CAB पारित होने पर IPS अब्दुर रहमान का इस्तीफा, व्यवस्था पर ही उठाए सवाल

  • नौकरी से मोहभंग या राजनीतिक महत्वाकांक्षा
  • व्यवस्था में बने रहकर किए जा सकते हैं सुधार
  • अपने कार्यों से लोगों को कर सकते हैं प्रेरित और जागरुक
  • यूपीएससी पास करने वाले होते हैं युवाओं के ऑईकॉन
  • कानून बनाने से लागू करने तक संविधान ने दी है सबको अपनी-अपनी जिम्मेवारी
  • लोकतंत्र में जनता की इच्छाएं होती हैं सर्वोपरि

                 -मुरली मनोहर श्रीवास्तव

राज्यसभा में नागरिकता संसोधन विधेयक पारित होने के बाद वृहस्पतिवार को इस विधेयक के लिए पड़े 230 वोटों में जहां समर्थन में 125 मत पड़े वहीं इसके खिलाफ 105 मत पड़े, लिहाजा ये विधेयक पूरी तरह से पारित हो गया। जैसे ही इसकी सूचना आईपीएस अधिकारी अब्दुर रहमान को मिली वो अपने पद से इस्तीफा देते हुए ट्वीट कर अपने इस्तीफे का इजहार कर दिया। देश में पहले से ही राजनीति से प्रेरित होकर ब्यूरोक्रेट्स के इस्तीफे का सिलसिला जारी है। देश या सूबे में किसी न किसी मुद्दे पर इस्तीफा सौंपने वाले आईएएस ऑफिसरों के बाद अब महाराष्ट्र में एक आईपीएस अधिकारी ने इस्तीफा देकर सबकी नजरें अपनी ओर आकर्षित कर ली है। अब आप जानना भी चाहेंगे कि आखिर ये जनाब के इस्तीफे की वजह क्या रही तो आपको बता दूं कि “नागरिकता संशोधन बिल” के सदन में पारित होते ही महाराष्ट्र कैडर के आईपीएस अधिकारी अब्दुर रहमान ने इस्तीफा सौंपकर एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है।

नागरिकता संशोधन विधेयक-2019 के माध्यम से पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं अफगानिस्तान में रह रहे वहां के अल्पसंख्यकों, हिंदू, सिक्ख, बौद्ध, जैन, पारसी एवं इसाईयों को दिसंबर 2014 तक भारत में रहने वालों को भारतीय नागरिकता प्रदान की जाएगी। धार्मिक उत्पीड़न के आधार पर इन देशों में वहां के अल्पसंख्यकों को मानवीय आधार पर भारत सरकार सहयोग करने के लिए इस कदम को उठाया है। कुछ लोगों का मानना है कि इस वर्ग में मुसलमान को क्यों नहीं शामिल किया गया है। सरकार का मानना है कि इन देशों में मुसलमान बहुसंख्यक हैं और उनके लिए धार्मिक उत्पीड़न का मामला नहीं बनता है। इस मसले पर आईपीएस अधिकारी अब्दुर रहमान ने अपने ट्वीटर में लिखा है कि नागरिकता संशोधन बिल विधेयक-2019 संविधान की मूल विशेषता के विरुद्ध हैं इसलिए मैं इस विधेयक की निंदा करते हुए मैंने कल से कार्यालय में उपस्थित नहीं होने का फैसला किया है, आखिरकार मैं अपनी सेवा छोड़ रहा हूं। आगे उन्होंने यह भी लिखा है कि यह विधेयक भारत के धार्मिक बहुलवाद के विरुद्ध है। साथ ही उन्होंने लोगों से यह अपील भी किया है कि इस विधेयक का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जाना चाहिए, जो संविधान की मूल विशेषता के खिलाफ है।

इस प्रकार सही मायनों में देखें तो देश का यह पहला मामला है जब किसी विधेयक के खिलाफ होकर किसी प्रशासनिक अधिकारी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। लोकतंत्र के मंदिर में बैठकर जनप्रतिनिधियों द्वारा लिए गए निर्णय पर आम से लेकर खास की बातों को सदन में रखने की जिम्मेदारी जनप्रतिनिधियों की होती है। वो जिस प्रकार से रखते हैं और उस पर बहस होती है फिर इस विधेयक को मान्यता दी जाती है। इन सारी प्रक्रियाओं में किसी व्यक्ति विशेष या किसी ग्रसित मानसिकता के हवाले से लिया गया निर्णय बताया जाना तर्क संगत नहीं है।

इसलिए सारे पहलुओं पर ध्यान देते नागरिकता संशोधन बिल का विरोध या समर्थन अलग मुद्दा है मगर इस प्रकार एक आईपीएस अधिकारी का खुलेआम विरोध जताना कहां का न्याय है। हां, इसमें कहीं दो मत नहीं कि लोकतंत्र में सबको अपनी बातें रखने का हक है। इधर कुछ वर्षों में आईएएस, आईपीएस अधिकारियों के इस्तीफे का सिलसिला चल पड़ा है। इस तरह से लगातार बढ़ रहे इस्तीफे पर सरकार को भी चिंतन तो करना चाहिए मगर राजनीति से प्रेरित होकर इस्तीफे की बातों से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। अगर ऐसा नहीं तो तत्काल में केरल से कन्नन गोपीनाथ, जम्मु-कश्मीर से शाह फैसल और फारुक अहमद, मेरठ से प्रीता हरित, ओडिसा से अपराजिता सारंगी, राजनेता मणिशंकर अय्यर, सत्यपाल सिंह, ओपी चौधरी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इसके प्रमाण हैं, जिन्होंने नौकरी में रहते ही अपनी कुर्सी को छोड़ समाज सेवा को माध्यम बताकर राजनीतिक अखाड़े तक पहुंचे और बहुत ही आसानी से राजनीतिक पार्टियों का दामन थाम कर ब्यूरोक्रेट बनकर जहां राजनेताओं की तामिल बजाते थे वहीं इस्तीफे के बाद राजनेता बनकर अपने कैडरों पर ही तामिल बजाने की राह पर चल पड़े हैं। सरकार इनके लिए काफी कुछ करती है, इनसे काफी उम्मीदें रखती हैं, मगर सत्ता का सुख पाने की चाहत कहें या फिर सच में लोकतंत्र के कुछ निर्णय से आहत होकर इनके इस्तीफे को मानें यह किसी के भी समझ से परे जरुर है मगर चौंकिए मत जितने भी ब्यूरोक्रेट्स ने अपने पद से इस्तीफे दिए हैं उनका इतिहास गवाह है कि वो सदन के गलियारे में जिन फैसलों का विरोध करते हैं उन्हीं फैसलों के पक्ष और विपक्ष में राजनीति में आकर वोटिंग करने वाले बनते हैं।

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