भारत में छुआ-छूत नहीं थी / डॉ. राजेश कपूर

-डा. राजेश कपूर, पारम्परिक चिकित्सक

पता नहीं भारत में कब और कैसे ये छुआ-छूत का विषधर सांप घुस गया? पूर्वाग्रहों को छोड़ कर ज़रा तथ्यों व प्रमाणों की रोशनी में देखें तो पता चलता है कि भारत में जातियां तो थीं पर छुआ- छूत नहीं. स्वयं अंग्रेजों के द्वारा दिए आंकड़े इसके प्रमाण हैं.

भारत को कमज़ोर बनाने की अनेक चालें चलने वाले अंग्रेजों ने आंकड़े जुटाने और हमारी कमजोरी व विशेषताओं को जानने के लिए सर्वे करवाए थे. उन सर्वेक्षणों के तथ्यों और आज के झूठे इतिहास के कथनों में ज़मीन आस्मान का अंतर है.

सन १८२० में एडम स्मिथ नामक अँगरेज़ ने एक सर्वेक्षण किया. एक सर्वेक्षण टी. बी. मैकाले ने १८३५ करवाया था. इन सर्वेक्षणों से ज्ञात और अनेक तथ्यों के इलावा ये पता चलता है कि तबतक भारत में अस्पृश्यता नाम की बीमारी नहीं थी.

यह सर्वे बतलाता है कि—

# तब भारत के विद्यालयों में औसतन २६% ऊंची जातियों के विद्यार्थी पढ़ते थे तथा ६४% छोटी जातियों के छात्र थे.

# १००० शिक्षकों में २०० द्विज / ब्राह्मण और शेष डोम जाती तक के शिक्षक थे. स्वर्ण कहलाने वाली जातियों के छात्र भी उनसे बिना किसी भेद-भाव के पढ़ते थे.

# मद्रास प्रेजीडेन्सी में तब १५०० ( ये भी अविश्वसनीय है न ) मेडिकल कालेज थे जिनमें एम्.एस. डिग्री के बराबर शिक्षा दी जाती थी. ( आज सारे भारत में इतने मेडिकल कालेज नहीं होंगे.)

# दक्षिण भारत में २२०० ( कमाल है! ) इंजीनियरिंग कालेज थे जिनमें एम्.ई. स्तर की शीशा दी जाती थी.

# मेडिकल कालेजों के अधिकांश सर्जन नाई जाती के थे और इंजीनियरिंग कालेज के अधिकाँश आचार्य पेरियार जाती के थे. स्मरणीय है कि आज छोटी जाती के समझे जाने वाले इन पेरियार वास्तुकारों ने ही मदुरई आदि दक्षिण भारत के अद्भुत वास्तु वाले मंदिर बनाए हैं.

# तब के मद्रास के जिला कलेक्टर ए.ओ.ह्युम ( जी हाँ, वही कांग्रेस संस्थापक) ने लिखित आदेश निकालकर पेरियार वास्तुकारों पर रोक लगा दी थी कि वे मंदिर निर्माण नहीं कर सकते. इस आदेश को कानून बना दिया था.

# ये नाई सर्जन या वैद्य कितने योग्य थे इसका अनुमान एक घटना से हो जाता है. सन १७८१ में कर्नल कूट ने हैदर अली पर आक्रमण किया और उससे हार गया . हैदर अली ने कर्नल कूट को मारने के बजाय उसकी नाक काट कर उसे भगा दिया. भागते, भटकते कूट बेलगाँव नामक स्थान पर पहुंचा तो एक नाई सर्जन को उसपर दया आगई. उसने कूट की नई नाक कुछ ही दिनों में बनादी. हैरान हुआ कर्नल कूट ब्रिटिश पार्लियामेंट में गया और उसने सबने अपनी नाक दिखा कर बताया कि मेरी कटी नाक किस प्रकार एक भारतीय सर्जन ने बनाई है. नाक कटने का कोई निशान तक नहीं बचा था. उस समय तक दुनिया को प्लास्टिक सर्जरी की कोई जानकारी नहीं थी. तब इंग्लॅण्ड के चकित्सक उसी भारतीय सर्जन के पास आये और उससे शल्य चिकित्सा, प्लास्टिक सर्जरी सीखी. उसके बाद उन अंग्रेजों के द्वारा यूरोप में यह प्लास्टिक सर्जरी पहुंची.

### अब ज़रा सोचें कि भारत में आज से केवल १७५ साल पहले तक तो कोई जातिवाद याने छुआ-छूत नहीं थी. कार्य विभाजन, कला-कौशल की वृद्धी, समृद्धी के लिए जातियां तो ज़रूर थीं पर जातियों के नाम पर ये घृणा, विद्वेष, अमानवीय व्यवहार नहीं था. फिर ये कुरीति कब और किसके द्वारा और क्यों प्रचलित कीगई ? हज़ारों साल में जो नहीं था वह कैसे होगया? अपने देश-समाज की रक्षा व सम्मान के लिए इस पर खोज, शोध करने की ज़रूरत है. यह अमानवीय व्यवहार बंद होना ही चाहिए और इसे प्रचलित करने वालों के चेहरों से नकाब हमें हटनी चाहिए. साथ ही बंद होना चाहिए ये भारत को चुन-चुन कर लांछित करने के, हीनता बोध जगाने के सुनियोजित प्रयास. हमें अपनी कमियों के साथ-साथ गुणों का भी तो स्मरण करते रहना चाहिए जिससे समाज हीन ग्रंथी का शिकार न बन जाये. यही तो करना चाह रहे हैं हमारे चहने वाले, हमें कजोर बनाने वाले. उनकी चाल सफ़ल करने में‚ सहयोग करना है या उन्हें विफ़ल बनाना है? ये ध्यान रहे!

26 thoughts on “भारत में छुआ-छूत नहीं थी / डॉ. राजेश कपूर

  1. वेदों के बारे में मैकाले के मानसपुत्रों ने कुछ भ्रान्तिया फैलाई हैं , उन्ही भ्रांतियों में से एक यह भी है कि वे ब्राह्मणवादी ग्रंथ हैं और शूद्रों के साथ अन्याय करते हैं | यही नहीं मैकाले के मानस पुत्रों द्वारा हिन्दू/सनातन/वैदिक धर्म का मुखौटा बने जातिवाद की जड़ भी वेदों में बताई जा रही है और इन्हीं विषैले विचारों पर दलित आन्दोलन इस देश में चलाया जा रहा है |

    परंतु, इस से बड़ा असत्य और कोई नहीं है | इस पोस्ट में इस मिथ्या मान्यता को खंडित करते हुए, वेद से स्थापित करेंगे कि –

    १. चारों वर्णों का और विशेषतया शूद्र का वह अर्थ है ही नहीं, जो मैकाले के मानसपुत्र दुष्प्रचारित करते रहते हैं |

    २. वेद ही एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जो सर्वोच्च गुणवत्ता स्थापित करने के साथ ही सभी के लिए समान अवसरों की बात कहता हो | जिसके बारे में आज के मानवतावादी तो सोच भी नहीं सकते | आइए, वेद के कुछ उपासना मंत्रों से जानें कि वेद शूद्र के बारे में क्या कहते हैं –

    रुचन्नो धेहि ब्राह्मणेषु रुचं राजषु नस्कृधि | रुचं विश्येषु शूद्रेषु मयि धेहि रुचा रुचं || यजुर्वेद १८ | ४८ ||

    अर्थात – हे भगवन! हमारे ब्राह्मणों में, क्षत्रियों में, वैश्यों में तथा शूद्रों में ज्ञान की ज्योति दीजिये | मुझे भी वही ज्योति प्रदान कीजिये ताकि मैं सत्य के दर्शन कर सकूं |

    यद्ग्रामे यदरण्ये यत्सभायां यदिन्द्रिये | यच्क्षुद्रे यदर्ये यदेनश्रचकृमा वयं यदेकस्याधि धर्मणि तस्यावयजनमसि || यजुर्वेद २० | १७ ||

    अर्थात – जो अपराध हमने गाँव, जंगल या सभा में किए हों, जो अपराध हमने इन्द्रियों से किए हों, जो अपराध हमने शूद्रों से और वैश्यों से किए हों और जो अपराध हमने किसी अधिकार को धारण कर्णे में किए हों, हे वरुण देव ! आप हमारे उन सभी पापो का निवारण करे |

    यथेमां वाचं कल्याणी मावदानि जनेभ्यः | ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च | प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयं मे कामः समृध्यतामुप् मादो नमतु || यजुर्वेद २६ | २ ||

    अर्थात – जिस प्रकार कल्याण करने वाली इस (दिव्य) वेदवाणी का हमने ( मंत्र दृष्टा ऋषि ) ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य, स्त्री तथा जो अत्यन्त पतित हैं उनके भी कल्याण के लिये उपदेश दिया हैं | उसी प्रकार , हे मनुष्यों आप लोग भी उपदेश करे, जिससे इस संसार में यज्ञ हेतु देवताओ को दक्षिणा देने वाले लोग हमसे प्रेम करे | हमारा यह अभीष्ट मनोरथ पूर्ण हो और हमें यश कि प्राप्ति हो |

    प्रियं मा दर्भ कृणु ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च |
    यस्मे च कामयामहे सर्वस्मै च विपश्यते || अथर्ववेद १९ | ३२ | ८ ||

    हे दर्भ ( प्रचंड शक्ति संपन्न औषधि ) ! ब्राह्मणों , क्षत्रियों , शुद्रो और वैश्यों के लिए हम जिस प्रकार प्रियपात्र बन सके , वैसा हमें बनाए | हम जिसके प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार करते हैं , उनके लिए भी आप हमें प्रिय पात्र बनाए |

    प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजषु मा कृणु | प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शुद्र उतार्ये || अथर्ववेद १९ | ६२ | १ ||
    हे अग्नि देव ! आप हमें देवताओ और राजाओ का प्रिय बनाए | शुद्रो , वैश्यों आदि सभी दर्शको का भी प्रिय पात्र बनाए |

    इन वैदिक प्रार्थनाओं से विदित होता है कि –

    -वेद में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण समान माने गए हैं |
    -सब के लिए समान प्रार्थना है तथा सबको बराबर सम्मान दिया गया है |
    -और सभी अपराधों से छूटने के लिए की गई प्रार्थनाओं में शूद्र के साथ किए गए अपराध भी शामिल हैं |
    -वेद के ज्ञान का प्रकाश समभाव रूप से सभी को देने का उपदेश है |

    यहां विशेष रूप से यह भी ध्यान देने योग्य है कि कुछ मंत्रों में शूद्र शब्द वैश्य से पहले आया है,अतः स्पष्ट है कि न तो शूद्रों का स्थान अंतिम है और ना ही उन्हें कम महत्त्व दिया गया है | इस से सिद्ध होता है कि वेदों में शूद्रों का स्थान अन्य वर्णों की ही भांति आदरणीय है और उन्हें उच्च सम्मान प्राप्त है |

    धर्म ग्रंथो कि बात कि जाय तो वेद ही अंतिम प्रमाण हैं |

  2. इतिहास की एक रोचक और बड़े महत्व की जानकारी सुधि पाठकों के लिए है कि………..
    भारत में अंग्रेजों के आने से पहले भी स्वदेशी तकनीक से चेचक का टीकाकरण होता था. आई.आई.टी दिल्ली के प्रो राजेन्द्र जी ने भी यह जानकारी प्राप्त की थी और अनेक कार्यक्रमों में इसकी जानकारी वे देते रहते हैं. # १० फ़रवरी,१७३१ को ओलिवर कोल्ट के नाम आर. कोल्ट ने एक पत्र लिख कर इसकी जानकारी देते हुए लिखा था कि गंगा के तट पर कासिम बाज़ार से आगे चंपारण कस्बे में चेचक का टीकाकरण बड़ी सफलता से होता हुआ उसने देखा था. इसीप्रकार ऍफ़.आर.एस., डा. जेजेड ने लन्दन के कॉलेज ऑफ फिजिशियंज़ के सदस्यों और अध्यक्ष के सामने बोलते हुए कहा था कि भारतीयों द्वारा किये चेचक के टीकाकरण में १० लाख में से एक असफल होता है. ज्ञातव्य है कि अंग्रेजों का टीकाकरण में सफलता का प्रतिशत इससे बहुत कम था. वे भारतीयों की इस प्रतिभा पर बड़े हैरान थे. यूरोपियों द्वारा टीकाकरण की खोज से बहुत पहले से भारतीय लोग इस कला के माहिर थे. विचार का विषय है कि जब ऐसा था तो भारत असभ्य गंवार कैसे हो सकता है? क्या इसका यह अर्थ नहीं कि अंग्रेजों द्वारा भारत को असभ्य, निर्धन, अनपढ़ बनाने के कुटिल प्रयासों का परिणाम बाद का भारत है जिसकी सही तस्वीर को बड़े जतनों से अंग्रेजों व अन्य यूरोपियों ने छुपा कर रखा हुआ है. ये सारे तथ्य धर्म पाल जी ने अंग्रेजों के लिखे दस्तावेजों में ढूढ़ कर निकाले हैं जिनका अध्ययन उन्होंने ब्रिटेन में रह कर किया था.

  3. जाति एक ब्रिटीश कुचेष्टा”

    अनुवाद: डॉ. मधुसूदन
    एक पुस्तक अकस्मात हाथ लगी।बस, ले लीजिए उसे आप यदि ले सकते हैं तो। नाम है, , “Castes of Mind: Colonialism and Making of British India” अर्थात “मानसिक जातियां : उपनिवेशवाद और ब्रिटीश राज का भारत में गठन” और लिखी गयी है, एक इतिहास और मानव विज्ञान के अमरिकन प्रोफेसर Nicholas D. Durks द्वारा।
    लेखक तर्क देकर पुष्टि भी करते हैं, कि वास्तविक वे अंग्रेज़ ही हैं, जिन्होंने जाति व्यवस्था के घृणात्मक रूपका आधुनिक आविष्कार किया, और कपटपूर्ण षड-यंत्र की चाल से जन-मानस में, उसे रूढ किया। आगे लेखक कहते हैं कि, जाति भेद, जिस अवस्था में आज अस्तित्व में है, उसका अंग्रेज़ो के आने से पहले की स्थिति से , कोई समरूपता (सादृश्यता ) नहीं है।
    कुछ विषय से हटकर यह भी कहा जा सकता है, कि, उन्होंने यही कपट अफ्रिकन जन-जातियों के लिए भी व्यवहार में लाया था। उद्देश्य था; वंशजन्य भेदों को बढा चढाकर प्रस्तुत करना, प्रजा जनों को उकसाना, विभाजित करना, आपस में भीडा देना, और उसी में व्यस्त रखना। इसी प्रकार, अपने राज की नीवँ पक्की करना।
    जिस अतिरेकी, और पराकोटि की मात्रा में, पश्चिमी समाज के जन-मानस में यह जातिभेदात्मक (जातिव्यवस्था नहीं?) अवधारणा घुस चुकी है, यह वामपंथियों की आत्मघाती, कुनीतियों के कारण ही है; यह भी इसी से स्पष्ट हो जाता है। {इस अनुवादक को इसकी, अनेक बार प्रतीती हो चुकी है। }
    वे इसका, बढा चढाकर, अतिरंजित घृणात्मक वर्णन करते हैं, और साथ में, इस मिथ्या धारणा का प्रचार, कि हिंदू (धर्म) माने केवल अंतर्जातीय वैमनस्य, हिंदुओं के पास दूसरा कोई मौलिक या आध्यात्मिक ज्ञान नहीं था या है।
    निश्चित रूपसे, यह एक ढपोसले के अतिरिक्त कुछ भी नहीं, और यह षड-यंत्र भी , कुछ रिलीजनों के (धर्मों के नहीं) कूटनैतिक उद्देश्यों से ही, संचलित है। ऐसी, कूट-नैतिक धारणाएं पश्चिमी (रिलीजन वाले) भारत में फैलाना चाहते हैं।
    आगे लेखक कहता है,; हिंदु सजग हो जाएं, और इस फंदे में ना फंसे।
    मैं ऐसा विद्वत्तापूर्ण लेखन -कुछ, ब्रिटीश और अमरिकन विद्वानों द्वारा ही, देख रहा हूं, जो सच्चाई के प्रति निष्ठा रखते हैं, और सही अर्थ में सत्य शोधक हैं। ऐसा लेखन, ब्रिटीशरों की कुचेष्टा ओं पर,जो जातियों के बीच, परस्पर घृणा को उत्तेजित करती थी, जो आज भी, दिखाई देती है, उस पर प्रकाश फेंकता है। सोचिए,==>किस कारण से पश्चिमी प्रोफेसर इस काममें इतनी सामग्री ढूंढ सकते हैं, जिस से ऐसी (पूरी) पुस्तकें लिखी जा सकती है; but Indian scholars keep groping in the dark? पर भारतीय विद्वान (?) अंधेरे में लडखडा कर टटोलते रह जाते हैं?
    या. कहीं, ऐसा तो नहीं कि, बहुतेरे इतिहासज्ञ वाम पंथी दल के होने के कारण इस दिशा में जाना ही नहीं चाहते, कि डरते हैं, कि, यदि गए, और सत्य हाथ लगा तो फिर उनके अपने हिंदुत्व के विषयमें कुप्रचार के धंधे में सेंध लग जाएगी।
    विशेष : निम्न समीक्षाएं, कुछ विद्वानों के शब्दोमें, बिना अनुवाद :
    ’…..Massively documented and brilliantly argued,- “Castes of Mind” – is a study in true contrapuntal ( प्रचलित मान्यता से अलग ) interpretation.’
    (Edward W. Said )
    ’……..Nevertheless, this groundbreaking work of interpretation demands a careful scholarly reading and response.’
    (John F. Riddick)
    Central Michigan Univ. Lib., Mt. Pleasant.
    ==>Dirks (Prof. history and anthropology, Columbia Univ.) elects to support the (latter) view.’Adhering to the school of Orientalist thought promulgated by Edward Said and Bernard Cohn, Dirks argues that ==>British colonial control of India for 200 years pivoted on its manipulation of the caste system’<==
    —-From Library Journal
    ’मधुसूदन उवाच’ इस समीक्षा का केवल अनुवादक है।

  4. आपके तथ्य सही हैं, पर यह भी सच है की अंग्रजो के पहले से ही यहाँ छुआछूत आ चूका था, अछूतों का मंदिर में प्रवेश वर्जित होना, एकलव्य की घटना, parshuram or karn की kath aadi kitna kuchh है ise sabit karne के liye .

  5. * इतिहास तथ्यों के आधार पर चलता है. हम तथ्यों के विश्लेषण में मतभेद तो रख सकते हैं पर तथ्यों को नकार नहीं सकते, उनसे मुंह नहीं चुरा सकते. * जो कहते हैं की हमको ऐतिहासिक तथ्य नहीं जानने, केवल पौराणिक ग्रंथों से ही अस्पृश्यता के प्रमाण निकालने हैं. तो इससे क्या समझा जाए ? अर्थात उनकी नीयत की खोट सामने उन्ही के शब्दों में आगई. वे सच से भागना चाहते हैं और केवल-केवल वही कहना, सुनना, सुनाना चाहते हैं जो भारत, भारतीयता या हिन्दू के विरुद्ध है. यही तो हम सब भी चाहते हैं की इनकी वास्तविकता, इनकी असली नीयत को सब जान जाएँ. ऐसे लोगों के विरुद्ध आ रही अनगिनत टिप्पणियों से साफ़ पता चलता है की ये लोग अपना सम्मान और विश्वास निरंतर खो रहे हैं. # इतने तथ्य ऊपर दिए पर कुछ लोग हैं जो इनमें से एक को भी विचार के योग्य नहीं समझते. ऐसे लोगों से संवाद कैसे संभव है जो तथ्यों व प्रमाणों के आधार पर नहीं, बस अपने पूर्वाग्रहों पर ही बात करना / अड़ना मात्र जानते हैं. # किसी भी समाज में कभी भी सबकुछ अछा होना संभव नहीं, सदा एक सा रहना संभव नहीं.सुनील पटेल जी की टिपण्णी भी इस तथ्य को स्पष्ट करती है. * विश्व के सारे समाजों की तुलना में भारत सर्वोत्तम रहा है, इतिहास यह कहता है और वह भी अनेक स्रोतों और प्रमाणों के आधार. * पर कल भी अनेक कमियाँ थी और आज भी हैं, जिन्हें हम सबको मिल-जुल कर दूर करना है. यही सतत प्रक्रिया है. * जो हमारी जड़ें खोद रहे हैं, उनसे भी विद्वेष रखने की ज़रूरत नहीं. वे या तो सुधर जायेंगे या समय के प्रवाह में खो जायेंगे. हमारी सात्विक संस्कृति की जीत सुनिश्चित है.

  6. दीपा शर्माजी आपकी बातों से मै सहमति रखता हूँ छुआछुत कोई आधुनिक व्यवस्था नहीं है और न यह अंग्रेजों के द्वारा सर्वप्रथम फैलाई गई है जिन पश्चिम विद्वानों यथा मेक्समूलर, का नाम लिया जा रहा है उन लोगों का इससे दूर दूर तक सम्बन्ध नहीं है पता नहीं कपूर जी जैसे लोग कहाँ से इन बातों को खोज लेते है या कयास लगा लेते है ,खैर उनकी वे जाने. एक बार की बात है काशी में आदि गुरु शंकराचार्य ब्रह्ममुहूर्त में गंगा स्नान कर लौट रहे थे कि रास्ते में एक चांडाल दूसरी तरफ से आ रहा था .शंकराचार्य ने उसे रास्ते से हटने को कहा क्योंकि वह अस्प्रश्य था जब कि यह नाटक स्वयं शिवजी ने किया था चांडाल के वेश में उन्होंने यह शिक्षा दी कि तुम्हारा अद्वैत दर्शन कैसे तुम्हे इस तरह के विचार कि अनुमति देता है.कहते है शंकराचार्य ने इसके लिए छमा याचना की रामानंद जैसे संत ने भी कबीर को शिष्य बनाने से इंकार किया क्यों की वे जुलाहे थे और इस कारण अश्प्रस्य भी.ये और बात है की उन्होंने दीक्छा के लिए अन्य मार्ग चुना अंग्रेज भारत मुश्किल से दो ढाई साल पहले आये थे जब की छुआ छूत की बीमारी कई सौ साल पहले से मौजूद रही है आज कल कतिपय लेखको में यह चलन हो गया है अपनी हर सामाजिक बुराइयों के लिए विदेशी शासकों को जिम्मेदार ठहराना और प्रकारांतर में साम्यवादी इतिहास लेखन को भला बुरा कहना इन लोगों के लिए साम्यवाद एक भूत की तरह पीछा करता दिखाई देता है मानव मानव से भेदभाव रखे यह सिर्फ हमारे तथाकथित सनातन धर्म में ही संभव है
    बिपिन कुमार सिन्हा

  7. डा. मीना जी, दीपा जी, रवि कुमार जी अनेक शूद्र ऋषि हैं जो वेदों की ऋचाओं के द्रष्टा हैं. अनेक महिलाएं भी वेदमंत्रों की द्रष्टा हैं. स्वयं व्यासदेव भी तो शूद्र थे. शूद्र भीलनी के जूठे बेर श्री राम खाते हैं, शूद्र केवट की भक्ति से विभोर होकर उसे गले लगाते हैं. लक्षमण उन बेरों को खाने से इसलिए इंकार नहीं करते कि वह शूद्र है, बेर जूठे होने के कारन नहीं खाए . और उपरोक्त लेख में दिए ऐतिहासिक प्रमाणों को आप कैसे नकार सकते हैं ? अतः पुराणों और मनुस्मृति के मात्र कुछ श्लोकों से तो पूरी तरह सिद्ध नहीं हो जता की ये सब इसी रूप में प्रचलित था. फिर इन श्लोकों के जो अर्थ आप के द्वारा दिए गए हैं, उनपर भी तो विचार करना चाहिए. अपने कुछ विद्वान मित्रों को इनके सही अर्थ बतलाने के लिए दे रहा हूँ. दीपा जी (?) आपने जिन और प्रमाणों की बात की हैं, दे सकें तो वे भी दे दें. उन पर भी विद्वानों की सम्मति ली जा सकेगी. यह आवश्यक इस लिए है क्यूंकि अनेकों विदेशी शासकों और ईसाई प्रचारकों ने स्पष्ट लिखा है कि वे इस संस्कृत अनुवाद आदि का काम हिन्दू धर्म की जड़ें खोदने और ईसाईयत प्रचार के लिए कर रहे है. (मैक्समुलर, मैकाले, फादर विलियम मोनियर आदि) अतः यदि आप द्वारा उद्दृत अनुवाद किसी विदेशी या उनके अनुयायी द्वारा किये हुए होंगे तो गलत होने की पूरी आशंका है. इस लिए किसी संस्कृत विद्वान की सम्मति लेने में कोई हानि नहीं. जो भी सच होगा, सामने आ जाएगा. पर तब तक उपरोक्त लेख के प्रमाणों को भी खातिर में लाकर संतुलित बात करें. धन्यवाद !

  8. डॉ. राजेश जी,नमस्कार। आज ही मैं ने इस पुस्तक को मँगाया है।कुछ एक सप्ताह, आते आते लग जाएगा। फिर कुछ पढ कर आलेख बना सकता हूं।
    १० मई, तो आज ही है। कमसे कम दो सप्ताह चाहिए। फिर भी प्रयास करूंगा कि पुस्तक आते ही, पढ लूं। पुस्तक अंग्रेज़ी में होने से भी, समय अधिक लग जाता है। पुस्तक आते ही कुछ ठीक अनुमान होगा।
    १० जुलाई की संगोष्ठी के पहले— निश्चित किया जा सकता है। पर १० मई तो(आज है) असंभव है।
    भारत में उपलब्ध शायद होगी ही। आंतर्जाल पर देखें, और मैं भी प्रयास करता हूं।
    यदि भारत में उपलब्ध हो तो सारी समस्या सुलझ जाएगी, ऐसा मानता हूं।

    धन्यवाद।

  9. प्रो. मधुसुदन जी इस अमूल्य जानकारी के लिए अभिनन्दन एवं आभार. क्या यह पुस्तक भारत में उपलब्ध हो सकेगी ? क्या आप इसके उल्लेखनीय अंशों पर एक लेख प्रकाशित कर सकेंगे? एक संगोष्ठी इसी विषय पर १० जुलाई को प्रस्तावित है. क्या इस विषय पर एक शोध आलेख आपका या आपके सहयोगी-मित्र का १० मई से पूर्व प्रकाशन व वाचन हेतु प्राप्त हो सकेगा ?

  10. जाति एक ब्रिटीश कुचेष्टा”
    http://indianrealist.wordpress.com/2009/07/04/1875/
    अनुवाद: डॉ. मधुसूदन
    एक पुस्तक अकस्मात हाथ लगी।बस, ले लीजिए उसे आप यदि ले सकते हैं तो। नाम है, , “Castes of Mind: Colonialism and Making of British India” अर्थात “मानसिक जातियां : उपनिवेशवाद और ब्रिटीश राज का भारत में गठन” और लिखी गयी है, एक इतिहास और मानव विज्ञान के अमरिकन प्रोफेसर Nicholas D. Durks द्वारा।
    लेखक तर्क देकर पुष्टि भी करते हैं, कि वास्तविक वे अंग्रेज़ ही हैं, जिन्होंने जाति व्यवस्था के घृणात्मक रूपका आधुनिक आविष्कार किया, और कपटपूर्ण षड-यंत्र की चाल से जन-मानस में, उसे रूढ किया। आगे लेखक कहते हैं कि, जाति भेद, जिस अवस्था में आज अस्तित्व में है, उसका अंग्रेज़ो के आने से पहले की स्थिति से , कोई समरूपता (सादृश्यता ) नहीं है।
    कुछ विषय से हटकर यह भी कहा जा सकता है, कि, उन्होंने यही कपट अफ्रिकन जन-जातियों के लिए भी व्यवहार में लाया था। उद्देश्य था; वंशजन्य भेदों को बढा चढाकर प्रस्तुत करना, प्रजा जनों को उकसाना, विभाजित करना, आपस में भीडा देना, और उसी में व्यस्त रखना। इसी प्रकार, अपने राज की नीवँ पक्की करना।
    जिस अतिरेकी, और पराकोटि की मात्रा में, पश्चिमी समाज के जन-मानस में यह जातिभेदात्मक (जातिव्यवस्था नहीं?) अवधारणा घुस चुकी है, यह वामपंथियों की आत्मघाती, कुनीतियों के कारण ही है; यह भी इसी से स्पष्ट हो जाता है। {इस अनुवादक को इसकी, अनेक बार प्रतीती हो चुकी है। }
    वे इसका, बढा चढाकर, अतिरंजित घृणात्मक वर्णन करते हैं, और साथ में, इस मिथ्या धारणा का प्रचार, कि हिंदू (धर्म) माने केवल अंतर्जातीय वैमनस्य, हिंदुओं के पास दूसरा कोई मौलिक या आध्यात्मिक ज्ञान नहीं था या है।
    निश्चित रूपसे, यह एक ढपोसले के अतिरिक्त कुछ भी नहीं, और यह षड-यंत्र भी , कुछ रिलीजनों के (धर्मों के नहीं) कूटनैतिक उद्देश्यों से ही, संचलित है। ऐसी, कूट-नैतिक धारणाएं पश्चिमी (रिलीजन वाले) भारत में फैलाना चाहते हैं।
    आगे लेखक कहता है,; हिंदु सजग हो जाएं, और इस फंदे में ना फंसे।
    मैं ऐसा विद्वत्तापूर्ण लेखन -कुछ, ब्रिटीश और अमरिकन विद्वानों द्वारा ही, देख रहा हूं, जो सच्चाई के प्रति निष्ठा रखते हैं, और सही अर्थ में सत्य शोधक हैं। ऐसा लेखन, ब्रिटीशरों की कुचेष्टा ओं पर,जो जातियों के बीच, परस्पर घृणा को उत्तेजित करती थी, जो आज भी, दिखाई देती है, उस पर प्रकाश फेंकता है। सोचिए,==>किस कारण से पश्चिमी प्रोफेसर इस काममें इतनी सामग्री ढूंढ सकते हैं, जिस से ऐसी (पूरी) पुस्तकें लिखी जा सकती है; but Indian scholars keep groping in the dark? पर भारतीय विद्वान (?) अंधेरे में लडखडा कर टटोलते रह जाते हैं?
    या. कहीं, ऐसा तो नहीं कि, बहुतेरे इतिहासज्ञ वाम पंथी दल के होने के कारण इस दिशा में जाना ही नहीं चाहते, कि डरते हैं, कि, यदि गए, और सत्य हाथ लगा तो फिर उनके अपने हिंदुत्व के विषयमें कुप्रचार के धंधे में सेंध लग जाएगी।
    विशेष : निम्न समीक्षाएं, कुछ विद्वानों के शब्दोमें, बिना अनुवाद :
    ’…..Massively documented and brilliantly argued,- “Castes of Mind” – is a study in true contrapuntal ( प्रचलित मान्यता से अलग ) interpretation.’
    (Edward W. Said )
    ’……..Nevertheless, this groundbreaking work of interpretation demands a careful scholarly reading and response.’
    (John F. Riddick)
    Central Michigan Univ. Lib., Mt. Pleasant.
    ==>Dirks (Prof. history and anthropology, Columbia Univ.) elects to support the (latter) view.’Adhering to the school of Orientalist thought promulgated by Edward Said and Bernard Cohn, Dirks argues that ==>British colonial control of India for 200 years pivoted on its manipulation of the caste system'<==
    —-From Library Journal
    ’मधुसूदन उवाच’ इस समीक्षा का केवल अनुवादक है।

  11. Sri Kapoor साहब बहुत बहुत धन्यवाद।
    आपने बहुत अच्छा एवं सत्य लिखा है। वाकई इस देद्गा में छुआछूत को महामारी के रूप में फैलाने का कार्य तो अंग्रेजों ने किया था। यह ठीक है कि छुआछूत पहले से थी किन्तु वह कुछ ही जगह थी, जीवन के हर क्षेत्र में नहीं, समाज के हर कोने में नहीं थी। अंग्रेजो ने इसे पाला पोसा और फलदार वृक्ष हमें देकर चले गये।

    दुनिया के हर धर्म में उच नीच, अच्छाई-बुराई है। यह कालांतर मे बढ़ते घटते रहती है। हम अच्छाई को लेकर गर्व तो कर ही सकते हैं, अगर न करें तो भी बुराई तो न करें। जब इस देद्गा में लालू चालीसा, महिला नेत्रियों की स्तुति छंद रूप में बनाई जा सकती है तो क्यो नहीं मनुस्मिृति आदि में श्लोको को बदल कर गलत व्याखया नहीं की गई होगी।

    पिछले १००-१५० नहीं बल्कि ६०-६५ सालों से सच्चे भारतीय गौरवद्गााली इतिहास को दबाया गया। दूध का जला……………………. किन्तु जिस देद्गा में सच्चा इतिहास नहीं पढाया जायेगा वहां के नौजवानों का खून कहां से खोलेगा। अद्गवत्थामा ने जब पड ौसी के यहां दूध पिया तब उसे अपने घर में पिलाऐ जा रहे आटे के घोल और दूध में अन्तर पता चला।

  12. महोदय,
    आपने कुछ प्रमाण आंकड़ो के माध्यम से दिए हैं कुछ आंकड़े मेरे पास भी हैं जो विदेशियों के नहीं अपितु अपने ही यहाँ के हैं किरपिया ध्यान देना और खुद को और हमको भ्रामक जानकारी देने से बचाना,
    १- एक शुद्र को मत सिखाओ -स्कन्द पुराण , वैष्णव काण्ड १९ अध्याय

    २- नीच जाती के लोगो को कुछ मत सिखाओ अगर कोई ब्रह्मण ऐसा करता है तो दुसरे ब्राह्मणों को उसका बहिष्कार कर देना चहिये शिक्षित शुद्र को भी बहार कर देना चाहिए – ब्रह्मा काण्ड १०
    वेदों से दूर रखने के लिए———–………………………..
    १- शुद्रो को वेदों से दूर रखना चाहिए गौतम धर्म सूत्र कहता है अगर उनके कान में शलोक पद जाये तो पिघली धातु उनके कान में दाल देनी चाहिए
    २- अगर शुद्र शत्रिये ब्रह्मण या वैश्य की बराबरी करता है तो वो विभिनिं पारकर के दंड का भागिदार होगा- गौतम सूत्र २/३/५
    ३- मनुस्मृती २८१/८
    यदि कोई शुद्र रजा या ब्रह्मण की गद्दी पर बेठता है तो उसके नितम्बों को काटकर देश से निर्वासित कर देना चाहिए
    ४-मनुस्मृती ११/१३
    यहाँ शूद्रों के साथ डाकू जेसा वियाव्हार करने की अनुमति दी गई है उनका धन जबरिया कब्ज़ा करने की अनुमति दी गयी है
    ५- १८/४/७ और ४१७/८
    यहाँ शूद्रों को किसी भी पिरकार की सम्पति का अधिकारी नहीं बताया गया है
    6- jnam से दास ४१३/८ मनुस्म्र्ती
    शुद्र जनम से दास होता है और वो ब्रह्मण का सेवक होता है
    ७- १४२/८ इ बिड
    यहाँ शूद्रों के लिए धर्मशास्त्रों में ऊँची ब्याज दर का प्रावधान किया गया है ब्रह्मण और शत्रियों की अपेक्षा दुगनी
    ८- १३/ ३१ मनुस्मृती
    शुद्र अपनी जाती से बहार शादी नहीं कर सकता है जबकि अन्य कर सकते हैं
    मेरे पास काफी डाटा और है अगर आपको इतने में ही याद आ जाये की भारत में चुअचुत थी के नहीं थी तो बेहतर है वर्ना जीवन के पिर्त्येक मामले में शूद्रों के साथ कितना भेदभाव हुआ है मुझे बाकी लिखने में भी कोई आपत्ति नहीं होगी…….
    kapoor jee nishchit rup से भारत का itihas garv करने yogye है parntu हमको apnee galtiyon को dhankna नहीं चाहिए अगर आपको inkee satyta पर koee shanka ho तो aap dekh सकते हैं.
    shubkaamnao के साथ और आंकड़े चाहिए तो bata dijiyega
    hum को jhuta garv shobha नहीं deta isliye ऐसा likha hai

      1. दीपा जी अगर आप जैसी सोच हमारे समाज के हर एक ऊँची जाती वालो की हो जाये तो सारे समाज से छुआछूत ही मिट जाएगा. लोगो का इतिहास के बारे में जानना बहोत जरूरी है अगर ऊँची जाती के लोग एक बार नीची जाती वालो का इतिहास पड़ेंगे, वो जब ऊँची जाती के लोगो द्वारा नीची जाती के लोगो पर हुए अत्याचार को महसूस करेंगे तो उनका भी दिल पिघल जायेगा ,छूआछूत एक अभिशाप है एक बार ऊँची जाती के लोग छूआछूत जीवन जी के देखे उन्हें खुद इस नारकीय जीवन का अहसास हो जायेगा., देश के हर नागरिक को सर उठाके जीने का पूरा हक होना चाहेये

  13. आदरणीय कपूर साहब अत्यन्त परिश्रम के जरिये जुटाये गये आँकड़ों तथ्यों सहित आपको प्रणाम। लेकिन…. ये लेकिन ही सबसे बड़ी समस्या है। मेरा ऐसा मानना है कि भूत चाहे कितना भी उज्ज्वल सिद्ध कर दिया जावे। हमारा वर्तमान एवं भविष्य तो दिन-प्रतिदिन के जीवन से बनता या बिगड़ता है। वर्तमान की सच्चाई आप जैसे विद्वान व्यक्ति को पता होगी ही, उसका आज के लिये और आने वाले कल के लिये समाधान जरूरी है।
    शुभकामनाओं सहित।

  14. श्रीराम तिवारी जी, आपने कृपा करके मेरा मार्ग दर्शन करने का प्रयास किया है, धन्यवाद. कृपया अपनी बात ज़रा ठीक से समझाएं, मेरे विचार में जो आप कहना चाह रहे हैं वह अभी स्पष्ट नहीं हुआ है. अपनी समझ में तो मैंने अकाट्य, प्रमाणिक तथ्यों के साथ अपनी बात कही है.
    एक निवेदन कर दूँ कि .१. विदेशियों द्वारा हम पर थोंपे गए झूठे इतिहास और हमारे वास्तविक इतिहास में ज़मीन-आसमान का अंतर है.२. यह उस झूठे इतिहास की ही ताकत है कि एकमात्र भारत में आज ऐसे अजीब लोग पैदा होगये हैं कि जिन्हें अपने अतीत की महानता पर विश्वास ही नहीं आता और अपनी लघुता पर अविश्वास नहीं होता. ३.उस झूठे इतिहास का ही कामाल है कि संसार में केवल भारत के लोग हैं जो अपनी संस्कृति, इतिहास, पूर्वजों, परम्पराओं, की आलोचना अपने मुख से करते हैं और इसमें सुख व गौरव का अनुभव करते हैं.
    ज़रा ऐसे अजीब लोग दुनिया के तख्ते पर ढूँढ़कर दिखाईये. इस अंतर के आधार पर ज़रा बात को समझने का प्रयास हम सबको करना चाहिए न? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम किन्हीं ताकतों के द्वारा इस्तेमाल होकर अपनी जड़ें स्वयं खोदने की भूल कर रहे हों? कृपता गलत अर्थ में न लें. लगभग १०० साल से कुछ ऐसा ही संसार में चल रहा है. संदेह हो तो ”जागतिक षड्यंत्र ” नामक पुस्तक एक बार पढ़ कर देखें.(न मिले तो स्रोत की सूचना भेज दूँगा.) मुझे और मेरे कुछ साथियों को तो ऐसा होता स्पष्ट नज़र आ रहा है. वही बतलाने का हमारा प्रयास है. आप सरीखे बुद्धिमान लोगों का विश्वास और सहयोग हमारा संबल बन सकता है. साभार,आपका अपना,

    1. महोदय,
      हमको विदेशियों का दिया इतिहास पढने की आवश्यकता ही नहीं है, हमारे धार्मिक ग्रन्थ ही पर्याप्त हैं उनमे बड़ा साफ़ साफ़ लिखा है की भेदभाव kis prkaar kiya jana chahiye ye बड़ा aasan है unko padh lo sab samajh aa jata है, aap unko zarur padhte honge……

  15. The campaign of Swami Dayanand should be referred to whenever division on the basis of caste / practice of untouchable in Hindu samaj is discussed. Maharishi raised the question – Is the Almighty not the well wisher of shudras? Is He partisan? Has He not bestowed all the limbs to all? No person untouchable. Any restraint on any person on the basis of caste has to be banished with full vigor. The Arya Samaj is continuing this campaign.

  16. भारत के अतीत में बहुत कुछ ऐंसा था जिस पर न केवल हमें बल्कि दुनिया को नाज था ,इससे किसे इनकार है .दीपा जी ने या किसी भी सुलझे हुए वैज्ञनिक दृष्टिकोण के विचारक ने कभी इंकार नहीं किया .
    डॉ राजेश कपूर का सत्य उनका अपना गढ़ा हुआ है .उनके विचार एक -दो अंग्रेज आक्रान्ताओं की लेखनी पर आधारित हैं .यह स्वयम डॉ सब ने उद्धृत किया है .अब उनके विरोधावासी खंडित विचारों को ठौर कहाँ मिलेगा ?जब उनसे कोई स्वनामधन्य देशभक्त पूंछ बैठेगा की डॉ साब अपन तो मेकाले .एडम स्मिथ कीन्स चार्ल्स डार्विन इत्यादि को पहले ही jhuntha करार दे चुके हैं .अब उन्ही गए गुजरे आक्रान्ताओं को अपनी बात सही saavit karane की garj aan padi है ..यह viveksheelta nisandeh भारत को गर्त में धकेलने के लिए पर्यय्प्त है .डॉ राजेश कपूर से निवेदन है की भावनाओं से नहीं बल्कि सम्वेदनाओं के धरातल पर वैचारिक सापेक्षता से आबद्ध सर्वस्वीकार्य सत्य का संधान करें

  17. दीपा जी धन्यवाद सहित निवेदन है कि इन तथ्यों की प्रमाणिकता पर संदेह हो तो १०१७ पृष्ठों की एडमस्मिथ की रपट आर्काईव से या किसे वरिष्ठ इतिहासकार से उसके अंश प्राप्त करके देखें.

  18. दीपा जी, नमस्कार ! कृपया एक बार अंतर्मुखी होकर, सोचकर देखें कि जब-जब हम भारतीय संस्कृती,समाज व परम्पराओं की आलोचना सुनते हैं; हमें कभी उनकी सत्यता पर संदेह हुआ? यदि नहीं तो फिर हमें अपनी श्रेष्ठता के प्रमाणों पर संदेह क्यों होता है? सही, संतुलित बात तो ये है कि संदेह ही करना है तो दोनों तरह की बातों पर होना चाहिए, है न ? याफिर सारी दुनियां के लोगों की तरह एक आम आदमीं जैसी सोच होनी चाहिए कि जैसे अपनी माँ या अपने बच्चे की तारीफ़ सुनकर मन खिल उठता है, प्रसन्नता मिलती है; उसी प्रकार हम भारत के लोगों को अपने देश व संस्कृति की प्रशंसा से आनंद मिलता है क्या ? बहुत लोग हैं जिन्हें अपने देश भारत की, अपने इतिहास, अपने पूर्वजों,परम्पराओं की प्रशंसा से चिढ होती है. दीपा जी, आपको भी अनेक बार ऐसे लोग शायद मिले हों ? ध्यान से देखिएगा कि ऐसे अजीब लोग केवल भारत में ही मिलते हैं जो अपने देश, अपनी संस्कृति की आलोचना बड़े उत्साह, जोश और प्रसन्नता से करके ऐसा दर्शाते या महसूस करते हैं जैसे उन्हों ने कोई बड़ा श्रेष्ठ काम किया हो. भारत की खिलाफत के सिंड्रोम के शिकार न होते तो अपने देश की कमियों की पीड़ा महसूस करने के साथ कई अछाईयाँ भी देखते. हर देश और समाज में कमियां और विशेषताएं होती ही हैं. पर भारत विरोध के मानसिक रोगियों को केवल बुराईयाँ ही नज़र आती हैं. ऐसे लोगों के बारे में क्या ऐसा मानना गलत है कि वे मैकाले की उस शिक्षा के शिकार हैं जो भारत-भारतीयता से घृणा पैदा कने के लिए दी जाती है. और या फिर वे उन विदेशी ताकतों के एजेंट हैं जो भारत की शत्रु हैं.
    अगर हमारी संस्कृति व परम्पराएं इतनी बुरी हैं तो ऐसा क्यों कि ——
    फ्रांसिसी विद्वान जैकोलियट ‘बाईबल इन इंडिया’ में कहते हैं, ”भारत विश्व का आदि देश है, यह सबकी जननी है. आपको पता चलता है कि भारत मनुष्य जाती की जननी और हमारी समस्त परम्पराओं का जन्म स्थान है……….हम लोगों को भाषा, नीतिशास्त्र, आचरण, साहित्य और धर्म प्रदान किया है……हम भारत के शब्द शास्त्रियों के परिश्रम के लिए उनके आभारी हैं क्योंकि हमारी भाषा के शब्दों के मूल और धातुओ का पता वहीँ मिलता है. मिस्श्र, हिब्रू, ग्रीक और रोमन व्यवस्थाओं पर मनु का प्रभाव स्पष्ट है.” (आर्यों का आदि स्थान…, पृ.३५) ऐसे एक नहीं सैंकड़ों उद्धरण हैं जिनसे पता चलता है कि जो असली भारत है वह बहुत महान और कल्याणकारी है. उसे समझना, खोजना और आज के सन्दर्भों में उसकी प्रासंगिकता का विश्लेषण करना, यह करने की जरूरत है न कि आँखें बंद करके आधुनिकता के नाम पर पतन की गहरी खाई में गिरते जाना? भारत विरोध के सुनियोजित प्रयास का शिकार बन जाना ?
    सही ,संतुलित और ईमानदार सोच तो यही है न कि हम अपने गौरवशाली पक्षों से उत्साह व प्रेरणा लेते रहें और अपनी कमियों को समझकर उनके सुधार का प्रयास करें. केवल कमियों की चर्चा, वह भी बढा-चढ़ा कर, यहाँ तक कि झूठ भी ; इसे तो सही नहीं कहा जासकता. भारत विरोधी ताकतों कि कुटिल चालों का शिकार बनाने से बचने के लिए थोड़ा सावधन तो हमें रहना ही पडेगा.
    आपकी प्रेरक टिप्पणी हेतु आभार. आगे भी कृपया जारी रखें,धन्यवाद !

    1. आदरणीय राजेश कपूर जी,
      भगवान् ने हमको बुद्धि दी है जिस कारन से में चाहकर भी भावुक नहीं हो पाती हूँ…. आपका कहना सही है की हमको अपने समाज संस्कृति परम्पराओं और पूर्वजों पर गर्व होना चाहिए हमको है भी, जब हम अपने देश की तारीफ़ सुनते हैं तो आपकी ही तरह फूल कर कुप्पा हो जाते हैं लेकिन जब झूटी तारीफ़ होती है तो कष्ट भी होता है क्योंकि उससे हमारे देश को कोई लाभ नहीं होने वाला है, हमको कताई भी भारत विरोधी मानसिक रोग नहीं है अपितु आपने जो लिखा है में उससे कतई सहमत नहीं हूँ, में बचपन से अपने आस पास जो देख रही हूँ उसको केसे मिटा दूँ वो भेदभाव जो मेरे घर, जाती और sage सम्भंधियों द्वारा होता चला आ रहा है और मनुवादी करते रहेंगे, महोदय में ब्रह्मण के यहाँ पैदा हुई और एक व्यक्ति तथाकथित निचली जात में पैदा हुआ तो इसमें मेरी क्या khubi है और उस व्यक्ति का क्या दोष होगा ये मेरा ह्रदय कभी मान ही नहीं सकता है की भारत में छुआ छुट नहीं थी, महोदय आप खुद को धोका दे सकते हैं में नहीं दे पाती हूँ, मेने निचली जाती के व्यक्ति के आने के बाद लोगो को अपने घर धोते हुए देखा है वो भी आज के समय में जबकि हम आज आधुनिक कहे जाते हैं, आपको न होती हो मगर मुझे खुद को ऐसी सभ्यता में घुटन महसूस होती रही है, और आपका ये जवाब एयर घुटन पैदा कर गया, महोदय मेरा आप की सोच पर कतई अधिकार नहीं है मगर जो बात असत्य है वो ज़रूर कही जाएगी,
      एक जो आवश्यक बात है की इसमें किसी भारत विरोधी विदेशी ताकत का कोई हाथ नहीं है ये मेरी अपनी सोच है जो समाज और धार्मिक ग्रंथों का अध्यन करने के फलस्वरूप पैदा हुई है तो आपसे विनर्म निवेदन है की भारत विरोधी ताकतों को कहकर मेरी सोच पर दुश्मनों का अधिकार तो न बताये, धन्यवाद के साथ ……………………………..दीपा शर्मा

    2. आदरणीय डॉ. कपूर साहब मैंने आपके अनेक आलेख पढे हैं, जिनसे निर्विवाद आपकी विद्वता सिद्ध होती है, लेकिन अतीत की किताबी बातों कि प्रति अतिआस्था को देश का वास्तविक इतिहास या देश का स्वर्णिम काल सिद्ध करने के लिये, उन लेखकों का सहारा लेना जो कुछ समय के लिये यहाँ आकर लिखते हैं, कितना न्याय संगत है? उन लोगों के विचारों को भी तो अपने लेखों का अधार बनाया जाना चाहिये, जो इस देश में सदियों से शोषण के शिकार हैं। भारत की आधी आबादी अर्थात्‌ मातृशक्ति को हमारे धर्मग्रन्थ लेखकों ने कितना भला बुरा कहा है, कितना उत्पीडित किया है, इसको पढकर ही रोंगटे खडे हो जाते हैं। जिन स्त्रियों ने उन अत्याचारों को सहा/भोगा होगा, उनकी दुर्दशा कैसी रही होगी? इसी प्रकार से छुआछूत के शिकार दलितों की दुर्दशा भी सर्वज्ञात है। धर्मग्रन्थों ने तो रजस्वाला स्त्री को भी अछूत घोषित कर रखा है, बेशक उसका कोई गूढ कारण रहा होगा, लेकिन सिद्धान्तों में निहित मूल धारणा का तब कोई अर्थ नहीं रह जाता है, जबकि व्यहार में उन धारणाओं को एक प्रतिशत लोग भी नहीं जानते हों। सच्चाई को व्यक्त करने वालों को मानसिक रूप से विक्षिप्त या विदेशों के इशारों पर काम करने वाले या अपने देश की आलोचना करने वाले सिद्ध करना भी क्या नकारात्मक/रुग्ण/अतिआस्थावादी मानसिकता का परिचायक नहीं है, जिसकी आप जैसे व्यक्तित्व से कतई भी अपेक्षा नहीं की जाती। आदरणीय व्यवहार की सच्चाईयों से हम मुःह नहीं चुरा सकते। सच्चाई को स्वीकार करने से ही प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है।
      धन्यवाद। शुभकामनाओं सहित।

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