एकात्म मानववाद यानी कमाने वाला खिलायेगा

दीनदयाल उपाध्‍याय पुण्‍यतिथि (11 फरवरी ) पर विशेष

भारत में स्वतंत्रता से पूर्व जितने भी आंदोलन हुए उसका एक ही ध्येय था स्वतंत्रता की प्राप्ति, फिरंगियों के क्रूर पंजों से माँ भारती की मुक्ति। स्वराज्य के उपरांत हमारी दिशा क्या होगी, हम किस मार्ग से अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्राप्त कर सकेंगे, कौन सा ऐसा विचार होगा जो हमारे समेकित उन्नयन में सहायक होगा, किस सिद्धांत का निरूपण कर हम व्यष्टि से समष्टि के रूप में अपनी खोई गरिमा प्राप्त कर सकेंगे। क्या होगा वह दर्शन जिसके माध्यम से हम अपनी अधुनातन आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रेरित हों एवं साथ ही अपनी महान संस्कृति को भी अक्षुण्ण रख सकें, इसका अधिक विचार नहीं किया गया।

हालांकि कई लोगों ने टुकड़े-टुकड़े में विचार कर अपना सिद्धांत प्रस्तुत किया था लेकिन उन सब पर जितना गंभीर चिंतन होना चाहिए था वह नहीं हो पाया था। ऐसी दिशाहीनता की स्थिति में, समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद, उदारवाद, व्यक्तिवाद आदि आयातित वादों से मुक्त हो एकात्म मानववाद सिद्धांत का सर्वप्रथम प्रतिपादन कर पं. दीनदयाल उपाध्याय ने आधुनिक राजनीति, अर्थव्यवस्था तथा समाज रचना के लिए एक चतुरंगी धरातल प्रस्तुत किया। एक ऐसा धरातल जिस पर खड़े होकर हम गौरवान्वित महसूस कर सकें।

श्री उपाध्याय ने बुद्धि, व्यक्ति और समाज, स्वदेश और स्वर्धम, परंपरा तथा संस्कृति जैसे गुढ़ विषयों का चिंतन मनन, एवं गंभीर अध्ययन कर उपरोक्त सिद्धांत का निरूपण किया। सर्वप्रथम उन्होने ही जनसंघ के सिद्धांत और नीति की रचना की और उन्हीं के शब्दों में ”विदेशी धारणाओं के प्रतिबिंब पर आधारित मानव संबंधी अपुष्ट विचारों के मुकाबले विशुद्ध भारतीय विचारों पर आधारित मानव कल्याण का संपूर्ण विचार करके एकात्म मानव वाद के रूप में उन्हीं सुपुष्ट भारतीय दृष्टिकोण को नये सिरे से सूत्रबद्ध किया।”

उन्होंने भारतीय संस्कृति की इस विशेषता से अपने को एकाकार किया कि वह संपूर्ण जीवन का, संपूर्ण सृष्टिï का संकलित विचार करती है। उसका दृष्टिकोण एकात्मवादी है। टुकड़ों-टुकड़ों में विचार करना व्यवहारिक दृष्टि से उचित नहीं।

यह एकात्मक विचार न केवल संपूर्ण समाज, सृष्टि या संस्कृति के साथ किया गया, वरन् समाज की इकाई के रूप में व्यक्ति समेकित उन्नयन का भी दर्शन प्रस्तुत करता है यह सिद्धांत। एकात्म मानववाद इस शास्त्रीय अवधारणा पर आधारित है कि व्यक्ति मन, बुद्धि, आत्मा एवं शरीर का एक समुच्चय है। पाश्चात्य विचारों की अनुपयोगिता का हेतु ही यही है कि वह मानव के इस अलग-अलग हिस्से का टुकड़े-टुकड़े के रूप में विचार करती है। जैसे प्रजातंत्र का विचार आया और वह व्यक्ति को एक राजनीतिक जीव मान उसकी राजनैतिक आकांक्षाओं की तृप्ति के लिए उन सबकों वोट देने का अधिकार प्रदान कर दिया। लेकिन उन्हें फिर अपनी क्षुधा तृप्ति के लिए माक्र्स के शरण में जाना पड़ा क्योंकि केवल वोट देने के अधिकार मात्र से उन्हें रोटी नही मिल सकती थी। मार्क्स ने वर्ग संघर्ष का रास्ता दिखाया लेकिन यहां भी यह दर्शन अधूरा ही रहा क्यूंकि मार्क्स के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि संघर्ष में मारे गये लोगों को क्या प्राप्त होगा। क्यूंकि यह सर्वज्ञात है कि आत्मा का अमरत्व या पुनर्जन्म की अवधारणा को व्याख्यायित करने वाला धर्म मार्क्स के लिए अफीम समान था। लेकिन भारतीय दर्शन में जैसा कि भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से गीता में धर्मयुद्ध का अनुरोध करते हुए कहा कि अगर(युद्ध के बाद) जीवित रहे तो धरा का सुखभोग प्राप्त करोगे और यदि वीरगति को प्राप्त हुए तो स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए खुला मिलेगा। इस तरह यह भारतीय एकात्मवादी दर्शन तो अधिकार की प्राप्ति के लिए धर्मयुद्ध (यदि करना ही पड़े तो) का भी औचित्य निरूपण करता है, जबकि उपरोक्त आधे-अधूरे विचारों के दुष्प्रभाव को अलग से व्याख्यायित करने की कोई आवश्यकता नहीं महसूस होती है। इसी तरह अमेरिका में शासन और राशन पर ध्यान तो केन्द्रित किया गया, लेकिन आत्मिक शांति के अभाव में तमान भौतिक वैभव के होते हुए भी सबसे ज्यादा आत्महत्यायें वहीं पर होती है। नींद की गोली का इस्तेमाल सबसे ज्यादा वहीं पर होता है। अत: वर्तमानत: पाश्चात्य विचारक भी यह महसूस करने लगे हैं कि कहीं न कहीं कोई मौलिक गलती अवश्य है। कारण प्रमाणित है कि वे मनुष्य की प्रगति को उसके मन, बुद्धि, आत्मा और शरीर की प्रगति से एकाकार नहीं कर पायें।

अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या आवश्यकतायें है हमारी? शास्त्रों में कहा गया है कि

-धर्मार्थ काम मोक्षाणां, यस्यैकोअपि न विद्यते

अजागलस्त नस्यैवं, तस्य जन्म निरर्थकम्॥

भावार्थ यह कि धर्म पूर्वक अर्थ की उपार्जन कर अपनी कामनाओं की पुष्टिï करते हुए मोक्ष रूपी परम पुरूषार्थ को प्राप्त होना ही मानव जीवन की आवश्यकतायें है, यही उसका ध्येय है। इस प्रकार धर्म आधारभूत पुरूषार्थ है। यहां यह ध्यातव्य है कि धर्म का मतलब मत, मजहब, पंथ या रिलीजन नहीं है। इसका संबंध केवल मस्जिद और चर्च से नही है। मजहब या रिलीजन तो कई हो सकते हैं लेकिन धर्म तो व्यापक है, जिस प्रकार अग्रि ताप निरपेक्ष नही रह सकती उसी प्रकार व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष नही रह सकता। रिलीजन को ही लोगों ने धर्म मान लिया अंग्रेजी अनुवाद की बहुत सारी हानियां में से यह सबसे बड़ी हानि है। जैसा कि भगवान गीता में उद्घोष करते हैं ये यथा मां प्रपद्यन्ते, तांस्तथैव भजाम्यहम्, यहां जिस रूप में भी भजन करना मजहब या रिलीजन हो सकता है, लेकिन उस परब्रम्ह से अपने को एकाकार कर आत्मिक सुख प्राप्त करना एकमात्र धर्म होगा जबकि मजहब कई हो सकते है।

इसी की व्याख्या करते हुए गुरूदेव रविन्द्र नाथ टैगोर ने कहा कि ”भारत हमेशा से सामाजिक एकता बनाये रखने का प्रयास करता रहा है, जिसमें विभिन्न मतावलंबियों को अपना अलग अस्तित्व बनाये रखने की पूर्ण आजादी होते हुए भी जुट रखा जा सके। यह बंधन जितना लचीला है उतना ही परिस्थितियां के अनुरूप इसमें मजबूती भी है। इस प्रक्रिया से एक एकात्म सामाजिक संघ की उत्पत्ति हुआ जिसका नाम हिन्दुत्व है।”

इस व्याख्या को अपने एकाधिक आदेशों में माननीय उच्चतम न्यायालय ने तो स्वीकार किया ही है यूनेस्को ने भी धर्म के इस धारणा को अंगीकार किया। इसकी चर्चा सुश्री अमृता प्रीतम ने अपनी आत्मकथा में की है। सुश्री प्रीतम यूनेस्कों कांफ्रेंस में भाग लेने गई थी। सम्मेलन का विषय था “साइंस एंड रिलीजन शुड गो टुगेदर।” सम्मेलन की समाप्ति के समय जब कार्यवाही का सार लिखा जा रहा था तो उस वक्त सुश्री प्रीतम ने एक गुजारिश की कि “मजहब” लफ्ज को बदलकर “धर्म” कर दिया जाय। फिर कांफ्रेंस का मकसद इस तर्क के साथ बदलकर साइंस एंड “स्प्रीचुएलिटी” शुड गो टुगेदर हो गया कि, मजहब कई हो सकते है, लेकिन धर्म, एक होता है। मजहब दरअसल धर्म के संस्थागत स्वरूप होते हैं जो कई हो सकते हैं, इसलिए मजहब शब्द से प्रश्र उठता है कौन सा मजहब जबकि आध्यात्मिकता शब्द हर प्रश्र से मुक्त होता है। अमृता जी के इस प्रस्ताव का सर्वप्रथम समर्थन एक अरब डेलीगेट ने ही किया और यूनेस्को ने न सिर्फ इसका अनुमोदन किया वरन् सम्मेलन के मकसद में सुधार करवाने के लिए सुश्री प्रीतम को धन्यवाद भी ज्ञापित किया।

हालाकि अपने असमय निधन के कारण पंडित जी मानव के समेकित विकास के इस विशुद्ध भारतीय विचार का सरलीकरण एवं लोकव्यापीकरण नहीं कर पाए। मुगलसराय के उस अभागे रेलवे स्टेशन पर संदेहास्पद रूप से मृत पाए जाने के साथ ही यह महान विचार उनके द्वारा सही अर्थों में लोकार्पित होने से रह गया ।अब नयी पीढी के विचारकों-चिंतकों से ही अपेक्षा की जा सकती है कि उनके सूत्रबद्ध विचारों का सरलीकृत प्रचार-प्रसार कर वास्तव में इस विचार को जन परिष्कार एवं लोक कल्याण का माध्यम बनने दें। मानव्य के समग्र एवं संकलित रूप पर विचार करने के उपरांत श्री उपाध्याय द्वारा प्रतिपादित इस एकात्म मानववाद के दर्शन को अंगीगार कर हम राष्टियता, समता, प्रजातंत्र एवं विश्व एकता के आदर्शों को एक समन्वित रूप प्रदान कर सकेंगे, साथ ही भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों से भी अपने को एकाकार कर सकेंगे।

– पंकज झा

11 thoughts on “एकात्म मानववाद यानी कमाने वाला खिलायेगा

  1. असीम आनंद आया आपका यह अतिसुन्दर आलेख पढ़…इस सुन्दर प्रेरक और कल्याणकारी आलेख के लिए आपका साधुवाद…
    सचमुच स्वतंत्रता आन्दोलन तक तो ठीक था,परन्तु उसके बाद जिन हाथों में शाशन व्यवस्था की डोर थमी और उत्तरोत्तर फिर यह जिस दिशं में आगे बढ़ा,समस्याएं दिनानुदिन विस्तृत होती ही गयीं…होना ही था यह….
    जब भी हम अपने मूल संस्कृति से भटककर अपर संस्कृति के खोल को ओढ़कर सुखी होने की चेष्टा करेंगे…कभी सफल नहीं हो पाएंगे…

    पंडित जी की धारणा …
    एकात्म मानववाद इस शास्त्रीय अवधारणा पर आधारित है कि व्यक्ति मन, बुद्धि, आत्मा एवं शरीर का एक समुच्चय है।
    पूर्णतः सत्य है…
    यही हमारी संस्कृति का प्रारूप है…जिस किसी व्यवस्था में इन तीनो को स्थान न मिलेगा,वहां भटकाव निश्चित है.

  2. धन्यवाद | दीन दयाल मार्ग से तो रोज ही जाता हूँ. लेकिन उनके बारे मैं पता नहीं था| उन्हें हार्दिक श्रधान्जली |

  3. पंकज जी, आपने बहुत ही अच्छा आलेख प्रस्तुत किया है | अपने सुंदर विचारों के कारण उन्‍हें याद किया ही जाना चाहिए .. उन्‍हें हार्दिक श्रद्धांजलि !!

  4. पंकज जी, आपने बहुत ही अच्छा आलेख प्रस्तुत किया है . आपको ढेर सारीं बधाइयाँ .आज जरुरत है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय को समझा जाये और उनके आधार पर शासन व्यवस्था चलाई जाये .क्योंकि बिना प्रयोग के किसी भी राजनेतिक वाद का अस्तित्व नहीं होता.दुर्भाग्य यह है कि हम अन्य महापुरूषों की तरह दीनदयालजी को भी भूलते जा रहे हैं आज यह क्विज की तरह भाजपा के नेताओं से पूछा जाये की कितने नेता दीनदयालजी की नीति और सिद्धांत से परिचित हैं तो शायद ही कोई जानता होगा.और तो और हमें डर है कि भाजपा कार्यालयों में भी यह पुस्तक होगी कितने विश्वविद्यालयों ने एकात्म मानव वाद पर शोध कराया ,परिचर्चाएं आयोजित की. क्या यह भाजपा के नेताओं की जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि जिस वैचारिक आधार पर अस्तित्व में हैं उसको ताकत पहुंचाई जाये?.अभी भी समय है अन्यथा दीनदयाल उपाध्याय को भी इतिहास में ही पढ़ा जायेगा और सरकार चलानेवालों को तो इतिहास भी याद नहीं रखेगा क्योंकि इतिहास से बड़ी कोई अदालत नहीं होती .

  5. ९ फ़रवरी को पं०दीन दयाल जी बरेली मे आखिरी बौद्धिक दे कर ही गये थे . मेरे पिता जी ही उनेह स्टेशन पहुचाने गये थे लेकिन ट्रेन लेट होने के कारण मेरे पिता जी के कमरे पर रुके और सुबह लखनऊ गये . अगले दिन ही मुगल सराय पर म्रत पाये गये .
    पं० जी का विचार दर्शन सच मे अनुकरणीय है . अन्तोदय तो सच्मुच अपनाने योग्य है . लेकिन उनके दर्शन को उन्ही के शिष्य ही भूल गये .

  6. पंकज जी
    आपका आलेख दीनदयाल जी के एकात्‍म मानव दर्शन का चित्रण करता है और आज हमें उनके इसी दर्शन की आवश्‍यकता है। लेकिन दुर्भाग्‍य यह है कि उन्‍हीं के नाम से राजनीति करने वाले लोग भी केवल सत्ता के लिए ही राजनीति करने लगे हैं। समग्रता का चिंतन कहीं भी दिखायी नहीं देता। आज व्‍यष्टि से समष्टि की ओर जाने की बात कहीं नेपथ्‍य में चले गयी है। बस व्‍यक्तिवाद ही हम सब पर हावी होता जा रहा है। मुझे तो लगता है कि एक दल तो गाँधी को भुना रहा है और दूसरा दीनदयाल जी को। मैंने उनका एकात्‍म मानव दर्शन पढ़ा है, निश्‍चय ही मानव मात्र के लिए नहीं अपितु सृ‍ष्टि के लिए कल्‍याणकारी है। आपने बहुत ही अच्‍छा आलेख लिखा है आपको मेरी बधाई।

  7. पंकज जी, इतने सुन्दर शब्दों के साथ एकात्म मानवतावाद से परिचय कराने के लिए हार्दिक धन्यवाद. आपके इस आलेख से काफी जानकारी और विचारने लायक तथ्य मिले. यह देश का दुर्भाग्य है कि उपाध्यायजी द्वारा प्रणीत इस विचार को अनदेखा किया गया.

  8. अब मानव है केन्द्र में, यही बात है मुख्य.
    उपाध्यायजी कह गये, दूर हो सबका दुःख.
    दूर हो सबका दुःख, जगत में सुख ही सुख हो.
    सम्बन्धों में तृप्ति का, हर घर में सुख हो.
    कह साधक कवि देह नहीं जीवन हो केन्द्र में.
    यही बात है मुख्य, अब मानव हो केन्द्र में.
    sahiasha.wordpress.com

  9. बढिया आलेख .. अपने सुंदर विचारों के कारण उन्‍हें याद किया ही जाना चाहिए .. उन्‍हें हार्दिक श्रद्धांजलि !!

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