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    Homeसाहित्‍यकविताअर्जुन जैसे अब नहीं होते अपनों के प्रति अपनापन दिखानेवाले

    अर्जुन जैसे अब नहीं होते अपनों के प्रति अपनापन दिखानेवाले

    —विनय कुमार विनायक
    अर्जुन जैसे अब नहीं होते
    अपनों के प्रति अपनापन दिखानेवाले
    अब तो तनिक सी बात से शत्रुता हो जाती
    मरने मारने पर उतारू हो जाते अपने
    तुरंत ही दुर्योधन दुशासन सरीखे बन जाते

    बिना किसी गीता को सुने हमेशा तैयार रहते
    मारने पीटने कूटने काटने अपनों को अपने ही
    जबकि अपनों से छले गए उन छली अपनों के प्रति
    अर्जुन में मोह ममता दया व मानवता बची हुई थी

    आज भाई भाई से, बहन बहन से, साले बहनोई से,
    बहनोई साले से, मित्र मित्र से ईर्ष्या द्वेष जलन करते
    एक दूसरे की तरक्की से एक दूसरे के बेटा बेटी से
    खुन्नस निकालते तनिक भी अपनापन नहीं दिखलाते
    सुनना पसंद नहीं करते अपनों की थोड़ी सी भी सफलता

    अब असत्य के खिलाफ सत्य की जीत के लिए
    गीता सुनने सुनाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती
    बिना गीता सुने अपनों की बखिया उधेड़ देते अपने

    आज अपनों से ही छिपाना पड़ता अपनी खुशियां
    आज अपनी सफलता की वजह से अपने दूर हो जाते
    आज अपने रिश्ते नाते मित्र सिर्फ नुक्ताचीनी निकालते
    आज अपने सगे संबंधी कुटुम्ब जन अपनों की सफलता
    और अपनी असफलता को कभी नहीं सहन कर सकते

    अपने रिश्तेदारों की सफलता को इत्तफाक समझते
    और अपनी असफलता को तर्क से महिमा मंडित करते
    आज बगैर गीता पढ़े बिना कृष्ण जैसे सलाहकार के
    लोग तत्क्षण दुर्योधन दुशासन के समान वार करने लगते

    अपनों की खुशियां हड़पने के लिए सदा ही तैयार रहते
    अब कोई शत्रुता निभाने के पहले अर्जुन जैसे नहीं सोचते
    अर्जुन सा मोहग्रस्त होकर भगवान से प्रश्न नहीं करते
    कि मैं जिनके खिलाफ हूं वो सगे संबंधी हैं कैसे हनन करुं?

    आज कोई अर्जुन सा भोलाभाला नहीं है सोचने वाला
    कि मैंने जिनसे शत्रुता पाल रखी है वो मेरे ही स्वजन हैं
    मैं जिनके विरुद्ध शिकायत करता हूं वो मेरे भाई बंधु हैं

    सच में मोहग्रस्त अर्जुन होना आज की आवश्यकता है
    भाई भाई में, बहन बहन में, दोस्त दोस्त में प्रेम के लिए
    मोहग्रस्त अर्जुन होना आज निहायत ज़रूरी मजबूरी है

    आज अर्जुन पुत्र को नहीं चाहिए जयद्रथ सा क्रूर फूफा हो
    आज के अर्जुन के अल्पवयस्क पुत्रों; अभिमन्यु जैसों को
    कर्ण सा कोई हत्यारा ताऊ काका नहीं मिले तो ही अच्छा
    ऐसा हो कि घरेलू तकरार में शामिल नहीं हो कोई बच्चा
    रिश्तों के प्रति बच्चों में जहर नहीं भरे वही मनुष्य सच्चा

    ना पक्ष विपक्ष में शकुनि शल्य सा बहन कोखनाशी मामा हो
    ना कोई पितामह भीष्म ऐसा हो जो पोते परपोते पर प्रहार करे
    ना कोई गुरु द्रोण ऐसा अर्थदास हो जो शिष्यों का संहार करे

    कोई मित्र दगाबाज गुरुभाई अश्वत्थामा जैसा नहीं बन जाए
    जो हकवंचित मित्रों के समूल संपूर्ण वंश को ही मिटाना ठान ले
    गुरुभाई होके मित्र पुत्रों की गला काटकर दुष्ट मित्र को भेंट कर दे
    और गर्भस्थ शिशु को मारने हेतु नारी कुक्षि पर ब्रह्मास्त्र चला दे

    चाहे धन संपत्ति की हकमारी कर लो स्वर्ग समेट इंद्रप्रस्थ लूट लो
    मगर अपनों और पराए जन की नारी पर कुदृष्टि कभी नहीं डालो
    परिणाम बुरा होता, इंद्रपदासीन नहुष से दुर्योधन की तुलना करलो

    आज गीता को सुनने पढ़ने का सीधा सा मतलब है
    अर्जुन सा अपनापन और मोह दुर्योधन दुशासन में भी हो
    फिर से भाईयों भाईयों में एक नया महाभारत नहीं हो!
    —विनय कुमार विनायक

    विनय कुमार'विनायक'
    विनय कुमार'विनायक'
    बी. एस्सी. (जीव विज्ञान),एम.ए.(हिन्दी), केन्द्रीय अनुवाद ब्युरो से प्रशिक्षित अनुवादक, हिन्दी में व्याख्याता पात्रता प्रमाण पत्र प्राप्त, पत्र-पत्रिकाओं में कविता लेखन, मिथकीय सांस्कृतिक साहित्य में विशेष रुचि।

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