भारतीय गोरैया पक्षी : खुद में ऐतिहासिक कथा बनती जा रही !

■ डॉ. सदानंद पॉल

हे फुतकी गोरैया !

गोरैया पक्षी (Sparrow Birds) की एक युगल जोड़ी सप्ताह में एक दिन कहीं से उड़ मेरे आंगन आती हैं । मेरे यहाँ कबूतर है, सोचा– वे भी कहीं न कहीं घोंसले बनाकर टिक जाएंगी । परंतु नहीं, वह कबूतर को दिए चावल के दाने चुन फुर्र उड़ जाती हैं, शायद हम मानवों से भय खाती हैं । कटिहार- मालदा रेलखंड पर कुमेदपुर रेलवे स्टेशन है, मैंने 2 साल पीछे देखा था, वहाँ हजारों की संख्या में गोरैये रह रहे हैं, अभी भी है ! भागलपुर जंक्शन में भी देखने को हमें इस फुतकी गोरैये के संरक्षण की दरकार है । सरकार के आसरे पर नहीं, अपितु सामाजिक सरोकार को जगाकर ! इसके लिए महीन दाने खेत- पथारों में कुछ यूँ छोड़ देने चाहिए व छिटने चाहिए । गोरैया में ‘गो’ शब्द का हिंदी अर्थ ‘जाना’ होता है, क्या यही हो गया ? तो हे ‘आरैया’ ! यानी ‘आ’ से आ जाओ, यहाँ मैं अकेला हो गया हूँ ! रे फुतकी गोरैया कहाँ चली गयी तू ! 20 मार्च को विश्व गोरैया दिवस रही ! जिनके लिए दिवस, वह प्राणी अल्पसंख्यक हो गए हैं ! राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में गोरैया को राज्यपक्षी का दर्जा प्राप्त है।

गोरैया मूलत: दो प्रकार के होते हैं- वन्य गोरैया और घरेलू गोरैया। घरेलू गोरैया घर पर बाड़ी-झाड़ी में घोंसले बनाते हैं । अब तो शहरी या नगरीय गोरैया भी है । एशिया और यूरोप में घरेलू गोरैया रहते हैं, तो अमेरिका, अफ्रीका, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया इत्यादि जगहों में शहरी गोरैया रहते हैं । नगरी गोरैया की खासकर 6 प्रजातियाँ होती हैं, यथ – हाउस गोरैया, स्पेनिश गोरैया, सिंड गोरैया, रसेट गोरैया, डेड सी गोरैया एवं  ट्री गोरैया । सम्पूर्ण संसार के अधिकांश हिस्से में गोरैया की भागीदारी है । अगर कोई फुस आदि के घर बना रहे हैं तो गाहे-बगाहे गोरैया आ ही जाते हैं ! मूलत: जाड़े की ऋतु में इनका आवागमन होता है, किंतु अब भारत में और भारत में भी बिहार में अल्पसंख्यक हो गए यह पक्षी अन्य ऋतुओं में भी देखे जाते हैं ! यह बहुत छोटी पक्षी है, हालाँकि बुलबुल, रसप्रिया या रस पीया से कुछ बड़ी होती है । दरअसल यह पक्षी 10 से 16 सेंटीमीटर लम्बी होती है । हल्की कत्थई रंग या भूरे रंग पर सफेदी का मिक्सिंग लिए होती हैं । नर और मादा साथ चलती है, परंतु मादा के गर्भधारण पर नर अपनी मादा के लिए आहार चुग कर लेते हैं । शाकाहारी गोरैया होते हैं, तो कीड़े आदि का भी वे भक्षण करते हैं । पीले चोंची और पैर भी प्राय: पीले रंग के होते हैं । इनमें हाउस स्पैरो को गौरैया कहा जाता है। यह शहरों में ज्यादा पाई जाती हैं। आज यह विश्व में सबसे अधिक पाए जाने वाले पक्षियों में से है। लोग जहाँ भी घर बनाते हैं देर सबेर गौरैया के जोड़े वहाँ रहने पहुँच ही जाते हैं। पहाड़ी स्थानों में भी यह पक्षी रहना पसंद करती है । नर गोरैया के गले के पास काले रंग होते हैं  नर गौरैया के सिर का ऊपरी भाग, निचले भाग तथा गालों पर भूरे रंग आकारित होते हैं । आँखों पर भी काला रंग होता है । मादा गोरैया के सिर और गले पर भूरा रंग नहीं होती है । पिछले कुछ वर्षों से शहरों में ही नहीं, गाँवों में भी गोरैयों की संख्या कम होती जा रही है । गाँवों में भी अब काफी संख्या में पक्के मकान हो गए हैं । शहरों में तो बहुमंजिली भवनों में गौरैया को रहने के लिए पुराने घरों की तरह जगह नहीं मिल पाती है। मॉल आदि ने इसे जीना मुहाल कर दिया है। रंग-रौनक संस्कृति से वे खत्म ही होते जा रहे हैं । खाने में कहीं भी महीन दानों का न मिलना उनके जीवित रहने की प्रवृत्ति को दुरूह बना रहा है । मोबाइल, मोबाइल टावर, इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों से निकलनेवाली प्रकाशपुंज और प्रदूषण भी उनकी विलुप्ति का कारण है । मेरे यहाँ अंडे पर बैठी कबूतर भी तब अंडा सेवना बंद कर देती है, जब बिजली व ठनका कड़कती है । गोरैया भी ऐसा करते हैं !  सनद रहे, कबूतर की खोप में पनपनेवाली तिलचट्टे को गोरैया वैसे खोप में घुसकर निकालती है और उसके शरीर के हिस्से निकालकर फुर्र से उड़ जाती है । यह छोटे कीड़े या उनके अंडो या लार्वो पर जीवनयापन करती हैं । यह गर्मी मौसम में, पर ज्यादा ऊँचाई में नहीं, तश्तरीनुमा घोंसला बनाती है। यह तीन या चार अंडे देती है, जो ललछौंने, सफेद निलछौंने होती हैं । हालाँकि दोनों हल्के भूर रंगों के पंख लिए होते हैं । मादा गोरैया समर्पित पक्षी है, किंतु नर गोरैया चालाक होते हैं, किंतु अन्य पक्षियों जैसे चालाक नहीं !

नर गोरैया में सेक्सकला कॉफी रोमांचित करता है । मादा को चोंच से आहार परोस कर अथवा खेत-बहियार में बिखड़े आहार को खुद के संरक्षण में नर गोरैया ‘मादा’ को खिलाने में सहयोग करते हैं ! यह मादा गोरैया को बहलाने-फुसलाने का मानवीय तरीका भी कह सकते हैं, फिर मादा समर्पित हो जाती है, नर के प्रति । मादा गोरैया शरीर को सिकोड़कर एक जगह बैठ जाती है, फिर नर गोरैया फुदक-फुदक कर मादा पर बैठते हैं, न्यूनतम 6-7 दफे और अधिकतम 22-23 दफे करते हैं, इसी क्रम में उन दोनों के बीच सहवास हो जाती है । यह फुदकती है, एतदर्थ इसे फुदकी या फुतकी चिड़िया भी कहते हैं । यह निरंतर फुदकती रहनेवाली छोटी चिड़िया है, जो झाड़ियों में निवास करती है। यह छोटे छोटे कीड़े मकोड़े उनके अंडो या लार्वो पर जीवनयापन करती है। फुदकी अप्रैल से सितंबर के बीच तीन फुट से कम की उँचाई पर छोटा प्यालानुमा घोंसला बनाती है। यह तीन या चार अंडे देती है, जो ललछौंह या नीले-सफेद और भूरे-लाल धब्बेदार होते हैं। ऐसे लक्षणों के गोरैया यूरोप और एशिया महादेश में पाए जाते हैं । वृक्षों में रहनेवाली गोरैया में हल्के हरापन रंग अनुकूलित हो जाते है, किंतु ये सुग्गे या तोते जैसे हरापन लिए नहीं होते हैं !

कुमेदपुर रेल जंक्शन के बाद भागलपुर रेल जंक्शन के छतों के कोटरे में भी गोरैया का खोता व घोंसले दिखाई देते हैं । स्टेशन परिसर में इस नन्हें परिंदों का गुलजार है। स्टेशन पोर्टिको के ठीक सामने के एक घना पेड़ पर सैकड़ों गोरैयों का आशियाना है। सुबह-शाम सूर्यास्त की लालिमा के साथ स्टेशन कैंपस में गोरैयों के टिक-टिक से व उनके चहचहाने वातावरण में संगीत घोल देता है । स्टेशन परिसर के रहवासी रेलकर्मियों ने कहा कि स्टेशन परिसर के गार्डेन में सजावटी पेड़-पौधे लगाए गए थे, वो काफी बड़े हो गए हैं। इसके पत्ते बहुत घने हैं, उसपर अमलतास की लत्तियाँ भी चढ़ गई है, जोकि सजावटी पेड़-पौधे पर एक आवरण लिए हो गया है, यही कारण है कि गोरैया अपने घोंसले को यहाँ बनाकर ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं ! भागलपुर के पक्षी वैज्ञानिक बताते हैं, प्रत्येक शाम गोरैया आते हैं, अपने-अपने रैन-बसेरों में रात बिताते हैं, फिर सुबह भोजन-पानी के फिराक में कलरव करते हुए फुर्र उड़ जाते हैं । वहां इसलिए आती हैं कि उसे रात बिताने के लिए झाड़ीदार पेड़ चाहिए। आसपास के आम, पीपल, बबूल, जामुन इत्यादि पेड़ों पर भी गोरैया घोंसले बनाकर रहते हैं । भागलपुर जंक्शन के पीछे और दक्षिण दिशा की बस्ती में भी गोरैया की तादाद है, जहाँ पक्के मकान की संख्या कम है, जहां भी गोरैया रहते हैं और महीन दाने चुगते हैं । यदि घर में घोंसला बनाई, तो वे सहज महसूस करेंगे । खिड़कियों, छज्जे, छतों पर, आँगन, दरवाजों पर उनके लिए दाना-पानी रखने से गोरैया चिक-चिक करते आएंगे । कड़ी धूप में पानी नहीं मिलने से गोरैया मर-खप जा रही हैं । वे घर पर छज्जे में रखे पुराने जूट, कूट के डिब्बों, मिट्टी के बर्तनों, जूट के टंगे थैलों, बेकार पड़ी सूप, टोकरी इत्यादि जगहों में भी घोंसले बना लेते हैं। कटिहार, बिहार के मनिहारी, नवाबगंज में भी गोरैया देखने को मिलते हैं । एक स्थानीय पक्षीप्रेमी श्री काली प्रसाद पॉल बताते हैं कि गोरैया पालतू चिड़िया है। वे तो रोज गोरैयों को दाना-पानी देते हैं । इस माहौल में वे बड़ी शिकारी पक्षियों से खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं। वे अकसर मेरे मिट्टी और फुस के घरों के बीच बनी जगहों में अपने घोंसले बना लेती थी या आसपास के पेड़ों पर अपना ठिकाना तलाश लेती थी, किंतु अब पक्के मकानों और घटते पेड़ों के चलते उनके लिए घोंसले बनाने के लिए कोई जगह सुनिश्चित नहीं बची है।

गोरैया : वैश्विक पक्षी

यूएसए में कुछ भिन्न प्रकार की गोरैया रहती हैं, उनके रंग और आकार यूरेशियाई गोरैयों से भिन्न होती हैं, किंतु अंशत: ही । ऐसे गोरैये जर्मनी मूल के हैं । जो जर्मन गोरैया भी कहलाते हैं ! यह सब जर्मन प्रजाति के है , जिनकी उपजातियाँ भी है । अमेरिकी गोरैयों को स्वच्छ वातावरण चाहिए, किंतु यूरेशियाई गोरैयों को गंदे घोंसले में रहने को लेकर कोई फर्क नहीं पड़ता, वे तो वृक्षों के कोटरों में भी रैनबसेरा बना लेते हैं । मौसमी बारिश को छोड़कर मादा गोरैयों का प्रजननकाल हर मौसम में है । अगर नर-मादा में प्रफुल्लता रहे, तो मादा गोरैया अधिकतम 6 अंडे तक दे सकती है । उनके घोंसले में कुछ दूरी लिए महीन छिद्र भी होती है, जोकि अंडे को नीचे से भी वायुत्व मिले । जो अंडे सेवी जा रही हो ! उनका जीवनावधि दो वर्ष का होता है, किंतु इनसे अधिक भी जीने के प्रमाण है । मेरे घर के घोंसले में गोरैयों की जो जोड़ी रहते थे, उनमें नर गोरैया ने साढ़े तीन की जीवनावधि को पूर्ण की ! वायरस और परभक्षी हिंसक कीटों से भी उन्हें खतरा है । चींटी भी उनके कमजोर देह को काट खाते हैं, तो हरहरे जैसे सामान्य सर्पवर्ग के साँप भी उनके अंडे खा जाते हैं ! आम, जामुन, नींबू, अमरूद, अनार, बाँस, कनेर फूल, बबूल, कटहल इत्यादि पेड़ों पर भी उनके रैन-बसेरे हैं, किंतु इन पेड़ों पर लगे मंजरों को बचाने के लिए किए गए कीटनाशक व हानिकारक रसायनवाले स्प्रे के होने और इसे चखने या अन्य मेथड से शनै: शनै: गोरैये के आहारनाल प्रभावित हो रहे हैं और उनकी प्रजाति पूर्ण विनष्टता की ओर पहुँच चुकी है। इसके अतिरिक्त उसे दाना-पानी की भी समस्या उत्पन्नहो गई है । यह पक्षी प्रमुखतया ज्वार, बाजरा, पक्के धान से निकाले गए व फांके गए चावल, छोटे कीड़े-मकौड़े यानी अल्फा, कतवर्म, तिलचट्टे इत्यादि को छिन्न-भिन्न कर चुगते हैं, बच्चे को उगलकर देते हैं, कभी-कभी सीधे आहार चोंच से चोंच तक पहुंचाते हैं और अंतत: जल ग्रहण कर गोधूलि बेला में अपने प्रवास लौट जाती है । आज जलस्रोत भी विषैले और प्रदूषित हो रही है।

यूरेशियाई गोरैया एशिया और यूरोप की विशाल आबादी से भी प्रभावित है । तभी तो विशाल आबादी के कारण यह वैश्विक स्तर पर लुप्तप पक्षियों की श्रेणी में नहीं आती है । सिर्फ दक्षिणी एशियाई क्षेत्र ही नहीं, अपितु पश्चिमी यूरोप में भी इस पक्षी की आबादी लुप्त होती जा रही है । यह शीत कृषि में कमी के कारण है । पूर्वी एशिया और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में यह पक्षी हानिकारक जीव के रूप में देखी जाती है, तो अफ्रीका के जंगलों में हिंसक पक्षी के रूप में इनका जीवनशैली है । अध्ययन यही कहता है कि स्थानविशेष और भोजनविशेष के कारण यह भी प्राणी अनुकूलित प्राणी के संज्ञार्थ अभिहित है। ऐसे भारत में इसे कलात्मक पक्षी भी कहते हैं। भारत के महानगरों में यह पक्षी शून्यप्राय हो गए हैं। हिंदी कथाकार भीष्म साहनी जी अपनी कहानियों में गोरैया को गाथित किये हैं ! गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के समय शांति निकेतन में न सिर्फ गोरैया, अपितु कौवे और लंगड़ी मैना भी इठलाकर फुदकती थी ! आज वहाँ इस प्राणी का बसर तो है, किंतु गुरुदेव के जमाने की स्वच्छंदता लिए कहाँ ? भारत के अंग्रेजी लेखक रस्किन बांड को भी इस छोटी चिड़िया के प्रति अतिशय अनुराग है!

भारतीय गोरैया

भारत के वृक्षों पर आवास करनेवाले गौरैयों में लम्बाई 12 से 14 सेंटीमीटर अर्थात 5 से 6 इंच तक, फिर उनके पंखों का व्यास 18 से 22 सेंटीमीटर अर्थात 6 से 9 इंच तक होती है, तो वज़न 20 से 25 ग्राम तक होती है। हम भले ही बड़े हो गए हैं, किंतु हम दिल से छोटे और कमजोर, बेबस और बेकस भी हो गए हैं । भारत में लगातार ही गोरैया घटती जा रही है, किंतु इसे सिर्फ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम का आसरा है, जबकि ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों में यह पक्षी रेड अलर्ट लिस्ट में शामिल है । पक्षी वैज्ञानिक संवेदनशील है, किंतु अपनी ही सुख-सुविधा और विलासिता में डूबे लोग गोरैया की विलुप्तता को गाम्भीर्यमूलक नहीं लेते हैं । दरअसल, इस पक्षी के गायब होने की सही पड़ताल देश में अबतक नहीं हो पाई है । हमारी अत्याधुनिक सुविधाओं से लेश होने की प्रवृत्ति हमारी प्रकृति को ढा दे रही है। ऐसे-ऐसे मकान बना रहे हैं कि इसतरह के प्राणियों के लिए जरा-सी भी जगह नहीं छोड़ रहे हैं । इनके प्रति हमारा अनुदार रवैया यानी वे विष्ठा (शौच) न कर दे, इस लिहाज से उनके घोंसले को उजाड़ फेंकते हैं । तिनके-तिनके जोड़कर उनके नीड़ निर्माण कोह नेस्तनाबूद कर डालते हैं । दूसरी ओर घर और वृक्ष के कोटरों में रहनेवाले साँप सहित, कौवे, कागे, बिल्ली-बिल्ला, बाज़, चील्हे इत्यादि हिंसक जीवों के क्रूर रवैये से उनके अंडे तो बचते नहीं ही है, वे भी किसी न किसी रात उन हिंसक जीवन के ग्रास बन जाते हैं।

विदित हो, जवान गोरैया के मस्तक के ऊपरी हिस्सा और गर्दन का पिछला हिस्सा गहरे भूरे रंग का होता है, यह पूरी तरह से सफ़ेद गालों पर गुर्दे के आकार का काला धब्बा होता है । दाढ़ीवाले हिस्से, गर्दन तथा गर्दन और चोंच के मध्यांश भी काले रंग का होता है। ऊपरी अंश साफ भूरे रंग के नहीं होते हैं, बल्कि यह हल्केपन लिए होते हैं और उस पर काली धारियां होती हैं, तो इनके भूरे पंखों पर दो पतली व स्पष्ट सफ़ेद पट्टियां होती हैं। इनके पैर हल्केपन लिए भूरे रंग के होते हैं और गर्मियों में इनकी चोंच का रंग नीले पारदर्शी जैसे हो जाते है , जो सर्दी पड़ते ही उनमें कृष्णसदृश्य वर्ण के सापेक्ष हो जाते हैं । अपनी बिरादरी के अंतर्गत भी गोरैया भिन्न-भिन्न होती हैं, इनमें नर और मादा के बीच पंखों में कोई अंतर नहीं होता । यह जवानी और प्रौढ़ता आयु में भी एक सदृश्य दिखते हैं, बशर्त्ते इनमें भी प्रौढ़ावस्था में कुछ-कुछ मायूसी परिलक्षित होती जाती है । हाँ, रंग फीकेपन लिए हो जाते हैं । इनके चहरे पर सरलताभाव आने लगते हैं । नर गोरैया में एक अंतर और आ जाती है, उनके धड़ पर भूरे रंग छींटे लिए आबद्ध हो जाते हैं । वे शारीरिक समृद्धि लिए हल्के मोटे भी हो सकते हैं यानी उनमें वजन या मांसल वृद्धि आने लगती है । खून में जलीय तत्व लिए सक्रिय हो जाता है । हालाँकि यह फुर्ती का सूचक नहीं, तथापि शिकारी देखते ही वह फुर्र हो जाते हैं । घर और खेत-खलिहानों में जीवन-बसर करनेवाले गोरैयों में संगीत अभिलक्षण भी आबद्ध हो जाती है, वे जब एक-दूसरे के प्रति यानी प्रेमालाप को लेकर चुहलबाजी करने लगते हैं तो उत्तेजना में आकर प्रणय-निवेदन कर बैठते हैं, जो कि उनकी भाषा ‘चि-चि’ में प्रेमालाप होता है । शुरुआत नर गोरैया करते हैं और मादा गोरैया इनमें भाव-विह्वल हो सादर समर्पित हो जाती है । गीतों में लयबद्धता या अंताक्षरी उनके ही विहित है । मनुष्यों के साथ उनके व्यवहार सार्थक हैं, तभी तो मनुष्य जहाँ-जहाँ गए, गोरैये भी उनके हमसफ़र होते चले गए।

मूलत:, उन्हें मित्रवत जनसमूह से कोई परेशानी नहीं है, किंतु वे शीघ्र शत्रुता भाववाले जनसमूहों की शीघ्र पहचान कर लेते हैं ! पर्यावरण में शोरगुल, डीजे की आवाज, मोटर-ट्रेनों को झिकझुक-भौंभौं, मोबाइल टावरादि से निःसृत रेडिएशन इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रे से उनमें भय घर जाते हैं और वे ठीक से एक-दूसरे के प्रति प्रेमालाप नहीं कर पाते हैं । वृक्षों की हरियाली भी उन्हें पसंद है । ये कमी विविधता लिए है, जिससे अंडोत्पन्न में अक्षम हो रहे हैं । उन्हें नमकीन चीजें या नमकघुली वस्तुएँ से उनकी आयु घट रही है । उन्हें ऐसे भोज्य पदार्थ प्राप्त नहीं होनी चाहिए । अंडे उत्पत्ति पर भी भय के कारण उसे सेवने में समस्या आड़े आ रही है। विश्व गोरैया दिवस पर मेधाविनी मोहन जी ने सत्याग्रह के लिए समीक्षा की है कि इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि इनकी संख्या आंध्र प्रदेश में 80 फीसदी तक कम हुई है और केरल, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में इसमें 20 फीसदी तक की कमी देखी गई है । इसके अलावा तटीय क्षेत्रों में यह गिरावट निश्चित रूप से 70 से 80% तक दर्ज की गई है । विश्व भर में गोरैया की 26 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जिनमें से 5 भारत में देखने को मिलती हैं । नेचर फॉरेवर सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद दिलावर के विशेष प्रयासों से वर्ष 2010 में पहलीबार विश्व गौरैया दिवस मनाया गया था । तब से ही यह दिन पूरे विश्व में हर वर्ष 20 मार्च को गोरैया के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है । गोरैया के जीवन संकट को देखते हुए वर्ष 2012 में उसे दिल्ली के राज्य पक्षी का दर्जा भी दिया गया था । हालात अभी भी जस के तस ही हैं. वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सहयोग से बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी सिटीज़न स्पैरो के सर्वेक्षण में पता चला कि दिल्ली और एनसीआर दिल्ली में वर्ष 2005 से गोरैया की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है । सात बड़े शहरों में हुए इस सर्वेक्षण में सबसे ख़राब नतीजे हैदराबाद में देखने को मिले । उत्तर प्रदेश में भी तत्कालीन सरकार के समय गोरैया के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास और जागरूकता अभियान चलाए गए थे, पर वर्तमान में सब ठप है।

यूपी, एमपी और राजस्थान में पक्षियों के संरक्षण के लिए कार्य करनेवाली संस्था भारतीय जैव विविधता संरक्षण संस्थान की अध्यक्ष सोनिका कुशवाहा बताती है कि गोरैया के संरक्षण की प्रक्रिया में एक मुश्किल उसकी गणना में आती है, फिर भी रिहायशी और हरियाली वाले इलाकों में सर्वेक्षण और लोगों की सूचना की मदद से उसे गिनने की कोशिश की जाती है । इसके लिए हम लोगों से अपील करते हैं कि अपने आसपास दिखाई देने वाली गौरैया की संख्या की जानकारी हम तक पहुंचाइये । वर्ष 2015 की गणना के अनुसार लखनऊ में सिर्फ 5,692 और पंजाब के कुछ चयनित इलाकों में लगभग 775 गौरैया थी । वर्ष 2017 में तिरुवनंतपुरम में सिर्फ 29 गौरैया पाई गई, जो दुःखद स्थिति है।

मानवीय विलासिता : गोरैया की विनष्टता लिए

विज्ञान से विकास तो होती है, किंतु उसके सामने चुनौती भी आती है । विकास हमारी टेक्नोलॉजी का परिणाम है । हम आत्मनिर्भर तो होते हैं, किंतु प्रकृति से दूर होते चले जाते हैं । हमारी अपेक्षा जब महत्वाकांक्षा में तब्दील हो जाती है, तब मानवेतर प्राणियों के प्रति हम कुटिल हो जाते हैं, यह कुटिलता जटिलता के सापेक्ष हो जाता है । यह विदित हो चुका है कि गोरैया पालतू पक्षी है, किंतु उस सुग्गे की भाँति नहीं, जो सोने के पिंजरे में बंद होकर सोने की कटोरी में दूध-भात खाती हैं । उस कबूतर की भाँति भी नहीं, जो पालतू बन अपने मालिक को अपने बच्चे का भोग लगाती हैं । विकास होनी चाहिए, किंतु यह विकास विनाश नहीं बने ! जंगल की बेतहाशा कटाई न होकर उनसे परिपक्व पादपों की ही सफाई हो, तो बेहतर है ! मनुष्य के अंदर जो दिल है, दरअसल में गोरैया पक्षी उनके ही करीब है । जब मानव दुष्ट प्रवृत्ति के होते चले जायेंगे, तो गोरैया भी दिल के मरीज व हृदयाघात के शिकार होंगे ही ! यह भावनात्मक-लगाव ही है, जो गोरैया को जीवन प्रदान करता है । यह प्राणी प्रकृति और शिष्ट मनुष्यों के बीच सहचारी का कार्य करती हैं । मानवीय बच्चे इनके करीब तो हैं, किंतु ज्यों-ज्यों ये बच्चे मर्द बनते जाते हैं, उनके व्यवहार में तब्दीली आती जाती है । हमारी नई पीढ़ी इन सबके साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाता है । ऐसे कितने घर हैं, जहाँ दूसरे के पशु-पक्षियों को या वन्यजीवों के लिए दरवाजे या मुंडेर पर दाना-पानी रखते हैं, उत्तर मिलेंगे- 1% से भी कम ! गोरैया मनुष्यों के प्रकृति और सदवृत्ति से जुड़ी प्राणी हैं, वे शिष्ट मनुष्यों के शुभचिन्तक हैं ! वैसे वे सभी प्रकार के मनुष्यों के शुभचिंतक हैं, किंतु अशिष्ट मनुष्यों की धूर्त्तता से उनकी प्रजाति विलुप्त होती चली जा रही है। हाँ, यह सच है कि शीशे के आगे हम मानव ही चेहरे नहीं निहारते हैं, अपितु गोरैये आदि प्राणी भी शीशे के साथ स्वयं को निहार स्वयं को दिलबाग कर बैठती हैं।

आज उनके संरक्षण की महती आवश्यकता है । दुनिया भर में 20 मार्च को गोरैया संरक्षण दिवस के रूप में मनाकर हम उसके प्रति सहानुभूति दिखाते हैं । सिर्फ एक दिन ही क्यों ? बाकी 364 दिन क्यों नहीं ? ध्यातव्य है, यह दिवस पहलीबार 2010 में मनाई गई थी । लेखक प्रभुनाथ शुक्ल ने  प्रसिद्ध पर्यावरणविद मो. ई. दिलावर के प्रयासों को नमन किया है ।आदरणीय पर्यावरणविद के बहाने उन्होंने लिखा है कि गोरैया का संरक्षण हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। मो. ई. दिलावर नासिक से हैं। वह बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी से जुड़े हैं। उन्होंने यह मुहिम 2008 से शुरु की थी। आज यह दुनिया के पचासाधिक देशों तक पहुंच गयी है । गोरैया के संरक्षण के लिए सरकारों की तरफ से कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखती है। पर्यावरणविद मोहम्मद ई. दिलावर ने कहा कि लोगों में गौरैया को लेकर जागरूकता पैदा किए जाने की जरूरत है क्योंकि कई बार लोग अपने घरों में इस पक्षी के घोंसले को बसने से पहले ही उजाड़ देते हैं। कई बार बच्चे इन्हें पकड़कर पहचान के लिए इनके पैर में धागा बांधकर इन्हें छोड़ देते हैं। इससे कई बार किसी पेड़ की टहनी या शाखाओं में अटक कर इस पक्षी की जान चली जाती है। पर्यावरणविद दिलावर के विचार में गोरैया संरक्षण के लिए लकड़ी के बुरादे से छोटे-छोटे घर बनाए जाय और उसमें खाने की भी सुविधा हो। उनके विचार में मोर (मयूर) की मौत का समाचार मीडिया की सुर्खियां बनती है, लेकिन गोरैया को कहीं भी जगह नहीं मिलती है। वह आगे  कहते हैं कि अमेरिका और अन्य विकसित देशों में गोरैयों सहित सभी पक्षियों के ब्यौरे भी रखे हैं । उन्होंने पक्षियों के संरक्षण के लिए कॉमन बर्ड मॉनिटरिंग आफ इंडिया के नामक् वेबसाइट भी बनायी है, जिसपर कोई भी पक्षियों से संबंधी जानकारी और आंकड़ा निकाल सकते हैं। यह संस्था स्पैरो अवार्ड्स भी देती है। ज्ञातव्य है, आंध्र यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में गोरैया की आबादी में 60 फीसदी से अधिक की कमी आयी है। ब्रिटेन की ‘रॉयल सोसाइटी आफ प्रोटेक्शन आफ बर्डस‘ ने विलुप्ति के कारण इस चुलबुली और चंचल पक्षी को ‘रेड लिस्ट‘ में डाला है । दुनिया भर में ग्रामीण और शहरी इलाकों में गौरैया की आबादी घटी है । गोरैया पासेराडेई परिवार की सदस्य है, लेकिन इसे वीवरपिंच का परिवार का भी सदस्य माना जाता है । यह अधिकांश झुंड में रहती है । यह अधिकतम 2 मील की दूरी तय करती है । गोरैया को अंग्रेजी विज्ञान में पासर डोमेस्टिकस के नाम से बुलाए जाते हैं। इस पक्षी को अधिक तापमान अखरता है।

मैं मोबाइल टावर की बात नहीं कर रहा, किंतु अगर लगातार मोबाइल व्यवहार से उपयोगकर्त्ता को क्षति पहुंच सकती है, तो असंख्य चालू मोबाइलों से निःसृत rays and radiation की उपस्थिति मात्र से यह छोटी चिड़िया के दियाद-गोतिया विनष्ट होने के कगार पर क्यों नहीं पहुँच सकती है, सिर्फ गोरैया की नहीं ! छोटी चिड़िया बुलबुल, रसपिया या रसपीया आदि की यही दु:स्थिति है । गाँव भी शहर बनते जा रहे है । वनों का सफाया, युवा वृक्षों की कटाई, तालाबों में मिट्टी भरकर सपाट किये जा रहे हैं, उसपर गैस गोदाम या पेट्रोल पंप बन रहे हैं । विदित हो, छोटी-छोटी पक्षियों को नदियों से जल ग्रहण करने में डर और संकोच होती है, किंतु तालाबों व पोखरों से ऐसा नहीं होती है । बहती नदियों के जलस्रोत में हिंसक जलीय जीव भी तो सकते हैं । इसके साथ ही गोरैये के डैने उतने मजबूत भी तो नहीं होते हैं । बाग-बगीचों अथवा शहरी पार्कों में मनुष्यों ने ही तो कब्जा कर रखे हैं । मिट्टी और फुस का घर गोरैयों के आवासन के लिए सबसे अनुकूल है। आकाश चूमती इमारतें और संचार-संबंधी तमाम activities उनके लिए जीवन दूभर कर दिए हैं । मोटरकारों, रेलों की पों-पों सहित प्रदूषित पर्यावरण और उद्योग-धंधों की विकास-यात्रा लिए कल-कारखानों से निकली धुंए से उनके जीवन अभिशप्त हो रहे हैं । गोरैया घास के बीजों से भी अपनी आहार चुगती है । पर्यावरणप्रेमी से लेकर पर्यावरणविद तक गोरैयों के दशा एयर दिशा को लेकर बेहद चिंतित हैं, परंतु भारत के ही नहीं, प्राय: देशों के वन और पर्यावरण मंत्रालयों का रुख इस ओर बेरुखी लिए है। कृषि में भी जैविकनाशक दवाइयों का छिड़काव बीज को विषाणु बना दे रहे हैं, हालाँकि यह मनुष्यों को सीधे तौर पर attack नहीं कर रहे हैं, किंतु गोरैयों द्वारा इन कीड़े-मकोड़े को चखने मात्र से वे असमय काल-कवलित हो रहे हैं । पतंगबाजी प्रतियोगिता, हवाईअड्डे के आसपास वाले क्षेत्र, तो चील, गिद्ध, कौवे इत्यादि झपटमार बड़े पक्षी भी उन्हें ‘चट मंगनी, पट ब्याह’ की भाँति उन्हें शीघ्र ही आहार बना लेते हैं । ज्ञात हो, पतंगों के खेल में उनके चोंच, पैर, पंख और आँख घायल हो जाया करते हैं । गोरैयों के अंडे, बच्चे व चूजे को सर्प आदि हिंसक जीव या दुष्ट प्राणी आहार बना लेते हैं । भारत में गोरैया संरक्षण के लिए नियम बनानेवाले महाराष्ट्र पहले राज्य हैं, उत्तर प्रदेश दूसरे, दिल्ली तीसरे और चौथे में बिहार आते हैं। सर्वप्रथम वर्ष 2008 में गोरैया के संरक्षण के लिए जागृति लिए चलाई गई  वैश्विक मुहिम ने रंग लाई । विश्व गोरैया दिवस 20 मार्च 2010 को पहलीबार व्यवस्थित ढंग से नेचर फाइबर सोसायटी के द्वारा मनाया गया। सनद रहे, प्राय: गोरैये का जीवन काल 11 से 13 वर्ष होता है। यह समुद्र तल से 1,500 फीट ऊपर तक पाई जाती है। गोरैया पर्यावरण में कीड़ों की संख्या को कम करने में मदद करती है।

गोरैयों के प्रभावी चिंतक

भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक मो. सलीम अली ने भी इस पर बेइंतहा कार्य किये हैं, वहीं लखनऊ की लेखिका श्रीमती संतोषी दास लिखती हैं कि गौरैया की चूं चूं अब चंद घरों में ही सिमट कर रह गई है। एक समय था जब उनकी आवाज़ सुबह और शाम को आंगन में सुनाई पड़ती थी। मगर आज के परिवेश में आये बदलाव के कारण वह शहर से दूर होती गई। गांव में भी उनकी संख्या कम हो रही है। आधुनिक घरों में गोरैया के रहने के लिए कोई जगह नहीं है । विदित हो, घर पर महिलाएं अब न तो गेहूं सुखाती हैं, न ही धान कूटती-पीसती हैं, जिससे उन्हें छत पर खाना नहीं मिल पाती है। घरों में टाइल्स का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा है, जिससे गोरैया को फुदकने में परेशानी हो रही है । पक्षी विज्ञानी श्री हेमंत सिंह के अनुसार, गोरैया की आबादी में 60% से 80% तक की कमी आई है। अगर इसके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए, तो हो सकता है कि गोरैया इतिहास की चीज बन जाए और भविष्य की पीढ़ियों को यह देखने को ही न मिले। लखनऊ विश्वविद्यालय में जंतु विज्ञान विभाग की प्रो. अमिता कन्नौजिया और उनके स्टूडेंट्स ने 8 जगहों पर गौरेया की संख्या जानने के लिए गणना की। इसमें चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि जो ग्रामीण क्षेत्र थे, वहां पर गौरेया की संख्या बेहद कम पाई गई, शहरी इलाके के बनिस्पत। इसका सबसे बड़ा कारण यह माना गया कि गांव अब आधुनिक हो रहे हैं, जिससे वहाँ भी गौरेये पर संकट मंडराने लगा है। लखनऊ में 2018 में इस सर्वेक्षण के समय सिर्फ 2,767 गोरैये पाए गए। लखनऊ में सर्वेक्षण हेतु 8 स्थान रहे, यथा- इटौंजा, बीकेटी, मोहान, अमेठी, गुसाईगंज, काकोरी, मलिहाबाद और डालीगंज। यह काउंटिंग उन्होंने वैज्ञानिक मैथेड प्वाइंट काउंटिंग और लाइन ट्रासिट मैथेड से किया। इसमें सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि गांव में गोरैया की संख्या कम थी। इस गणना से यह पता चला कि इटौंजा में सबसे कम गौरेया थी। वहां पर गणना में गोरैया की संख्या 17 पाई गई। वहीं लखनऊ शहर के डालीगंज में 927 गौरैया पाए गए। प्रो. अमिता ने बताया कि यह सर्वे गोरैया पक्षी पर Ph. D. कर रहे उनके स्टूडेंट्स द्वारा किए गए हैं। इस सर्वे में यह पता चला है कि लखनऊ में कुल 2,767 गौरैया रहे हैं, यथा- डालीगंज में 927, इटौंजा में 17, बीकेटी में 200, मोहाना में 100, अमेठी में 100, गुसाईगंज में 50, मलिहाबाद में 150 रहे।  ज्ञात हो, यह कौतूहल और समर्पण की बात है कि उत्तरप्रदेश के आलमबाग निवासी श्री सुरेंद्र प्रसाद पाण्डेय ने तो अपना पूरा घर गौरैया के नाम कर दिया है, जिन्होंने अपने बगीचे में 15 टाइप्स के मानवनिर्मित घोंसले भी बनाए, जो दाना-पानी युक्त है।

और अंत में

भारत में उपलब्ध प्राचीन लेखों के अनुसार, यह पक्षी जिस भी घर में या उसके आंगन में पाई जाती है, वहाँ सुख-शांति बनी रहती है, किंतु प्रसन्नता सिर्फ पाने ने नहीं, इसे खोने में भी है ! हम विलासी बने और गोरैयों से दूर हो गए । प्राचीन हिन्दू धर्म में ऐसे और भी पक्षी हैं, जिनके धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व हैं । पक्षियों को हिंदू धर्म में देवऔर पितर माना गया है। ऐसी मान्यता है, जिस दिन आकाश में विचरते पक्षी लुप्त हो जाएंगे, उस दिन धरती से मनुष्य भी लुप्त हो जाएगा ! किसी भी पक्षी को मारना, अपने पितरों को ही मारने-जैसा है। भारतकोश में गोरैया को जंतु (Animalia), संघ- कोर्डेटा (Chordata), वर्ग- एवीज (Aves), गण- पैसरीफोर्म्स (Passeriformes), कुल- पैसरेडी (Passeridae), जाति- पैसर (Passer), प्रजाति- डोमेस्टिकस (domesticus), द्विपद नाम- पैसर डोमेस्टिकस (Passer domesticus‌) लिखा गया है। इस पक्षी की मुख्यत: 6 प्रजातियां बताई गई है। जो ऊपर वर्णित है । इसके अतिरिक्त सोमाली, पिंक बैक्ड, लागो, शेली, स्कोट्रा, कुरी, कैप, नार्दन ग्रे हैडॆड, स्वैनसन, स्वाहिल, डॆहर्ट, सुडान गोल्ड, अरैबियन गोल्ड, चेस्टनट इत्यादि नामक गोरैया विभिन्न देशों में पायी जाती है। इनके रंग-रुप, आकार- प्रकार देश-प्रदेश की जलवायु के अनुसार परिवर्तित होते रहे हैं।

यह गल्प आख्यान हो सकती है कि सृष्टि के निर्माण के साथ ही इस धरती बनी हो ! इसके बाद वृक्ष, वन, वायु, पानी, आग, जीव-जंतु, पक्षी-कीटप्राणी भी उत्पन्न हुए । बादल-पानी, नदी-निर्झर, महानद-सागर हुए हो ! एक भाग धरती और शेष तीन भाग पानी से भर दिए हो, ताकि प्राणी जीवित रह सके ! …. और अंत में धरती को श्रृंगार रस में भिंगोने के बाद उन्होंने मानव की उत्पत्ति हुई ! सृष्टि में मानव को बुद्धि से आच्छादित की गई और तभी से सृष्टिकर्त्ता ‘मानव’ के प्रति सशंकित हो गए! सृष्टिकर्त्ता ने निर्माण कार्य छोड़ दिया, जब से मनुष्य के द्वारा निर्मित हर चीज कितना गहरा असर जन-जीवन पर डाल रही है ! मनुष्य के द्वारा निर्मित हर चीज कितना गहरा असर जन-जीवन पर डाल रही है । कई पशु-पक्षी विलुप्त हो गए । छोटी चिड़िया गोरैया भी उनमें से एक है। अमर उजाला के लिए लेखक श्री अमित शर्मा लिखते हैं कि हमारे बचपन की दोस्त गौरैया अब हमारे घर नहीं आती। अपना घर बनाने की चाहत में हमने उनसे उनका प्राकृतिक आवास और भोजन छीन लिया है। यही वजह है कि गौरैया अब हमसे लगातार दूर होती जा रही है और कई क्षेत्रों में तो अब ये देखने को भी नहीं मिलती ! पक्षीप्रेमी अर्जुन जी के हवाले कहना है कि मोबाइल टावर्स की तरंगें नहीं है समस्या। दिल्ली के चांदनी चौक के रहने वाले अर्जुन जी ने बताया कि अगर हम अपने घरों में कृत्रिम रूप से उनके लिए घोंसले बना दें, तो गौरैया को अंडे देने की जगह मिल जाएगी। अंडे देने का उनका समय अगस्त से नवंबर के बीच होता है। ऐसे में अगर हम उन्हें ‘जगह’ उपलब्ध करवा दें, तो वे हमारे पास वापस आ सकती हैं। उन्होंने बताया कि वे दिल्ली के हजारों घरों में अब तक घोंसले बना चुके हैं और इन घरों में गौरैयों को वापस आते हुए और अपने अंडों को पालते हुए देखा है। उनके आवास के लिए बॉक्स कुछ बड़े साइज में होनी चाहिए। वे बॉक्स में कुछ कॉटन और सूखी पत्तियां रख देते हैं। इस बॉक्स को जमीन से आठ से दस फीट की ऊंचाई पर रख देते हैं जहां ये सुरक्षित रह सकें। इन घोंसलों पर पानी नहीं पड़ना चाहिए। इनके आसपास थोड़ी दूर पर पीने के लिए पानी का एक पात्र भी रख देते हैं और कुछ दूर पर उनके खाने की चीजें जैसे उबले चावल, पोहा या रोटी के टुकड़े बिखेरने वाले अंदाज में रख दी जानी चाहिए। इससे गौरैयों को यह उनका प्राकृतिक आवास जैसा महसूस होता है और वे इनमें वापस आ जाती हैं। 

छोटे-छोटे दानोंवाले अनाजों की खेती न होने से गोरैया के आहार में कमी आयी है, जिससे गौरैया को खाने के लिए चीजें नहीं मिल रही हैं। गोरैया कीड़ों को भी खाना पसंद करती है, लेकिन शहरों में ढकी नालियों के चलते अब गोरैयों के लिए कीड़ों की उपलब्धता में भी भारी कमी आई है, जिससे उनका जीवन असहज हुआ है। इस पक्षी की सैकड़ों प्रजातियां दुनिया के हर कोने में पाई जाती हैं, लेकिन प्राकृतिक स्थलों के बदलाव के कारण अब इनकी संख्या में तेजी से कमी हो रही है । एक रपट के अनुसार, सिर्फ गोरैया ही नहीं, वरन दुनिया की हर 8वीं चिड़िया की प्रजाति पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। अमेरिकी संस्था ‘कार्नेल लैब’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1966 की संख्या के आधार पर गोरैया की संख्या में 84% तक की कमी आई है। ब्रिटेन में गोरैया की संख्या अब आधी से भी कम रह गई है। इस पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ही प्रतिवर्ष 20 मार्च को विश्व गोरैया दिवस मनाया जाता है। भारत सरकार ने 2010 में गोरैया पर डाकटिकट जारी किया और दिल्ली सरकार की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने वर्ष 2012 में गौरैया को दिल्ली का राज्य पक्षी घोषित की। हमें युद्धस्तर पर इस मासूम पक्षी के संरक्षण के लिए अतुलनीय प्रयास करने ही पड़ेंगे, तभी हमारी पीढ़ी इसे देख पाएंगी!
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संदर्भ :-

1. श्री प्रभुनाथ शुक्ल/आईचौक.इन/मार्च 2018
2. सुश्री/श्री मेधाविनी मोहन/सत्याग्रह/मार्च 2018
3. सुश्री/श्री संतोषी दास/पत्रिका/लखनऊ/प्रकाशनावधि-N.A.
4. श्री अमित शर्मा/अमर उजाला/सितंबर 2019
5. भारत कोश और विकिपीडिया से स्रोत-संदर्भित।

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