बढ़ती महत्वाकांक्षा-गिरता राजनैतिक स्तर


भगवत कौशिक।

किसी भी देश उन्नति व प्रगति उस देश की मजबूत राजनैतिक इच्छाशक्ति व समाज के प्रति मानवता की भावना पर निर्भर करती है।यदि देश राजनैतिक व धर्म जैसे मामलो मे स्पष्ट दृष्टिकोण अपनाता है तो वो देश कभी भी आंतरिक मोर्चे पर मार नहीं खाता।राजनीति और धर्म दोनों ही दूजे से अलग न हो सकने वाले विषय है ।लेकिन यदि हम अपने देश की बात करे तो आज दोनो ही विषय निम्नता के स्तर को पार कर चुके है।अपनी महत्वाकांक्षा को पुरी करने के लिए एक तरफ राजनेता धर्म की आड मे समाज को आपस मे बाटं रहे है तो दुसरी तरफ धर्म के ठेकेदार लोगों की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके अपनी राजनैतिक जमीन तैयार करके स्वयंभू बनने की जुगत बैठाने मे लगे हुए है। “नफरत की लाठी तोड़ो लालच का खंजर फेकों जिद के पीछे मत दौड़ो, तुम प्रेम के पंछी हो देश प्रेमियों, आपस में प्रेम करो देश प्रेमियों…. “देश प्रेमी” फिल्म का ये गाना जो मोहम्मद रफी ने देश की जनता को इस गाने से माध्यम से भाईचारे का संदेश देने का काम किया। लेकिन फिल्मी गााने फिल्मों में अच्छे लगते हैं। सच्चाई इससे कही कोसो दूर है। देश की राजनीति मे जो कुछ  इन दिनों घटित हो रहा है वह किसी से छुपा नहीं है।


 आज देश के सभी पार्टियों के नेता धर्म और जात पात के नाम पर ब्यान देकर सुर्खिया बटोरने का काम कर रहे हैं और धर्म के साथ राजनीति को जोड़ कर देश की जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। कोई पूछने वाला नहीं, कोई बताने वाला नहीं, केवल नेता जी को चिंता है ” धर्म के नाम पर तैरने की और मुद्दा विहिन राजनीति करने की”। आखिर ऐसा क्यों कर रहे देश के नेता। इसे तुच्छ राजनीति भी कहां जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि किस प्रकार नेता हर रोज धर्म की आड़ में जनता की परेशानियों और समस्याओं को छुपा रहे हैं। उनसे किनारा कर रहे हैं। लेकिन जो धर्म जात पात का बीज देश की भोली भाली जनता के बीच में बोया जा रहा है उसका परिणाम क्या होगा? कोई नहीं जानता। केवल सत्ता पर आसीन होने का ख्वाब देख रही राजनीतिक पार्टियों को किस प्रकार मंहगा पड़ेगा ये समय ही बता सकता है, क्योंकि ये जनता जनार्दन है सब कुछ जानती है?  आज विचारधारा का कोई मतलब नहीं रहा है| भारतीय राजनीतिक दल केवल मुनाफे के अधिकतमकरण में दिलचस्पी रखने वाले कॉरपोरेट घराने बन गए हैं,जिनका प्रमुख लक्ष्य केवल और केवल सत्ता तक पहुंचना ही रह गया है |कोई भी दल किसी को भी टिकट देने में संकोच नहीं करता है जो जीत सकता है; यह वास्तव में कोई फर्क नहीं पड़ता भले ही वह अपराधी या बलात्कारी हो। कोई भारतीय राजनीति की तुलना किसी विशेष क्लब से कर सकता है। सदस्यता प्राप्त करने के लिए आपको कुछ क्लब सदस्यों द्वारा सिफारिश करने की आवश्यकता होती है और फिर आपको शुल्क के रूप में एक भारी राशि का भुगतान करना पड़ता है। लेकिन एक बार जब आप सदस्य होते हैं, तो आप हमेशा अपनी टेबल या अपने पार्टनर को एक ही टेबल पर बदलते रह सकते हैं। यह आजीवन सदस्यता है। आप जितनी बार चाहें अपनी राजनीतिक पार्टियों को बदल सकते हैं। कोई समस्या नहीं है, भले ही वे स्पष्ट रूप से वैचारिक झुकाव के विपरीत हों। लुटियन की दिल्ली का यह नया नियम है कि आपको पांच साल में एक बार जनता की तलाश करनी होगी, बीच में आप जो भी महसूस करते हैं, उसे करते रहें। आपकी ओर से,अच्छी तरह से तैयार किए गए प्रवक्ता हर शाम टेलीविजन स्क्रीन पर लड़ाई लड़ते रहेंगे। शो चल जाएगा, आप आराम कर सकते हैं।जनता को धर्म और जाति के नाम पर आपस में भड़काकर ये लोग सत्ता पर कब्ज़ा जमाते है | जिसका नतीज़ा आए  दिन धर्म और जाति के नाम पर हो रहे झगड़े और हमारे देश में पनपता आतंकवाद है | आज सभी पार्टिओ के नेता आपस में एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे है कोई किसी को चोर तो कोई किसी को देशद्रोही साबित करने में जुटे हुये है किसी को जनता कि समस्याओ से कोई मतलब नहीं है |इन मुद्दों को भुना कर राजनीति में कदम बढ़ा चुके देश के नेता आज उन्हीं मुद्दों से किनारा कर रहे हैं। वैसे तो राजनीति में चुने गये उम्मीदवारों के लिए जनता सर्वापरि है। जनता के सुख दुख उनके सुख दुख है। जनता की परेशानियों , समस्याओं को देश की सबसे बड़ी पंचायत में उठाने का हक केवल इन्हीं चुने गये नेताओं को मिला है। जिनको जनता ने भरोसा दिखा कर चुना और सत्ता पर काबिज करने का काम किया। ना जाने कितने मुद्दे लेकर देश की जनता सडक़ों पर उतर कर इंसाफ की भीख मांग रही है। देश में हर रोज धरने प्रदर्शनों का सहारा लिया जा रहा है । जब देश मे छोटी छोटी समस्याओं कज समाधान के लिए  सडक़ों का सहारा लेने पड़े तो समझिये कैसा होगा देश का कानून, जब कोई ईलाज के लिए तड़प तड़प कर अपने प्राण त्याग दे। तो जरा सोचिए कैसा हाल होगा। शिक्षा की आड़ में करोड़ो रूपए का चूना लगाने वाली शिक्षा प्रणाली पर कई बार सवाल उठ गये, बेरोजगारों को सुनहरे सपने दिखा कर कई बार उनकी वोट हथियाने का काम कर गये हैं। देश के नेता क्या राजनीति की आड़ में किस प्रकार के देश का निर्माण करने पर उतारू हो गये हैं देश की राजनीति के चाणक्य। 


भगवत कौशिक

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