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    Homeराजनीतिभ्रष्टाचार मुक्ति का माध्यम बने सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा पत्र

    भ्रष्टाचार मुक्ति का माध्यम बने सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा पत्र

    – ललित गर्ग –

    नरेन्द्र मोदी ने सबसे पहले देश के प्रधानमंत्री बनते ही भ्रष्टाचार मुक्त भारत का संकल्प लिया। उन्होंने न खाऊंगा और न खाने दूंगा का शंखनाद किया, उनके दो बार के प्रधानमंत्री के कार्यकाल में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण पाने के लिये अनेक कठोर कदम उठाये गये है और उसके परिणाम भी देखने को मिले हैं, लेकिन भ्रष्टाचार फिर भी खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। भ्रष्टाचार की जटिल से जटिल होती स्थितियों को देखते हुए ही केंद्रीय सतर्कता आयोग ने सरकारी संस्थानों, मंत्रालयों और नागरिकों के लिए छह बिंदुओं का सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा पत्र जारी किया है, जिसमें उनसे भ्रष्टाचार मुक्त भारत की संकल्पना के साथ जुड़ने का आह्वान किया गया है। प्रतिज्ञा पत्र को आयोग ने भ्रष्टाचार मुक्त देश के लिए विशेष अभियान के तौर पर पेश किया है। राष्ट्र में भ्रष्टाचार के विरुद्ध समय-समय पर ऐसी क्रांतियां एवं प्रशासनिक उपक्रम होते रहे हैं। लेकिन उनका लक्ष्य, साधन और उद्देश्य शुद्ध न रहने से उनका दीर्घकालिक परिणाम संदिग्ध रहा है। प्रश्न है कि सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा पत्र की आवश्यकता क्यों पड़ी,  क्या इसका हश्र ढाक के तीन पात ही होना है? देश को भ्रष्टाचार मुक्त करना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी ही चाहिए।
    सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा पत्र 31 अक्टूबर से 6 नवम्बर 2022 तक आयोजित किये जाने वाले भ्रष्टाचार मुक्त भारत-विकसित भारत के जागृति अभियान का अभिनव उपक्रम है, इस सतर्कता जागरूकता सप्ताह में तंद्रा तोड़ने के लिये भैरवी तो बजाने ही पड़ेगी। ईमानदारी के अभ्युदय के लिये ही इस प्रतिज्ञा पत्र में कहा है- जीवन के सभी क्षेत्रों में ईमानदारी से काम करेंगे, नियमों का पालन करेंगे। कभी रिश्वत नहीं लेंगे और न ही देंगे। सभी कार्य ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ करेंगे। जनहित में कार्य करेंगे। अपने आचरण में ईमानदारी दिखाएंगे। भ्रष्टाचार की घटना की सूचना संबंधित एजेंसी को जरूर देंगे। ये संकल्प निश्चित ही जन-जन और प्रशासन में बैठे अधिकारी एवं कर्मचारी ले ले तो भ्रष्टाचार को समाप्त होने में देर नहीं लगेगी। लेकिन छोटे-छोटे भ्रष्टाचार के साथ बड़े भ्रष्टाचार को भी नियंत्रित किया जाना जरूरी है। इसके लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक ऐसी क्रांति का शंखनाद किया है जिसमें प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी जैसी एजेन्सियां सक्रिय हुई हैं, जिसने न केवल विभिन्न राजनीतिक दलों एवं उनके नेताओं की चूलें हिला दी है बल्कि भ्रष्टाचार के प्रश्न पर भी प्रशासन-शक्ति को जागृत कर दिया है।
    अब प्रशासन शक्ति जाग गयी है तो राजनीतिक दलों एवं नेताओं का हिलना, आगबबूला होना एवं बौखलाना स्वाभाविक है। आम आदमी पार्टी के मंत्री सत्येन्द्र जैन की गिरफ्तारी के बाद ईडी ने नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी को पूछताछ के लिए तलब किया है। अन्य नेता भी इसकी गिरफ्त में आये हैं। दरअसल, सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा पत्र ऐसे वक्त में जारी हुआ है, जब माना जाने लगा है कि सरकारी काम बिना लिए-दिए नहीं हो सकता है। ऐसी परिस्थितियों में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहिम की जरूरत है, एक जागृति अभियान की आवश्यकता है। सरकारी जांच एजेंसी लगातार राज्यों से लेकर केंद्र में बैठे लोगों पर कार्रवाई भी कर रही है, लेकिन उसका प्रभाव ज्यादा दिखाई नहीं दे रहा है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि आखिर इस भ्रष्टाचार को हवा कहां से मिल रही है? कौन लोग हैं, जो शीर्ष की सख्ती के बावजूद बेखौफ हैं। कौन है जो सरकारी सेवाओं में भ्रष्टाचार को जगह दे रहे हैं? आखिर प्रशासनिक मशीनरी इसको क्यों नहीं रोक पा रही है? ये ऐसे सवाल है जिनका उत्तर ही हमें भ्रष्टाचार मुक्ति दिशा दे सकती है।

    रिश्वत एक नासूर है। रिश्वत देने वाला काम जल्दी होने की उम्मीद में रिश्वत दे रहा है। लेने वाला काम करने के बदले रिश्वत ले रहा है। यानी भ्रष्ट-व्यवस्था कायम हैं। काम में विलम्ब या आम आदमी को परेशान करना- यह भ्रष्टाचार को पोषित करने की जमीन है। भले ही अपेक्षित सारे काम करना सरकारी कर्मचारी-अधिकारी की जिम्मेदारी होे, फिर भी भ्रष्टाचार को शिष्टाचार एवं रिश्वत को एक तरह से सुविधा शुल्क मान लिया गया है और इसके लेन-देन को लेकर कहीं कोई अपराध बोध नहीं दिखाई देता। ऐसे में सवाल यही है कि आखिर इस भ्रष्टाचार को खत्म कैसे किया जाए? क्या सिर्फ इस तरह के प्रतिज्ञा पत्र से भ्रष्टाचार दूर होगा? असल में जरूरत है नीचे से लेकर ऊपर तक सुधार करने की। नीचे का व्यक्ति तभी सुधर सकता है, जब ऊपर बैठा हुआ व्यक्ति भी उस सुधार के लिए प्रेरित हो और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हो।
    भ्रष्टाचार मठे की तरह राष्ट्र में गहरा पैठा है। राष्ट्रीय स्तर पर 1971 के बाद भ्रष्टाचार ने देश में संस्थागत रूप ग्रहण कर लिया, विशेषतः राजनीतिक दलों में यह तेजी से पनपा। खुद पर भ्रष्टाचार के आरोपों के जवाब में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कहा था कि ‘भ्रष्टाचार तो दुनिया भर में है। सिर्फ भारत में ही नहीं है।’ पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी कहा था कि केंद्र सरकार गरीबों के लिये दिल्ली से जब एक रूपया गांवों में भेजती है तो सिर्फ 15 पैसे ही उन तक पहुंच पाते हैं। कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों की यह कैसी लाचारी थी, कैसी विवशता थी। विडम्बना तो यह है कि कुछ राजनीतिक दलों ने इसी भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष करके सत्ता हासिल की और सत्ता पर बैठते ही भोली-भाली एवं अनपढ़ जनता की आंखों में धूल झोंकते हुए खुलकर भ्रष्टाचार में लिप्त हो गये हैं।
    आजकल राष्ट्र में थोड़े-थोड़े अन्तराल के बाद ऐसे-ऐसे घोटाले, काण्ड, प्रशासनिक रिश्वतखोरी या भ्रष्टाचार के किस्से उद्घाटित हो रहे हैं कि अन्य सारे समाचार दूसरे नम्बर पर आ जाते हैं। पुरानी कहावत तो यह है कि ”सच जब तक जूतियां पहनता है, झूठ पूरे नगर का चक्कर लगा आता है।“ इसलिए शीघ्र चर्चित प्रसंगों को कई बार इस आधार पर गलत होने का अनुमान लगा लिया जाता है। पर यहां तो सभी कुछ सच है। घोटाले झूठे नहीं होते। रिश्वत झूठी नहीं होती। सरकारी कामों में लापरवाही एवं जनता को परेशान करने का प्रचलन झूठा नहीं होता। एक बड़ा सच यह है कि खुद सरकारी कर्मचारी एवं अधिकारी भी भ्रष्टाचार के शिकार होते हैं। उन्हें अपनी मन-मुताबिक पोस्टिंग के लिये रिश्वत देनी होती है। जब पोस्टिंग में भ्रष्टाचार होगा, तो फिर उस पर बैठने वाला भी भ्रष्टाचार करेगा। जरूरी है कि इसके खिलाफ लड़ाई पूरे मन से शुरू हो। हर कोई अपने स्तर पर इसके खिलाफ खड़ा हो। शासन स्तर से लेकर पंचायत स्तर तक इसके खिलाफ माहौल बनना चाहिए, तभी इसका फायदा आम आदमी को मिल पाएगा। अन्यथा भ्रष्टाचार देश को दीमक की तरह चट करता रहेगा। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिये भ्रष्टाचार सबसे बड़ी बाधा है। सत्ता और संपदा के शीर्ष पर बैठकर यदि जनतंत्र के आदर्शों को भुला दिया जाता है तो वहां लोकतंत्र के आदर्शों की रक्षा नहीं हो सकती। राजनीति के शीर्ष पर जो व्यक्ति बैठता है उसकी दृष्टि जन पर होनी चाहिए पार्टी पर नहीं, धन पर नहीं। आज जन एवं राष्ट्रहित पीछे छूट गया और स्वार्थ आगे आ गया है। जिन राजनीतिक दलों को जनता के हितों की रक्षा के लिए दायित्व मिला है वे अपने उन कार्यों और कर्त्तव्यों में पवित्रता एवं पारदर्शिता रखें तो किसी भी ईडी एवं सीबीआई कार्रवाई की जरूरत नहीं होगी। किसी सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा पत्र की जरूरत नहीं होगी।
    मोदी ने इस वर्ष लाल किले से संबोधन के दौरान भ्रष्टाचारियों पर जमकर प्रहार किया। उन्होंने इसके खिलाफ जंग में देशवासियों का सहयोग भी मांगा। प्रधानमंत्री के इस उपयोगी उद्बोधन के अनेक अर्थ निकाले गये , प्रशंसा हुई, तो आलोचक भी कम नहीं हुई हैं। भ्रष्टाचार देश में अगर बढ़ रहा है, तो किसकी जिम्मेदारी बनती है? भ्रष्टाचार को कौन खत्म करेगा? आजादी के 75वें साल में इस सवाल का उठना अपने आप में गंभीर बात है। आजादी के स्वप्न में भ्रष्टाचार से मुक्ति भी शामिल थी। आज भ्रष्टाचार पर प्रधानमंत्री अगर चिंता जता रहे हैं, तो देश अच्छी तरह से वस्तुस्थिति को समझ रहा है। प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सही कहा है कि किसी के पास रहने को जगह नहीं और किसी के पास चोरी का माल रखने की जगह नहीं है। निस्संदेह, भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ हमें मिलकर कदम उठाने पड़ेंगे। भारतीय जनता को सदैव ही किसी न किसी स्रोत से ऐसे संदेश मिलते रहे हैं, इस बार सत्यनिष्ठा प्रतिज्ञा पत्र माध्यम बना है तो उसे व्यर्थ न जाने दें।

    ललित गर्ग
    ललित गर्ग
    स्वतंत्र वेब लेखक

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