डॉ. शैलेश शुक्ला
बीसवीं सदी ने दुनिया को यह विश्वास दिलाया कि निजी कार आधुनिकता, समृद्धि और स्वतंत्रता का सबसे बड़ा प्रतीक है लेकिन इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक एक बिल्कुल अलग प्रश्न पूछ रहा है—क्या हर व्यक्ति को वास्तव में अपनी कार की आवश्यकता है, या हम केवल एक ऐसी उपभोक्तावादी संस्कृति के शिकार हो चुके हैं जिसने स्वामित्व को सुविधा से अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है? जिस समय पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, ऊर्जा संकट और भीड़भाड़ वाले शहरों से जूझ रही है, उस समय यह प्रश्न केवल व्यक्तिगत सुविधा का नहीं, बल्कि सार्वजनिक नीति, पर्यावरणीय न्याय और भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी का भी है। संभवतः अब समय आ गया है कि समाज “कार का मालिक बनने” की मानसिकता से आगे बढ़कर “परिवहन सेवा का उपयोग करने” की संस्कृति को अपनाए। टैक्सी, किराये की गाड़ियाँ और साझा परिवहन केवल विकल्प नहीं हैं, बल्कि टिकाऊ भविष्य की आवश्यकता बन चुके हैं।
निजी कार खरीदने का निर्णय अक्सर भावनाओं के आधार पर लिया जाता है, जबकि उसका प्रभाव पूरी तरह आर्थिक होता है। कार शोरूम से बाहर निकलते ही अपने मूल्य का एक हिस्सा खो देती है और उसके बाद हर वर्ष उसका अवमूल्यन होता रहता है। इसके साथ बीमा, रोड टैक्स, नियमित सर्विसिंग, इंजन ऑयल, टायर, बैटरी, ब्रेक, मरम्मत, सफाई, पार्किंग शुल्क और ईंधन जैसे अनगिनत खर्च जुड़ जाते हैं। यदि कार किसी दुर्घटना का शिकार हो जाए तो अलग आर्थिक बोझ पड़ता है। अधिकांश लोग यह गणना ही नहीं करते कि जिस वाहन का वे प्रतिदिन एक-दो घंटे उपयोग करते हैं, वह वर्ष के लगभग बाईस घंटे प्रतिदिन निष्क्रिय खड़ा रहता है, लेकिन उसकी लागत लगातार चलती रहती है। यदि यही धन शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यवसाय या निवेश में लगाया जाए तो वह आय उत्पन्न कर सकता है, जबकि कार समय के साथ केवल खर्च और मूल्यह्रास देती है।
कार केवल धन ही नहीं लेती, वह मानसिक शांति भी छीन लेती है। जैसे ही कोई व्यक्ति वाहन का स्वामी बनता है, उसके जीवन में नई चिंताओं का प्रवेश हो जाता है। वाहन कहाँ खड़ा होगा? कहीं चोरी न हो जाए। कहीं खरोंच न आ जाए। बारिश या ओलावृष्टि से नुकसान न हो जाए। बीमा कब समाप्त हो रहा है? अगली सर्विस कब करानी है? प्रदूषण प्रमाणपत्र बनवाना है। टायर बदलने हैं। बैटरी कमजोर हो गई है। इन छोटी-छोटी जिम्मेदारियों का संचय व्यक्ति के समय और मानसिक ऊर्जा पर लगातार दबाव बनाता रहता है। आधुनिक जीवन पहले से ही तनावों से भरा हुआ है; ऐसे में क्या एक अतिरिक्त जिम्मेदारी केवल इसलिए लेना उचित है कि समाज कार को प्रतिष्ठा का प्रतीक मानता है?
यदि व्यक्ति स्वयं गाड़ी चलाता है तो समस्या और गंभीर हो जाती है। ड्राइविंग केवल स्टीयरिंग पकड़ना नहीं है; यह निरंतर मानसिक सजगता की मांग करती है। भीड़भाड़ वाले शहरों में वाहन चलाते समय चालक का ध्यान हर क्षण सड़क, ट्रैफिक सिग्नल, पैदल यात्रियों, मोटरसाइकिलों, अचानक आने वाले वाहनों और दुर्घटनाओं की संभावनाओं पर केंद्रित रहता है। यात्रा का समय विश्राम या उत्पादकता का समय नहीं रह जाता। यदि वही व्यक्ति टैक्सी में बैठा हो तो वह पुस्तक पढ़ सकता है, कार्यालय का कार्य पूरा कर सकता है, ऑनलाइन बैठक में भाग ले सकता है, समाचार पढ़ सकता है, संगीत सुन सकता है या कुछ देर आँखें बंद कर विश्राम कर सकता है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में समय सबसे मूल्यवान संसाधन है। यदि यात्रा के दो घंटे भी उपयोगी बन जाएँ तो वर्ष भर में सैकड़ों घंटे बचाए जा सकते हैं।
यदि व्यक्ति स्वयं वाहन नहीं चलाता तो उसे चालक रखना पड़ता है, और तब समस्याओं का एक नया संसार सामने आ जाता है। चालक का वेतन, छुट्टियाँ, समय की पाबंदी, विश्वसनीयता, व्यवहार, प्रशिक्षण, दुर्घटना की स्थिति में कानूनी दायित्व—ये सभी अलग चुनौतियाँ हैं। अनेक परिवारों का दैनिक कार्यक्रम केवल इसलिए बाधित हो जाता है क्योंकि चालक समय पर नहीं आया। इसके विपरीत टैक्सी सेवा में वाहन और चालक दोनों सेवा प्रदाता की जिम्मेदारी होते हैं। उपभोक्ता केवल यात्रा के लिए भुगतान करता है, न कि पूरी व्यवस्था का भार उठाता है।
भारत सहित दुनिया के अधिकांश महानगर आज पार्किंग संकट से जूझ रहे हैं। सड़कें चलने के लिए बनी थीं, लेकिन वे धीरे-धीरे स्थायी पार्किंग स्थलों में बदलती जा रही हैं। फुटपाथों पर वाहन खड़े हैं, सार्वजनिक स्थान सिकुड़ रहे हैं और हर नया भवन पार्किंग की समस्या से ग्रस्त है। निजी वाहन जितने बढ़ेंगे, शहर उतने ही रहने योग्य कम होते जाएंगे। टैक्सी और साझा परिवहन इस संकट का स्वाभाविक समाधान प्रस्तुत करते हैं। एक टैक्सी दिन भर अनेक यात्रियों की सेवा करती है, जबकि निजी कार अधिकांश समय केवल स्थान घेरती रहती है।
पर्यावरण के संदर्भ में निजी कारों का प्रश्न और भी गंभीर है। अक्सर चर्चा केवल वाहन से निकलने वाले धुएँ तक सीमित रहती है, जबकि वास्तविक पर्यावरणीय लागत उससे कहीं अधिक है। प्रत्येक नई कार के निर्माण में इस्पात, एल्यूमिनियम, प्लास्टिक, रबर, काँच, दुर्लभ खनिज और भारी मात्रा में ऊर्जा का उपयोग होता है। इसके निर्माण से लेकर परिवहन और अंततः कबाड़ बनने तक कार का पूरा जीवनचक्र पृथ्वी पर कार्बन उत्सर्जन का बोझ डालता है। यदि एक ही वाहन अनेक लोगों की आवश्यकता पूरी कर सकता है, तो अनावश्यक रूप से लाखों अतिरिक्त वाहन बनाना संसाधनों की बर्बादी है। साझा उपयोग की अवधारणा—चाहे वह टैक्सी हो, कार-शेयरिंग हो या किराये की गाड़ी—प्राकृतिक संसाधनों के अधिक विवेकपूर्ण उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
यह तर्क नहीं दिया जा रहा कि निजी कार का कोई स्थान नहीं है। दूरदराज़ के क्षेत्रों में, सार्वजनिक परिवहन की कमी वाले इलाकों में, विशेष आवश्यकताओं वाले परिवारों या ऐसे पेशों में जहाँ वाहन निरंतर आवश्यक हो, निजी कार उपयोगी और कई बार अपरिहार्य भी है। किंतु प्रश्न उन करोड़ों लोगों का है जो सप्ताह में केवल कुछ बार कार का उपयोग करते हैं, फिर भी पूरे वर्ष उसके स्वामित्व की भारी कीमत चुकाते हैं। यदि आवश्यकता के अनुसार टैक्सी उपलब्ध है, तो केवल स्वामित्व के लिए वाहन खरीदना आर्थिक और पर्यावरणीय दृष्टि से कितना तर्कसंगत है, इस पर पुनर्विचार होना चाहिए।
डिजिटल प्रौद्योगिकी ने इस परिवर्तन को पहले से कहीं अधिक सरल बना दिया है। मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से कुछ ही मिनटों में उपयुक्त वाहन उपलब्ध हो जाता है। छोटी दूरी के लिए छोटी गाड़ी, परिवार के साथ यात्रा के लिए बड़ी गाड़ी, लंबी यात्रा के लिए अलग वाहन—उपयोगकर्ता आवश्यकता के अनुसार विकल्प चुन सकता है। उपयोग समाप्त होते ही जिम्मेदारी भी समाप्त हो जाती है। यही आधुनिक अर्थव्यवस्था का सिद्धांत है—स्वामित्व नहीं, सेवा का उपयोग। जैसे हम बिजली उत्पादन के लिए अपना पावर प्लांट नहीं बनाते, होटल में ठहरने के लिए भवन नहीं खरीदते, या उड़ान भरने के लिए विमान नहीं खरीदते, उसी प्रकार परिवहन को भी व्यक्तिगत संपत्ति के बजाय सार्वजनिक सेवा के रूप में देखने की आवश्यकता है।
यदि सरकारें वास्तव में प्रदूषण कम करना, तेल आयात घटाना, सड़क दुर्घटनाएँ कम करना और शहरों को अधिक रहने योग्य बनाना चाहती हैं, तो उन्हें ऐसी नीतियाँ अपनानी होंगी जो साझा परिवहन, टैक्सी सेवाओं, विद्युत वाहनों और सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित करें। समाज को भी यह समझना होगा कि प्रतिष्ठा का मापदंड गैरेज में खड़ी कारों की संख्या नहीं, बल्कि संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की क्षमता है। आने वाले वर्षों में सफल समाज वे नहीं होंगे जहाँ हर व्यक्ति के पास अपनी कार होगी, बल्कि वे होंगे जहाँ हर व्यक्ति को आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षित, सुलभ, सस्ती और पर्यावरण-अनुकूल परिवहन सेवा उपलब्ध होगी।
संभव है कि भविष्य का इतिहासकार इक्कीसवीं सदी के आरंभिक दशकों को उस समय के रूप में याद करे जब मानव समाज ने पहली बार यह समझना शुरू किया कि स्वामित्व से अधिक महत्वपूर्ण उपयोग है, संग्रह से अधिक महत्वपूर्ण साझेदारी है और व्यक्तिगत सुविधा से अधिक महत्वपूर्ण पृथ्वी का भविष्य है। यदि हम सचमुच स्वच्छ हवा, कम भीड़, शांत शहर और टिकाऊ विकास चाहते हैं, तो हमें अपनी प्राथमिकताएँ बदलनी होंगी। शायद अब सबसे बुद्धिमानी भरा निर्णय नई कार खरीदना नहीं, बल्कि जब आवश्यकता हो तभी एक वाहन बुलाना है। यही व्यक्तिगत विवेक, आर्थिक समझदारी और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व का संगम है।
डॉ. शैलेश शुक्ला