क्या भारत में ईसाइयों की आबादी वास्तव में कम हो रही है?

भारत में कैथोलिक चर्च के अनुयायियों का आधिकारिक आंकड़ा लगभग दाे कराेड़ है। कैथाेलिक चर्च ने अपने प्रशासनिक ढांचे काे 200 के लगभग डायसिस और 29 धार्मिक – प्रांतों में बांट रखा है। अगर सरकारी जनगणना काे ही सही माने, तो दाे करोड़ कैथोलिक हैं, बाकी प्रोटोस्टेंट या दूसरे डिनोमिनेशन, स्वतंत्र कलीसिया केवल 30 लाख ही हैं, जबकि इससे ज्यादा संख्या तो उसमें कार्य करने वाले और धर्म प्रचारकाें की ही हाेगी। प्रोटोस्टेंट या दूसरे डिनोमिनेशन, स्वतंत्र कलीसिया से जुड़े अनुयायियों की संख्या कैथोलिक से दोगुनी-तिगुनी होगी।

लोकसभा में एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधनों पर चर्च नेता गुस्से में हैं, हालांकि वह इस मामले में खुलकर बाेलने से बच रहे हैं। वे इसे घातक और लोकतंत्र-विरोधी बता रहे हैं। उन्होंने हिंदू संगठनों द्वारा ईसाइयों पर तथाकथित हमलाे और उत्पीड़न काे मुद्दा बनाने और  सरकार काे राष्ट्रीय – अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घेरने के प्रयास शुरू कर दिये हैं।

हालही में “प्रॉसिक्यूशन रिलीफ” नामक संस्था ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि ईसाईयों के विरूद्ध घृणा फैलाकर भड़काई जाने वाली हिंसक घटनाओं में 40.87 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह राष्ट्रव्यापी बढ़ोत्तरी, कोविड-19 के कारण लगाए गए राष्ट्रव्यापी लाकडाउन के बावजूद हुई। वरिष्ठ स्तंभकार राम पुनियानी ने इस पर एक बड़ा लेख लिखते हुए सवाल उठाया है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, वनवासी कल्याण आश्रम, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल दूरदराज के क्षेत्रों में धर्म परिवर्तन को लेकर चर्च /  ईसाई संगठनों के विरूद्ध लगातार दुष्प्रचार करते रहते हैं। जबकि ईसाईयों की जनसंख्या लगातार घट रही है।

राम पुनियानी अपने लेख Conversions and Anti Christian Violence in India/ में कहते हैं, कि अंतिम जनगणना (2011) के अनुसार देश में ईसाईयों का प्रतिशत 2.30 है। यह प्रतिशत पिछले साठ वर्षों से लगातार गिर रहा है। 1971 की जनगणना के अनुसार ईसाई देश की कुल आबादी का 2.60 प्रतिशत थे, जो 1981 में 2.44 प्रतिशत 1991 में 2.34 प्रतिशत और 2001 में 2.30 और 2011 में भी 2.30 प्रतिशत हैं। राम पुनियानी जनगणना आंकड़ों के साथ खेलते हुए भूल जाते हैं, कि पिछले पांच दशकाें से चर्च / ईसाई संगठन किस तरह एक साेची -समझी रणनीति के तहत जनगणना का खेल – खेल रहे हैं।

भारत में कैथोलिक चर्च के अनुयायियों का आधिकारिक आंकड़ा लगभग दाे कराेड़ है। कैथाेलिक चर्च ने अपने प्रशासनिक ढांचे काे 200 के लगभग डायसिस और 29 धार्मिक – प्रांतों में बांट रखा है। अगर सरकारी जनगणना काे ही सही माने, तो दाे करोड़ कैथोलिक हैं, बाकी प्रोटोस्टेंट या दूसरे डिनोमिनेशन, स्वतंत्र कलीसिया केवल 30 लाख ही हैं, जबकि इससे ज्यादा संख्या तो उसमें कार्य करने वाले और धर्म प्रचारकाें की ही हाेगी। प्रोटोस्टेंट या दूसरे डिनोमिनेशन, स्वतंत्र कलीसिया से जुड़े अनुयायियों की संख्या कैथोलिक से दोगुनी-तिगुनी होगी।

दरअसल एक रणनीति के तहत भारत का चर्च अनुसूचित जातियाें से धर्मांतरित लाेगाें काे हिंदू दलितों की श्रेणी में रहने काे मूक-समर्थन देता है। ऐसे लाेग ईसाइयत में दीक्षित हाेने के बाद वचन,आस्था और कर्म से ताे ईसाई हैं लेकिन जनगणना में वह जानबूझ कर अपने काे ईसाई घाेषित नहीं करते। अब तो प्रोटोस्टेंट या स्वतंत्र कलीसियाओं की स्थापना करने वाले अधिकतर धर्म प्रचारक, स्वतंत्र पादरी अपने ईसाई नाम भी नहीं रखते, उतर भारत में सिंह, चौधरी, बिहारी, यादव, तिवारी, शर्मा, मुखर्जी, बनर्जी  जैसे कई नामों वाले पादरियाें की बाढ़ आई हुई है। पंजाब में पगड़ी वाले और कई जगह भगवाधारी पादरी आम हैं, जाे गैर-ईसाइयाें काे आसानी से ईसाइयत की तरफ आकर्षित करते है।2008 में कंधमाल में हुई सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए ईसाइयाें काे शहीद घोषित करने की मांग काे लेकर कैथाैलिक चर्च और कैथाैलिक यूनियन ने वेटिकन पर अपना दबाब बड़ा दिया है। कंधमाल हिंसा की 10वीं सालगिरह के अवसर पर पोप फ्रांसिस काे लिखे पत्र में मांग की गई है कि वेटिकन जल्द से जल्द उन्हें शहीद घोषित करें। यह पत्र भारत में पाेप के राजदूत महाधर्माध्यक्ष गियामब्लास्ता डायक्वाट्रो (Archbishop Giambattista Diquattro)  के माध्यम से भेजा गया है। हालांकि कटक भुवनेश्वर आर्चडायसिस के आर्चबिशप के साथ चार कार्डिनल्स ने इस प्रक्रिया पर पहले ही अपना काम शुरू कर दिया था।

कटक-भुवनेश्वर आर्चडायसिस के आर्कबिशप जॉन बारवा ने इनके लिए अंग्रेजी और ओड़िया भाषा में प्रार्थना तैयार करवाई है। कैथाेैलिक चर्च  के मुताबिक कंधमाल की हिंसा में मरे लोग साहसी थे और येसु मसीह में विश्वास करने के लिए मरने को भी तैयार थे। अंत में मौत के स्वीकार कर उन्होंने अपने विश्वास की गवाही दी। इसलिए शहीद घोषित किये जाएं।

चर्च की यह दलील गले उतरने वाली नहीं है कि केवल येसु मसीह में विश्वास करने के कारण या ईसाई हाेने के कारण वे मार दिए गए। कंधमाल हिंसा के कई कारण थे जिनमें दाे बड़ी वजह धर्मांतरण और आरक्षण थी। यह बात कई जांच एजेंसियाें ने भी मानी है। पूर्व न्यायाधीश एस सी मोहपात्रा ने कंधमाल में हिंसा की अंतरिम रिपोर्ट में कहा था , मुख्य वजह भूमि विवाद, धर्म परिवर्तन और पुन: धर्म परिवर्तन एवं फर्जी सर्टिफ़िकेट हैं। आदिवासियों को संदेह था कि ईसाई फर्जी तरीके से उनके जमीन पर कब्ज़ा कर रहे हैं। 

जब आम ईसाई राेजाना अपने घर और हर इतिवार काे चर्च द्वारा बनाई गई  प्रार्थना का जाप करेगा ताे उससे अंदर स्थायी शत्रुता का भाव सदैव बना रहेगा। कैथाेैलिक चर्च के इस कदम से हमारा देश उन देशाें में शामिल हाे गया है जहां सदियाे पहले मसीह में विश्वास करने के लिए विश्वासियों का उत्पीड़न किया जाता था या उन्हें मार दिया जाता था। भारत दक्षिण एशिया का वह पहला देश बन गया है। कैथाेैलिक चर्च  ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए इन शहीदों काे संत की श्रेणी में लाने के लिए फादर पुरुषोत्तम नायक को प्रक्रिया के लिए दस्तावेज़ तैयार करने का कार्य सौंपा है। फादर नायक आर्च-बिशप के सचिव और ओडिशा कैथाैलिक चर्च के उप-सचिव हैं।

अपने लाभ के लिए चर्च अपनी तथाकथित जनसंख्या को एक शस्त्र के रूप में इस्तेमाल करते हुए भारत काे राष्ट्रीय – अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम कर रहा है।

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