इरोम शर्मीला-एक दृढ़ इच्छाशक्ति का नाम

डॉ प्रेरणा दूबे

भारतीय नारी मात्र वासना की मूर्ति नहीं है जो फिल्मों में नायकों के इर्द-गिर्द नाचती-गाती है। उसने राष्ट्रीय आंदोलन में अरूणा आसफ अली, सरोजिनी नायडू, कस्तुरबा गांधी तथा जयप्रभा की तरह कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष में भाग लिया। उसने आपातकाल में भी सुषमा स्वराज, जया जेटली, रागिनी जैन आदि के रूप में दु:ख-दर्द सहे। रामजन्म भूमि आंदोलन में साध्वी ऋतंभरा तथा सुश्री उमा भारती को वीरता तथा ओजपूर्ण भाषणों के लिए ही जाना जाता था।

गत 11 वर्षों से मणिपुर में विशेष सशस्त्र बल अधिकार अधिनियम के विरूध्द भूख-हड़ताल करने वाली इरोम चानू शर्मीला भारतीय महिलाओं के लिए मिसाल है। उन्होंने अपने निरक्षर मां के साथ यह अनुबंध कर लिया है कि जब तक वह इस सामाजिक-राजनीतिक लक्ष्य को पर्याप्त नहीं कर लेतीं, तब तक एक-दूसरे से नहीं मिलेंगी।

प्रश्न यह उठता है कि देश के भिन्न-भिन्न भागों में सशस्त्र बलों को दिए जाने वाले विशेषाधिकार मानवाधिकारों का हनन क्यों करते? वे निर्दोष, निरपराध व्यक्तियों की हत्या, संपत्ति की लूट तथा महिलाओं के साथ बलात्कार का अधिकार क्यों देते? यदि इस प्रकार के कानून-अधिनियम सरकार द्वारा बनाए गए हैं तो सरकार को एक समिति का गठन कर विचार करना चाहिए, क्योंकि इस प्रकार के कानून सामाजिक समरसता को हानि ही पहुंचाते हैं।

इरोम चानू शर्मीला ने सत्याग्रह के इन साधनों का प्रयोग क्यों किया? यह इसलिए कि भारतीय संस्कृति में इसका बार-बार प’योग किया गया है।

2 नवम्बर, 2000 को असम रायफल्स ने मणिपुर की राजधानी इंफाल के समीप मलोम कस्बे में बस की प्रतीक्षा कर रहे दस निर्दोष नागरिकों की अंधाधुंध गोलियों की वर्षा करके हत्या कर दी। इसमें सीनियर सिटिजन 62 वर्षीया लेसंगबम इबेतोमी तथा सिनम चंद्रमणि भी मारी गयीं। इन दस व्यक्तियों की हत्या ने इरोम चानू शर्मीला को हिलाकर रख दिया। वे कवयित्री, पत्रकार तथा समाजसेवी के साथ स्त्री भी है। बड़ी परेशान रही शर्मीला ने अध्ययन किया कि भारतीय सुरक्षा बलों को यह विशेषाधिकार पर्याप्त है कि वे कहीं भी किसी भी समय बिना वारंट के घुसकर तलाशी और गोलियां चला सकते हैं तथा वे निरपराध जनों को गिरफ्तार कर सकते हैं। एक नवम्बर, 2000 को यह घटना घटी। लगातार मंथन के बिना 3 नवम्बर, 2000 को इन्होंने अन्न जल ग’हण किया और 4 नवम्बर, 2000 को भूख हड़ताल पर बैठ गयीं। सरकार ने उन्हें तीसरे दिन गिरफ्तार कर लिया तथा धारा-309 के तहत आत्महत्या करने के आरोप मढ़ते हुए जवाहरलाल नेहरू अस्पताल के वार्ड में रखा है और वहीं उनके नाक में जबरन तरल पदार्थ दिया जाता है।

जब सन् 2004 में मणिपुर लिबरेशन आर्मी की सदस्या होने के आरोप में थंगियम मनोरमा के साथ सामूहिक बलात्कार तथा नृशंस हत्या हुई तो इसकी चर्चा सारे भारत में हुई। मणिपुरी महिलाओं ने असम रायफल्स के मुख्‍यालय कांग्ला फोर्ट पर नग्न होकर विशाल प्रदर्शन किया तथा उन्होंने त’तियों पर लिखा था – ”भारतीय सेना आओ, हमारा बलात्कार करो”। इस प्रदर्शन ने दुनिया का ध्यान अन्यायी और अत्याचारी विशेषाधिकार सशस्त्र बल अधिनियम की तरफ खींचा।

दिल्‍ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे का जनलोकपाल बिल के लिए होने वाला अनशन तो प्रमुखता से मीडिया में स्थान पा जाता है पर पूर्वोत्तर पर क्यों नहीं? इरोम चानू शर्मीला पर मीडिया कवरेज क्यों नहीं? क्योंकि वह पूर्वोत्तर से है या वो एक स्त्री है? यह सवाल देश की आधी आबादी तथा बुध्दिजीवियों से किया जा सकता है।

यह भी बता दूं कि इरोम चानू शर्मीला के आदर्श राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हैं जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत को अपने सत्याग्रही साधनों द्वारा सास्टांग दंडवत करा दिया था। जब उन्होंने महात्मा गांधी की समाधि पर श्रध्दांजलि अर्पित की तो उन्हें गिरफ्तार कर दिल्‍ली के एक अस्पताल में ले जाकर तथा पुन: मणिपुर भेज दिया गया। अहिंसक सत्याग्रह के माध्यम से क्रांति का बिगुल फूंकने वाली यह महिला नारीवादियों के लिए क्रांति की मिसाल है।

शर्मीला के अहिंसक सत्याग्रह का ही परिणाम है कि भारत सरकार ने सन् 2004 में उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया कि क्या इस कानून को समाप्त कर दिया जाना चाहिए या इसमें संशोधन की जरूरत है। 2005 में आयोग ने यह सुझाव दिया कि इसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए तथा इसके कई प्रावधानों को समायोजित किया जाना चाहिए। लेकिन सरकार ने इस आयोग की अनुशंसा पर ध्यान नहीं दिया। अत: जरूरी है कि सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया जाए।

इरोम चानू शर्मीला का कहना है कि जब तक भारत सरकार विशेषाधिकार अधिनियम – 1958 को समाप्त नहीं कर देती, तब तक मेरा यह आंदोलन जारी रहेगा। उसका यह भी कहना है कि यह कानून वर्दीधारियों को बिना किसी सजा के भय के बलात्कार, अपहरण और हत्या करने का अधिकार देता है। यह कानून 1958 में नगालैंड में लागू था तथा यह 1980 से मणिपुर में भी लागू है।

(लेखिका कहानीकार, कवयित्री, समाजसेवी तथा हिन्दी अध्यापन से जुड़ी हैं।) 

4 thoughts on “इरोम शर्मीला-एक दृढ़ इच्छाशक्ति का नाम

  1. चाहे पूर्वोतर राज्य हों, या काश्मीर या फिर नक्शल प्रभावी मध्य भारत के इलाके हीं क्यों नहो,पर पीढी दर पीढी वहां के लोगों की आवाज को सेना के बल पर दबाया जाए,यह किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के माथे पर कलंक क टीका है.हो सकता है कि उन भू भागों के जनता की सब मांगे जायज नहीं हों,पर ऐसा कभी नहीं हो सकता कि उनकी सब मांगें नाजायज हीं हैं इन सब बातों का समाधान बल प्रयोग या सैनिको को विशेषाधिकार से नहीं हो सकता.
    इरोंम शर्मिला ने जो देखा था,वह अन्य लोगों ने भी अन्य स्थानों पर देखा है और उन कारनामों को किसी भी आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता.
    इन सभी समस्याओं का जल्द से जल्द समाधान ढूँढने में ही सबका कल्याण है.सरकार या कुछ नागरिकों के विचार में इरोम शर्मीला का यह सत्याग्रह भले ही ठीक न दिखे ,पर आम नागरिक की सहानुभूति अवश्य इस महिला के साथ है.

  2. इरोम का तरीका भले सही हो लेकिन उनका आन्दोलन सही नहीं कहा जा सकता. भारतीय सशत्र बालो को बदनाम करने के लिए कई देशी-विदेशी ताकते सक्रीय है. जो कभी कश्मीर से सेना हटाने या पूर्वोत्तर में सेना के अधिकार छीनने के लिए मांग/दबाव करते रहते हैं. क्या सेना को पंगु बनाकर या उन्हें हटाकर वहा की मासूम जनता को दशहत गर्दो की दया पे छोड़ दिया जाए. और इसीलिये इरोम को व्यापक जन समर्थन नहीं मिला है. आन्दोलन की नीति और नीयत देश हित में हो तो ही देश आपके साथ खडा रहेगा.

  3. ||ॐसाईंॐ|| सबका मालिक एक……….
    जनता कांग्रेसियों को उनके परिवार सहित देख लेगी …भ्रष्ट सरदार को बोलो १९८४ में सरदारों से ज्यादा बुरी तरह जूते खायेगे कांग्रेसी सह परिवार………..सावधान
    दोस्तों जिन्हें इंडिया गेट पर खडा करके जूते मारना चाहिए और क़ानून के हवाले कर देना चाहिए, उन हरामखोरो,भ्रष्टाचारियो,घोटालेबाजो,डकेतो,माफिओं,मवालियो,और गुंडों को हम वोट देकर संसद में पहुचा देते है और फिर अन्ना के साथ जनलोकपाल की भीख मांगते है…९०% पत्र पत्रिकाओं के पन्ने इन्हिके काली करतूतों और घोटालो से रंगे पुते रहते है..और अन्ना इन्हें राजनेता कहते है…हमारी कुल आबादी का ०.००००१% से भी कम ये नेता कौम के भ्रष्ट नरपिशाच हमारे जीवन पर अभिशप्त कोहरे की तरह छाये हुए है…और खुद को लोकतंत्र का चौथा खम्बा समझने वाला मिडिया भ्रष्टाचारियो और अमीरों की रखैल बनकर देश की लूट का कुछ हिस्सा लेकर मजे लूट रहा है…….
    सरकारी व्यापार भ्रष्टाचार

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