खेल जगत मनोरंजन

जर्सी का रंग नहीं, खेल की गरिमा बचाने की जरूरत

कुमार कृष्णन

भारतीय हॉकी टीम की नई यूनिफॉर्म में केसरिया रंग के प्रयोग को लेकर शुरू हुई बहस अब केवल खेल तक सीमित नहीं रही। यह विवाद राजनीति, इतिहास, सांस्कृतिक प्रतीकों और राष्ट्रीय पहचान के प्रश्नों तक पहुँच गया है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा के बयान के बाद यह मुद्दा संसद से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा का विषय बन गया। सत्ता पक्ष इसे भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बता रहा है, जबकि विपक्ष इसे प्रतीकों की राजनीति से जोड़कर देख रहा है। ऐसे में मूल प्रश्न यह नहीं है कि जर्सी का रंग क्या है, बल्कि यह है कि क्या खेल भी अब वैचारिक संघर्ष का नया मैदान बनते जा रहे हैं।

लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है। सरकार के निर्णयों पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है और उन प्रश्नों का उत्तर देना सरकार की जिम्मेदारी लेकिन जब किसी राष्ट्रीय टीम की जर्सी का रंग खिलाड़ियों के प्रदर्शन से बड़ा विषय बन जाए, तब यह चिंता का विषय बन जाता है। खेलों की आत्मा प्रतिस्पर्धा, अनुशासन और उत्कृष्टता में निहित होती है। यदि राष्ट्रीय विमर्श खिलाड़ियों की उपलब्धियों के बजाय उनकी पोशाक पर केंद्रित हो जाए, तो यह खेल संस्कृति के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।

भारत में रंग केवल रंग नहीं हैं; वे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अर्थों से जुड़े प्रतीक भी हैं। केसरिया त्याग, तप, साहस, ज्ञान और बलिदान का प्रतीक माना जाता है। भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में भी इसे सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। इसलिए खेल पोशाक में केसरिया रंग का प्रयोग अपने-आप में असामान्य नहीं कहा जा सकता। वहीं लोकतांत्रिक समाज में किसी भी सार्वजनिक निर्णय पर प्रश्न उठाना भी समान रूप से वैध अधिकार है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब सांस्कृतिक प्रतीकों की व्याख्या राजनीतिक ध्रुवीकरण का माध्यम बनने लगती है।

प्रियंका गांधी का यह कहना कि “रंग बदलने से सोच नहीं बदलती”, केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं बल्कि एक व्यापक संदेश भी है। उनका संकेत इस ओर है कि किसी भी राष्ट्र का निर्माण केवल प्रतीकों से नहीं होता। शिक्षा, रोजगार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, खेल अवसंरचना, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती ही किसी देश की वास्तविक शक्ति होती है। यदि युवा अवसर, रोजगार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की मांग कर रहे हैं, तो उनके प्रश्नों का समाधान केवल प्रतीकात्मक बदलावों से नहीं, बल्कि ठोस नीतिगत निर्णयों से होगा।

दूसरी ओर, सत्ता पक्ष का तर्क भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उसके अनुसार केसरिया किसी राजनीतिक दल की पहचान नहीं बल्कि भारतीय सभ्यता की दीर्घकालिक सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है। संन्यास, त्याग, राष्ट्रसेवा और बलिदान की भावना सदियों से इस रंग से जुड़ी रही है। इसलिए यदि राष्ट्रीय टीम की जर्सी में इस रंग का प्रयोग किया गया है, तो उसे केवल राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यही वह बिंदु है जहाँ यह विवाद केवल खेल का न रहकर सांस्कृतिक विमर्श का विषय बन जाता है।

दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब किसी राष्ट्रीय प्रतीक, रंग या सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को लेकर राजनीतिक बहस छिड़ी हो। पिछले कुछ वर्षों में इतिहास, पाठ्यपुस्तकों, स्मारकों, स्थानों के नाम, राष्ट्रीय प्रतीकों और सांस्कृतिक विरासत को लेकर लगातार वैचारिक टकराव सामने आए हैं। इससे स्पष्ट है कि भारत में पहचान की राजनीति अब सार्वजनिक जीवन का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। हॉकी की जर्सी पर उठा विवाद उसी व्यापक परिघटना की एक कड़ी है।

लेकिन इस पूरे विवाद के बीच सबसे अधिक उपेक्षित पक्ष खिलाड़ी हैं। भारतीय हॉकी इस समय पुनर्जागरण के दौर से गुजर रही है। वर्षों के संघर्ष के बाद भारतीय पुरुष और महिला दोनों टीमें विश्व स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना रही हैं। खिलाड़ियों की कठिन साधना, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और निरंतर प्रदर्शन के कारण भारत फिर विश्व हॉकी की प्रमुख शक्तियों में गिना जाने लगा है। ऐसे समय में यदि राष्ट्रीय चर्चा खिलाड़ियों के खेल से अधिक उनकी जर्सी पर केंद्रित हो जाए, तो यह खेल के साथ न्याय नहीं होगा।

खेलों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे समाज में मौजूद विभाजनों को पाटने का काम करते हैं। भाषा, धर्म, जाति, क्षेत्र और विचारधारा की सीमाएँ मैदान पर धुंधली पड़ जाती हैं। खिलाड़ी केवल अपने देश के लिए खेलता है और दर्शक केवल उसकी सफलता में अपना गौरव खोजते हैं। यही कारण है कि खेलों को अक्सर राष्ट्रों के बीच संवाद और शांति का माध्यम माना गया है लेकिन पिछले कुछ दशकों में खेल भी राजनीति, बाजार और वैचारिक संघर्षों से पूरी तरह अछूते नहीं रहे हैं।

विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि कई बार खेलों का उपयोग राजनीतिक संदेश देने के लिए किया गया। 1936 के बर्लिन ओलंपिक में नाजी जर्मनी ने खेलों को अपनी विचारधारा के प्रचार का मंच बनाया, किंतु अश्वेत अमेरिकी धावक जेसी ओवेन्स ने चार स्वर्ण पदक जीतकर नस्लीय श्रेष्ठता के उस दावे को चुनौती दे दी। 1968 के मैक्सिको ओलंपिक में टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस ने नस्लीय भेदभाव के विरोध में पदक मंच पर मुट्ठियाँ उठाकर पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया। दक्षिण अफ्रीका को रंगभेद की नीति के कारण वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय खेलों से बाहर रखा गया। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि खेल सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों से पूरी तरह अलग नहीं रह सकते, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब राजनीति खेलों पर हावी हो जाती है, तो सबसे अधिक नुकसान खिलाड़ियों और खेल भावना का होता है।

भारत का खेल इतिहास भी बताता है कि खेल हमेशा राष्ट्रीय आत्मविश्वास के वाहक रहे हैं। 1948 के लंदन ओलंपिक में स्वतंत्र भारत द्वारा हॉकी का स्वर्ण पदक जीतना केवल एक खेल उपलब्धि नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक दासता से मुक्त राष्ट्र के आत्मसम्मान की उद्घोषणा थी। मेजर ध्यानचंद की विरासत ने भारतीय हॉकी को विश्व में ऐसी प्रतिष्ठा दिलाई, जो आज भी प्रेरणा का स्रोत है। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीमों ने जिस तरह अपनी खोई हुई पहचान को पुनः स्थापित किया है, उसने देश में इस खेल के प्रति नई उम्मीदें जगाई हैं।

यही कारण है कि आज जब भारतीय हॉकी पुनरुत्थान के दौर में है, तब राष्ट्रीय बहस खिलाड़ियों की रणनीति, फिटनेस, प्रशिक्षण और उपलब्धियों पर केंद्रित होनी चाहिए। यदि पूरा विमर्श उनकी जर्सी के रंग तक सिमट जाए, तो यह खेल की मूल भावना के साथ न्याय नहीं होगा। खिलाड़ियों का मूल्यांकन उनके प्रदर्शन से होना चाहिए, न कि उनकी पोशाक के रंग से।

लोकतंत्र में प्रतीकों का महत्व होता है, लेकिन प्रतीक नीति का विकल्प नहीं हो सकते। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक संस्थानों, खेल अकादमियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं से निर्मित होती है। यदि खेलों को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना है, तो उत्कृष्ट प्रशिक्षण, आधुनिक खेल विज्ञान, ग्रामीण प्रतिभाओं की पहचान, महिला खिलाड़ियों को समान अवसर और पारदर्शी खेल प्रशासन पर अधिक ध्यान देना होगा। केवल प्रतीकों के आधार पर खेल संस्कृति मजबूत नहीं होती।

इस पूरे विवाद ने खेल प्रशासन की भूमिका पर भी प्रश्न खड़े किए हैं। राष्ट्रीय टीम की यूनिफॉर्म में किसी महत्वपूर्ण परिवर्तन के पीछे यदि स्पष्ट आधिकारिक जानकारी और पारदर्शी संवाद हो, तो अनेक अनावश्यक विवादों से बचा जा सकता है। लोकतंत्र में सूचना का अभाव अक्सर अटकलों और राजनीतिक व्याख्याओं को जन्म देता है। इसलिए खेल संस्थाओं की जवाबदेही केवल प्रतियोगिताओं के आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक विश्वास बनाए रखना भी उनकी जिम्मेदारी है।

मीडिया के सामने भी एक बड़ी चुनौती है। लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व केवल राजनीतिक बयान प्रसारित करना नहीं, बल्कि समाज को तथ्यों और संदर्भों से अवगत कराना भी है। यदि समाचार माध्यम केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाएँ, तो वास्तविक प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। उन्हें यह भी बताना चाहिए कि भारतीय हॉकी किन चुनौतियों से जूझ रही है, खिलाड़ियों की तैयारी कैसी है और खेल ढाँचे में किन सुधारों की आवश्यकता है। स्वस्थ लोकतंत्र में मीडिया बहस को दिशा देता है, उसे केवल उत्तेजना का माध्यम नहीं बनाता।भारतीय संविधान की सबसे बड़ी विशेषता उसकी बहुलता और समावेशिता है। भारत की राष्ट्रीय पहचान किसी एक विचार, एक संस्कृति या एक रंग से नहीं बनती, बल्कि अनेक परंपराओं, भाषाओं, आस्थाओं और जीवन मूल्यों के समन्वय से निर्मित होती है। यही कारण है कि तिरंगे का प्रत्येक रंग अपने भीतर एक विशिष्ट अर्थ समेटे हुए है। केसरिया त्याग और साहस का, श्वेत सत्य और शांति का तथा हरा समृद्धि और विकास का प्रतीक है। इन तीनों में से किसी एक को दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। भारत की शक्ति इन्हीं तीनों के संतुलन में निहित है।

इसीलिए राष्ट्रीय प्रतीकों पर होने वाली बहस को भी व्यापक दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। यदि किसी निर्णय को लेकर समाज में प्रश्न उठते हैं, तो लोकतंत्र का तकाजा है कि उनका उत्तर संवाद और पारदर्शिता से दिया जाए। वहीं यह भी उतना ही आवश्यक है कि प्रत्येक सांस्कृतिक प्रतीक को तत्काल राजनीतिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति से बचा जाए। लोकतांत्रिक परिपक्वता का अर्थ यही है कि असहमति और सम्मान दोनों साथ-साथ चलें।हॉकी की जर्सी का विवाद हमें एक और महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर ले जाता है। क्या हम खेलों को उनकी वास्तविक प्राथमिकता दे रहे हैं? भारत आज ओलंपिक महाशक्ति बनने का सपना देख रहा है। इसके लिए आधुनिक खेल अवसंरचना, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, पोषण, खेल चिकित्सा, प्रतिभा खोज और ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधाओं का विस्तार कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यदि राष्ट्रीय बहस इन प्रश्नों से हटकर केवल प्रतीकों तक सीमित रह जाएगी, तो खेलों के विकास का मूल उद्देश्य प्रभावित होगा।भारतीय हॉकी ने पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय वापसी की है। पुरुष टीम ने ओलंपिक पदक जीतकर लंबे इंतजार को समाप्त किया जबकि महिला टीम ने भी विश्व स्तर पर अपनी क्षमता का प्रभावशाली प्रदर्शन किया। इन उपलब्धियों ने सिद्ध किया कि सही नीति, दीर्घकालिक निवेश और खिलाड़ियों के अथक परिश्रम से भारत फिर विश्व खेलों में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर सकता है।

अब आवश्यकता इस बात की है कि यह गति बनी रहे और खेलों को अनावश्यक विवादों से दूर रखा जाए।इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक दलों की भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार से प्रश्न पूछना है और सरकार का दायित्व उन प्रश्नों का उत्तर देना। लेकिन जब राष्ट्रीय खेल और खिलाड़ी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के केंद्र में आ जाते हैं, तब सबसे अधिक नुकसान राष्ट्रीय हित का होता है। खेलों को वैचारिक श्रेष्ठता सिद्ध करने का मंच बनाने के बजाय राष्ट्रीय उपलब्धि के रूप में देखने की आवश्यकता है।खेल प्रशासन को भी यह समझना होगा कि पारदर्शिता केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास का आधार है। राष्ट्रीय टीम की जर्सी, प्रतीकों या किसी भी बड़े निर्णय को लेकर यदि समय पर स्पष्ट जानकारी दी जाए, तो अनावश्यक विवादों की संभावना कम हो जाती है। इसी प्रकार मीडिया का दायित्व भी केवल राजनीतिक बयानबाजी को प्रमुखता देना नहीं, बल्कि समाज को तथ्य, संदर्भ और संतुलित विश्लेषण उपलब्ध कराना है। लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व बहस को परिपक्व बनाना है, उसे केवल सनसनी में बदल देना नहीं।

अंततः यह विवाद हमें एक मूलभूत सत्य की याद दिलाता है कि किसी खिलाड़ी की सबसे बड़ी पहचान उसकी जर्सी का रंग नहीं, बल्कि उसके सीने पर अंकित तिरंगा होता है। वह किसी दल या विचारधारा का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है। जब वह मैदान में उतरता है, तो उसकी सफलता पूरे देश की सफलता बन जाती है और उसकी हार भी पूरे राष्ट्र की पीड़ा।इसलिए आवश्यक है कि खेलों को राजनीति से पूरी तरह अलग रखने की अव्यावहारिक अपेक्षा करने के बजाय उन्हें राजनीतिक ध्रुवीकरण का स्थायी माध्यम बनने से बचाया जाए। लोकतंत्र में बहस होती रहे, इतिहास की व्याख्याएँ भी हों और सांस्कृतिक प्रतीकों पर विमर्श भी चले, लेकिन इन सबके बीच खिलाड़ियों का सम्मान, खेल की निष्पक्षता और राष्ट्रीय एकता सर्वोच्च प्राथमिकता बने रहनी चाहिए।भारतीय हॉकी की जर्सी का रंग चाहे जो हो, उसकी असली पहचान तिरंगा ही रहेगा। भारत की शक्ति किसी एक रंग में नहीं, बल्कि तिरंगे के तीनों रंगों, संविधान की लोकतांत्रिक चेतना और विविधता में निहित एकता में है। यदि यह विवाद हमें उस संतुलन का महत्व समझा सके, जहाँ खेल राजनीति से ऊपर और राष्ट्रहित सर्वोपरि हो, तो यही इसकी सबसे बड़ी सार्थकता होगी। खेल अंततः जीत और हार से आगे बढ़कर विश्वास, अनुशासन, सम्मान और राष्ट्रीय अस्मिता का उत्सव हैं; उन्हें उसी गरिमा के साथ देखा और संरक्षित किया जाना चाहिए।

कुमार कृष्णन