उपेक्षित है ग्रामीण पत्रकारिता

डॉ. आशीष वशिष्ठ

ग्रामीण परिवेश तथा ग्रामीण जन के प्रति भारतीय जनमानस में गहरी संवेदनाएं हैं. प्रेमचंद, रेणु, शरतचंद्र, नागार्जुन जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने ग्रामीण परिवेश पर काफी कुछ लिखा है, मगर आज भी ग्रामीण पत्रकारिता की दयनीय स्थिति काफी कचोटती है. कुछ क्षेत्रीय समाचार पत्रों को छोड़ दें, तो ग्रामीण पत्रकारिता की स्थिति संतोषजनक कतई नहीं है. दरअसल, यह लाइफ स्टाइल पत्रकारिता का दौर है. भारतीय पत्रकारिता भी इससे अछूती नहीं है. पेज-थ्री पत्रकारिता का बढ़ता ‘स्पेस’ इसका बड़ा उदाहरण है.

सवाल उठना स्वाभाविक है कि देश की करीब सवा सौ करोड़ आबादी के लिए दो जून की रोटी जुटाने वाले 70 प्रतिशत ग्रामीण लोगों की ‘लाइफ स्टाइल’ हमारे मीडिया की विषय-वस्तु क्यों नहीं हो सकती. वास्तविकता में मीडिया से गांव दूर होता जा रहा है. गांव, गरीब और उनकी समस्याओं को उजागर करने में मीडिया रुचि नही लेता है. ग्रामीण पत्रकारिता उसी तरह उपेक्षित है, जिस तरह शहर के आगे गांव.

आजादी के साढे छह दश्कों में पत्रकारिता ने कीर्तिमान स्थापित किये और नवीन आयामों को छुआ. सूचना क्रांति, विज्ञान एवं अनुसंधान ने संपूर्ण पत्रकारिता के स्वरूप को बदलने में महती भूमिका निभाई है. प्रिंट, इलेक्ट्रानिक व सोशल मीडिया का विस्तार तीव्र गति से हो रहा है, लेकिन इन सबके मध्य ग्रामीण पत्रकारिता की सूरत और सीरत में मामूली बदलाव ही आया है. अगर ये कहा जाए कि गांव, गांववासियों की भांति ग्रामीण पत्रकारिता की स्थिति शोचनीय है तो यह गलत नहीं होगा.

इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी के अनुसार, भारत में 62,000 समाचार-पत्र हैं, जिनमें से 90 प्रतिशत यानी लगभग 55,000 स्थानीय भाषाओं में छपते हैं. लेकिन इनमें 50,000 की प्रसार-संख्या 10,000 से कम है. इतनी कम प्रसार-संख्या के कारण इनमें से कई अक्सर घाटे में चलते हैं, पर अपनी शुद्ध स्थानीयता के कारण ये पाठकों को पसंद आते हैं. यह दीगर बात है कि इन पत्रों के संवाददाता आम तौर पर बहुत शिक्षित-प्रशिक्षित नहीं होते.

सोशल मीडिया ने पत्रकारिता और सूचना जगत को हिला रखा है, बावजूद इसके देश की आत्मा और वास्तविक भारत कहे जाने वाले गांव भारी उपेक्षा के शिकार हैं. ग्रामीण क्षेत्रों की इक्का-दुक्का खबरें ही यदा-कदा राष्ट्रीय पटल पर स्थान पाती हैं. अधिसंख्य तो गांव की देहरी पर ही दम तोड़ देती हैं. मीडिया का ध्यान महानगरों और शहरों में ही केन्द्रित है. पत्रकार भी दूर-दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में रिर्पोटिंग करने की बजाय नगरों और कस्बों में काम करने को प्राथमिकता देते हैं और जब तक मजबूरी न हो ग्रामीण क्षेत्रों में जाने से बचते हैं. मीडिया के विस्तार ने छोटी-छोटी घटनाओं को राष्ट्रीय स्तर पर लाने के कई सराहनीय प्रयास किये, मगर देश में गाँवों की संख्या और ग्रामीण भारत की समस्याओं के अनुपात के सापेक्ष ये प्रयास एक फीसदी से भी कम है.

पिछले दो दशकों में पत्रकारिता के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव तकनीक और सुविधाओं के मामले में देखने को मिले हैं. मीडिया ने राष्ट्र विकास, आम आदमी की आवाज को सत्ता तक पहुंचाने, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को सीमा में रहने और दबाव बनाने का बड़ा काम किया है, लेकिन इन सबमें पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्य से भटक गयी है. उसने स्वयं को एक सीमित दायरे में बांध लिया है.

लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहा जाने वाला आज मीडिया महानगरों और शहरों के आसपास ही सिमटा दिखता है. गांव तक आज भी उसकी पहुंच उतनी ही है जितनी स्वतंत्रता से पूर्व थी. जब तक गांव या दूरदराज क्षेत्र में कोई बड़ी घटना न घट जाए तब तक वो राष्ट्रीय तो छोडिए प्रदेश स्तर की खबर भी नहीं बन पाती. शहरों, कस्बों और जिलों में प्रतिनिधि नियुक्त करने वाले मीडिया हाउस ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिनिधि रखने की आवश्यकता ही अनुभव नहीं करते. मीडिया की दृष्टि और बुद्धि भीएक व्यापारी की भांति हर स्थान पर नफा-नुकसान नापकर निवेश करती है.

गांव, खेत, खलिहान, विकास के लिए चलाई जा रही योजनाओं का हाल, ग्रामीणों की संस्कृति और रहन-सहन आदि ऐसी कई चीजें हैं जो ग्रामीण पत्रकारिता के माध्यम से मीडिया तक पहुंच पाती है. लेकिन मीडिया गांव की खबरों को कितना महत्व दे रहा है, यह किसी से छुपा नहीं हैं. भूत-प्रेत और अंधविश्वास की खबर हो तो भले ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा उसे विशेष कार्यक्रमों में पैकेज बनाकर दिखाया जाता है, लेकिन दो वक्त की रोटी और तन ढकने के लिए कपड़ों के मोहताज लोगों की आवाज को मीडिया भी धीरे-धीरे अनदेखा करने लगा है.

मीडिया बाजारवाद की मोह माया में फंस कर अपना दायित्व भुलता जा रहा है. मीडिया को मालूम है कि गांवों में भले ही देश की जनसंख्या का बड़ा हिस्सा निवास करता हो, भले ही अपने गांव की याद भी लोगों को आती हो, लेकिन गांव में रहना कोई पसंद नहीं करता. रोजी-रोटी की मजबूरी, दिनोंदिन कम होती खेती और अन्य कारणों के चलते गांवों से बड़े स्तर पर आबादी का पलायन शहरों की ओर रहा है. गांव से शहर आने के कई कारणों में से एक यह भी है कि गांवों पर कोई भी ध्यान नहीं देता है. सरकारी मशीनरी के साथ मीडिया भी इस जमात में शामिल है.

मीडिया ने गांव को कभी बिकाऊ माल समझा ही नहीं. उसकी सारी खोजबीन महानगरों, शहरों और कस्बों के इर्द-गिर्द ही घूमती रहती है. उसे बखूबी मालूम है कि शहर की मामूली घटना भी बिक सकती है उसकी टीआरपी और रीडरशिप है. जब ग्रामीण गांव में रहना पसंद नहीं करते तो ख़बरें दिखाओ या न दिखाओ, खबर लिखो चाहे न लिखो कोई पहाड़ टूटने वाला नहीं है.

पत्रकारिता आबादी के महज 30-35 फीसदी हिस्से को ही कवर करती है. गांव, देहात और दूर-दराज क्षेत्रों में आबादी किन हालातों में जीवन यापन कर रही है, उनके दुख-दर्द, समस्याएं और परेशानियां देश और दुनिया तक पहुंच ही नहीं पाते हैं. सरकारी फाइलों और आंकड़ों में गांवों का मौसम गुलाबी ही दिखाया जाता है, लेकिन वास्तविकता से किसी छिपी नहीं है. आपाधापी और सबसे पहले दिखाने की होड़ में कभी-कभार किसी प्रिंस के गडढे में गिरने, किसी दस्यु डकैत के इनकाउंटर, किसी शीलू के बलात्कार, किसी ऑनर किलिंग के मामले या फिर किसी नेता के दौरे की वजह से ही कैमरा और कलम वहां तक पहुंच पाते हैं आम दिनों में गांव की खबरें बटोरने, लिखने और दिखाने का समय किसी के पास नहीं है. बढ़ती बाजारवादी प्रवृत्ति के कारण ग्रामीण पत्रकारिता का स्तर जस का तस बना हुआ है.

ग्रामीण पत्रकारिता को आधुनिकता की दौड़ में सबसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है. संवाद को समाज की परिस्थिति के अनुकूल वास्तविकता में ढालना, सामाजिक सरोकारों के बीच परमार्थ को जगाते रहना पत्रकारों के लिए सामाजिक उद्यमी जैसा कार्य होता जा रहा है. हालांकि अखबारों के विविध संस्करण होने से आंचलिक पत्रकारों की खबरों को जगह तो मिलने लगी है, फिर भी शहरी पत्रकारिता की अपेक्षा ग्रामीण पत्रकारिता एक चुनौती और जोखिम भरा काम है . इसलिये ग्रामीण पत्रकारों को भी सुरक्षा के साथ विशेष प्रोत्साहन देने की जरूरत है . वहीं ग्रामीण पत्रकारों से इस बात की अपेक्षा है कि वे आंचलिक पन्ने का भरपूर उपयोग कर गांवों की कठिनाईयों व समस्याओं को उजागर करने में करें और साथ ही प्रेरणादायी आयामों को भी सामने लायें.

ग्रामीण क्षेत्रों से जो खबरें आ भी रही हैं वो गांव फौजदारी मामलों, प्रधान के भ्रष्टाचार, सरकारी डॉक्टर, टीचर और अन्य कर्मचारियों के शिकवे-शिकायत, पुलिस प्रशासन की चापलूसी तक ही सीमित रहती है. अखबार, रेडियो, दूरदर्शन, स्वयंसेवी आदि संस्थायें, इलेक्ट्रानिक मीडिया जितनी संजीदगी गांव की रोमांचकारी खबरों में दिखाते हैं, उतनी संजीदगी ग्रामीणों के दुख-दर्द वाली खबरों के लिये दिखाई नहीं देती.

देश की 70 प्रतिशत जनता जिनके बलबूते पर हमारे यहां सरकारें बनती हैं, जिनके नाम पर सारी राजनीति की जाती हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक योगदान करते हैं, उन्हें पत्रकारिता के मुख्य फोकस में लाया ही जाना चाहिए. मीडिया को नेताओं, अभिनेताओं और बड़े खिलाडिय़ों के पीछे भागने की बजाय उस आम जनता की तरफ रुख़ करना चाहिए, जो गांवों में रहती है. जिनके दम पर यह देश और व्यवस्था चलती है. पत्रकारिता जनता और सरकार के बीच, समस्या और समाधान के बीच, व्यक्ति और समाज के बीच, गांव और शहर की बीच, देश और दुनिया के बीच, उपभोक्ता और बाजार के बीच सेतु का काम करती है. यदि यह अपनी भूमिका सही मायने में निभाए तो हमारे देश की तस्वीर वास्तव में बदल सकती है.

 

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