लेखक परिचय

अशोक बजाज

अशोक बजाज

श्री अशोक बजाज उम्र 54 वर्ष , रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर से एम.ए. (अर्थशास्त्र) की डिग्री। 1 अप्रेल 2005 से मार्च 2010 तक जिला पंचायत रायपुर के अध्यक्ष पद का निर्वहन। सहकारी संस्थाओं एंव संगठनात्मक कार्यो का लम्बा अनुभव। फोटोग्राफी, पत्रकारिता एंव लेखन के कार्यो में रूचि। पहला लेख सन् 1981 में “धान का समर्थन मूल्य और उत्पादन लागत” शीर्षक से दैनिक युगधर्म रायपुर से प्रकाशित । वर्तमान पता-सिविल लाईन रायपुर ( छ. ग.)। ई-मेल - ashokbajaj5969@yahoo.com, ashokbajaj99.blogspot.com

Posted On by &filed under राजनीति.


अशोक बजाज

किसी भी नागरिक को अपने देश के किसी भी भू-भाग में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की स्वतंत्रता है। स्वतंत्र भारत का ध्वज तिरंगा है और इसे भारतीय गणतंत्र के किसी भी भू-भाग में फहराया जा सकता है यह विडंबना ही है कि भारत एक मात्र देश है जहॉं पर राष्ट्रीय पर्व के दिन ध्वज फहराने को लेकर विवाद उत्पन्न हो रहा है। विवाद उत्पन्न करने वाले लोग यह तर्क दे रहे हैं कि तिरंगा अगर फहराया गया तो कश्मीर में शांति भंग हो जायेगी। जिस तिरंगे की आन-बान और शान के लिए लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी तथा अनेक वीर सपूत हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर लटक गये और जिस तिरंगे के बारे में यह कहा गया कि —-

‘शान न इसकी जाने पाये ,

चाहे जान भले ही जाये ,

विश्व विजय करके दिखलायें ,

तब होवे प्रण पूर्ण हमारा,

झण्डा उँचा रहे हमारा ;

आज देश की राजनैतिक स्थिति ऐसी हो गई है कि भारत के मुकुट मणि कश्मीर में झण्डा फहराने से रोका जा रहा है, कुछ लोगों को इसमें आपत्ति है, आपत्ति करने वाले लोग बड़े शान से कह रहे हैं कि इससे शांति भंग होगी, न फहरायें। कभी तिरंगे को फहराना शान की बात समझी जाती थी, तो आज इन लोगों की नजर में तिरंगा न फहराना शान की बात समझी जा रही है। जहॉं तक शांति भंग का सवाल है तो स्वतंत्रता आंदोलन के समय अंग्रेजी हुकूमत भी यही कहती थी कि आंदोलनकारियों के कारण शांति भंग हो रही है, देश में अराजकता फैल रही है। महात्मा गांधी तक को शांति भंग के आरोप में कई बार गिरफ्तार किया गया। जो लोग तिरंगा फहराने को लेकर आपत्तियां कर रहे हैं, उन्हें तिरंगे की आन-बान और शान की परवाह नहीं है। प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह एवं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अंग्रेजों की भाषा में बोल रहे हैं। 1947 के पहले जो बात अंग्रेज बोलते थे, वही बात आज हमारे प्रधानमंत्री और कश्मीर के मुख्यमंत्री बोल रहे हैं।

यह विचित्र विडंबना है कि जिस कांग्रेस पार्टी के बैनर तले देश की आजादी की लड़ाई लड़ी गयी, केन्द्र में उसी कांग्रेस पार्टी की आज हुकूमत है। 1947 के पहले कांग्रेस के नेता झण्डा फहराने के लिए मरते थे और आज झण्डा फहराने वालों को मार रहे हैं, देश की जनता यह सब देख रही है । केन्द्र सरकार ने तुष्टिकरण की नीति के चलते अलगाववादियों के सामने घुटने टेक दिए, देश की सीमा खतरे में है। उमर अब्दुल्ला ने आज तक कभी-भी कश्मीर के लाल चौंक में पाकिस्तानी झण्डा फहराने वालों को नहीं रोका। भारत और भारतीयों के खिलाफ जगह-जगह वहॉं नारे लिखे गये, उसके बारे में कभी नहीं टोका। आज जब देश के नौजवान वहॉं तिरंगा फहराने की बात कर रहे हैं तो इनको आपत्ति हो रही है। युवाशक्ति के इस इरादे को भांपकर, बेहतर होता कि स्वयं प्रधानमंत्री डॉ0 मनमोहन सिंह यह कहते कि नौजवानों तुमको लाल चौंक जाने की जरूरत नहीं है, मैं स्वयं वहॉं जाकर तिरंगा फहराउंगा, तो शायद उनकी इज्जत में बढ़ोत्तरी होती, लेकिन तिरंगा फहराने वालों की आलोचना करके उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से यह सिद्ध कर दिया है कि वे कश्मीर को भारत का भू-भाग नहीं मानते। इस घटनाक्रम से एक बात का खुलासा तो हो ही गया कि कौन तिरंगे का पक्षधर है और तिरंगे का विरोधी । जो लोग लालचौंक में तिरंगा फहराने का विरोध कर रहे हैं, उनमें और अलगाववादियों में फर्क क्या रह गया है ?

जहॉं तक कश्मीर समस्या का सवाल है, यह समस्या धारा 370 की वजह से उत्त्पन्न हुई है, अगर पंडित नेहरू ने सरदार वल्लभ भाई पटेल की बात मान ली होती तो आज कश्मीर की सूरत ही कुछ और होती ।आज कश्मीर की हालत यह हो गयी है कि समूचा राज्य अलगाववादियों के हवाले कर दिया गया है तथा दिल्ली की सरकार विवश और लाचार बन कर बैठी है।

5 Responses to “भारतीय गणतंत्र और तिरंगा”

  1. विजय सोनी

    VIJAY SONI

    सचमुच बजाज जी इस गणतंत्र दिवस पर तिरंगा यात्रा को रोक कर कांग्रेस ने ये साबित कर दिया की आज़ाद भारत में कश्मीर को अलग राज्य का दर्ज़ा देने ,या यों कहें की पंडित नेहरु की लचर नीतियों ने देश के हर नागरिक को ये सोचने पर बाध्य किया है की क्या कश्मीर भारत का अंग नहीं है ?क्या साबित करना चाहती है ये पार्टी ?क्या भारत के किसीभी भू भाग पर तिरंगा लहराना जुर्म है ?क्यों रोकी गई तिरंगा यात्रा ?क्यों रद्द की गई सभी रेल गाड़ियाँ ?क्या हमें फिर गुलामी के दिनों की याद नहीं आई ?निश्चित ही ये प्रश्न सभी देशवासियों के मनोमस्तिक में भूचाल पैदा कर रहें हैं ,किन्तु देर सही अंधेर नहीं हैं २०१४ के चुनाव में देश का मतदाता”सौ सुनार की -एक लोहार की”वाली कहावत को ज़रूर ज़रूर चरितार्थ कर अपने एक एक बटन से से एक एक प्रश्न का जवाब निश्चित कर इस दोमुही सरकार को उखाड़ फेंकेगा,देश की आज़ादी आन्दोलन में शहीद हर सपूत को इस कृत्य से घृणा है,उन सभी की आत्माएं पूछ रही है की क्या गणतंत्र यही है की हम अपने देश में तिरंगा लेकर जाएँ और सरकार इसे रोके ?क्या इसी लिए हम स्वतंत्र हुवें हैं ? ये याद रखना चाहिए की “जो खून गिरा पर्वत पर-वो खून था हिन्दुस्तानी ,जो शहीद हुवें हैं उनकी ज़रा याद कुर्बानी ” जय भारत जय छत्तीसगढ़ -विजय सोनी अधिवक्ता दुर्ग

    Reply
  2. Bina Jha

    भारत एक “राष्ट्रियता-निरपेक्ष” देश बनता जा रहा है. जहां राष्ट्रिय झण्डा फहराना “रबिश” है. लेकिन आतंकवादीयो को पक्ष मे वकालत करना राष्ट्रवाद बन गया है. अगर भारत की बहुसंख्यक जनता अपने देश मे पैदा हुए नागरिक को प्राईम-मिनिष्टर बनाने की बजाए किसी ईटली मे जन्मी महिला को सुपर प्राईम मिनिष्टर बनाएगी तो देशभक्ति की परिभाषा तो बदलेगी ही.

    Reply
  3. sanjay rastogi

    यह हिंदुस्तान अवं भारत का दुर्भाग्य है की सरदार मनमोहन सिंह जैसे इस देश के प्रधान मंत्री हैं अगर उनका वश होता तो वोह जम्मू कश्मीर ना ना श्रीनगर के मुख्या मंत्री ना ना अतंकवादियो अवं पकिस्तनिओन के प्रिय मो उमर को तिरंगा जलाने और पाकिस्तानी झंडा लहराने के लिए सारी ताकत लगा देते

    Reply
  4. sunil patel

    श्री बजाज जी सच कह रहे है. वाकई लाल चौक पर राष्ट्रीय झंडा फहराना से मन करना गुलामी के समय अंग्रजो के बर्बरता कार्यवाही की याद दिलाती है. कहते है शांति भंग होगी. झंडा फहररता तो आतंकवादी, अलगाववादी और समर्थको को सबक मिलता की देश अब और यह सब सहन नहीं करेगा.

    Reply
  5. अहतशाम "अकेला"

    @ अशोक बजाज
    अटल बिहारी वाजपेई सरकार में आपका देशप्रेम कहा चला गया था
    अरुणाचल बोर्डर पर जाने की कभी फुर्सत नहीं मिलती आप लोगो को

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *