भारतीय लोकतंत्र की बीमारी बनी भारतीय नौकरशाही

शशांक कुमार राय

भारतीय लोकतंत्र एक गम्भीर बीमारी की चपेट में है जिसका समय रहते इलाज नहीं हुआ तो इसका क्षरण होना तय है और वह गम्भीर बीमारी है- “स्थायी कार्यपालिका अर्थात नौकरशाही की बढ़ती मनमानी, कार्यों में लापरवाही व अनुत्तरदायित्व की बढ़ती प्रवृत्ति, भ्रष्ट आचरण और पदाभिमान।” 

यह याद रखने की जरूरत है कि आज भी भारतीय नौकरशाही ब्रिटिशकालीन प्रभुत्ववादी व्यवहार से अपने आप को मुक्त नहीं कर पाई है और अभी भी यह ‘अधीन राजनीतिक संस्कृति’ वाली प्रवृत्ति अपनाये हुए है। इसके पीछे विभिन्न लोग विभिन्न कारण गिना सकते हैं लेकिन मेरे विचार से इसके पीछे जो सबसे बड़ा कारण है वह है “अस्थायी कार्यपालिका यानी जनता द्वारा चुनी हुई वास्तविक कार्यपालिका का नौकरशाही पर उचित लगाम न लग पाना और स्थायी कार्यपालिका के रूप में नौकरशाही का किसी भी स्थिति में अपने पद पर बने रहने का घमण्ड।” 

हालांकि पिछले कुछ आयोगों ने ‘एक निश्चित आंशिक अवधि में किये गये कार्यों की अच्छाई या कमी के आधार पर प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों के पदोन्नति, पदावनति, निलम्बन और बर्खास्तगी’ का सुझाव दिया है लेकिन उसका अनुपालन नहीं हो पाया है। इसके अलावा अस्थायी कार्यपालिका द्वारा अपने स्वार्थ के लिए नौकरशाही का राजनीतिकरण किया जाना भी नुकसानदायक साबित हुआ है। क्योंकि भारत की बुद्धिमान नौकरशाही जो कि “वास्तव में नौकरशाही न होकर अफसरशाही है”, राजनीतिकरण के मामले में अस्थायी कार्यपालकों अर्थात राजनेताओं पर भारी पड़ती जा रही है। यहीं कारण है कि राजनेतागण तो थोड़े समय के लिए और थोड़ी ही मात्रा में अफसरशाही का राजनीतिकरण कर पाते हैं, लेकिन स्थायी कार्यपालिका के रूप में भारतीय शासन-तंत्र या ‘सिस्टम’ में गहरी पैठ बना चुकी अफसरशाही अपने हिसाब से और अपने मनचाहे तरीके से भारतीय राजनेताओं एवं राजनीतिक दलों के साथ ‘राजनीतिकरण’ का माइंड गेम खेलने में सिद्धहस्त हो चुकी है। अब भारतीय अफसरशाही ने अपने फायदे के हिसाब भारतीय राजनेताओं के साथ राजनीति करना शुरू कर दिया है। यहीं कारण है कि जो राजनीतिक दल इन अफसरशाहों की उम्मीदों या मनोकामनाओं पर खरा उतरते हैं उनके साथ यह बढ़िया तालमेल बनाकर उसका प्रभाव बढ़ाती रहती है जबकि उम्मीदों या अपनी लाभकारी इच्छाओं पर खरा न उतरने वाले राजनीति दलों और राजनेताओं के साथ तालमेल न बनाकर इनके प्रभाव या लोकप्रियता को गिराने में लग जाती है। वर्तमान समय में भी अनेक राज्य सरकारों के साथ भारतीय अफसरशाही द्वारा किया जा रहा खिलवाड़ जारी है। जो भी निर्देश दिये जा रहे हैं या जो भी नीतियाँ बन रही है उन्हे क्रियान्वित करने व लागू करने में जानबूझकर देर की जा रही है। जो कार्य हो भी रहे हैं उनमें कमियाँ ही कमियाँ दिख रही हैं। चाहे पुलिस हो या प्रशासनिक अधिकारी, सभी जानबूझकर गलतियाँ करने और गड़बड़ियों को बढ़ावा देने में लगे हैं। 

वर्तमान भारतीय अफसरशाही जिन अवगुणों से ग्रसित है उनमें से कुछ इस प्रकार हैं — (1) प्रशासनिक जिम्मेदारियों व कार्यों के प्रति उदासीनता (2) अपनी जिम्मेदारियों को एक-दूसरे पर थोपने की प्रवृत्ति (3) कार्यकुशलता व दक्षता का अभाव (4) प्रत्येक कार्यों में विलम्ब करने और अवरोध उत्पन्न करने की प्रवृत्ति (5) उत्तरदायित्व के प्रति उदासीनता (6) स्वार्थ पूर्ति के लिए पद का दुरुपयोग करने की प्रवृत्ति (7) रिश्वतखोरी (8) लालफीताशाही (9) दलीय और वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ ही पक्षपातयुक्त व्यवहार अपनाने और पूर्वाग्रह से ग्रसित होने की प्रवृत्ति (10) भाई-भतीजावाद (11) उद्योगपतियों और बाहुबलियों से घनिष्ठता (12) प्रतिष्ठित राजनेताओं और मंत्रियों के प्रति निष्ठा (13) ब्रिटिशकालीन पदाभिमान से ग्रसित (14) स्वयं को लोक सेवक की बजाय ‘लोक साहब’ समझने की प्रवृत्ति (15) कम समय में अधिक से अधिक सम्पत्ति और प्रतिष्ठा अर्जित करने की प्रवृत्ति। इन्हें दूर किये बिना भारतीय नौकरशाही में सुधार असम्भव है।

इसलिए मेरे विचार से भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अफसरशाही पर लगाम कसने का समय आ चुका है। अब समय की माँग है कि राजनेतागण अफसरों को अपने प्रभाव में रखें न कि स्वयं उनसे प्रभावित हों। सभी प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों की स्थिति में क्रान्तिकारी बदलाव की सख्त जरूरत है। इन्हे राजनीतिकरण से मुक्त करते हुए अल्पकालिक अवधि में इनके द्वारा किये गये कार्यों का मूल्यांकन करके इनकी पदोन्नति, पदावनति, निलम्बन, बर्खास्तगी, स्थानान्तरण इत्यादि का निर्धारण कठोरता से किया जाना आवश्यक है। उनकी यह ‘अल्पकालिक उत्तरदायित्व अवधि ‘तीन वर्ष’ रखी जा सकती है।

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