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    बाईडेन की जीत, बराक की वापसी!

    अमेरिका की राजनीति में तेजी के साथ बदलते हुए समीकरण ने बहुत कुछ शांत शब्दों में संदेश दे दिया जिसे समझने की आवश्यकता है। अमेरिका के चुनाव में जिस प्रकार से डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी भरपूर ताकत लगाई वह भी जगजाहिर है। ट्रंप लगातार अपने आपको पुनः विजयी राष्ट्रपति एवं मजबूत दावेदार घोषित करने में लगे थे। ट्रंप बार-बार मतदाताओं पर मानसिक रूप से दबाव भी बना रहे थे कि वह दुबारा से राष्ट्रपति निर्वाचित होंगे। साथ ही ट्रंप अपने ट्यूटर एकाउंट पर लगातार पोष्ट भी डाल रहे थे। लेकिन यह बात अलग है कि ट्यूटर ने उनके भड़काउ पोष्ट को प्लेटफार्म पर टिकने ही नहीं दिया और लगातार उनके पोष्ट को हटाता रहा जिससे कि ट्रंप के द्वारा बनाए जा रहे समीकरण को गहरा झटका जरूर लगा। क्योंकि ट्रंप जिस प्रकार से चक्रव्यूह रच रहे थे वह वास्तविकता से पूरी तरह से भिन्न था। जिसके कारण ट्यूटर ने ट्रंप के द्वारा गढ़े जा रहे शब्दों को अनुचित एवं असत्य ठहराते हुए लगातार अकाउंट से हटाने का काम। जिसके कारण ट्रंप अपना एजेण्डा चला पाने में विफल रहे।
    चुनाव में बाजी पलटने का एक और कारण है जोकि इस बार के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की जड़ है। क्योंकि ट्रंप जहाँ उग्रता एवं तांडवता का रूप धारण करके चुनावी मैदान में उतरे हुए थे तो वहीं पर जो बाईडेन उसके ठीक विपरीत थे। जो बाईडेन लगातार चुनाव में शांति,प्रेम एवं सभ्यता के साथ चुनावी मैदान में उतरे हुए थे। जिससे कि मतदाताओं का आकर्षण जो बाईडेन की ओर बहुत ही तेज गति से हुआ जिससे कि अमेरिका में जो बाईडेन के पक्ष में एक बडा सार्थक माहौल बना।
    जो बाईडेन की जीत के पीछे एक बड़ा नाम है जोकि पर्दे के पीछे पूरी तरह से बहुत ही मजबूती के साथ खड़ा था। जो बाईडेन को व्हाईट हाउस पहुँचाने में अमेरिका की एक बड़ी ताकत पर्दे के पीछे लगी हुई थी यदि शब्दों को बदल कर कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा कि जो बाईडेन का नाम आगे था लेकिन काम किसी और का था। बता दें कि इस पर्दे के पीछे कोई और नहीं बल्कि विश्व का जाना पहचाना चेहरा एवं बेदाग छवि के पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा लगे हुए थे जिन्होंने बहुत ही मजबूती के साथ पूरे चुनाव को हैंडल करते हुए मतदाताओं को अपने नाम पर जो बाईडन के पक्ष में मतदान करने को प्रेरित किया। बराक ओबामा अमेरिका की वह शख्शियत हैं जिनके ऊपर अफ्रीकी मूल के सभी निवासी एवं पीड़ित तथा प्रताड़ित लोग एवं अश्वेत समुदाय आँख बंद करके पूरी तरह से भरोसा करता है। इसी कारण बराक ओबामा के एक आह्वान पर पूरे अमेरिका की सियासी हवा बदल गई और ट्रंप चारों खाने चित हो गए। बराक ओबामा ने पूरे चुनावी समीकरण को अपने हाथ में रखा और सभी बारीकियों को ध्यान से देखते हुए सभी मोर्चे को संभालते रहे। जिससे कि बाईडेन की जीत संभव हो सकी। जो बाईडेन को आगे कर बराक ओबामा ने एक बार फिर व्हाईट हाउस के अंदर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर दी। यह अलग बात है कि बराक ओबामा साक्षात रूप से कोई नीति नहीं बनाएंगे लेकिन इस बात से इन्कार कदापि नही किया जा सकता कि अब व्हाईट हाउस की कोई भी नीति बराक ओबामा की अनुमति के बगैर निकल पाएगी। ऐसा कदापि नहीं हो सकता। यदि शब्दों को बदल कर कहा जाए तो अब एक बार फिर से अमेरिका की सत्ता बराक के हाथों में आ गई। अब सभी प्रकार की अमेरिकी नीति पर अप्रत्यक्ष रूप से हस्ताक्षर करेंगें। जबकि प्रत्यक्ष रूप से हस्ताक्षर जो बाईडेन के होगें लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से वह हस्ताक्षर बराक ओबामा के ही होगें। सूत्रों की माने तो ओबामा ने ही राष्ट्रपति चुनाव में बाईडेन का नाम आगे किया क्योंकि बाईडेन खुद भी अमेरिका की राजनीति में एक पुराना जाना पहचाना चेहरा थे। जोकि ट्रंप के मुकाबले किसी परिचय के मोहताज नहीं थे क्योंकि बाईडेन का एक लम्बा राजनीतिक इतिहास है। बाईडेन अमेरिका की राजनीति में करीब पांच दशकों से सक्रिय हैं। अमेरिका की राजनीति में जो बाइडेन एक ऐसा नाम हैं जोकि सबसे युवा सीनेटर से लेकर सबसे उम्रदराज अमेरिकी राष्ट्रपति बनने तक का शानदार सफर तय करके इतिहास रचने में कामयाब रहे। खास बात यह है कि जो बाइडेन छह बार सीनेटर रहे जोकि उनकी राजनीतिक पारी का एक बड़ा हिस्सा है। जिसके दम पर वह अमेरिका में ट्रंप को सीधी टक्कर देने में कामयाब हो गए। बराक ओबामा की ताकत एवं छवि का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जो बाइडेन वर्ष 1988 और 2008 में राष्ट्रपति पद की दौड में शामिल हुए लेकिन चुनाव में नाकामी मिली। राष्ट्रपति बनने का सपना संजोये डेलावेयर से आने वाले दिग्गज नेता जो बाइडेन को सबसे बडी सफलता उस समय मिली जब वह दक्षिण कैरोलीना की डेमोक्रेटिक पार्टी प्राइमरी में 29 फरवरी को अपने सभी प्रतिद्वंदियों को पछाड़कर राष्ट्रपति पद की दौड में जगह बनाने में कामयाब रहे। राष्ट्रपति चुनाव की पहली सीढ़ी ही बाईडेन के लिए आसान नहीं थी क्योंकि वह राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ चुके थे लेकिन हार गए थे। इसलिए विरोधी खेमा सक्रिय था लेकिन बराक ओबामा ने जिम्मा संभाला और बाईडेन का नाम आगे किया। और पूरी मजबूती के साथ चट्टान की तरह खड़े रहे जिसका परिणाम आज दुनिया के सामने है।
    भारत की दृष्टि से डेमोक्रेट उम्मीदवार जो बाइडेन को भारत का हिमायती समझा जाता रहा है उनके राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भारत-अमेरिकी संबंधों के और प्रगाढ़ होने की संभावना है क्योंकि बराक ओबामा के राष्ट्रपति रहने के दौरान बाइडेन उप राष्ट्रपति रहे हैं और उस कार्यकाल में भारत के साथ मजबूत संबंधों के पक्षधर रहे हैं। खास बात यह है कि चुनाव अभियान के दौरान भी बाइडेन ने बतौर उप राष्ट्रपति अपने कार्यकाल को याद करते हुए भारत से संबंधों को और मजबूत किए जाने का जिक्र भी किया है। उन्होंने कहा था कि अगर वह राष्ट्रपति चुने जाते हैं तो भारत-अमेरिका के बीच रिश्ते उनकी प्राथमिकता रहेगी।
    बाइडेन एक ऐसे सियासी परिपक्व व्यक्ति हैं जिन्होंने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के पारित होने में भी अहम भूमिका निभायी थी। यह कार्य पूर्व दिग्गज राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में हुआ। तब बाइडेन ने डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों पार्टियों के सांसदों से बात कर अमेरिकी कांग्रेस से 2008 में भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को पास कराने में अहम भूमिका निभाई थी। इन सभी बिन्दुओं पर प्रकाश डालने के बाद एक ऐसा मानचित्र उभरकर सामने आता है जिससे कि भारत और अमेरिका के संबन्धों को नई ऊँचाई मिलना तय है। साफ दिल एवं कुशल नेतृत्व एवं अपने लम्बे सियासी अनुभव के कारण दूरगामी परिणामों की परख रखने वाले बाईडेन भारत के लिए काफी लाभदायक साबित होंगे।
    अवगत करा दें कि उप राष्ट्रपति बनने से पहले साल 2006 में बाईडेन ने अमेरिका-भारत संबंधों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहा था कि मेरा सपना है कि 2020 में भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया के दो सबसे करीबी देश हों ऐसा मैं चाहता हूँ। डेलावेयर राज्य में लगभग तीन दशकों तक सीनेटर रहने वाले बाइडेन हमेशा ही भारत-अमेरिकी संबंधों को मजबूत करने के हिमायती रहे। चुनाव के लिए कोष जुटाने के एक अभियान के दौरान जुलाई में बाइडेन ने कहा था कि भारत-अमेरिका एक प्राकृतिक साझेदार हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इसी साल जुलाई में ही बाईडेन ने कहा था कि अगर वह नवंबर में राष्ट्रपति का चुनाव जीतते हैं तो वह भारतीय आईटी पेशेवरों के बीच सबसे अधिक लोकप्रिय एच-1बी वीज़ा पर लागू अस्थायी निलंबन को खत्म कर देंगे। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन से एच1बी वीजा और ग्रीन कार्ड योजना से हजारों भारतीयों को लाभ होगा हर साल एच1बी वीजा का 70 फीसदी कोटा भारतीयों के खाते में ही जाता रहा है। इन सभी समीकरणों से बाईडन भारत के युवाओं के उज्जवल भविष्य के लिए बहुत ही लाभदायक साबित होंगे। जिससे कि भारत की प्रगति बहुत ही तीव्रता के साथ होगी।
    बता दें कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने 23 जून को भारतीय आईटी पेशेवरों को एक बड़ा झटका देते हुए एच-1बी वीज़ा और अन्य विदेशी कार्य वीज़ा को 2020 के अंत तक निलंबित कर दिया था। जिससे कि भारतीय व्यक्तियों को बड़ा नुकसान हुआ। आर्थिक मंदी के दौर में दुनिया को रोजगार की तलाश है जिसमें भारत भी रोजगार की दौड़ में है। चूँकि जीवन के लिए आय मुख्य आधार है। अतः बाईडेन के आने से भारत के उन युवाओं के चेहरे फिर से खिल उठे हैं जोकि अमेरिका में नौकरी अथवा अपना छोटा-मोटा व्यवसाय करते थे जोकि ट्रंप ने अपनी नई नीति लागू करके भारतीयों को बड़ा झटका दिया था। जिससे कि भारत को बहुत आर्थिक नुकसान हुआ अब बाईडेन के आने से एक बार फिर उम्मीद की किरण जाग उठी है।

    सज्जाद हैदर
    सज्जाद हैदर
    स्वतंत्र लेखक

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