व्यक्तिवाद , राष्ट्रवाद और राजनीति

व्यक्तिवाद
विश्व के एकमात्र विशाल संगठन  “राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ” की राष्ट्रवाद , सनातन वैदिक धर्म व संस्कृति की रक्षार्थ डॉ हेडगेवार जी ने कुछ समर्पित महान विभूतियों के साथ अपने अथक पराक्रम से स्थापना की थी। भारतीय संस्कृति व सभ्यता की रक्षार्थ अपने अनेक  आनुषांगिक संस्थाओं द्वारा इस विश्वव्यापी संगठन के दशकों से चल रहें अतुलनीय व प्रशंसनीय सामाजिक व राष्ट्रीय कार्यों की श्रृंखला को बांधना असंभव तो नही परंतु कठिन अवश्य होगा। इन अनुशासित संगठनों के लाखों-करोड़ों समर्पित कार्यकर्ताओं का आदर्श प्रतीक रुप में  केवल “भगवा” रंग से सुशोभित झंडा सर्वोच्च व पूजनीय हैं । लेकिन यह अत्यंत दुःखद है कि आधुनिक युग में राजनीतिज्ञों की बढ़ती चाटूकारिता व स्वार्थी प्रवृति ने व्यक्ति विशेष को ही राष्ट्र व धर्म से भी ऊपर उठकर महान बना कर व्यक्तिवाद को बढ़ावा देने की मानसिकता की चपेट से ऐसे संगठन भी अछूते नही रहें हैं ।राष्ट्रीय व प्रदेशीय स्तर के नेताओं को छोड़ भी दिया जाय तो सामान्यतः ग्राम पंचायत , नगर, महानगर  व जनपद के भी कार्यकर्ता नेता बनकर अपने अपने अभिनंदन व स्वागतों के कार्यक्रमों के आयोजन के अतिरिक्त स्थान-स्थान पर  चित्रों सहित बड़े बड़े बैनर व बोर्ड लगवाने की होड़ में भी पीछे नही रहते । ऐसी आत्मस्तुति की प्रस्तुति में व्यस्त रहने से भी लोकतांत्रिक राजनीति में अधिकांश आदर्शवादी नेता अपने अपने सिद्धांतो पर अडिग नही रह पाते । परिणामस्वरुप राजनीति में सफल होकर शीर्ष पर पहुँच कर भी उनको एक सामान्य मानव की भांति पदलोलुपता व आत्मप्रवंचना की प्रवृत्ति का मद जकड़ लेता हैं। इसीलिए जिन मुख्य राष्ट्रवादी विचारों के कारण राजनीति के शिखर पर पहुँचने में सफल होते हैं उन्ही मुख्य बिंदुओं को भुला देना ऐसे दुर्बल नेताओं का स्वभाव बन चुका हैं। यह मानवीय दुर्बलता राष्ट्रवादी नेताओं को भी समझौतावादी बनने को विवश कर देती हैं। क्योंकि आज सारा समाज आधुनिक विलासता का जीवन जीने की सर्वोत्कृष्ट इच्छा रखता हैं तो फिर वह ऐसे बिंदुओं पर न कोई चर्चा करता और न कोई चिंतन। बल्कि ऐसा समाज केवल अपने स्वार्थो की पूर्ति हेतु ही इन नेताओं के गुणगान करने को उत्साहित रहता हैं । हम जैसे निस्वार्थ हज़ारो-लाखों राष्ट्रवादी इसीलिए बार बार ठगे जाते है और ठगे जाते रहेंगे । क्या सत्य सनातन वैदिक धर्म व संस्कृति की रक्षा करना प्रत्येक भारत भक्त का धर्म नही हैं ? हम अगर निस्वार्थ राष्ट्रभक्ति के लिए समर्पित हैं तो हमें अपने नेताओं की चापलूसी से बच कर उनमें बढ़ती आत्मप्रवंचना की मानसिकता को रोकना होगा । भारत मेरी जन्म, मातृ, पितृ ,पूण्य व धर्म भूमि है ऐसा स्वाभिमान जगा कर हम सब व्यक्तिवाद को तिलांजलि दें तभी एक उत्तम राष्ट्र निर्माण की अवधारणा फलीभूत हो सकेगी।

राष्ट्रवाद
जिसप्रकार आज देश में राष्ट्रवादी शक्तियों के विरुद्ध अनेक षडयंत्र रचे जा रहें हैं , वह भविष्य में एक बड़े संकट की घण्टी बजने जैसा चेताने वाला अलार्म है। फिर भी राष्ट्रवादी नेता अपने अपने पदों पर सुशोभित हो कर अनेक राष्ट्रवादी कार्यों में लगे अपने ही कार्यकर्ताओं की सहायता करने के स्थान पर उनके कार्यों को अपराध मानकर होने वाली कानूनी प्रक्रिया होने पर भी कोई संवेदना नही रखते। “घर वापसी” , “लव जिहाद”  व  “गऊ रक्षा” संबंधित अनेक राष्ट्रवादी कार्यों में जुटे रहने वाले सैकड़ो-हज़ारों कार्यकर्ता आज अपनी ही सरकार में उपेक्षित है और प्रताड़ित हो रहें हैं। इस प्रकार राष्ट्रवादियों की बार बार उपेक्षा होते रहने से क्या राष्ट्रभक्तों का मनोबल नही टूटेगा ? क्या राष्ट्रभक्तों के मूल्यांकन में कभी कोई सुधार होगा या वे योंही समझौतावादी राजनीति के शिकार होते रहेंगे ? क्या ऐसे में देशभक्तों का देश की राजनीति से मोहभंग नही होगा ?  जबकि आधुनिकता की चकाचौंध ने “राजनीति” में युवाओं की सकारात्मक सक्रियता को निर्मूल कर दिया हैं। इसीलिए उनको राष्ट्रभक्ति के लिए राजनीति का पाठ पढ़ने में कोई रुचि नही होती। क्या ऐसे में भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को अपने राष्ट्र की व्यवस्था को बनाये रखने व सामाजिक दायित्व निभाने के लिये कोई आउटसोर्सिंग का सहारा लेना पड़ेगा ? अतः राष्ट्रवादी नेताओं को अपने छोटे छोटे समर्पित कार्यकताओं व स्वयं सेवकों का तिरस्कार नही करना चाहिये बल्कि उनका सहयोग करके राष्ट्रवादी कार्यों को प्रोत्साहित करें अन्यथा वर्तमान कुटिल राजनीतिज्ञ अनेक छदम धर्मनिरपेक्षवादी, तथाकथित बुद्धिजीवी व मानवतावादी , देशद्रोहियों एवं विदेशी शक्तियों के साथ मिलकर सत्ता परिवर्तन में सफल हो सकते हैं।

राजनीति
क्या कारण है कि देश के टुकड़े टुकड़े करके बर्बादी तक जंग लड़ने वाले देशद्रोही आज नेता बन रहें हैं ? अनेक देशद्रोही शक्तियां राष्ट्रवाद की भावना और उसकी लहर को नष्ट करने के लिए हिंदुओं को जातिगत आधार पर बांटने के साथ साथ जिहादियों को भी बढ़ावा दे रही हैं । परिणामस्वरुप राष्ट्रवादी व उनके समर्थक विभिन्न प्रकार से सुनियोजित षडयंत्रों के कारण भविष्य में अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने में सफल हो पाएंगे या नही, अब यह संशय होने लगा है। आज देश में कुटिल राजनेता बात बात पर और बार बार राष्ट्रवाद पर प्रहार करने के लिए अनुचित अवसरों का सहारा ले कर भोले भाले देशवासियों को भ्रमित करने के मार्ग ढूंढने में लगे हुए हैं। सत्ताहीनता की पीड़ा ने पूर्व सत्ताधारियों को कोई सकारात्मक दृष्टिकोण का पाठ नही पढ़ाया और न ही उनके स्वभाव में कोई विशेष परिवर्तन के लक्षण दिखने को मिलते हैं । उनके स्वभावों में परिवर्तन कैसे हो यह भी विचार करना होगा ? क्योंकि वे दशकों से सत्ता सुख के आनन्द व अहंकार की मानसिकता से बाहर नही आना चाहते ?  तभी तो उनका एकमात्र लक्ष्य यह है कि देश में राष्ट्रवादियों के विरुद्ध निरंतर नकारात्मक वातावरण बना रहें और भविष्य में वे पुनः राजसत्ता पा सकें । क्या विपक्ष में बैठने वाले राजनेताओं को अपनी विरोधी मानसिकता के कारण राष्ट्रीय हित को तिलांजलि दे देनी चाहिये ? यह कैसी अज्ञानपूर्ण महत्वाकांक्षा है जो किसी अन्य को राज सत्ता में देखकर वैमनस्यपूर्ण व्यवहार के लिए प्रेरित करती है । अगर ऐसे नकारात्मक विचारों की वास्तविकता देशवासियों को प्रभावित करेगी तो यह अत्यंत दुखद होगा । जिसप्रकार जीवन में बईमानी व चोरी के अनेक मार्ग होते हैं परंतु ईमानदारी का “सत्य” ही  केवल एक मार्ग हैं । इसीलिए राष्ट्रभक्ति विभिन्न मार्गों पर चलने की अनुमति नही देती । उसमें राजनीति हो पर राष्ट्रनीति ही सर्वोच्च होती हैं । बुद्धिजीवियों में अनेक किन्तु – परंतु हो सकते हैं लेकिन राष्ट्र सर्वोपरि के प्रति कोई समझौता अवनति के मार्ग पर ही जायेगा ।
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष में आज ‎अनेक प्रश्न उठते हैं जिनका सार केवल यही है कि क्या महात्मा विदुर व आचार्य चाणक्य के समान कोई महान निस्वार्थ व्यक्तित्व राजनीति के शीर्ष पर उभरेगा , जो देश में सक्षम व कुशल नेतृत्व के अभाव को दूर करके , भारत की महान संस्कृति व सभ्यता की श्रेष्ठता को स्थापित कर सकें ?  क्या धरती पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम व योगीराज श्री कृष्ण के समान आदर्श भगवान रुपी युग पुरुष पुनः अवतरित होंगे ? क्योंकि आज विडंबना यह है कि प्रायः सामान्य समाज विभिन्न राष्ट्रीय व सामाजिक समस्याओं  व स्वयं अपने आप के लिए भी जीवन में संघर्षों से जूझने के स्थान पर उदासीन व निष्क्रिय होकर उसको “भगवान भरोसे” छोड़ने में ही संतोष पाता है।

विनोद कुमार सर्वोदय

1 thought on “व्यक्तिवाद , राष्ट्रवाद और राजनीति

  1. ऐसा प्रतीत होता है कि देश में विकृत राजनीति को व्यक्तिगत आर्थिक लाभ हेतु व्यवसाय बनते, उस राजनीतिक व्यवसाय पर नियंत्रण और चिरकाल से असंगठित व नेतृत्वहीन जनसमूह के ऊपर प्रभुत्व बनाए भारत में लोकतंत्र के नाम पर राष्ट्रविरोधी तत्वों द्वारा लूट होते देख आपकी सोचने की शक्ति ही क्षीण हो गई है| यहाँ मेरे एक वाक्य में प्रस्तुत विशालकाय घिनौने दृश्य में मैं आपको अकेला देखता हूँ और यदि कुम्भ की भीड़ में कभी आपके यहीं कहीं होने की मेरे मन में जिज्ञासा बन जाए तो आश्चर्य नहीं कि वहां भी में आपको अकेले अपने कपड़े लत्ते इत्यादि सँभालने में लगे देखूंगा|

    यदि आप कोई समस्या देखते हैं तो उसके समाधान हेतु आज आधुनिक विलासिता का जीवन जीने की सर्वोत्कृष्ट इच्छा रखते सारे समाज से मिल बैठ समस्या पर चर्चा और चिंतन करते लोकतंत्रीय राजनीति में भागीदारी अथवा अपने मनोनीत नेताओं के अभिनंदन व स्वागतों के कार्यक्रमों के आयोजन नहीं बल्कि समाज, राज्य, व देश के प्रति उनके उत्तरदायित्व पर आपको कड़ी दृष्टि रखनी होगी| भर्त्सना नहीं, पुरुषार्थ ही सभी समस्याओं का एक मात्र उत्तर है| इंसान

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