ऐसे तो नहीं खत्म होगी किसानों की कर्जदारी

सुनील अमर 

देश के आधे किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं, सरकार ने इस बात को संसद में स्वीकार किया है। कृषि मंत्री शरद पवार ने गत सप्ताह सदन को बताया कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन यानी एन.एस.एस.ओ ने अपने ताजा सर्वे में पाया है कि देश के कुल किसान परिवारों में से 48.6 प्रतिशत ऋणग्रस्त हैं। आश्चर्य इस बात का है कि किसानों की तमाम तरह की सरकारी मदद दिए जाने के बावजूद उनके कर्जदार, कंगाल और अंततोगत्वा मौत को गले लगा लेने की घटनायें बढ़ती ही जा रही हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्य इस बात पर है कि रिपोर्ट में पंजाब, आंध्र, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सर्वाधिक ऋणग्रस्तता बतायी गयी है जो कि प्रगतिशील खेती करने वाले राज्य हैं, जिनके यहां शेष भारत की अपेक्षा कृषि जोतें अधिक बड़ी हैं और जिनका कृषि उत्पादन सदैव अच्छा रहा है। देश के छह राज्यों में यह स्थिति ज्यादा घातक है। सरकार द्वारा इन्हें ऋणमुक्त करने के लिए अब तक अपनाये गये सभी प्रयास फेल साबित हुए हैं।

भारत को अभी भी गांवों का देश कहा जाता है और 70 प्रतिशत से ज्यादा ही आबादी आज भी न सिर्फ गाॅवों में निवास करती है बल्कि देश के कुल श्रमिकों में से लगभग आधे खेती में ही समायोजित हैं। वैश्विक मंदी का देश पर असर नहीं पड़ा, हमारे खाद्य गोदामों में अनाज रखने की जगह नहीं है और हमारा भंडार मानक से दो गुना अधिक है, खाद्यान्न उत्पादन वृद्धि स्थिर है, यह सब अक्सर भारतीय कृषि की महानता को लेकर बताया जाता है। बीज, कीटनाशक, रासायनिक उर्वरक तथा ईंधन आदि भी उन्हें सरकार द्वारा रियायती दरों पर दिया जाता है और आजादी के बाद से अब तक की गई किसानों की सबसे बड़ी मदद के रुप में सरकार ने उन्हें 65,000 करोड़ रुपयांे की कृषि ऋण माफी भी वर्ष 2008 में दी। इन सबके बावजूद किसान को खुशहाल कौन कहे अगर वे ऋणमुक्त भी नहीं हो पा रहे हैं तो सोचना ही पड़ेगा कि खामी कहां है!

विदर्भ और बुंदेलखंड का उदाहरण हमारे सामने है। इन दोनों क्षेत्रों में सरकार द्वारा हजारों करोड़ रुपया अब तक व्यय कर देने के बावजूद स्थिति सुधरने को कौन कहे उल्टे बिगड़ती ही जा रही है। मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच का इलाका जिसे हम बुंदेलखण्ड के नाम से जानते हैं, अब देश का दूसरा विदर्भ बनता जा रहा है। कृषि के लिए वर्षों से विपरीत रही परिस्थितियां ने यहां के लोगों विशेषकर किसानों को बैंकों या साहूकारों से कर्ज लेने को मजबूर कर दिया। अगली फसल अच्छी होने की आशा में लिया गया कर्ज बढ़ता गया और जमीन बिकने की नौबत आयी तो गरीब लेकिन स्वाभिमानी किसान ने इतनी सारी जलालत झेलने के बजाय मौत को गले लगाना उचित समझा। यह समझना चाहिए कि आत्महत्या करने जैसा कदम कोई तब उठाता है जब उसको सारे रास्ते बंद नजर आने लगते हैं। कर्जमाफी खत्म करने के कई उपाय करने के बावजूद अगर लोगों का विश्वास नहीं सरकार में नहीं बन रहा है तो यह देखा जाना चाहिए कि इसे और भरोसेमंद कैसे बनाया जा सकता है।

यह समझ लेना जरुरी है कि जिस तरह किसी मरीज को महज खून चढ़ाकर जीवित नहीं रखा जा सकता उसी तरह सामुदायिक रसोई चलाकर और एकाध राउण्ड में कर्ज माफ कर किसानांे की स्थाई मदद नहीं की जा सकती। सरकार ने कुछ किसानों का कर्ज माफ कर दिया, सो ठीक रहा अन्यथा उसे या तो बंधक रखी जमीन नीलाम करानी पड़ती या जेल जाना पड़ता लेकिन किसान को दुबारा कर्ज न लेना पड़े या अगर वह ले तो उसका भुगतान कर सके, इसकी परिस्थितियाॅ बनाई ही नहीं जा रही हैं। देश में सबसे पहले विदर्भ (महाराष्ट्र) के किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं को थामने के लिए ऋणमाफी और सहायता के पैकेज दिये गये। विदर्भ में किसानों द्वारा आत्महत्या करने का औसत प्रतिवर्ष 1000 से भी ज्यादा है। वहाॅ अब तक 4000 करोड़ रुपये से अधिक की कंेद्रीय सहायता दी जा चुकी है लेकिन हालात में जरा भी फर्क नहीं आया है। ऐसा ही बुंदेलखंड में हो रहा है जहाॅ कई हजार करोड़ रुपये खर्चने और कर्ज माफी के बावजूद किसानों द्वारा आत्महत्या करने को वो भयावह सिलसिला जारी है कि पिछले महीने उ.प्र. उच्च न्यायालय ने समााचार पत्रांे में छप रही खबरों का स्वतः संज्ञान लेते हुए न सिर्फ वहां हो रही हर प्रकार की सरकारी वसूली पर रोक लगा दी अपितु उ.प्र. सरकार को वहां चल रही राहत योजनाओं की सम्पूर्ण जानकारी देने के लिए अदालत में भी तलब किया।

आज देश के किसी भी क्षेत्र के किसान के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक है वह आत्म निर्भरता जो उसे खेती से प्राप्त हो। खेती से आत्मनिर्भरता तभी आ सकती है जब या तो उसे उसकी उपज का बाजार के समतुल्य दाम मिले या फिर एक निश्चित जोत पर एक निश्चित सरकारी प्रतिपूर्ति की पक्की व्यवस्था हो जैसा कि पश्चिम के कई विकसित देशों में बहुत दिनों से है। यह सच है कि सरकार प्रतिवर्ष खाद्यान्नों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती हैं, लेकिन यह मूल्य किस मंहगाई को मानक मानकर निर्धारित किया जाता यह रहस्य ही होता है। इस खिलवाड़ को ऐसे समझा जा सकता है कि जब बाजार में उपलब्ध तमाम वस्तुओं के दामों में उनकी नाप-तौल की मानक इकाई के अनुसार 500 रुपये से 5000 तक की वृद्धि हो जाती है तो सरकार गेहूं और धान में 25-30 रुपये प्रति कुंतल की बढ़ोत्तरी कर देती है! वर्ष 1967 में एक कुंतल गेंहूं बेचने पर किसान 121लीटर डीजल खरीद सकता था, लेकिन आज वह एक कुंतल में महज 26 लीटर ही पाता है! ऐसा क्योंकर संभव हुआ? एक किसान को बाजार भाव पर टिकाये रखने के लिए क्या यह जरुरी नहीं था कि जैसे-जैसे बाजार चढ़े वैसे-वैसे किसान के उत्पाद का दाम भी सरकार चढ़ाये?यह जिम्मेदारी सरकार की इसलिए भी थी कि देश में खेती के अलावा छोटे से छोटा भी कोई ऐसा उद्योग-धंधा नहीं है जिसके उत्पाद का दाम सरकार लगाती हो! आप को जानकर आश्चर्य होगा कि बीते दशक में तो ऐसा भी हुआ है कि 4-5वर्षो के बीच में सरकार ने गेहॅू और धान के दामों में केवल 10रुपये की ही वृद्धि की! यानी 2रुपया सालाना!

किसी भी देश के लिए कृषि प्राणतत्व होती है। सम्पन्न से सम्पन्न व्यक्ति भी रोटी ही खाता है। देश की आबादी हर दसवें साल एक देश के बराबर बढ़ रही है। भारतीय कृषि पर तो वैसे भी वैश्विक दबाव हैं क्योंकि कृषि जमीन की यहाॅ प्रचुरता होने के कारण विश्व के वे देश जिनके यहाॅ प्राकृतिक कारणों से पर्याप्त खाद्यान्न नहीं पैदा हो पाता, वो भी भारत सरीखे देशों पर निर्भर करते हैं कि हम अपनी जरुरत से कहीं अधिक अनाज पैदा कर उन्हें बेच दें। यह जानना दिलचस्प होगा कि खाद्यान्न की कमी से डरे ऐसे कई देश दूसरे देशों में भारी मात्रा में जमीन खरीद रहे हैं ताकि वहां वे अनाज पैदा कर अपने देश को ला सके। ऐसे में भारतीय किसान की रक्षाकर उसे हर हाल में खेती की तरफ उन्मुख किये रहना अत्यंत आवश्यक है। खेती से ऊबा किसान तो अपने खाने भर को पैदा करने के बाद मजदूरी भी कर लेगा लेकिन तब हम कहीं 1970 के पहले वाली हालत में न पहुॅच जाॅय जब हम दुनिया के खाद्यान्न सम्पन्न देशों के सामने कटोरा फैलाये खड़े रहते थे। इसलिए तमाम तरह की रियायतों और कर्जमाफी के बजाय किसान को खेती द्वारा आत्म्निर्भर बनाने के प्रयास किये जाने चाहिए।

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