चम्बल में डाकू म्यूजियम का औचित्य

यद्यपि चम्बल अंचल में डकैत समस्या समाप्त हो चुकी है किन्तु चम्बल से डकैतों के नाम एक चौंकाने वाला समाचार आया है | कहा जा रहा है कि मध्यप्रदेश पुलिस, भिंड में डाकू म्यूजियम बनाने जा रही है | म्यूजियम अर्थात संग्रहालय,एक ऐसा संस्थान जो अपनी विरासत या धरोहर को सहेजने का कार्य करता है | प्रश्न यह है कि क्या डाकू भी हमारी धरोहर हैं ? कुछ स्थानीय लोग कहते हैं कि ये डाकू नहीं बाग़ी थे किन्तु आजादी के बाद चम्बल में जितने भी डाकुओं के एनकाउंटर हुए या जिन्होंने समर्पण किये उनमें से संभवतः कोई भी बाग़ी या विद्रोही नहीं था | बाग़ी या विद्रोही तो सरकार के दमन या अव्यवस्था के विरुद्ध झंडा उठाते हैं,वे देश और समाज के उद्धार के लिए लड़ते हैं इन डकैतों का ऐसा कोई ध्येय था ? संपत्ति के बँटवारे में हुए मर्डर,भूमि विवाद,जातीय संघर्ष या निजी बैर आदि के कारण लोग डाकू बने सभी ने संविधान से परे जा-जाकर बन्दूक उठाई अपने-अपने बदले लिए | संभव है कुछ लोग सरकार से न्याय न मिल पाने के कारण डाकू बनने पर विवश हुए किन्तु डाकू बनने के बाद इन्होने सामाजिक न्याय की लड़ाई नहीं लड़ी अपितु और भी जघन्य अपराध किये | इनके द्वारा किये गए अत्याचार न तो क्षम्य हैं न अनुकरणीय और न हीं किसी संग्रहालय में सजाने योग्य | समाज के सभ्रांत लोगों की हत्या करना,लूटना,अपहरण कर फिरौती (पैसे)माँगना ये तो बागियों के लक्षण नहीं हैं | चूँकि अँगरेज शासन में क्रांतिकारियों को बाग़ी/विद्रोही भी कहा जाता था पर जनता इन बाग़ियों को सम्मान की दृष्टि से देखती थी | डाकुओं ने भी समाज से सम्मान पाने और अपने प्रति घृणा कम करने के लिए स्वयं को बाग़ी कहलवाया,गाँव के लोग भय से इन्हें भी बाग़ी कहने लगे और तब से यह शब्द चल पड़ा |
डकैत समस्या के कारण चम्बल के इतिहास,संकृति,पुरातत्व पर पर्याप्त कार्य नहीं हो पाया | जबतक डकैतों का महिमामंडन होता रहेगा तब तक अन्य विषय गौण ही रहेगें | कितने लोगों को ज्ञात है कि चम्बल के लोग पानीपत की पहली लड़ाई में राजा विक्रमादित्य के साथ बाबर के विरुद्ध लड़ने गए थे | क्या लोगों को पता है कि हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना में यहाँ के लोग राजा रामशाह के नेतृत्व में लड़े थे | नेताजी सुभास चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फ़ौज बनी तब उसमें भी चम्बल के लोग थे | अमर शहीद पं.रामप्रसाद बिस्मिल का नाम तो पूरा संसार जानता है, वे भी इसी चम्बल की माटी के सपूत थे | चम्बल आज भी देश की सेनाओं में बड़ी संख्या में सैनिक भेजती है | देश रक्षा में चम्बल अपने असंख्य बेटों का बलिदान कर चुकी है | आज उस चम्बल में डाकू म्यूजियम बनाया जा रहा है क्यों ? यदि म्यूजियम ही बनाना है तो हुतात्मा सैनिकों का बनाइए | यह भी सत्य है कि डकैतों से तो पुलिस को ही लड़ना पड़ता है | कई मुठ-भेड़ों में मध्यप्रदेश पुलिस के जवानों ने अपना अतुलनीय बलिदान दिया है | ऐसे पुलिस वालों को भी उस सैनिक संग्राहलय में स्थान दिया जाना चाहिए | पुलिस चाहे तो बलिदानी पुलिस कर्मियों का प्रथक से संग्रहालय बना सकती हैं | किन्तु डाकुओं का महिमामंडन या डकैतों के नाम पर संग्रहालय बनाना तो किसी भी भाँति उचित नहीं जान पड़ता | जो लोग केवल सिनेमा के माध्यम से ही चम्बल को जानते हैं वे सोचते हैं चम्बल के बीहड़ों में डाकू लोग शोले के गब्बर सिंह की भाँति अभी भी आते होंगे | दुर्भाग्य से हिन्दी सिनेमा ने चम्बल क्षेत्र को डाकुओं के लिए इतना बदनाम कर दिया है कि यहाँ के इतिहास,भूगोल,समाज संस्कृति किसी भी चीज को गंभीरता से नहीं लिया जाता | अब यदि डाकू संग्रहालय और स्थापित हो जाएगा तो चम्बल क्षेत्र का सम्पूर्ण विमर्श इसी पर केन्द्रित हो कर रह जाएगा |
महत्व पूर्ण प्रश्न यह भी है कि डाकू संग्रहालय बनाकर हम देश और चम्बल के युवाओं को क्या सन्देश देना चाहते हैं ? डाकुओं के परिवार वाले चाहेंगें कि उन्हें डाकू न कहकर बागी कहा जाए और उनका महिमा मंडन कर, उनके पक्ष या प्रशंसा में अतिरंजित कहानियाँ गढ़ी जाएँ | जिन लोगों के घर परिवार वालों को इन दस्युओं ने मारा या लूटा वे चाहेंगें कि इन्हें खूँखार डकैत के रूप में ही चित्रित किया जाए | कुल मिलकर इस विमर्श से समाज को कोई लाभ होने वाला नहीं है | जब चम्बल के पास महाभारत काल से लेकर राजा अनंग पाल और बिस्मिल जी तक एक गौरव पूर्ण इतिहास है तो भला डाकुओं की विरासत सहेजने और प्रचारित करने का औचित्य ही क्या है |
आज अमेरिका,आस्ट्रेलिया सहित पूरे योरोपीय देशों में चम्बल के युवा विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं | कितने ही इंजीनियर्स,डॉक्टर्स और वैज्ञानिक विश्व फलक पर चम्बल का नाम ऊँचा कर रहे हैं | इनमें कुछ मेरे विद्यार्थी और सहपाठी मित्र भी हैं वे चाहते हैं कि भिंड -मुरैना में शिक्षा क्षेत्र में कुछ उल्लेखनीय कार्य हो | किन्तु जब वे सुनेंगे कि हम अभी डाकू संग्रहालय से आगे ही नहीं बढ़ पाए, तो क्या सोचोंगे ? और पूरा देश चम्बल के बारे में क्या कहेगा ? इसकी चिंता किसी को नहीं है | कैसी विडंबना है कि देश के विभिन्न जिलों और संभागों में नए-नए आईआईटी,एम्स और बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रियल यूनिट्स खोली जा रही हैं और चम्बल में डाकू संग्रहालय |

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