क्या अमेरिकी नीति डेमोक्रेटिक है…?

               लूट और फूट की नीति पर अमेरिका।

आज के मौजूदा परिप्रेक्ष्य में यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि विश्व में क्या हो रहा है। क्या हम आज के शिक्षित एवं जागरूक समाज में जीवन जी रहे हैं…? अथवा पाषाण युग में फिर से हमने पुनः प्रवेश कर दिया…? जिस प्रकार से विश्व की राजनीति ढ़केली एवं थोपी जा रही है वह किसी भी दृष्टि से लोकतान्त्रिक एवं डेमोक्रेटिक नहीं है। यदि आज की इस राजनीति को लोकतान्त्रिक नाम दिया जा सकता है तो फिर पुनः विचार करना पड़ेगा कि पूर्व में जो हो रहा था और आज में जो हो रहा है उसमें और आज में क्या अन्तर है। क्योंकि, पहले भी बल पूर्वक रूप से ही राजा एवं शासक अपना वर्चस्व कायम रखता था और निर्बल व्यक्ति, राष्ट्र, एवं समूह को दबाता रहता था।

इतिहास साक्षी है कि कोई भी राजा अपने बल का प्रयोग करते हुए किसी भी राज्य पर आक्रमण कर देता था और उस राज्य को या तो अपने कबजे में ले लेता था अथवा उस प्राप्त किए हुए राष्ट्र में लूट-पाट करता था। यदि इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो यह स्पष्ट रूप से सिद्ध हो जाता है कि क्या उस समय क्या स्थिति थी। सभी आक्रमणकारियों ने अपने बल का प्रयोग करते हुए अपने राज्य के क्षेत्रफल में सदैव ही बढ़ोत्तरी की है। निर्बल एवं कमजोर राजा का पतन करके सबल राजा अपना अधिकार स्थापित कर लेता था। और शासन आरम्भ कर देता था। इस प्रकार के कुकृत्य से सम्पूर्ण विश्व रक्त रंजित हो उठा था। प्रत्येक स्थान पर हिंसा ने अपने पैर पसार रखे थे। परन्तु, इस कुकृत्य से मुक्ति हेतु अहिंसा की निति अपनाई गई और प्रत्येक राष्ट्र के लिए एक रूप रेखा तैयार की गई। सभी राष्ट्रों की सीमा रेखा निर्धारित की गई और सभी राष्ट्रों को इस नियम का पालन करने के लिए बाध्य किया गया।

परन्तु, ऐसा आभास हो रहा कि वह सभी नियम कानून सम्भतः कागज के पन्नों में ही सिमट कर रहे गए हैं। धरातल पर उन सभी नियम एवं कानून की छाया भी कहीँ दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती। अगर नियम की रूप रेखा कहीं भी दिखाई देती है तो वह किसी कमजोर एवं निर्बल राष्ट्र के लिए। जिस प्रकार से तानाशाही और लूट-पाट का नंगा नाच पूरे विश्व में हो रहा है उससे कोई भी व्यक्ति अनभिज्ञ नहीं है। परन्तु, पूरा विश्व भय़ वश आँख मूंद कर बैठ गया है। आँख मूँद कर बैठ जाना ही सारी समस्याओं की जड़ है। आँख मूंदकर बैठ जाने पीछे भी एक बड़ा कारण है। वह यह कि आज की चाटुकारिता और स्वार्थ की राजनीति ने अपने पैर पूरे विश्व में पसार रखे हैं। इसी कारण लुटेरे, डाकू और तानाशाह इस धरती पर अपनी इच्छा के अनुसार नंगा नाच घूम-घूमकर पूरी पृथ्वी पर कर रहे हैं। और पूरा विश्व मूक दर्शक बनकर देख रहा है।

जिस नीति में तेजी के साथ बदलाव देखने को मिल रहा है वह यह कि अब अमेरिका प्रत्यक्ष रूप से न लूटकर परोक्ष रूप से लूटने की दिशा में गतिमान है जोकि सन् 1953 से अनवरत इसी दिशा में तेजी के साथ चल रहा है। अमेरिका फूट डालो और राज करो की नीति पर तेजी से कार्य कर रहा है। पूरे विश्व को एक दूसरे से आपस में लड़ाकर एक राष्ट्र पर कब्जा कर लेता है। और अपनी इच्छा के अनुसार एक गुलाम शासक बैठा देता है जोकि अमेरिका के रिमोट से चलता रहे। और अमेरिका का परोक्ष रूप से शासन चलता रहे। यह बिन्दु और मजबूती के साथ तब स्पष्ट हो जाता है कि जब किसी भी देश का मुखौटा राष्ट्र अध्यक्ष अमेरिका के इशारे पर कार्य नहीं करता तो अमेरिका उसका धुर विरोधी नेता उसी राष्ट्र में खोज लेता है और फिर उस धुर विरोधी नेता को सत्ता की लालच देकर उसे राष्ट्र का राष्ट्र अध्यक्ष बना देता है और पूर्व में बनाए गए हुए राष्ट्र अध्यक्ष को राष्ट्रविरोधी, जनविरोधी नियम के अन्तर्गत कानूनी रूप से फंसा देता है। और उसे जेल की सलाखों की पीछे धकेल देता है। और उसपर मुकदमा चलवाकर उसे फांसी की सजा देकर मौत के घाट उतार देता है। इसी भय से आज के समय में सभी मुखौटा शासक अमेरिका के इशारे पर नाच रहे हैं। और अमेरिका के हित के लिए कार्य कर रहे हैं। सभी मुखौटा राष्ट्र अध्यक्षों को इस बात का भय सता रहा है कि यदि अमेरिका की इच्छा के विपरीत कोई भी कार्य किया तो परिणाम बहुत ही घातक होंगे। जिसका साक्षात सबूत एवं तथ्य तथा आधार इराक का शासक सद्दाम हुसैन है। जिसको अमेरिका ने पहले अपने लाभ हेतु ईरान के विरोध में खड़ा किया और ईरान पर आक्रमण करवाया लेकिन जब सद्दाम अमेरिका के हाथों से छिटकर दूर जाने की कोशिश करने लगा तो अमेरिका ने एक बड़ी ही चतुराई के साथ एक शाजिस रची और सद्दाम हुसैन का अंत कर दिया। इसके बाद अमेरिका ने अपनी इच्छा के अनुसार फिर से इराक में सरकार बना ली और फिर परोक्ष रूप से इराक में शासन करने लगा।

ईरान से दुश्मनी का कारण भी यही कि अमेरिका यह चाहता है कि ईरान में भी हमारा मुखौटा रूपी शासक हो। और अमेरिका ने कर भी दिखाया था। इतिहास साक्षी है कि सन् 1953 में जनता के द्वारा ईरान में लोकतान्त्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को अमेरिका ने गिरा दिया और अपना मुखौटा रूपी शासक ईरान में बैठा दिया था जिसने काफी लंबे समय तक ईरान के तेल भण्डार का लाभ सीधे-सीधे अमेरिका को पहुँचाया। सन् 1953 से लेकर सन् 1979 तक अमेरिका ने ईरान पर परोक्ष रूप से शाह पहेलवी को मुखौटा शासक बनाकर शासन किया। लेकिन ईरान की जनता अमेरिका की इस तानाशाही से पूर्ण रूप से विरोध में थी। क्रान्ति की आग ईरान की जनता के हृदय में धधक रही थी। बस प्रतीक्षी थी सही समय और मजबूत नेतृत्व की। जैसे ही ईरान की जनता को मजबूत नेतृत्व मिला ईरान की जनता ने देश में क्रान्ति आरम्भ कर दी और अमेरिका का मुखौटा रूपी शासक शाह पहेलवी ईरान छोड़कर भाग खड़ा हुआ। जैसे ही अमेरिका का वर्चस्व ईरान से समाप्त हुआ तो अमेरिका ने ईरान की जनता को सबक सिखाने का फैसला किया इसका मुख्य कारण था ईरान की क्रान्ति। अमेरिका ने इराक को अपना मोहरा बनाया और ईरान पर आक्रमण आरम्भ कर दिया। इस आक्रमण में बेगुनाह मासूम जनता की बड़े पैमाने पर हत्याएं हुई। जिसका मुख्य आधार अमेरिका था।

सत्य यह है कि ईरान शान्ति पूर्वक रूप से अपना कार्य कर रहा था। और लोकतान्त्रिक रूप से सरकारें चल रही थीं। लेकिन अमेरिका ने ईरान की सरकार को गिराकर अपना मुखौटा बैठा दिया। अमेरिका के द्वारा किया गया यह स्पष्ट रूप से सिद्ध करता है कि अमेरिका ने तेल और सत्ता की लालच में ईरान में जाकर कूद पड़ा और स्वयं ही आग भड़काई जिसके कारण ही अमेरिका से ईरान का विरोध आरम्भ हो गया। यदि अमेरिका अपनी लूट की नीति को त्याग दे तो पूरे विश्व में शान्ति का वातावरण कायम हो जाए। अमेरिका का यह रवैया बहुत ही गलत तथा पूर्ण रूप से अन्तर्राष्ट्रीय नियम के विपरीत है। यह कृत्य कितना गंदा है कि अमेरिका पहले किसी के घर में घुस जाता है फिर उसके घर पर अपना अधिकार दिखाने लगता है। पूरे विश्व में अमेरिका की तानाशाही सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है। अमेरिका मात्र अपना हित साधने के लिए पूरे विश्व को जलती हुई आग में ढ़केल देने के प्रयास में लगा हुआ है। अतः पूरे विश्व को समय रहते हुए इस पर एक नीति तैयार करनी चाहिए। अन्यथा अमेरिका कभी भी किसी भी राष्ट्र को भी अपना शिकार बना सकता है। इसलिए पूरे विश्व को समय रहते हुए इस समस्या से मुक्ति के लिए बड़े एवं कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। अन्यथा अमेरिका अपना हित साधते हेतु किसी भी राष्ट्र के प्रति षड़यन्त्र रच सकता है। किसी भी राष्ट्र में आग भड़काना अमेरिका की बड़ी चाल है। जिसके बाद वह आसानी के साथ सरपंच की भूमिका में प्रवेश कर लेता है। और उस राष्ट्र को दो भागों में विभाजित करके अपना राज्य स्थापित कर देता है।                                                    

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