चरितार्थ हुआ मोदी है तो संभव है

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के पहले कार्यकाल में जो कुछ भी हुआ उसका परिणाम यह था कि उन पर देश की जनता ने अपार भरोसा कर दूसरी बार सत्‍ता सौंपी । उस अखण्‍ड जय की कल्‍पना तो स्‍वयं नरेन्‍द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी से लेकर भाजपा के दिग्‍गज नेताओं ने भी नहीं की थी जोकि उनकी एवं उनकी पार्टी की झोली में देश की जनता ने सहसा ही डाल दी थी। किंतु इसके बाद भी यह कहने वालों की कोई कमी नहीं थी कि भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी से लेकर उनकी पूरी टीम देश की जनता को विभिन्न मुद्दों पर गुमराह कर रही है। 

पिछले 05 साल के अपने कार्यकाल में उसने जम्‍मू-कश्‍मीर से धारा 370 हटाने,  आर्टिकल 35 ए समाप्त करने, राम मंदिर निर्माण, समान नागरिक संहिता जैसे कई मुद्दों पर वोट तो प्राप्त किए हैं परंतु उसकी कोई मंशा इनमें बदलाव लाने की नहीं दिखी। पर आज जो सदन में हुआ है। राज्‍यसभा फिर उसके बाद लोकसभा में जिस तरह से गृहमंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर को अपाहिज बना चुकी धारा 370 हटाने का संकल्प रखते हुए अपनी बात कही । उससे यह साफ हो गया है कि लोकसभा चुनाव के समय लगाया जा रहा यह नारा व्यर्थ नहीं था कि मोदी है तो संभव है। 

भाजपा की एक अच्छी बात इस बार सरकार में आने के पूर्व जो चुनाव कैंपेन के दौरान देखने को मिली थी और जिसे कि यथावत उसने सरकार बनाने के बाद भी एक तरह से लागू कर रखा है कि सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास । वस्‍तुत: यह जो विश्‍वास भाजपा ने अपने नारे में बाद में जोड़ा और जिसका कि दिग्दर्शन आज संसद में देखने को मिला है, उसके लिए जितनी तारीफ भारतीय जनता पार्टी सरकार की हो, वह कम ही कहलाएगी। गृहमंत्री और भाजपा के अध्‍यक्ष अमित शाह ने सदन में आज जो कर दिखाया है, वास्‍तव में वह ऐसी नजीर है जिसे कि आनेवाली राजनीतिक पीढ़ि‍यां मिशाल के तौर पर प्रस्‍तुत करती रहेंगी। 

जिस धारा 370 की बात करनेभर से जम्‍मू-कश्‍मीर में दंगे भड़क उठते थे। पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती, नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता फारुक अब्दुल्ला, उमर अब्‍दुल्‍ला एवं अलगाववादी नेता आए दिन यह धमकी देते थे कि अगर केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 370 अर्टिकल-35 ए को खत्म करती है तो जम्मू-कश्मीर और भारत के बीच का रिश्ता भी खत्म हो जाएगा। उन्‍हें जिस अजय भाषा में पूर्ण विश्‍वास के साथ आज सदन में जवाब दिया गया है, निश्‍च‍ित ही उसने एक नया इतिहास रच दिया है। साथ में यह भी बता दिया गया है कि भारत की सशक्‍त मोदी सरकार किसी के भी सामने झुकने और रुकने वाली नहीं है।  

केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पर जो यह ऐतिहासिक फैसला अनुच्छेद 370-35ए हटाने का लिया। जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बना देने के साथ ही लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर दिया। उससे उन तमाम लोगों को राहत मिली है, जिनकी कई पीढ़ि‍यां इस राज्‍य में अन्‍याय सहती आ रही हैं।  जम्‍मू-कश्‍मीर की तमाम वाल्मीकि कॉलोनियों से आज मोदी-शाह के लिए बुजुर्गों के हाथ आशीर्वाद के लिए उठे हैं जोकि भोर होने से पूर्व सोते शहर के बीच जल्‍दी उठजाने की जद्दोजहद और उठते ही शहर की सफाई हो जाने के सेवा कार्य में लग जाते हैं, लेकिन इन्‍हें अब तक नित-रोज अपने देश में अपने ही नागरिकों से भेदभाव सहना पड़ता रहा है। वस्‍तुत: आजाद भारत के 70 साल गुजर आने के बाद भी वाल्मीकि समुदाय के लोग जम्‍मू-कश्‍मीर में आज तक इस राज्‍य के स्‍थायी नागरिक नहीं बन पाए हैं। जिस आर्ट‍िकल 35ए ने इनके सभी रास्‍ते बंद कर रखे थे, उसकी समाप्‍ती की घोषणा के साथ इनके लिए आशा की उम्‍मीदें जाग उठी हैं। अब भविष्‍य के प्रति विश्‍वास है कि जो धारा 370 इस राज्‍य में उनके मौलिक अधिकारों का हनन कर रही थी अब आगे वह ऐसा नहीं कर पाएगी। 

जम्‍मू-कश्‍मीर में दर्द के रोजमर्रा के भुक्‍तभोगी सिर्फ बाल्‍मिकी समुदाय के लोग ही नहीं हैं। पश्चिमी पाकिस्तान से 1947 में बंटवारे के वक्त हजारों की संख्‍या में अपनी जान बचाकर आए वे हिन्‍दू भी हैं जो यहां आकर बस गए थे, तब उन्‍हें भरोसा दिया गया था कि उनका जीवन और भविष्‍य सब सुरक्षित है। पूरे जम्मू-कश्मीर में उस वक्‍त पश्चिमी पाकिस्तान से करीब तीन लाख शरणार्थी आये थे। लेकिन उन्हें आज तक धारा 370 अनुच्छेद 35ए के तहत वह अधिकार नहीं मिल सके हैं जो राज्य के मूल निवासियों को प्राप्त हैं। इस कारण से यहां ये निर्वासित जीवन भोगने को मजबूर हैं। ऐसे तमाम लोग आज जम्‍मू-कश्‍मीर में मोदी और अमित शाह को दिल से दुआएं दे रहे हैं। 

देखाजाए तो यह कष्‍ट सहने का सिलसिला यहीं नहीं थमता है। कभी उनके पूर्वज राजा-महाराजाओं के दौर में यहां सेवादारी के लिए आकर बस गए थे। उन्‍होंने सोचा नहीं था कि नए आजाद भारत में उन्‍हें इस राज्‍य में मूल निवासी नहीं माना जाएगा । यह गोरखे संसदीय चुनाव में वोट डालने का अधिकार रखते हैं किंतु स्‍थानीय विधानसभा, नगरीय या पंचायती चुनावों में इनके कोई स्‍थानीय मूल मताधिकार नहीं । संसद में आज के निर्णय से इन सभी गोरखाओं को भी इस राज्‍य में अपने लिए सुनहरा भविष्‍य नजर आ रहा है। 

वस्‍तुत: जम्‍मू–कश्‍मीर में इस बात को सहज ही लोग मानते हैं, छोड़ घाटी के कुछ जिलों के लोगों को कि धारा 370 35-ए के प्रावधान न सिर्फ लैंगिक समानता के खिलाफ हैं बल्कि मानव अधिकारों का भी हनन है। इसे अतिशीघ्र समाप्‍त कर देना चाहिए। आज ऐसे सभी लोगों की मंशा राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह द्वारा जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने की सिफारिश के बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविद ने इस बदलाव को अपनी मंजूरी देने के साथ पूर्ण हो गई है। 
अब जम्मू-कश्मीर धारा 370 के साथ ही 35-ए से मुक्‍त राज्‍य है और यहां पर भारतीय कानून पूरी तरह से लागू हो चुके हैं। इसके बाद शेष यदि कुछ बचता है कि तो वह सिर्फ और सिर्फ इस सरकार को लेकर देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के समय सदन में रखा गया संकल्‍प है, जिसमें यह बात कही गई है कि हम पाकिस्‍तान से अधिकृत कश्‍मीर की एक-एक इंच भूमि लेकर रहेंगे। 
आशा बलवती है। काश, अब वह दिन भी आ जाए कि यह संकल्‍प भी पूरा होता मोदी सरकार में दिखे। इस पंद्रह अगस्‍त के पूर्व मोदी-शाह का यह फैसला आनेवाले सशक्‍त भारत की ओर संकेत देने के साथ बहुत कुछ कहता है। अंत में साधुवाद अमित भाई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को । 

लेखक फिल्‍म सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के पूर्व सदस्‍य हैं   

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