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    Homeसाहित्‍यव्यंग्यलाज़िम है हम भी देखेंगे...!

    लाज़िम है हम भी देखेंगे…!

    ~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

    सभागृह में उपस्थित सम्मानीय श्रोतागणों आप सभी को ‘चक्षु’ का नमस्कार ‌ । बस, कुछ ही पलों में ही हमारे सामने अपने आप में विद्वता के मानक प्रो. विद्वेष कुमार स्वयं प्रकट हो रहे हैं। उनके विषय में हमें ज्यादा बतलाने की आवश्यकता नहीं है- वे अपने आप में स्वयं एक परिचय हैं। तो, आइए बिना विलम्ब किए माइक और मंच उन्हें सौंपते हैं। 

    आप सबकी करतल ध्वनि उनके स्वागत के लिए बज उठे ; ऐसी प्रार्थना है। 

    और करतल ध्वनि से पूरा सभागृह गूँज उठता है……..!

    तभी मंच पर एक गोल – मटोल – लम्बे व छोटे शरीर के धीर गम्भीर मानुष का प्रकटीकरण होता है। मंच पर आते ही माइक की ओर लपकते हुए वे दौड़ पड़ते हैं !

    माइक पर उनका झपट्टा ठीक वैसा ही था , जैसे बिल्ली झपट्टा मारती है।

    माइक और मंच से आवाज़ गूंजने लगी –

    अब मंच व माइक हमारे हवाले साथियो – तो सुनो हमारी व्यथा कथा साथियो…

    जैसा कि आप सभी को ज्ञात ही है कि -आजकल राष्ट्रीय शोध, संगोष्ठियों , परिचर्चाओं एवं व्याख्यान-मालाओं में मेरा खूब आना- जाना हो रहा है। शोध विश्लेषण एवं परिचर्चाओं में मुझसे मिलने वाले अक्सर मेरे मुरीद हो जाते हैं। चारों ओर मेरे सम्मान और मेरी विद्वता का शोर मच रहा है , लेकिन मेरे महाविद्यालय में मेरी कोई कद्र ही नहीं है। यह ऐसा ही है जैसे – ‘मेरे घर में नहीं मेरी तस्वीर- और पूजे जाते हैं घर में पीर ‘ । बहरहाल, मैं फिर भी बहुत खुश हूँ। मेरी बढ़ती हुई इस शोहरत से मेरे सहकर्मी जलते कुढ़ते रहते हैं। सच बताऊं तो वे मेरी प्रतिभा के ताप को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। वे यह पचा ही नहीं पा रहे कि उनके बीच राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का विद्वान है। 

    आपको तो पता ही है कि – मैं गुमशुदा नगर के अज्ञात शासकीय महाविद्यालय का प्रोफेसर विद्वेष कुमार हूँ। वैसे मुझे अच्छी तरह से जानने वालों को पता ही है । लेकिन अपनी सत्यवादी प्रवृत्ति पर आप सबकी मुहर लगवाने के लिए आप सबसे साझा करते हुए मुझे यह प्रसन्नता हो रही है कि- मैं टीप-टाप विधा में वेल एजुकेटेड हूँ। मैंने कोरम पूरा करने के लिए अपने सारे रिसर्च पेपर भी ऐसे ही इधर – उधर से टीप टाप करके लिखे हैं । और अपने रिसर्च पेपर्स को लेकर मुझे अतिशय घमण्ड भी है। क्या कोई ऐसे ही प्रोफेसर बन जाता है । वास्तव में इसके लिए मेरे जैसी तपस्या चाहिए होती है।

    मंच से प्रोफेसर विद्वेष कुमार का धारा प्रवाह ‘ व्याख्यान प्रपंच’ लगातार जारी था…

    वे आगे बोलते हुए कहने लगे – 

    साहित्य की ऐसी कोई विधा नहीं होगी जिसमें मैं जलवे न बिखेरता होऊँ। मेरा ‘कमरे में कविता’ नामक काव्य संग्रह खूब चर्चित हुआ है । इसमें मैंने बुर्जुआ वर्ग के विरुद्ध ऐसी भीषण क्रांति मचाई है कि – चौतरफ़ा विमर्श का दौर चलने लगा है। अक्सर अपने जैसे जिन विद्वानों का मैं सम्मान करता हूं।‌उन सभी ने प्रशंसा के इतने कसीदे गढ़े कि मैं फूलकर कुप्पा भले हुआ। लेकिन अगले पल ही मैंने गम्भीरता का परिचय देते हुए उन सबके प्रति कृतघ्नता व्यक्त कर दी।

    लेकिन मुसीबत हर जगह हैं – मुझसे जलने वाले जलनखोर कविगण कहते हैं कि – विद्वेष तुम्हारी कविताएँ चीत्कार कर रही हैं। इसीलिए कम से कम तुम कविता न लिखो। चूँकि मैं आलोचना को सज्जनता के साथ बर्दाश्त कर लेता हूँ । इसलिए मैंने फिर कविता संग्रह छपवाना छोड़कर एक लम्बी कविता ‘जीभ के दाँत’ लिखकर साहित्य के आकाश को छू! लिया। हाँ एक बात और अब आप ये न पूँछने लगना कि – जिसे मैं बर्दाश्त कर लेता हूँ – वह आलोचना कौन है ? ये गम्भीर बात है‌ – इसे फिर कभी बताऊंगा। 

    ‘आलोचना’ शब्द के द्विअर्थी बोध से सभा में उत्सुकता का वातावरण बन जाता है‌ । श्रोताओं की भावभंगिमा को किनारे करते हुए विद्वेष कुमार ने अपनी व्यथा – कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा चूंकि विषयांतर हो जाएगा, अतएव मुद्दे पर आते हैं —

    मेरे साथियो! आपको गौरवान्वित होना चाहिए कि – अपने इन साहित्यिक धतकरमों के लिए अपने खर्चे से मैं अनेकानेक स्थानों पर सम्मानित हुआ।मगर, अपने काॅलेज में – मिसरा सर से मैनें अपना सम्मान करवाने के लिए न जाने कितनी बार प्रार्थना की होगी। उनकी डेहरी पर लगातार नाक रगड़ता रहा । आए दिनों उन्हें अपने सम्मानों की फोटो, अखबारों की कतरनें और न जाने क्या कुछ ह्वाट्सएप – फेसबुक से भेजता रहा। लेकिन वे हर बार मुझे झिड़कते हुए कह देते हैं – यार, विद्वेष तुम्हारी हो जयजयकार – लेकिन कविता के नाम पर मत करो चीत्कार । 

    हालांकि मैं अच्छी तरह से ये जानता और समझता हूँ कि वे खुद मनुवादी हैं इसी कारण मेरा बहिष्कार करते रहते हैं। मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि सभी ‘मिसरा’ – मनुवादी नहीं होते हैं। इसकी नज़ीर के रुप में हमारे कुनबे के ‘लफ्फाज’ मिसरा हैं। उनके विमर्शों के हम सब कायल हैं। वे अक्सर मुझ जैसों को सम्मानित करवाते रहते हैं।

     अगर, मैं याद करना चाहूँ तो वे समानता के असल पैरोकार हैं। वह दिन भुलाए नहीं भूलता जब हम और लफ्फाज सर – ‘जीव हिंसा – संसार का सबसे बड़ा पाप’ विषय में ढिमका विश्वविद्यालय में व्याख्यान देने के बाद शहर भ्रमण में निकले थे। जहाँ शहर के चर्चित होटल में तफरी करने का हमारा मन हो गया। और फिर क्या था – हम पहुंच गए सौ परसेंट शुद्ध माँसाहारी होटल में। जहाँ वेटर को ऑर्डर दिया। और फिर जैसे ही ‘चिकन और मटन’ की प्लेटें सज के आईं। मेरा तो जी! झूम गया। हम दोनों प्लेट पर परोसे माँस को नोचने में वैसे ही लग गए जैसे कुत्ते शुरु हो जाते हैं। चिकन मटन का हमने जमकर लुत्फ उड़ाया। और उसी होटल के डिस्को बार अपार्टमेंट में ह्विस्की के जाम पर जाम छलकाने लगे। और क्या क्या बताएँ‌ । उस दिन तो डीजे की धुन पर सुन्दरियों के साथ अपनी-अपनी तोंदे मटकाते हुए ठुमके लगाने का मजा ही कुछ और था। सच बताएं तो – यह होती है असल समानता जिसे हमारे काॅलेज के मिसरा सर कहाँ समझ सकेंगे !? वे तो मनुवादी – हिन्दुत्ववादी जो ठहरे। इसलिए मित्रों – जो समानता की लगाते हैं गुहार – उन लफ्फाज सर की बनेगी अगली सरकार।

    बहरहाल, मैं फिर भी खुश हूँ। आदरपूर्वक एवं विनम्रता के साथ भारी मन से कहना चाहता हूँ – यदि काॅलेज के मिसरा सर मेरा सम्मान नहीं करवाएँगे तो – क्या मैं अपना सम्मान नहीं करवा लूँगा? हमारे कुनबे में स्वयं के खर्चे से सम्मानित करने वालों की एक लम्बी भीड़ लगी है। देश – विदेश जहाँ जाना चाहें – हर जगह सम्मान की बारिश होगी। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा – दो तीन महीने का वेतन ही तो खर्च हो जाएगा। लेकिन यदि फाॅरेन रिटर्न और राष्ट्रीय स्तर के सम्मान का टैग लग गया – तो मुझे अपना विद्वेष फैलाने में सहूलियत ही सहूलियत होगी। फिर कचरा लिखो या कचरे में लथपथ रहो। अपना टैग ही इतना बड़ा हो जाएगा कि – मैं उस पर किसी शोधार्थी का शोध करवा लूँगा‌।

    मित- रों! चूँकि आप सभी बड़े ही ढीठ ढँग से मुझे इतनी देर से बर्दाश्त कर रहे हैं – उसके लिए आभार शब्द बहुत छोटा होगा। इसलिए मुझे और बर्दाश्त करने के लिए कमर कस लीजिए और तैयार हो जाइए।  

    श्रोताओं ने ओके सर…ओके सर कहते हुए उनका उत्साह बढ़ा दिया…..

    विद्वेष कुमार अपने पूरे रौ में बहने लगे 

    मित- रों , तो आप सभी को मैं यह बताना चाहूँगा कि – मेरे घर में अब बड़ा सा! पुस्तकालय भी बन चुका है। जिसमें आधे से अधिक पुस्तकें काॅलेज व विभाग के पुस्तकालय से मेरे द्वारा चुराई गई हैं। मित -रों ! , मैं किताबें चोरी करने का पक्षधर नहीं हूँ। हाँ आप अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से चोरी करते रहिए‌। वैसे यह हमारे कुनबे के लिए कोई नई बात नहीं है।

    क्योंकि जब तक चोरी पकड़ी न जाए – तब तक चोरी नहीं कहलाती है। बाकी आप सब स्वयं समझदार हैं। फिर भी मैं अपनी सच्चाई का उद्घाटन करके यहाँ यह स्पष्ट करना चाहता हूँ कि – मैं सचमुच में ईमानदार हूँ। 

    बतलाइए – मैं ईमान- दार हूं या नहीं?

    और सामने से – ईमानदार – ईमानदार का शोर सुनाई देने लग जाता है।

    मित- रों! इतना ही नहीं मैं आगे के क्रम में बताना चाहूंगा कि। – मेरे सारे स्टूडेंट्स भी इस बात के गवाह हैं कि ‘ जादुई सीरीज ‘ के अलावा मैंने कभी भी अपने विषय की मूल किताबों से विद्यार्थियों को नहीं पढ़ाया है। और मैं इस बात के लिए गर्व भी करता हूँ । साथ ही अपना परम् सौभाग्य भी मानता हूँ कि – दस से बीस हजार रुपए की शुल्क के साथ शोधार्थियों की थीसिस लिखने में उनका सहयोग कर देता हूँ। आप सब ही बताइए – क्या मुझसे बड़ा दरियादिल कोई और होगा..? क्या पीएचडी थीसिस का इससे बढ़िया रेट और कहीं मिलेगा? 

    पूरा हाॅल तालियों से गूँज उठा – सस्वर आवाज आई – कोई नहीं – कोई नहीं….. केवल आप – केवल आप।

    मित- रों !, आज समाज में दलित चेतना पर विमर्श ही नहीं बल्कि व्यापक विमर्श किए जाने की आवश्यकता है। इन मनुवादियों को वह दिन देखना पड़ेगा जब – 

    लाज़िम है कि हम भी देखेंगे

    वो दिन कि जिसका वादा है

    सब तख्त उछाले जाएँगे 

    सब ताज गिराए जाएँगे ।

    और इतना ही नहीं – मित- रों, ‘अब दिल्ली दूर नहीं है’ जल्द ही किरान्ति की महाप्रलय आएगी। और यह सब तब आएगी जब आप सब मेरे हाथों को – मेरे बैंक बैलेंस को । मेरे कचरा साहित्य को जन आंदोलन बना देंगे। लेकिन इसके लिए हमें चाहे जो त्याग और बलिदान कर देना पड़े – इन मनुवादियों को इस देश से खदेड़ भगाना है। 

    तो बताइए – कौन कौन है मेरे साथ…? 

    हम सब – हम सब … के स्वर के साथ पूरा माहौल अजीब सी मायूसी के साथ सन्नाटे में परिवर्तित हो गया ‌‌। और विद्वेष कुमार बोलने लगे —

    आज कल ये मनुवादी लोग ‘लव जिहाद ‘ का झूठा प्रपंच करके हमारे ‘भाईचारे’ को खत्म करने पर तुले हुए हैं। ये मनुवादी – हिन्दुत्व की आड़ में अपनी सत्ता चलाना चाहते हैं ,मगर हम ये हरगिज़ नहीं होने देंगे। हम अपने भाइयों का ‘ चारा ‘ बन जाएंगे । लेकिन इन मनुवादियों – हिन्दुत्व वादियों के भ्रम में कभी नहीं फँसेंगे।

    मेरे साथ आप सभी गाइए –

    हम ‘ चारा’ बनकर कट जाएंगे

    मर जाएंगे – मिट जाएंगे

    अपना भाईचारा सदा निभाएंगे 

    और एजेण्डा खूब चलाएंगे।

    साथियो, मैं हर मंच से यही कहता हूं कि – ये हिन्दुत्ववादी लोग , दलित – मुस्लिम एकता के बीच दरार डालना चाहते हैं।इनकी सब बातें कोरी बकवास हैं। मीडिया भी झूठ कहता है। वे सारे वीडियो और चीखें- गुहारें झूठी हैं जिनमें जनजातीय क्षेत्रों में, शहरों में , कस्बों में – हिन्दू लड़कियों को प्यार से इंकार करने पर मुसलमान कभी बलात्कार करके फांसी के फंदे पर लटका देते हैं। कभी गोली से भून देते हैं। कभी पेट्रोल डालकर जला देते हैं। मैं मानता हूं कि – लव जिहाद का कोई अस्तित्व ही नहीं है। क्या इन हिन्दुत्ववादियों के कहने पर कोई प्यार करना छोड़ दे? यह सब बिल्कुल झूठी खबरें है। यह हमारे भाईचारे को तोड़ने की साजिशें हैं। और इन साजिशों से पार पाना हमारी जिम्मेदारी।

    बोलो क्या है तैयारी?

    आप सब मेरे साथ नारा लगाइए-

    जय भीम – जय मीम का नारा है। 

    भाईचारे में हम सब चारा-चारा हैं।

    जय हो – जय हो ….की आवाजों से एक बार फिर से महौल में गरमी छा! गई। विद्वेष कुमार अपने विद्वेष के कारण प्रफुल्लित थे‌ । इसी बीच उन्होंने जिक्र करते हुए कहा –

    मित – रों ! अभी कुछ दिन पहले की बात बतला रहा हूं – चाय की गुमटी में जहाँ मैं सिगरेट फूँक रहा था। वहां एक हिन्दुत्ववादी से मेरी भिड़ंत हो गई । मामला यह था कि – वह अपने फोन से वीडियो और अखबारों की कटिंग दिखलाते हुए बतला रहा था – झारखंड के पलामू में मुसलमानों ने जनजातीय समाज के लोगों को उनके घरों से खदेड़ दिया। उनके पूजा स्थल नष्ट कर दिए। कहीं जनजातीय समाज की लड़की का अपहरण करके मुसलमानों के लड़के ले गए‌ । और कुछ दिन बाद पेड़ में फन्दे से लटकती हुई वह हिन्दू लड़की मिली। 

    तो कभी फेसबुक और इंस्टाग्राम में नाम बदलकर आगे मुसलमानों के लड़कों ने – लव जिहाद में फंसाया‌ । फिर उनके अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल किया। तो कभी जबरदस्ती शादी करके धर्मांतरण के लिए बाध्य किया। इतना ही नहीं – वह हिन्दुत्ववादी एक अखबार की वह कतरन भी दिखा रहा था – जिसमें मुसलमान लड़के ने हिन्दू नाम से लड़की को प्यार के जाल में फंसाया।‌फिर धर्मांतरण के लिए बाध्य करने लगा। मांस खिलाने लगा‌ । और जब लड़की ने इंकार किया – तो कुछ दिनों बाद ही सूटकेस में उसकी लाश पड़ी मिली‌ । और इस घटनाक्रम की तफ्तीश कई महीनों की पुलिसिमा कार्रवाई के बाद हो पाई थी।

    मित – रों ! चूँकि मैं पहले एक ही सिगरेट पीने के मूड में था लेकिन जब उस हिन्दुत्ववादी को इस प्रकार का भ्रम फैलाते हुए देखा – तब मैंने तत्क्षण सिगरेट का पूरा पैकेट ले लिया। इतना ही नहीं वह हिन्दुत्वादी आगे बतलाने लगा कि – बिहार के फला जगह में मुसलमानों ने दलितों के घर फूँक दिए। ऐसा ही बंगाल में भी बतलाया। और उसने एक एक करके न जाने कितने आँकड़े – तथ्य के साथ दिए – जिसमें मुसलमानों द्वारा वनांचलों में रहने वाले जनजातीय समाज, दलित समाज, वंचित समाजों पर मुसलमानों के अत्याचार की रपटें थी।

     फिर उसने चाय वाले बाबा से कहा – बाबा, ये तुष्टिकरण और मुसलमानों के अत्याचार पूरे भारत में इसी तरह हैं। जहां भी मुस्लिम बाहुल्य में हो जाते हैं – वहां से हिन्दुओं को पलायन करना पड़ता है‌ । भारत विभाजन से लेकर काश्मीर तक समूचे भारत के नरसंहार इसके साक्षी हैं। और भारत विभाजन के समय जोगेन्द्रनाथ मण्डल का हश्र हमें नहीं भूलना चाहिए। मण्डल की सनक के कारण उसके भरोसे में पाकिस्तान व बंग्लादेश में रह गए हिन्दुओं जो अधिकांशतः दलित हैं ; उनकी दयनीय हालत किसी से छिपी नहीं है। और जो भी कुछ वर्तमान में हो रहा है वह बहुत बड़े खतरे की आहट है।

     मगर, समाज न जाने कब जागेगा? 

    बाबा ने कहा -बेटा, बात तो एकदम सही कह रहे हो। अब समाज को एकजुट होना ही पड़ेगा। मुसलमानों का तुष्टिकरण बन्द करना पड़ेगा। ‘शठे शाठ्यं समाचरेत’ की नीति अपनानी पड़ेगी। दुष्टों का संहार करना और उन्हें दण्ड देने के लिए सबको संगठित होना होगा। सरकारों के भरोसे अब नहीं रहा जा सकता । 

    बिल्कुल बाबा, आप एकदम सही कह रहे हैं। – हिन्दुत्वादी ने कहा। 

    मित- रों, इतना ही नहीं वह बाबा भी उसके फ्लो में बहते हुए कहने लगे –

    शस्त्र और शास्त्र का ज्ञान देकर सम्पूर्ण हिन्दू समाज को अपनी शक्ति का संचय करना ही पड़ेगा। और इन लव जिहादी आतंकियों का – हिन्दू समाज के विरुद्ध षड्यंत्र करने वालों को जमींदोज करना ही पड़ेगा।

    मित – रों! सच्चाई तो यह भी है कि – बाबा की ओजस्वी बातें सुनकर मुझे भी ढाई हजार वोल्टेज का झटका लगा। अपने कुनबेपंथ- कुपंथ की कसम खाकर कहता हूं कि –

    सब उसकी बातों से प्रभावित हुए जा रहे थे। 

    उसे सुनते सुनते आधे घण्टे बीत गए। फिर अचानक मेरे अन्दर का दलित विमर्शकार जाग उठा। मैंने उसे गंगा जमनी तहजीब की दुहाई देनी चालू कर दी। चूँकि उसने जो कुछ बताया था – वह सबकुछ सत्य था। लेकिन मुझे विमर्श जीतना था। इसलिए मैंने उसे कभी मनुवादी कहा – कभी संघी कहा . । कभी दलित विरोधी – मुस्लिम विरोधी कहा। 

    मैंने उससे कई बार पूँछा कि – आखिर में तुम कौन जात हो ? लेकिन वह हर बार अपने को हिन्दू कहने पर जुटा रहा। मैं मौके की ताक में था कि कैसे भी करके – वो अपनी जात बता दे और मैं उस पर लाँछन लगाते हुए विमर्श जीत जाऊँ। लेकिन उस दिन बड़ी मुसीबत आन पड़ी थी! मैं चारो खाने चित्त हो गया था। क्योंकि अपने कुपंथियों ने मुझे जो सूत्र दिया था कि – अपनी बात जीतने के लिए हिन्दुत्व वादियों से ऊलजलूल प्रश्न पूँछने लगो। और फिर उन पर लाँछन लगाओ। विवादित बातें कहकर उन्हें गुस्सा दिलाओ। ; यह सब बातें फेल हो चुकीं थी।

    मितरों! जब कभी ऐसी स्थिति आ जाए तब विमर्श जीतने के लिए – मैं जो तरकीबें आजमाता हूँ – वह यह है कि – मैंने उसके सारे वीडियो, अखबारों की कटिंग सबको फेक बतला दिया। और अन्तिम प्रहार करते हुए कहा – ये सब तुम मनुवादियों की चालें हैं जिसे हिन्दुत्व का चोला ओढ़कर अंजाम देते हो। तुम्हारे अखबार हैं – तुम्हारे चैनल हैं ; इसीलिए कुछ भी दिखाकर दलित मुस्लिम एकता को तोड़ने का षड्यंत्र रचते रहते हो। लेकिन मेरे रहते यह संभव नहीं हो पाएगा। और मैं वहाँ से भाग निकला। 

    तो हो जाओ तैयार साथियों.. हम सबको अपने विमर्श को ऐसे ही आगे बढ़ाना है और भाईचारे का चारा बनने के लिए तैयार रहना है। 

    कौन कौन है मेरे समर्थन में …?

    हम सब ….हम सब ( पूरा हाॅल फिर से गूँज उठा)

    मित- रों! आप ही बताइए ये हिन्दुत्वादी-मनुवादी दलितों को हिन्दू कहते हैं। लेकिन क्या वे हिन्दू हैं!? 

    नहीं नहीं नहीं…..

    लेकिन वहीं एक युवा श्रोताओं के बीच से तमतमाते हुए खड़ा हो गया। उसने एक माईक लिया और पूँछा – अच्छा आप ये बताइए जोगेंद्र नाथ मण्डल कौन थे ? 

    दलितों के महानायक थे‌ । उन्हीं की वजह से पाकिस्तान बना था। 

    विद्वेष जी – आगे बतलाइए फिर क्या हुआ था..? 

    ऐ! छोरे। ज्यादा दिमाग न चलाओ। जो हुआ सो हुआ। गड़े मुर्दे मत उखाड़ो। लगता है तुम भी मनुवादियों से प्रभावित हो। 

    इधर उधर बातें न बनाइए – जवाब दीजिए जवाब। कहते हुए वह युवक आक्रोशित हो गया। 

    देखो! छोरे पाकिस्तान पे मत जाओ। यहीं की बात करो। 

    अच्छा! तो आप बताइए पाकिस्तान – बंग्लादेश में जो हिन्दू लाचारी का जीवन जी रहे हैं। आए दिनों वहाँ मुसलमानों के अत्याचार झेल रहे हैं। दिल्ली से लेकर हर शहर में शरणार्थियों का दयनीय जीवन जी ! रहे हैं – वे किस समाज से हैं? 

    दलित समाज से! 

    बस , यही पूँछना था। विद्वेष जी आपने कभी उनकी पीड़ा समझी है!? उनके दर्द से रूबरू हुए हैं! ? उनसे पूँछिएगा कि वे हिन्दू हैं या नहीं?

    जरा, बतलाइए। तो आप उन हिन्दुओं के लिए कब खड़े हुए? जब सरकार ने उनके लिए ‘सीएए’ का कानून लाया। तब आप दिल्ली के शाहीन बाग में मीमटों की नौटंकियों में क्यों शामिल थे? 

    ये, छोरे। ये हमारे कुपंथ की गाईडलान में नहीं था। हमें जिसके लिए फंण्डिग हुई-हमने वो फर्ज निभाया ‌।

    वाह्..वाह् जी। मतलब एक ओर दलित बान्धवों का विरोध करके उनके लिए खाई बना रहे। और दूसरी ओर फंण्डिग की मलाई खाकर! – ‘भीम मीम’ का षड्यंत्र रचने में जुटे रहे‌

    इस छोरे को बाहर करो … ये मनुवादी है।मित- रों, इस षड्यन्त्रकारी जासूस को हिन्दुत्वादियों ने – हमारे विमर्श को बर्बाद करने के लिए भेजा है।

    विद्वेष कुमार के इतना कहते ही- भीड़ इकठ्ठा होने लगती है। और उस युवक से धक्का मुक्की करने लगती है….

    वह युवक कहता है – मैं खुद चला जा रहा हूँ। लेकिन यदि वे दलित हिन्दू हैं – तो हम सब दलित हिन्दू हैं। हम भले दर्द में हैं। दु:ख में है। लेकिन एक दिन सब दूर होगा। सारा समाज हमारी व्यथा समझेगा। हमें गले लगाएगा। और हम सब चाहे जहाँ रहें – हम सब हिन्दू हैं‌। समूचा हिन्दू समाज – पूज्य ऋषियों की संतानें हैं। इसका प्रमाण हमारे गोत्र हैं। हम सब आगे बढ़ेंगे। एकजुट होंगे। इतना ही नहीं जिएँगे हिन्दू – मरेंगे हिन्दू।

    देखो ….देखो ये मनुवादी का रंग…कहते हुए विद्वेष कुमार चीख पड़े‌।

    हाँ हाँ देखो ये रंग। जिस प्रकार से ब्राह्मण हिन्दू हैं। क्षत्रिय हिन्दू हैं। उसी प्रकार सारे समाज अपने समाज की अलग अलग पहचान के साथ हिन्दू हैं। हिन्दू धर्म जितना ब्राह्मण का है -क्षत्रिय का है- वैश्य का है‌। उतना ही सनातन से प्रवाहित शाश्वत हिन्दू धर्म हम सबका है।; यह कहते हुए वह युवक सभागृह से बाहर चला गया ‌ ।

    इस हाई वोल्टेज माहौल के चलते कुछ समय तनातनी का दृश्य बन चुका था। मगर तभी बगल में बैठी हुई प्रख्यात एक्टिविस्ट – ‘कुण्ठा दीवानी’ ने विद्वेष कुमार को इशारा करते हुए कहा – विद्वेष जी ‘वो’

    वाला प्रसंग बतलाइए न ! ?

    अच्छा.. ‘ वो ‘ वाला !

    लेकिन ‘वो’ माहौल के हिसाब से ठीक नहीं है। 

    तो, क्या हुआ ‘वो’ प्रसंग आपकी ईमानदारी की चमक को और बढ़ा देगा।

    मित- रों!, कुण्ठा दीवानी जी के विशेष अनुरोध पर मैं अपने जीवन का एक प्रसंग साझा कर रहा हूँ – हुआ यूँ कि मैं कई महीनों से दलित विमर्श पर आधारित अपना उपन्यास लिखने में जुटा हुआ था। चूँकि जहाँ मेरा घर बना है वहाँ मुसहर, मवासी सहित न जाने कितने जंगली लोग रहते हैं। सबके सब दरिद्र। न किसी को रहने का तरीका – न बात करने का तरीका‌ ‌‌। न कोई साफ- सफाई ‌। आए दिनों मेरे घर के सामने भीख माँगने आ जाते हैं।

    अपनी इस समस्या के निराकरण के लिए मैंने स्थानीय अतिक्रमण अधिकारी को पचास हजार रुपए भी दिए थे‌। ताकि वे कैसे भी इन जंगलियों को यहाँ से निकाल फेंके। पता नहीं ये सब कब तक हो पाएगा..? इन सबसे तंग आ चुका हूं। मेरा वश चले तो इन जंगलियों को रातों- रात खदेड़ दूँ।

    लेकिन मुख्य बात यह है कि – उस दिन अति ही हो गई थी – रामकली मवासी अपने आठ वर्ष के लड़के को लेकर मेरे दरवाजे पर चीख पुकार मचाने लगी‌। मेरा ध्यान भंग हो गया। उपन्यास की कहानी का प्लाॅट ही मिस हो गया। मैंने अपनी पत्नी को पहले रामकली को भगाने के लिए कहा। मगर, वह कुछ पैसे उपचार के लिए उधार माँगने पर लगी रही‌ आई । एक तो मेरी कहानी का प्लाॅट मिस हो गया था। दूसरा उन जंगलियों का कर्कश शोर बर्दाश्त से बाहर होने लगा। 

    मैं, झटपट अपने कमरे से आया। और चार झन्नाटेदार तमाचे उसके दूसरे लड़के को जड़ते हुए – धक्का देते हुए दरवाजे से बाहर की ओर धकेल दिया। आप सब ही बताइए – ठीक किया न..? उन जंगलियों ने पूरे विमर्श का सत्यानाश कर दिया था। ऐसे जंगली लोग ही विमर्श में बाधा बनते हैं।‌

    कुण्ठा दीवानी के इशारे पर तालियाँ बाज उठीं. ‌‌……..!

    लेकिन मूल बात जो थी वो आप सबके लिए – विमर्श के लिए बहुत मायने रखती है। वह बात यह है कि – फिर हमने अपने उपन्यास में – उस लड़के की पिटाई वाले दृश्य को – अपने चरित्र चित्रण को ‘ठाकुर साहब’ के अमलीजामा में पहनाकर ; महादलितों पर ठाकुरों के अत्याचार के रूप में चित्रित कर दिया। जो कि उपन्यास के प्रकाशित होने के बाद हमारे समूचे कुनबे के साहित्य जगत में व्यापक चर्चा का विषय बन गया। सबने हमारे उपन्यास के प्लाॅट को आधार बनाकर लेख लिखे। गोष्ठियां की – समीक्षाएं की। और इतना ही नहीं जल्द ही एक पुरस्कार का इंतजाम होने वाला है‌। 

    मित-रों, अपने कुपंथ के ‘ईको सिस्टम ‘ को बनाए रखना है।देश – विदेश से आने वाली फण्डिग से बैंक बैलेंस बढ़ाना है। भाईचारा निभाना है ‌ । और ऐजेण्डे को चलाना है‌ । 

    है न सही मित- रों!?

    बिल्कुल बिल्कुल… के स्वर से हाॅल गूंजने लगा

    तो आप सब ‘ विमर्श के गुर ‘ सीख गए न..! आज इस व्याख्यान को यहीं विराम। फिर आगे होगा भीषण संग्राम।

    हाँ ..हाँ ..हाँ – हमारे सरकार – विद्वेष कुमार 

    ; के सामूहिक नारों के साथ व्याख्यान अपने समाहार की ओर चल पड़ा…..! 

    ~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

    कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
    कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
    कवि,लेखक,स्तम्भकार सतना,म.प्र. सम्पर्क - 9617585228

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