प्रवक्ता न्यूज़

नारी सशक्तिकरण का संकल्प

संदर्भः- महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को पारित कराने मध्य प्रदेश सरकार ने लिया संकल्प
प्रमोद भार्गव

महिला आरक्षण विधेयक पारित कराने की दिशा में मध्यप्रदेश सरकार ने अनूठी पहल की है। विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर नारी शक्ति वंदन का संकल्प लिया है। इस संकल्प लेने का उद्देष्य  है कि विधेयक को कानूनी रूप देते समय जो चूक हो गई थी, उसे संषोधित कर दिया जाए। इसमें प्रावधान है कि 2021 की जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह कानून लागू होगा। किंतु कोरोना के चलते 2021 की जनगणना टालनी पड़ी। अब जनगणना के पहले चरण की शुरुआत हुई है, जिसके अंतिम परिणाम 2028 तक आएंगे। इसलिए केंद्र सरकार विधेयक के पारित हो चुके प्रारूप में संशोधन के लिए प्रस्ताव लाई थी, जो संसद में पारित नहीं हो सका। 2023 में पारित हुए इस विधेयक में संशोधन किए बिना 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव में इसे लागू नहीं किया जा सकता है। परिसीमन से तात्पर्य निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निधारण से है।  
वास्तव में संसदीय विपक्ष ने लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिषत आरक्षण देने से जुड़े संविधान संषोधन परिसीमन और केंद्र षासित क्षेत्र कानून संषोधन विधेयकों को अस्वीकार करके बड़ी भूल की है। इस कारण 2029 के चुनाव में 33 प्रतिषत महिलाएं आरक्षण के लाभ से वंचित रह जाएंगी। नरेंद्र मोदी जब से केंद्रीय सत्ता का नेतृत्व कर रहे हैं, तभी से लगातार उन्हें चुनावों में नारियों ने बढ़-चढ़कर समर्थन दिया है। इसी कारण न केवल मोदी लोकसभा में तीसरी बार बहुमत लाने में सफल रहे बल्कि भाजपा और राजग गठबंधन के सहयोगी दलों को विधानसभाओं में भी विजय दिलाने में सफल हुए हैं। देष की महिलाओं को निर्वाचन में भागीदारी का उचित लाभ दिलाने की दृश्टि से मध्य प्रदेष सरकार ने विधानसभा में नारी षक्ति वंदन संकल्प पर 8 घंटे चर्चा की और उसे ध्वनि मत से पारित भी कर दिया। विपक्ष के सवालों का उत्तर देते हुए मुख्यमंत्री मोहन यादव ने ठीक ही कहा कि ‘कांग्रेस अपनी नकारात्मक राजनीति के जरिए देष को फिर से दंगों के दौर में ले जाना चाहती है। धर्म के आधार पर आरक्षण देने की कांग्रेस की मांग को जनता कभी क्षमा नहीं करेगी। यह अधिनियम सदी की सबसे बड़ी क्रांतिकारी पहल थी, जिसे कांग्रेस एवं अन्य विपक्ष ने लागू नहीं होने दिया। साफ है, कांग्रेस की नियत में खोट है।‘
वाकई यदि कांग्रेस की नियत में खोट नहीं होता तो यह विधेयक बहुत पहले लागू हो चुका होता। किंतु परिसीमन के बहाने एक बार फिर महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 2029 से मिलने जा रही आरक्षण की सुविधा से वंचित कर दिया। इस विधेयक के अनुसार सभी राज्यों में एक समान रूप से 50 प्रतिषत सीटों की बढ़ोत्तरी की जानी है। परंतु विपक्ष की यह आषंका बनी रही कि परिसीमन के बहाने सीटों की संरचना कुछ इस तरह से निर्धारित होगी कि भाजपा समर्थित वोट बड़ी संख्या में क्षेत्र विषेश में समा जाएं। दरअसल जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होता है तो दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों के दल प्रमुखों ने यह अंदाजा लगा लिया कि इन प्रांतों में जनसंख्या कम होने के कारण राजनीतिक रूप से वे नुकसान में रहेंगे। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने इस पहल को संघीय ढांचे को कमजोर करने और दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक आवाज को दबाने वाला कदम बता दिया था और तेलंगाना के उप मुख्यमंत्री षिवकुमार ने कहा था कि इतना बड़ा संवैधानिक बदलाव सभी दलों की सहमति के बिना संभव नहीं है। इन साझा आवाजों की बुलंदी ने इन विधेयकों को पारित नहीं होने दिया। नारी षक्ति को नकारने की समूचे विपक्ष ने बड़ी भूल कर दी है, जिसके परिणाम उसे आने वाले चुनावों में भुगतने पड़ सकते हैं ?
इन विधेयकों को लटकाने के लिए विपक्ष ने कोटे में कोटा देने का उपाय की भी मांग कर डाली थी। इसी को लेकर मोहन यादव ने तार्किक उत्तर देते हुए विधानसभा में कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण की मांग सर्वथा अनुचित है। मायावती ने इस विधेयक का स्वागत करते हुए कहा कि 33 प्रतिषत कोटे में एससी-एसटी और ओबीसी की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था हो। आरक्षण के कोटे में विभिन्नि वर्गों के लिए अलग से आरक्षण लागू करने की यह बात विपक्ष ने उस समय नहीं उठाई थी, जब 2023 में  विधेयक को लाया गया था। जबकि अब परिसीमन विधेयक पारित हो जाता तो सामाजिक न्याय की दिषा में एक बड़ा काम होता। क्योंकि 128वां संविधान संषोधन विधेयक पारित होने के बाद संसद के दोनों सदनों से लेकर विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी 33 प्रतिषत तय हो जाती। विधेयक के कानून में बदलने और क्रियान्वित होने के बाद वर्तमान स्थिति के हिसाब से लोकसभा में महिलाओं के लिए 181 और राज्य विधानसभाओं में 1374 सीटें बढ़ जाती। मध्य प्रदेष विधानसभा की सदस्य संख्या 230 से बढ़कर 345 हो जाती। इनमें से 114 सीटें महिलाओं के लिए सुरक्षित हो जाती। इस समय देष में करीब 44 करोड़ महिला मतदाता हैं। इन्हीं में से 2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाएं उम्मीदवार बनाई जातीं। 2034 में क्या स्थिति बनेंगी, यह भविश्य के गर्भ में है।
दरअसल इन विधेयकों के कानून बनते ही ऐसे कई दोहरे चरित्र के चेहरे हाशिये पर चले जाएंगे, जो पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने के प्रावधान के बहाने, गाहे-बगाहे बीते 27 साल से गतिरोध पैदा किए हुए हैं। विधेयक से असहमत दलों की हमेषा ही 33 फीसदी आरक्षण के कोटे में पिछड़े और मुस्लिम समुदायों की महिलाओं को आरक्षण की मांग बनी रही है। जबकि संविधान के वर्तमान स्वरूप में केवल अनुसूचित जाति और जनजाति के समुदायों को आरक्षण की सुविधा हासिल है। ऐसे में मुस्लिम समुदाय की महिलाओं को कोटे में कोटा देना कैसे संभव है ? हमारे लोकतांत्रिक संविधान में धार्मिक आधार पर किसी भी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। लिहाजा इस बिना पर मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण की सुविधा कैसे हासिल हो सकती है ?
दरअसल इस कानून के वजूद में आ जाने के बाद अस्तित्व का संकट उन काडरविहीन दलों को है, जो व्यक्ति औैर जाति आधारित दल हैं। इसी कारण लालू, मुलायम और शरद यादव इस बिल के विरोध मंे दृढ़ता से खडे़ होते रहे थे। अब इसी लाइन पर राहुल गांधी, अखिलेष यादव और मायावती हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में जातियता के बूते क्रियाशील इन यादवों की तिकड़ी का दावा रहता है कि इस अलोकतांत्रिक विधेयक के पास होने के बाद पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के लिए जम्हूरियत के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। जबकि इनकी वास्तविक चिंता यह नहीं है ? दरअसल 33 फीसदी आरक्षण के बाद बाहुबलि बने पिछड़े वर्ग के आलाकमानों का लोकसभा व विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक आधार तो सिमटेगा ही,  सदनों में संख्याबल की दृष्टि से भी इन दलों की ताकत घट जाएगी। अन्यथा ये सियासी दल वाकई उदार और पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के ईमानदारी से हिमायती हैं, तो सभी आरक्षित सीटों पर इन्हीं वर्गों से जुड़ी महिलाआंे को उम्मीदवार बना सकते हैं ? बल्कि अनारक्षित सीटों का भी इन्हें प्रतिनिधित्व सौंप सकते हैं ? दरअसल इन कुटिल राजनीतिज्ञों के दिखाने और खाने दांत अलग-अलग हैं। गोया तय है कि अल्पसंख्यकों की बेहतर नुमाइंदगी की वकालात के इनके दावे थोथे हैं।
इन दलों का दोहरा चरित्र इस बात से भी जाहिर होता रहा है कि जब देश की पंचायती राज्य व्यवस्था में महिलाओं का 33 फीसदी से 50 फीसदी आरक्षण बढ़ाने का विधेयक लाया गया था, तब ये सभी दल एक राय थे। यही नहीं जब नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण का विधेयक लाया गया था, तब भी इन दलों की सहमति बनी रही। लेकिन जब लोकसभा व विधानसभा की बारी आती है तो यही दल गतिरोध पैदा करने लग जाते हैं। क्योंकि इस विधेयक के लागू होते ही इनके निजी राजनीतिक हित प्रभावित हो जाएंगे। इनका लोकसभा और विधानसभा में पुरुषवादी वर्चस्व का दायरा 33 फीसदी घट जाएगा। राजनेताओं के लिए यह विधेयक इसलिए भी वजूद का संकट है, क्योंकि जिन लोक व विधानसभा क्षेत्रों से ये लोग लगातार विजयश्री हासिल करते चले आ रहे हैं, वह क्षेत्र यदि महिला आरक्षण के दायरे में आ गया तो इन्हें चुनाव लड़ना भी मुश्किल हो जाएगा ? तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने भी मुस्लिम समुदाय को बरगलाए रखने के नजरिये से इस विधेयक का विरोध किया था। भ्रष्टाचार में लिप्त ऐसे नेता भी इस विधेयक का विरोध करते रहे हैं, जिनके लिए सांसद अथवा विधायक के रूप में लोक सेवक बने रहना, सुरक्षा कवच का काम करता है। मध्यप्रदेश सरकार ने संकल्प पारित करके यह जता दिया है कि वह महिला सशक्तिकरण के हितों के पक्ष में है।

प्रमोद भार्गव