लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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 डॉ0 कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

सोनिया कांग्रेस की गतिविधियों, उसके कार्यक्रमों और भारतीयता अथवा हिन्दुत्व के प्रति उसके एजेंडा को लेकर पिछले कुछ अर्से से व्यापक चर्चा हो रही है। खास कर जब से विकीलीक्स ने इस बात का खुलासा किया है कि सोनिया कांग्रेस की दृष्टि में भारत को खतरा इस्लामी आतंकवादियों या फिर लकरे तोयबा जैसे संगठनों से नहीं है बल्कि भारत को खतरा गुस्से मे आ रहे हिन्दुओं से है। सोनिया कांग्रेस ने अप्रत्यक्ष रूप से भारत और भारत की पहचान भारतीयता को ही प्रिनत किया है। दरअसल सोनिया कांग्रेस की एक टीम जिसके मुखिया दिग्विजय सिंह है, ने एक सोची समझी योजना के अन्तर्गत भारत में हो रहे आतंकवादी हमलों में पाकिस्तानी आतंकवादियों और पाकिस्तान में प्रशिक्षित आतंकवादियों को क्लीन चिट देने का सिलसिला भी शुरू किया है और भारत में पाकिस्तान द्वारा चलाया जा रहे इस छद्म युद्व में पाकिस्तान को पाक साफ बताते हुए भारतीय अथवा हिन्दुओं को ही आतंकवादी घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराना भी शुरू कर दिया है, उससे लगता है कि है किसी सिरफिरे प्रलाप नहीं बल्कि किसी बड़ी साजिश का हिस्सा है।

 

इस साजिश में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नाम का प्रयोग लोगों को धोखा देने के लिए किया जा रहा है। जबिक असलियत यह है कि सोनिया कांग्रेस का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से कोई सम्बन्ध नहीं है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का इतिहास उसके जन्म से लेकर 1998 तक एक प्रकार से भारत की राष्ट्रीय धरोहर है इस इतिहास में लोकमान्य तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, महात्मा गांधी, सरोजनी नायडू, जवाहर लाल नहरू, सुभाष चन्द्र बोस, डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद, डॉ0 जाकिर हुसैन लाल बहादुर शास्त्री इन्दिरा गांधी, नरसिम्हाराव इत्यादि अनेक महानुभावों का नाम भी शुमार है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अन्तिम अध्यक्ष सीताराम केसरी हुए। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विचारों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है। परन्तु इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता की इस संगठन का देश को विदेशी शासन से मुक्त करवाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है और इसने भारत की मूल पहचान को लेकर कभी कोई प्रश्न खड़ा नहीं किया।

सोनिया कांग्रेस एक बिल्कुल अलहदा राजनैतिक दल है जिसका गठन 1998 में किया गया लेकिन दुर्भाग्य से सोनिया गांधी और उसके योजनाकारों ने इतनी हिम्मत नहीं दिखाई की वे इस नये राजनैतिक दल की घोषणा भारत के लोगों के सामने स्पष्ट रूप से करते और अपने इस नये राजनैतिक दल का एजेंडा भी भारत के लोगों को स्पष्ट रूप से बताते। इसके विपरीत एक बड़े षड्यंत्र के अन्तर्गत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तंत्र पर कब्जा करने की योजना बनाई गई। इस योजना का अहम हिस्सा था कि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सीताराम केसरी को किसी ढंग से बलपूर्वक अपदस्थ करके मुख्यालय पर कब्जा कर लिया जाये।

इसके लिए सोनिया गांधी और उसके योजनाकारों ने कांग्रेस कार्यकारणी के कुछ सदस्यों को अपने साथ मिलाने की योजना बनाई। हो सकता है कि इसके पीछे चर्च का हाथ हो या कुछ ऐसी शक्तियों को हाथ हो जो भारत को अस्थिर करना चाहती है और उसको कई हिस्सों में तोड़ने का प्रयास कर रही है। सोनिया गांधी और उसके योजनाकारों के इस षड्यंत्र में साथ देने के लिए ए0के0 एंटोनी, अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, विंसेट जार्ज के अतिरिक्त शरद पवार भी शामिल हुए। यह ध्यान में रखना चाहिए कि चर्च एक लम्बे अरसे से शरद पवार को प्रधानमंत्री बनाने के प्रयासों में लगा हुआ है। 5 मार्च 1998 को जैसे ही कांग्रेस कार्यकारणी की मीटिंग हुई घर के इन भेदियों ने सोनिया गांधी से प्रार्थना की की वे कांग्रेस संसदीय दल का नेता मनोनीत करें। सीताराम केसरी संसदीय दल के नेता थे। 9 मार्च 1998 को सीताराम केसरी और दूसरे कांग्रेसी सोनिया गांधी की इस साजिश को समझ गये कि सोनिया के नेतृत्व में 57 लोगों का एक समूह भारत के सबसे पुराने राजनैतिक दल को समाप्त करके उसके नाम की आड़ मे ही एक नया राजनैतिक दल खड़ा करना चाह रहे हैं। उन्होंने तुरन्त देश भर के कांग्रेसियों को इस षड्यंत्र से वाकिफ करवाने के लिए यह घोषणा कर दी की वे ऑल इण्डिया कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन बुलाकर उसमें अपना त्यागपत्र प्रस्तुत कर देंगे और कांग्रेसियों को आगे का रास्ता चुनने के लिए कहेंगे। ध्यान रहे सीताराम केसरी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विधिवत चुने हुए अध्यक्ष थे। ए0आई0 सी0सी0 में पूरे दो भर से एक हजार से भी ज्यादा प्रतिनिधि होते हैं। केसरी के इस निर्णय से सोनिया गांधी और उसके योजनाकार और उनकी सहायता कर रहे एंटनी अहमद और गुलाम नबी इत्यादि सकते में आ गये। तुरन्त योजना को नया रूप दिया गया 14 मार्च 1998 को दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय पर कार्यकारिणी की बैठक में प्रणब मुखर्जी ने कांग्रेस के संविधान का हवाला देते हुए कहा कि असाधारण स्थिति पैदा हो गई है। इस स्थिति में सीताराम केसरी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाया जाता है। तुरन्त जितेन्द्र प्रसाद ने खड़े होकर घोषणा की कि सोनिया गाधी को नया अध्यक्ष बनाया जाता है। अभी सीताराम केसरी कुछ समझ पाते तब तक सोनिया गाधी के विशेष सुरक्षा दस्ते ने कांग्रेस मुख्यालय को घेर लिया मीडिया का एक सेक्शन शायद पहले ही इस षड़यंत्र को जानता था या उसके कुछ लोग उसमें भामिल थे। क्योंकि तुरन्त मीडिया एक दो समूहों ने अतिरिक्त उत्साह से सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के औचित्य को सिद्ध किया। जबिक कांग्रेस सविधान ने कांग्रेस के अध्यक्ष को कार्यकारणी नहीं हटा सकती। यह स्थिति कुछ इसी प्रकार की थी जैसे किसी देश में सेना के कुछ अधिकारी सेना की सहायता से सत्ता के मुख्यालय पर कब्जा कर लेते है और नीचे के अपरेटस स्वत्ता नयी व्यवस्था के अनुसार चलना भी शुरू हो जाता है। क्योंकि यह सत्ता परिवर्तन असंवैधानिक होता है इसलिए कुछ देश नयी सरकार को मान्यता नहीं भी देते। लगभग यही स्थिति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ हुई थी जिसमें सोनिया गांधी ने अपने कुछ सहायकों की सहायता से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मुख्यालय पर कब्जा कर लिया था और स्वयं को इस राजनैतिक दल का अध्यक्ष भी घोषित कर दिया था। यह कुछ इसी प्रकार का मुसोलिनी टाईप फासीवादी प्रयोग था जिसमें पहले किसी की हत्या की जाती है और बाद में उसी व्यक्ति के शरीर में किसी दूसरी आत्मा का प्रवेश करवाया जाता है। दार्क काया देख कर उसे वही आदमी मानते हैं जबिक उसके भीतर कोई दूसरा छिपा बैठा होता है। चुनाव आयोग को चाहिए था कि इस घटनाक्रम के तुरन्त बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर देता और सोनिया कांग्रेस को नये राजनैतिक दल के रूप में पंजीकरण करवाने के लिए कहता। परन्तु दुर्भाग्य से चुनाव आयोग अपन कर्तव्य से चुक गया।

सोनिया कांग्रेस भारत में अपने जिस एजेंडे को लागू कर रही है उसको इस पूरी पृष्ठभूमि में समझना आसान हो सकता है। जिन शक्तियों ने इस नये राजनैतिक दल को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जाहिर है की वे शक्तियां इस देश की पहचान से मुतफिक नहीं हैं। इस देश की पहचान अब्दुल रहमान अंतुले, गुलाम नबी आजाद, अहमद पटेल, विंसेट जार्ज और दूसरे ऐसे ही कुनबे से नहीं बनी है बल्कि इस देश की पहचान हिन्दुत्व के इस राष्ट्र प्रवाह से बनी है जिसे पूरे विश्व में भारत का पर्यायवाची माना जाता है। सोनिया कांग्रेस अपने दिग्विजयों, अजीज बर्नियों के माध्यम से इसी पहचान को मिटाने का प्रयास कर रही हैं। इस प्रयास में सोनिया कांग्रेस के साथ साथ कुछ दूसरी शक्तियां भी लगी हुई हैं। गुलाम नबी फाई और उसके आका अमेरिका में बैठ कर यह काम कर रहे हैं। ओपस दाई स्पेन में बैठ कर यही काम कर रही है। दुर्भाग्य से सोनिया कांग्रेस का एजेंडा इन भारत विरोधी शक्तियों से मेल खा रहा है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और भी कि सोनिया कांग्रेस यह सब काम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नाम से कर रही है जो देश से भी धोखा है और इतिहास से भी।

7 Responses to “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और सोनिया कांग्रेस में अन्तर को समझना होगा”

  1. संजीव कुमार सिन्‍हा

    संजीव कुमार सिन्हा, संपादक, प्रवक्ता

    मीणा जी को साधुवाद कि वो बार-बार हमारी गलतियों की ओर इंगित कर हमें सचेत करते रहते हैं.

    १. लेकिन मीणा जी, आपका यह कहना सही नहीं है कि …….” स्वयं को सबसे बड़ा हिन्दू और राष्ट्रभक्त घोषित कर चुके एक कथित विद्वान मेरे नाम से एक ही टिप्पणी को अनेकों स्थानों पर पेस्ट कर रहे हैं और प्रवक्ता की ओर से ऐसी टिप्पणियॉं बिना जॉंच पड़ताल के अप्रासंगिक होते हुए भी न जाने किस पवित्र उद्देश्य से प्रदर्शित की जाती रही हैं?”……..
    २. डॉ. राजेश जी ने एक टिप्पणी को ‘अनेकों’ जगह नहीं बस एक जगह और उपयोग किया है. कई बार ऐसा होता है कि टिप्पणीकार एक ही टिप्पणी को एक सन्दर्भ से जुड़े २-3 लेखों पर चिपकाते हैं. इसलिए मैंने टिप्पणी पढ़कर उसे अप्रूव कर दिया. हम २-३ घंटे पर टिप्पणी मोडरेट करता हैं और औसतन २५ टिप्पणियां डैशबोर्ड पर मोडरेशन के लिए होती है, इसलिए संदर्भित २५ लेखों को देख पाना श्रमसाध्य कार्य है. हम केवल टिप्पणी की विषयवस्तु ही देख पाते हैं. हालाँकि यहाँ राजेश जी से त्रुटि हुई है. लेकिन यह भूलवश ही है. यह सुविदित है कि वे प्रवक्ता पर गंभीर टिप्पणी करने के लिए मशहूर हैं.
    ३. जहाँ तक इस लेख का सवाल है, हम मानते हैं कि यह महत्वपूर्ण लेख है.
    ४. लेख भेजते समय लेखक की ओर से प्रूफ चेक करने की बात कही गई थी. हमने ऐसा किया भी था फिर भी त्रुटियाँ रह गई थीं. मैं क्षमापार्थी हूँ.
    ५. आपने कहा है कि…..’आलोचना करके मेरा आशय प्रवक्ता को श्रृेष्ठतम बनाने की दिशा में आगे बढने को प्रेरित करना है| ‘

    आपके इस नेक इरादे को मैं सलाम करता हूँ.

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  2. -डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

    सबसे पहले तो यह कि हिन्दुत्व के नाम पर स्वयं को सबसे बड़ा हिन्दू और राष्ट्रभक्त घोषित कर चुके एक कथित विद्वान को मेरा नाम इतना परेशान कर रहा है कि मेरे नाम से एक ही टिप्पणी को अनेकों स्थानों पर पेस्ट कर रहे हैं और प्रवक्ता की ओर से ऐसी टिप्पणियॉं बिना जॉंच पड़ताल के अप्रासंगिक होते हुए भी न जाने किस पवित्र उद्देश्य से प्रदर्शित की जाती रही हैं?

    यहॉं पर प्रदर्शित श्री डॉ. राजेश कपूर जी की टिप्पणी इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है| इस टिप्पणी से पूर्व मेरी कोई टिप्पणी इस आलेख पर नहीं है| फिर भी यह टिप्पणी मेरी किसी पूर्ववर्ती टिप्पणी के प्रसंग में सम्मान के साथ प्रदर्शित हो रही है!
    +++++++++++++++++++++++++++++++
    जहॉं तक इस आलेख पर टिप्पणी करने का सवाल है तो मुझे लगता ही नहीं कि इसमें जो कुछ भी लिखा गया है, उसका कोई आधार हो| केवल कयासों और सम्भावनाओं को आधार बनाकर आपराधिक शैली में लिखे जाने वाले उपन्यासों की तरह इसकी पटकथा रची गयी है| यह सही है कि यूनीकोट में लिखते समय हम सभी से कुछ त्रुटियाँ रह जाती हैं, लेकिन इस आलेख को पढकर लगता है कि इस आलेख को लिखने और इसे प्रदर्शित करने की लेखक को इतनी जल्दी रही होगी कि उन्होंने एक जगह नहीं, अनेकों जगह पर लिखी गयी गम्भीर और अर्थ को अनर्थ करने वाली अशुद्धियों तक को ठीक करने के लिये, लेख को प्रकाशन हेतु भेजने से पूर्व एक बार पढना तक जरूरी नहीं समझा और प्रवक्ता के सम्पादक मण्डल ने भी इस लेख की अशुद्धियों, आधारहीन बातों और कयासों के आधार पर रची गयी गाथा को यहॉं पर प्रदर्शित करने से पूर्व किस प्रकार अपना सम्पादकीय धर्म निभाया, यह भी विचारणीय है?

    हो सकता है कि लेखक के दिमांग में चल रही सभी बातें सम्भावित हों, लेकिन कम से कम अपनी सम्भावनाओं के समर्थन में कुछ तो तथ्यपूर्ण या दस्तावेजी जानकारी उपलब्ध करवाते| ताकि निष्पक्ष पाठक आपकी ढपली का साथ देने के बारे में सोचने को विवश हो जाते| अपनी मण्डली के लोगों की वाहवाही से कुछ नहीं होने वाला है| जरूरत है कि आपके विचारों से असहमति प्रकट करने वाले भी एक बार इस बात को सोचने को विवश हों कि हॉं वाकई आपकी बात विचारणीय है, तो ही इस प्रकार के लेखन का कोई अर्थ है| अन्यथा तो इस तरह के लेख वेब मीडिया की विश्‍वसनीयता तो क्षति पहुँचाने के सिवा कुछ भी हासिल नहीं कर सकते| इस लेख में केवल स्वर्गीय श्री सीताराम केसरी के अलोकतान्त्रित तरीके से पद से बर्खास्त करने के तथ्य को अवश्य कॉंग्रेस की आलोचना के लिये उपयुक्त आधार माना जा सकता है| लेकिन इस बात से भी सारा देश पहले से ही परिचित है कि केसरी को जबरन हटाकर सोनिया की ताजपोशी की गयी थी, जिसमें सारे के सारे कॉंग्रेसी नतमस्तक थे| हालांकि इसे बाद में पूरी कॉंग्रेस ने स्वीकार कर लिया| ऐसे में पूरी कॉंग्रेस को ही नयी बताने का तर्क कितना सार्थक और बौद्धिक है, यह समझ से परे है| यदि ऐसे तर्क दिये जाने लगे तो संविधानसभा के गठन के बारे में भी अनेक सवाल उठेंगे?

    यह लेख पढकर मैं पहली बार प्रवक्ता के सम्पादक मण्डल की आलेखों की गुणवत्ता की नीति पर भी सोचने को विवश हूँ|

    श्री संजीव सिन्हा जी, मुझे दु:ख है कि मैंने सम्पादक मण्डल पर सवाल खड़े किये हैं| आलोचना करके मेरा आशय प्रवक्ता को श्रृेष्ठतम बनाने की दिशा में आगे बढने को प्रेरित करना है| कहीं न कहीं हम भी प्रवक्ता से अपनापन अनुभव करते हैं| अपने आपको प्रवक्ता परिवार का हिस्सा मानते हैं| इसी भाव से आग्रह है कि सम्पादक मण्डल को कम से कम लेख की भाषा की अशुद्धता और लेख की विषयवस्तु के आधारों के बारे में तो विचार करना ही चाहिये| आगे आपकी इच्छा! आप प्रवक्ता पर क्या चाहते हैं और क्या नहीं ये आपको ही निर्धारित करना है| लेख या किसी भी टिप्पणी को प्रकाशित करने से पूर्व उसका अध्ययन जरूरी होना चाहिये, केवल लेखक की प्रोफाईल देखकर प्रकाशन की स्वीकृति दे देना बुद्धिमता नहीं है!

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  3. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    तो डा. मीणा जी आप आही गए . मुझे भी विश्वास था की आप इस अवसर पर ज़रूर प्रगट होंगे और ससमाज में दरारें पैदा करने, विद्वेष बढाने के अपने प्रिय कार्य को करने का कोई भी अवसर क्यूँ छोड़ेंगे. जितने सवाल इस उपरोक्त लेख में हैं, उनमें से एक का भी उत्तर महोदय आपने नहीं दिया. प्रो. कुसुमलता केडिया जी के लेख पर एक भी तर्कसंगत तो क्या कैसा भी उत्तर नहीं दिया. उनके इतने विद्वत्ता पूर्ण और ऐतिहासिक प्रमाणों से भरपूर लेख को बेकार बतला अपनी विद्वत्ता (?) का परिचय दे दिया. उत्तर नहीं दे सकते तो वहां प्रकट ही न होते तो आपकी लाज रह जाती. मेरे और उनके लेखों का उत्तर देने से भागने के कारण पाठकों को आपकी नीयत और समझ का और अछि तरह पता चल गया. ……… अब ज़रा बात करते हैं आपकी इस टिपण्णी के बारे में. व्यक्ती के भीतर जो भरा होता है वही बहार आता है. ज़रा आप देखें की आपके भीतर क्या भरा है. ” कुकर्मी पूर्वज, गालीगलौच, नीच जाती, दुष्कर्मी, दुष्ट, ज़हरीले कीड़े, बौधिक ज़हर, कलंक” . एक छोटी सी टिपण्णी में आपने इतने सारे शांति, सभ्यता और अपनी सोच व व्यक्तित्व का परिचय देने वाले शब्दों का प्रयोग कर डाला. मुझे कुछ विशेष कहने की आवश्यकता नहीं. आपके भीतर क्या है, साफ़ नज़र आ रहा है. आपकी नीयत आपके भाषा से प्रगट हो ही जाती है. फिर से दोहराता हूँ की ईश्वर आपको सदबुधि दे.

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  4. Anil Gupta,Meerut,India

    विकिलीक्स का ये खुलासा कुछ हद तक इस सच्चाई को उजागर करता है की वर्तमान परिस्थितियों में हिन्दू समाज गुस्से में आ रहा है. मई १९७० में लोकसभा में तत्समय गुजरात व महाराष्ट्र में हुए सांप्रदायिक दंगो पर चर्चा की शुरुआत करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी जी ने सदन से एक सवाल पूछा था जिसका किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया.सवाल था की हिन्दू दुनिया में सबसे अधिक सहनशील है लेकिन ७०० साल तक लगातार मार खाने के बाद अब हिन्दू ईंट का जवाब patthar से देना सीख गया है. Hindu के svabhaav में आ रहा ये अंतर किस कारण से आ रहा है इस पर विचार होना चाहिए. लेकिन इंदिरा गाँधी जी समेत किसी ने इसका जवाब नहीं दिया. इस सवाल का जवाब ६ दिसंबर १९९२ को बाबरी ढांचा गिरने के बाद वी एस नायपाल ने दिया था. उन्होंने कहा की १००० साल तक दबाये जाने से उत्पन्न संकलित आक्रोश की ये प्रस्फुटि थी.कांग्रेस के नेता और खास तौर पर सोनिया गाँधी ये अच्छी इअरह जानते हैं की उनकी दुकान तभी तक चल रही है जब तक हिन्दू विभाजित है जिस दिन हिन्दू संगठित होकर अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति कर देगा उस दिन सारे सेकुलरिस्टों का बाजा बज जायेगा. सकल जगत में खालसा पंथ गाजे, जगे धर्म हिन्दू सकल भांड भाजे.दुर्भाग्य से इस समय कांग्रेस का नेतृत्व एक ऐसी विदेशी महिला के हाथों में है जिसे इस देश से केवल वहीँ तक लगाव है जब तक उसे यहाँ से लूट की छूट मिली हुई है. कांग्रेस के गौरवशाली नेतृत्व श्रंखला को कलंकित किया जा रहा है.सोनिया के कांग्रेस अध्यक्ष पद पर कब्ज़ा करने के सन्दर्भ में विद्वान् लेखक ने मुसोलिनी टाइप फासीवादी सत्ता कब्जाए जाना सही बताया है क्योंकि सोनिया गाँधी उर्फ़ एड्विगे अन्तोनिया अल्बीना मैनो के परिवार के मुसोलिनी और उसकी फासिस्ट पार्टी से गहरे पारिवारिक रिश्ते रहे हैं.आज जो हिन्दुओं को दबाने का कार्य किया जा रहा है उसके दो कारण हैं. एक, सोनिया को सत्ता पर पूरा कब्ज़ा करने में केवल हिंदुओंके गुस्से का ही दर है इसलिए हिन्दुओं को किसी भी तरह हतोत्साहित करना है. दूसरा देश की राजनीती में इसाई नेताओं (अधिकांश ने अपने हिन्दू नाम नहीं बदले हैं) को बढ़ावा देकर देश के ईसाईकरण को गति देना है जैसा की वर्ड चर्च कोंसिल का आदेश है.निजी बातचीत में कांग्रेस के पुराने नेता इस तथ्य को स्वीकार करते हैं लेकिन पार्टी के भीतर आवाज़ उठाने का साहस नहीं दिखा पाते हैं.ऐसे में हिन्दुओं को एकजुट होकर संगठित शक्ति के द्वारा इसका प्रतिकार करना होगा वर्ना शायद अफ़सोस करने लायक भी नहीं बचेंगे.

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  5. kaushalendra

    आर.सिंह जी ! उत्तराधिकारी उसे कहते हैं जो अधिकार के योग्य हो और अपने पूर्वजों के निर्धारित किये रास्ते पर चलने के लिए कृत संकल्प हो न कि उसे बदलने के लिए षड्यंत्रकारी हो . सोनिया उत्तराधिकारी नहीं हैं उन्होंने भारत की एक पुराणी पार्टी पर बलात कब्जा किया है. मणि शंकर अय्यर की तल्ख़ आवाज़ क्या इशारा कर रही है ?
    हमें तो इतनी बड़ी डकैती के बारे में पहली बार पता चल रहा है . इस राजनैतिक डाके के प्रति विपक्षी दलों की चुप्पी भी रहस्यमयी है. वस्तुतः सोनिया और उनके सलाहकारों ने कांग्रेस की तो खाट खड़ी कर दी है. पर कमाल है, कांग्रस के अन्य लोग भी क्यों सोये हुए हैं ? हम देश पर कांग्रेस का राज नहीं चाहते पर कांग्रेस का खात्मा भी नहीं चाहते. देश में कम से कम दो सशक्त परस्पर विरोधी पार्टियां होनी ही चाहिए.
    कांग्रेस के इस सत्य से देश को परिचित कराने के लिए अग्निहोत्री जी को सादर नमन !

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  6. premshanker gupta

    मुझ ऐसा लगता है कि सोनिया के पीछे कोई शातिर माफिया गैग का दीमाग काम कार रहा है जो भारत को लूट कर इसको कंगाल कर देने पर तुला है ताकि इसको फिर से गुलामी कि बेडियो में जकडा जा सके| दुर्भाग्य की बात है कांग्रेस के कई बड़े बड़े नेतागण भी इस विषय में सोनिया का साथ दे रहे है, और इसका कारण यातो लालचियो को भरपूर पैसा है जो कि सोनिया के पास बहुतायत से है या किसी भय वस लोग सोनिया का साथ देने को
    विवश है|| बीजे पी के नेताओ की नरम रुख/ आक्रामक रवय्ये का आभाव भी
    संदेहास्पद है|

    अतएव भारत की अस्मिता कि रक्षा के लिये एक नए देश भक्तो, वीरो और
    विचारको के दल का निर्माण कर आगे आना होगा| नेतृत्व के लिये हमारे सामने
    सिर्फ तीन ही नाम आते है – १) बाबा रामदेव २) अन्ना हजारे ३) डॉ.सुब्रामनियन
    स्वामी| बाबा राम,देव और अन्ना हजारे राजनिति में नहीं आने के लिये संकल्पित है|
    पर देश-हित और जन-हित को ध्यान में रखते हुए हम सब लोगो को बबा रामदेव
    और अन्ना हजारे से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे अपना आशीर्वाद डॉ.स्वामी को दे
    जिससे की डॉ.स्वामी के नेतृत्व में अधर्म और अत्याचार के विरुद्ध जेहाद छेड़ दिया
    जाय| इस विषय में कोई भी बिलंबा घातक ही होगा|
    जय भारत.

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  7. आर. सिंह

    आर.सिंह

    इस लेख को मैंने नहीं पढ़ा. उसके लिए विज्ञ लेखक से क्षमा चाहता हूँ ,क्योंकि बिना पढ़े टिप्पणी करना न्याय संगत नहीं है ,फिर भी मैं वह दू:साहस कर रहा हूँ क्योंकि मैं सोनिया कांग्रेस को केवल इंदिरा कांग्रेस का उतराधिकारी मानता हूँ.इसका भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से नाता तो१९६९ में ही टूट गया था,जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विभाजन के बाद इंदिरा .कांग्रेस का जन्म हुआ था.

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