डा. विनोद बब्बर
प्रथम मई अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस है। यह दिन मजदूरों के लिए अपनी एकता प्रदर्शित करने का दिन माना जाता है। आज के परिदृश्य में यदि हम मजदूर दिवस की महत्ता का आकलन करें तो पाएंगे कि लगभग हर आदमी मजदूर (मजबूर) है। न जाने क्यों प्रत्येक व्यक्ति को लगता है कि उसका शोषण हो रहा है, वह अपनी नियति, अपने भाग्य को कोसते हुए अंधभूखा, अधनंगा रहने को अभिशप्त है।
मजदूर होना कोई बुरी बात नहीं है क्योंकिमजदूर, चित्रकार तथा लकडी और पत्थर पर काम करने वालों ने संसार भर की गगनचुंबी अट्टालिकाएं बनाई है। महल चौबारे बनाए हैं तो खेतों को हरे भरे रखने वाले विशाल बांध और विकास के नए सोपान तय करने वाले कारखाने बनाए हैं। किसी भी देश की लाइफ लाइन कहीं जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग से अंतरराष्ट्रीय विमान पत्तन तक मेरे मजदूर भाइयों में ही बनाएं । मंदिर में जिस प्रभु प्रतिना के समक्ष हम शीश झुकाते हैं उसे बनाने वाला कारीगर मूर्तिकार भी तो मजदूर ही है ।
एक प्रश्न हम सबके मन में अक्सर उठता है कि जब मजदूर ही विकास की धुरी है, संस्कृति सभ्यता का केंद्र बिंदु है तो फिर अंतर क्यों है? कहीं दरिद्रता का अखण्ड साम्राज्य है, दूसरी तरफ संपन्नता का हिमालय क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं की संपन्नता भी मानसिक दुःखों से विमर्दित है। मशीनें बनाईं तो गयी थीं मनुष्यों का पेट भरने के लिए-मजदूरों को सुख देने के लिए, परन्तु वह काली-काली मशीनें ही काली बनकर उन्हीं मनुष्यों का भक्षण कर जाने के लिए मुख खोल रही हैं । भारत जैसे दरिद्र देश में मनुष्यों के हाथों को मजदूरों के बदले कलों से काम लेना काल का डंका बजाना होगा।
दुनिया के बड़े भूभाग पर बहुत दरिद्रता रही है। आज स्वयं को विश्व का सिरमौर कहने वाले अमेरिका में भी गुलामी प्रथा रही है लेकिन तब से आज तक हर नदी में बहुत पानी बह चुका है। कहा जा सकता है कि ऐसी तमाम कुप्रथाएं जल प्रवाहित की जा चुकी है। लेकिन समाज में धीरे-धीरे मजदूरों की दशा खराब हो रही है। खून पसीना वाले भी हाड़तोड़ मेहनत करके भी अपनी और अपनों की आवश्यकताएं पूरी नहीं कर पाते तो उसे किसी गुलामी से कमतर नहीं कहा जा सकता ।
हमारा भारत परंपरागत रूप से किसानों और दस्तकारों का देश रहा है। दस्तकार अपने घर पर रहकर कृषि तथा घर जरूरत के औजार और अनेक प्रकार की कलात्मक वस्तुएं में तैयार करते थे। लेकिन दुनिया में हुई औद्योगिक क्रांति ने दस्तकारों को मजदूर बना दिया। परिवार और गांव बिखरने लगे। शहरों में मजदूर नरकीय जीवन बिताने के लिए बाध्य हो गए । भारत के किसी भी महानगर अथवा सामान्य नगर, वहां की जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग झुग्गी बस्तियों में रहने वाले मजदूरों का है। आज का भारत कृषि प्रधान नहीं रहा। निम्न-मध्यम वर्ग के पास व्यापार के लिए इतनी पूंजी नहीं कि धन्नासेठों के बाद बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का मुकाबला कर सके। आज छोटे-छोटे मोटे दुकानदारों की रोजी रोटी ऑनलाइन व्यापार ने छीन ली है। सामान्य मजदूर के लिए काम के 8 घंटे निर्धारित है लेकिन छोटे दुकानदार से रेडी पटरी फेरी वाले तो उसे दुगने से भी अधिक समय काम करकेकिसी तरह से अपना और अपने बच्चों का पेट पाल रहे हो । क्या इन्हें हम मजदूर नहीं मानेंगे ? सत्य तो यह है कि आज के जीवन में जब आर्थिक समस्याएं चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं रोजगार का संकट है, शहरी जीवन में रहने वाला हो या गांव का छोटा किसान लगभग प्रत्येक व्यक्ति मजदूर ही तो है। अब जो किसी फैक्ट्री आदि में नाम मात्र के वेतन पर काम कर रहे हैं , उन्हें मजदूर माना जाएं या नहीं ?
ईमानदारी से देखा जाए तो आज का डॉक्टर, अध्यापक, पत्रकार, अधिकारी, एजेन्ट, बीपीओ, सेल्स, मार्केटिंग, विज्ञापन की दुनिया में काम करने वाले, एक्टर, गायक, लेखक आदि, आदि ये सब भी तो मजदूर हैं। आखिर वहीं मजदूर नहीं जो फ़ैक्ट्री में मशीन पर काम करता हो या गारे-सीमेंट से लोहा लेता हो बल्कि हर मेहनतकश मजदूर है। सुना तो यह भी है कि मुम्बई के एकं मशहूर फिल्म निर्माता ने अपने कार्यस्थल का नाम ही फ़ैक्ट्री रखा है। मुम्बई ही क्यों हर कलाकार वास्तव में अपनी कला (श्रम) को किसी मजदूर की तरह बेचता है। कुछ भाग्यशाली होते हैं जिन्हें मजदूरी के साथ यश मिल जाता है तो वे सफलता की बुलन्दियों को छू लेते हैं, शेष मजदूर जीवनभर मजबूर बने रहते हैं।
आज का यथार्थ है कि उत्पादन का हर साधन (मशीन, कम्प्यूटर, कैमरा; लोहे के औजार, शब्दों के औजार आदि, आदि) जिनके माध्यम से आदमी अपनी रोजी-रोटी कमाते हुए मानसिकत स्वतंत्रता और अपनापन महसूस नहीं करता है। वह स्वयं को औजार (टूल) महसूस करता है। उनके पास पेट पालने के लिए बेचने के लिये केवल अपना श्रम है। अब यह श्रम शारीरिक या मानसिक भी हो सकता है। तो क्या इस अर्थ में हर शहरी मजदूर हुआं या नहीं हुआ? बेशक 1856 में काम के आठ घंटे निभार्रित करने की मांग हुई थी लेकिन कुछ संगठित क्षेत्रों अथवा सरकारी कार्यालयों को छोड़ दे तो शेष में यह आज भी व्यवहारिक रूप से लागू नहीं हो सका है। हर छोटा दुकान रिक्शा, स्कूटर आटो, टैक्सी वाला, रेहड़ी -पटरी वाला, पत्रकार, लेखक वेटर, कुली, चौकीदार, चपरासी मजदूर, यहाँ तक कि सीमा पर तैनात जवान, साधारण सिपाही भी 12 से 16 घंटे काम करने के बाद भी अपनी कुछ जरूरतों के बिना रहने को अभिशप्त है। हमारी मातृशक्ति घरेलू महिला होकर पूरे 365 दिन हर दिन दो मजदूरों से अधिक का काम करती है तो वे महिलाएं जो नौकरीपेशा हैं, उनकी व्यस्तता तो समझी ही जा सकती है जिन्हें अपने कार्यस्थल पर काम करने के साथ घर पर भी अपनी सभी जिम्मेदारियां निभानी पड़ती है । देश का किसान कितना श्रम करता है यह किसी से छिपा हुआ नहीं है लेकिन प्रथम मई का अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस उसके लिए नहीं है ।
अब प्रश्न यह है कि इस समस्त वातावरण के लिए आखिर कौन जिम्मेवार है। सबसे बड़ा दोष व्यवस्था का है तो दूसरा दोष हमारी मानसिकता का। दिन प्रतिदिन महंगी होती शिक्षा तो दूसरी तरफ सरकारी शिक्षण संस्थानों की कक्षा में सामान्य औसत से चार गुना छात्रों के होना शिक्षा के स्तर को प्रभावित कर रहा है। उसी का परिणाम है कि दोहरी शिक्षा प्रणाली मजबूर समाज का निर्माण कर रही है। सरकारी स्कूलों के अध्यापक सरकारी व्यवस्था के मास्टर टूल बन कर रह गए है। मतदान, मतगणना, उससे भी पहले मतदाता सूची बनाना, फेरबदल करना, जनगणना करना, जातिगणना करना, दाल-दलिया बांटना तो जारी था ही उसपर उन्हें फरमान भी कि वे किसी भी बच्चें को फेल न करें, उनकी शरारत को अनदेखा करें। शरारत चाहे गंभीर अपराध ही क्यों न हो आज के सरकारी स्कूलों के अध्यापक आंखें मूंदे रखने को विवश है अन्यथा उनकी नौकरी खतरे में पड़ सकती है। आज के बच्चें अपनी शरारत के बाबजूद अध्यापकों के विरूद्ध पुलिस को बुलाने से भी नहीं हिचकिचाते। इस सारे खेल में लाखों बच्चे पढ़ाई बीच में छोड़ने को विवश हो जाते हैं।
दूसरी ओर प्राईवेट स्कूल व्यवसायिक स्थल बन चुके हैं। जहाँ छद्म शिक्षा प्रणाली मजबूर मजदूर पैदा कर रही है। इस प्रणाली की पैदावार के रूप में सामने आ रही युवा पीढ़ी किसी ‘काल सेन्टर’ का वाईट कालर मजदूर के अतिरिक्त आखिर क्या हैसियत रखता है? परिवारों की टूटन, बुजुर्गो की बिगडती दशा, एकल परिवारों से एकल व्यक्ति की और बढ़ता वातावरण, गाँवों से शहरों की ओर पलायन, शहरों में गंदी बस्तियों की बढ़ती संख्या, नशे का बढ़ता प्रचलन, व्यभिचारं अनेक सामाजिक कुरीतियों का पनपना आखिर अकारण नहीं हो सकता।
मई दिवस हमारे सम्मु प्रश्न प्रस्तुत करता है कि क्या बदलते हुए परिवेश में मजदूर की परिभाषा बदलने की आवश्यकता नहीं है? आखिर लाख कोशिशों के बावजूद मजबूर सामान्य व्यक्ति की दशा क्यों बिगड़ी है? उसकी चुनौती आठ घंटें नहीं अपितु सोलह घंटे काम करने के बाद भी अपने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, संतुलित भोजन की व्यवस्था करने में असफल होना है। ऐसे में जब वह बुनियादी जरूरतें ही उपलब्ध नहीं करवा पा रहा तो उसे नई पीढ़ी को संस्कार न दे पाने के लिए कैसे दोषी ठहराए ।
डा. विनोद बब्बर