प्रवक्ता न्यूज़

हिंदुस्तानियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भाजपा को दिलाई जीत 

प्रमोद भार्गव

     पश्चिम बंगाल,असम, तमिलनाडु,केरल और पुडुचेरी के परिणाम आ गए हैं। बंगाल में भाजपा ने तृणमूल मुखिया ममता बनर्जी को बड़ा झटका देकर बंगाल को स्पष्ट बहुमत के साथ झटक लिया है। बंगाल का यह नतीजा उन पाखंडी बौद्धिकों को भी बड़ा सबक है,जो पूर्वाग्रही बने रहने के कारण निष्पक्ष नहीं रह पाते हैं। हालांकि सात में से पांच एग्जिट पोल ने जता दिया था कि असम और बंगाल में भाजपा इतिहास रचने जा रही है,सो रच भी दिया।लेकिन तमिलनाडु में परिणाम सटीक नहीं बैठे। एम के स्टालिन की द्रमुक को पोल साफ बहुमत दे रहे थे,जो सटीक नहीं बैठे। यहां हाल ही में अस्तित्व में आई अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके यानी तमिलगा वेट्री कजगम 100  सीटों की जीत के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनके उभरी है। दूसरे नंबर पर एआईडीएमके-भाजपा गठबंधन है। अब यहां यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार किस गठबंधन के साथ बनती है। कांग्रेस चार सीटें जीत रही है, अतएव सरकार में उसकी कोई भूमिका नहीं रहेगी। केरल में कांग्रेस नेतृत्व वाला यूडीएफ गठबंधन सरकार बना लेगा। पुडुचेरी में भाजपा ने बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है। असम में भाजपा हिमंत बिस्वा शर्मा एक बार फिर मुख्यमंत्री बनेंगे,इसमें कोई संशय नहीं है।            पांचों प्रांतों 

में मतदाताओं ने जबरदस्त मतदान करके इतिहास रचकर साफ संदेश  दिया था, कि बदलाव की जबरदस्त लहर देखने में आएगी। हिंदुस्तानियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा की  चिंता करते हुए असम में भाजपा की वापसी कर दी,वहीं घुसपैठियों के लिए लाल कालीन बिछाने वाली ममता को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। तमिलनाडु में यही सबक स्टालिन को मतदाताओं ने दिया है। स्टालिन को सनातनी हिंदुत्व को मलेरिया और डेंगू कहने में कभी कोई परहेज नहीं रहा। राजभाषा हिंदी के विरोध में भी वे हमेशा खड़े दिखाई देते रहे हैं। इस चुनाव के परिणामों ने संदेश दे दिया है कि अब हिंदी,हिंदुत्व और हिंदुओं का विरोध करने वाले दल और राजनेता,भारतीय राजनीति में चल नहीं पाएंगे। कांग्रेस और राहुल गांधी के ऐसे ही आचरण के कांग्रेस लगातार रसातल में जा रही है। ये नतीजे उन नेताओं के लिए भी सबक हैं,जो आतंकवाद और आतंकियों की पैरवी में ऐसे खड़े हो जाते हैं, जैसे कोई राष्ट्रभक्त की वकालात कर रहे हों। 

       बंगाल में तृणमूल की पराजय के बाद जैसे वामदल अपना वजूद खोते चले गए,वही हश्र ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल का देखने में आ सकता है ?  दरअसल असम एवं बंगाल में सबसे बड़ा कोई मुद्दा रहा है तो वह घुसपैठ और इन राज्यों में बढ़ता इस्लामीकरण है। अनेक सीमांत जिलों में घुसपैठ ने दोनों राज्यों में जनसंख्यात्मक घनत्व को बिगाड़ दिया है। कई जिलों में मुस्लिमों की आबादी 90 से 95 फीसदी तक पहुंच गई है। इन बदतर  हुए हालातों के प्रति नरेंद्र मोदी और अमित शाह

 ने मतदाताओं को जागरूक  किया। हिंदू  संदेशखाली और आरजीकर  में हुए महिला दुष्कर्मों के चलते ध्रुवीकृत हुए। भाजपा ने इन मुद्दों को भुनाने की दृश्टि  से आरजीकर  अस्पताल में दुष्कर्म व हत्या की शिकार हुई डॉक्टर की मां रत्ना देबनाथ

 को पानीहाटी और संदेशखाली आंदोलन की चेहरा रहीं रेखा पात्र को हिंगलगंज से उम्मीदवार बनाया था। ये दोनों महिलाएं चुनाव में जीत के लिए बढ़त बनाए हुए हैं। इन महिलाओं की उम्मीदवारी से बंगाल की महिलाओं में संवेदना जगी और बदलाव की लहर बनाने में उनकी प्रमुख भागीदारी रही।         इन सब बिंदुओं ने बंगाल में  लोकतंत्र की गरिमा को महिमामंडित करने का काम कर दिया। इसी का परिणाम रहा कि भाजपा को बंगाल में करीब 200 सीटें मिलने जा रही हैं। 15 साल राज करने वाली ममता को सौ सीटें भी नहीं मिल रही हैं। बंगाल में ऐसा 49 साल बाद संभव हो पाया कि निष्पक्ष मतदान हुआ। निर्वाचन आयोग पूरी तरह चौकन्ना रहा। जहां से भी गड़बड़ी की खबर मिली, तुरंत एक्शन लिया। इस कारण लंबे समय तक अराजक तत्वों द्वारा मतदान रोकना संभव नहीं हो पाया। किसी भी झड़प को बड़े संघर्ष का रूप लेने से पहले ही केंद्रीय बलों के जवान उसे नियंत्रित करने में सफल दिखे। पहली बार अमल में लाई गई त्वरित प्रतिक्रिया (रिस्पांस) दल ने भी अपने दायित्व का पूर्ण रूप से पालन किया। बावजूद फालता में 21 मई को पुनर्मतदान होगा। यहां ईवीएम से छेड़छाड़ की गईं। बूथ कब्जा लिए। एक ईवीएम पर तो भाजपा के चुनाव चिन्ह पर टेप चिपका मिला।          यदि 2.40 लाख सैन्य बलों की तैनाती नहीं होती तो बंगाल में लोकतंत्र बुरी तरह प्रभावित होता।  दरअसल बंगाल में इसके पहले हुए चुनावों में तृणमूल के कार्यकर्ता और अवैध घुसपैठिए अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए हिंदुओं को मतदान नहीं करने देते थे। इस बार सेना की कठोरता के चलते हिंदुओं ने धुर्वीकृत होकर मतदान में भागीदारी की। इसलिए इस बार बंगाल में पिछली बार की तुलना में करीब 9 प्रतिषत अधिक वोट पड़े थे,जो भाजपा के लिए संजीवनी साबित हुए। । आयोग ने एसआईआर के जरिए भी घुसपैठ करके अवैध मतदाता बने करीब 92 लाख मतदाताओं को मत से वंचित कर दिया था । इनमें से बढ़ा प्रतिषत तृणमूल के समर्थकों का रहा है, क्योंकि ये लोग जानते थे कि भाजपा आई तो बंगाल से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए मुस्तैद हो जाएगी।    
        बड़े मत प्रतिशत का सबसे अहम् , सुखद व सकारात्मक पहलू है कि यह अनिवार्य मतदान की जरूरत की पूर्ति कर देता है। हालांकि फिलहाल हमारे देश  में अनिवार्य मतदान की संवैधानिक बाध्यता नहीं है। निकट भविष्य  में इस उम्मीद की पूरी होने की संभावना भी नहीं है। मेरी सोच के मुताबिक ज्यादा मतदान की जो बड़ी खूबी है, वह है कि दल व उम्मीदवारों को अल्पसंख्यक व जतीय समूहों की वोट बैंक की लाचारगी से छुटकारा मिल जाता है। इससे कलांतर में राजनीतिक दलों को भी तुष्टिकरण की मजबूरी से मुक्ति मिलेगी। अतएव अगले चुनावों में हम देखेंगे कि क्षेत्र विषेश से जुड़े मतदाताओं की अहमियत लगभग खत्म हो जाएगी। नतीजतन उनका संख्याबल जीत या हार की गारंटी नहीं रह जाएगा। लिहाजा सांप्रदायिक व जातीय आधार पर ध्रुवीकरण की राजनीति नगण्य हो जाएगी। एसआईआर के जरिए देश से घुसपैठिए बाहर कर दिए जाते हैं तो इस अवैध घुसपैठ से लाभ उठाने वाले नेताओं की भूमिका को भी जनता नकार देगी। जैसे कि असम और बंगाल में देखने में आने लगा है। 

 प्रमोद भार्गव