भारतीय गणतंत्र और तिरंगा

अशोक बजाज

किसी भी नागरिक को अपने देश के किसी भी भू-भाग में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की स्वतंत्रता है। स्वतंत्र भारत का ध्वज तिरंगा है और इसे भारतीय गणतंत्र के किसी भी भू-भाग में फहराया जा सकता है यह विडंबना ही है कि भारत एक मात्र देश है जहॉं पर राष्ट्रीय पर्व के दिन ध्वज फहराने को लेकर विवाद उत्पन्न हो रहा है। विवाद उत्पन्न करने वाले लोग यह तर्क दे रहे हैं कि तिरंगा अगर फहराया गया तो कश्मीर में शांति भंग हो जायेगी। जिस तिरंगे की आन-बान और शान के लिए लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी तथा अनेक वीर सपूत हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर लटक गये और जिस तिरंगे के बारे में यह कहा गया कि —-

‘शान न इसकी जाने पाये ,

चाहे जान भले ही जाये ,

विश्व विजय करके दिखलायें ,

तब होवे प्रण पूर्ण हमारा,

झण्डा उँचा रहे हमारा ;

आज देश की राजनैतिक स्थिति ऐसी हो गई है कि भारत के मुकुट मणि कश्मीर में झण्डा फहराने से रोका जा रहा है, कुछ लोगों को इसमें आपत्ति है, आपत्ति करने वाले लोग बड़े शान से कह रहे हैं कि इससे शांति भंग होगी, न फहरायें। कभी तिरंगे को फहराना शान की बात समझी जाती थी, तो आज इन लोगों की नजर में तिरंगा न फहराना शान की बात समझी जा रही है। जहॉं तक शांति भंग का सवाल है तो स्वतंत्रता आंदोलन के समय अंग्रेजी हुकूमत भी यही कहती थी कि आंदोलनकारियों के कारण शांति भंग हो रही है, देश में अराजकता फैल रही है। महात्मा गांधी तक को शांति भंग के आरोप में कई बार गिरफ्तार किया गया। जो लोग तिरंगा फहराने को लेकर आपत्तियां कर रहे हैं, उन्हें तिरंगे की आन-बान और शान की परवाह नहीं है। प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह एवं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अंग्रेजों की भाषा में बोल रहे हैं। 1947 के पहले जो बात अंग्रेज बोलते थे, वही बात आज हमारे प्रधानमंत्री और कश्मीर के मुख्यमंत्री बोल रहे हैं।

यह विचित्र विडंबना है कि जिस कांग्रेस पार्टी के बैनर तले देश की आजादी की लड़ाई लड़ी गयी, केन्द्र में उसी कांग्रेस पार्टी की आज हुकूमत है। 1947 के पहले कांग्रेस के नेता झण्डा फहराने के लिए मरते थे और आज झण्डा फहराने वालों को मार रहे हैं, देश की जनता यह सब देख रही है । केन्द्र सरकार ने तुष्टिकरण की नीति के चलते अलगाववादियों के सामने घुटने टेक दिए, देश की सीमा खतरे में है। उमर अब्दुल्ला ने आज तक कभी-भी कश्मीर के लाल चौंक में पाकिस्तानी झण्डा फहराने वालों को नहीं रोका। भारत और भारतीयों के खिलाफ जगह-जगह वहॉं नारे लिखे गये, उसके बारे में कभी नहीं टोका। आज जब देश के नौजवान वहॉं तिरंगा फहराने की बात कर रहे हैं तो इनको आपत्ति हो रही है। युवाशक्ति के इस इरादे को भांपकर, बेहतर होता कि स्वयं प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह यह कहते कि नौजवानों तुमको लाल चौंक जाने की जरूरत नहीं है, मैं स्वयं वहॉं जाकर तिरंगा फहराउंगा, तो शायद उनकी इज्जत में बढ़ोत्तरी होती, लेकिन तिरंगा फहराने वालों की आलोचना करके उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से यह सिद्ध कर दिया है कि वे कश्मीर को भारत का भू-भाग नहीं मानते। इस घटनाक्रम से एक बात का खुलासा तो हो ही गया कि कौन तिरंगे का पक्षधर है और तिरंगे का विरोधी । जो लोग लालचौंक में तिरंगा फहराने का विरोध कर रहे हैं, उनमें और अलगाववादियों में फर्क क्या रह गया है ?

जहॉं तक कश्मीर समस्या का सवाल है, यह समस्या धारा 370 की वजह से उत्त्पन्न हुई है, अगर पंडित नेहरू ने सरदार वल्लभ भाई पटेल की बात मान ली होती तो आज कश्मीर की सूरत ही कुछ और होती ।आज कश्मीर की हालत यह हो गयी है कि समूचा राज्य अलगाववादियों के हवाले कर दिया गया है तथा दिल्ली की सरकार विवश और लाचार बन कर बैठी है।

5 thoughts on “भारतीय गणतंत्र और तिरंगा

  1. सचमुच बजाज जी इस गणतंत्र दिवस पर तिरंगा यात्रा को रोक कर कांग्रेस ने ये साबित कर दिया की आज़ाद भारत में कश्मीर को अलग राज्य का दर्ज़ा देने ,या यों कहें की पंडित नेहरु की लचर नीतियों ने देश के हर नागरिक को ये सोचने पर बाध्य किया है की क्या कश्मीर भारत का अंग नहीं है ?क्या साबित करना चाहती है ये पार्टी ?क्या भारत के किसीभी भू भाग पर तिरंगा लहराना जुर्म है ?क्यों रोकी गई तिरंगा यात्रा ?क्यों रद्द की गई सभी रेल गाड़ियाँ ?क्या हमें फिर गुलामी के दिनों की याद नहीं आई ?निश्चित ही ये प्रश्न सभी देशवासियों के मनोमस्तिक में भूचाल पैदा कर रहें हैं ,किन्तु देर सही अंधेर नहीं हैं २०१४ के चुनाव में देश का मतदाता”सौ सुनार की -एक लोहार की”वाली कहावत को ज़रूर ज़रूर चरितार्थ कर अपने एक एक बटन से से एक एक प्रश्न का जवाब निश्चित कर इस दोमुही सरकार को उखाड़ फेंकेगा,देश की आज़ादी आन्दोलन में शहीद हर सपूत को इस कृत्य से घृणा है,उन सभी की आत्माएं पूछ रही है की क्या गणतंत्र यही है की हम अपने देश में तिरंगा लेकर जाएँ और सरकार इसे रोके ?क्या इसी लिए हम स्वतंत्र हुवें हैं ? ये याद रखना चाहिए की “जो खून गिरा पर्वत पर-वो खून था हिन्दुस्तानी ,जो शहीद हुवें हैं उनकी ज़रा याद कुर्बानी ” जय भारत जय छत्तीसगढ़ -विजय सोनी अधिवक्ता दुर्ग

  2. भारत एक “राष्ट्रियता-निरपेक्ष” देश बनता जा रहा है. जहां राष्ट्रिय झण्डा फहराना “रबिश” है. लेकिन आतंकवादीयो को पक्ष मे वकालत करना राष्ट्रवाद बन गया है. अगर भारत की बहुसंख्यक जनता अपने देश मे पैदा हुए नागरिक को प्राईम-मिनिष्टर बनाने की बजाए किसी ईटली मे जन्मी महिला को सुपर प्राईम मिनिष्टर बनाएगी तो देशभक्ति की परिभाषा तो बदलेगी ही.

  3. यह हिंदुस्तान अवं भारत का दुर्भाग्य है की सरदार मनमोहन सिंह जैसे इस देश के प्रधान मंत्री हैं अगर उनका वश होता तो वोह जम्मू कश्मीर ना ना श्रीनगर के मुख्या मंत्री ना ना अतंकवादियो अवं पकिस्तनिओन के प्रिय मो उमर को तिरंगा जलाने और पाकिस्तानी झंडा लहराने के लिए सारी ताकत लगा देते

  4. श्री बजाज जी सच कह रहे है. वाकई लाल चौक पर राष्ट्रीय झंडा फहराना से मन करना गुलामी के समय अंग्रजो के बर्बरता कार्यवाही की याद दिलाती है. कहते है शांति भंग होगी. झंडा फहररता तो आतंकवादी, अलगाववादी और समर्थको को सबक मिलता की देश अब और यह सब सहन नहीं करेगा.

  5. @ अशोक बजाज
    अटल बिहारी वाजपेई सरकार में आपका देशप्रेम कहा चला गया था
    अरुणाचल बोर्डर पर जाने की कभी फुर्सत नहीं मिलती आप लोगो को

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