कहां गए कॉमेडियन

– अनिल अनूप 

हिंदी फिल्मों में कॉमेडियन शब्द की अहमियत उतनी ही है जितनी कि एक हीरो की होती है। लगभग सभी फिल्में, खासकर अगर वह पारिवारिक पृष्ठभूमि पर आधारित हैं या रोमांटिक हैं, कॉमेडी की सही मात्रा के बिना अधूरी लगती हैं। अक्सर फिल्मों में कॉमेडी का मूल कहानी से ज्यादा कुछ लेना-देना नहीं होता है और अगर ऐसा होता भी है तो इसे कहानी के साथ प्रासंगिक बनाए रखने के लिए एक बेहद पतली सी कड़ी होती है।

हर उस मुख्य अभिनेता ने, जिसने सफलता का भरपूर स्वाद चखा है, कॉमेडी में अपना हाथ आजमाया है। इंडस्ट्री में कुछ मौलिक कॉमेडियन हैं और कुछ ऐसे हैं, जो रिक्त स्थानों की पूर्ति करते हैं। कुछ ऐसे कॉमेडियन भी रह चुके हैं, जो अपने आप में सुपरस्टार थे। इनके साथ ही कुछ ऐसे कॉमेडियन भी हैं, जो बी या सी ग्रेड मूवी में सटीक बैठते हैं। इंडस्ट्री में ऐसे भी कॉमेडियन रहे हैं, जो बिना अधिक मेहनत किए दर्शकों को खुलकर हंसाने की क्षमता रखते थे।

न केवल हिंदी फिल्मों में, बल्कि क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों में भी उनका अपना स्टार कॉमेडियन होता है। न केवल पुरुष, बल्कि महिलाओं ने भी कॉमेडियन के रूप में दर्शकों को खूब हंसाया है, लेकिन उन्हें इस काम के लिए केवल कुछ ही मिनट दिए जाते थे और वे अपनी भाव-भंगिमा से लोगों को हंसाते थे। उदाहरण के तौर पर आप मनोरमा या टुनटुन को ले सकते हैं।

अक्सर पारिवारिक दर्शकों को ध्यान में रखते हुए इस तरह की फिल्में बनाई जाती थीं, जिनमें किसी गंभीर मुद्दे से दर्शकों के ध्यान को कुछ समय तक के लिए भटकाने की जरूरत थी। ऐसे में इन फिल्मों में कॉमेडी को जोड़ा गया। इन्हें कॉमिक रिलीफ बताया जाने लगा। आजकल की फिल्मों की तुलना में उस वक्त फिल्में थोड़ी ज्यादा लंबी होती थीं, ऐसे में ये कॉमिक रिलीफ मददगार होते थे।

कॉमेडी ने अपने सुपरस्टार खुद बनाए। बात अगर 1950 या 1960 के दशक की करें तो बेशक इस दौर में कई मशहूर कॉमेडियन थे, लेकिन इस क्षेत्र में दबदबा रहा जॉनी वॉकर का। वह इस कदर मशहूर हुए कि जो किरदार उनके लिए लिखे जाते थे, जब उन्हें दिए जाते थे, तब उन्हें इसे अपने तरह से निभाने की पूरी छूट होती थी, लेकिन वक्त के साथ-साथ जैसे कई मशहूर सितारें धूमिल होते गए, वैसे जॉनी वॉकर भी दूर हो गए।

जब दूसरे कॉमेडियन क्षितिज की ओर अग्रसर थे, तब महमूद के दौर का शुभारंभ हो रहा था। जॉनी वॉकर का जहां कॉमेडी का अपना एक खास अंदाज था, महमूद और भी ज्यादा विविधरंगी थे। उनका करियर लगभग दो दशकों तक चला और उस दौर में महमूद के बिना किसी फिल्म को सोचना भी मुश्किल था।

कॉमेडियन की इस श्रेणी में किशोर कुमार का भी नाम आता है। एक बहुमुखी अभिनेता जिन्होंने फिल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया और इसके साथ ही 70 के दशक में संगीत की दुनिया में भी वह एक गायक के तौर पर छाए रहे। किशोर कुमार को शायद आज उनके गाए सदाबहार गीतों के लिए ज्यादा याद किया जाता है, लेकिन इसके साथ ही उन्हें उनके भाइयों अशोक कुमार और अनूप कुमार के साथ सदाबहार कॉमेडी फिल्म ‘चलती का नाम गाड़ी’ के लिए भी याद किया जाता है।

इसके बाद इस सूची में देवेन वर्मा का नाम आता है, जो ऋषिकेश मुखर्जी, बासु चटर्जी और इस तरह के कई निर्देशकों के लिए पहली पसंद थे, जिन्होंने अपने समय में बेहतरीन कॉमेडी फिल्मों का निर्माण किया जो लोगों को आज भी गुदगुदाते हैं।

इसके बाद आए समय में परेश रावल ने देवेन वर्मा की जगह ली, जिन्होंने महज अपने चेहरे के भावों से दर्शकों को हंसाया। इस काम को धीरे-धीरे इरफान खान, बोमन ईरानी और अनु कपूर जैसे अभिनेताओं ने भी बखूबी संभाला। इनकी फिल्मों का इंतजार दर्शकों को हमेशा से रहा है।

जॉनी लिवर को इस श्रेणी के कलाकारों में ऐसा आखिरी कॉमेडियन कहा जा सकता है, जिनके साथ दर्शक खुद को जोड़ पाए।

पहले की फिल्मों में मसखरा ज्यादा नहीं होता था। कॉमेडियन राजेंद्रनाथ को ही इस संदर्भ में देख लीजिए। वह फिल्मों में या तो हीरो के दिली दोस्त होते थे या हीरोइन की सहेली के साथ उनकी जोड़ी बनाई जाती थी। फिल्मों में अपने मजेदार अंदाज से वह दर्शकों के दिलों को जीतने में सफल रहे। ये वह दौर था जब अश्लीलता और डबल मीनिंग वाले संवादों का इस्तेमाल फिल्मों में नहीं किया जाता था।

1980 के दशक की बात करें तो इस दौरान हिंदी में दक्षिण भारतीय फिल्मों के कई रीमेक बने। इन फिल्मों में ऐसे विलेन या खलनायक होते थे जो कॉमेडी भी करते थे। इन फिल्मों में कॉमेडी करने वाले छह से सात कलाकार होते थे, जिनमें कादर खान मुख्य रहते थे।

कादर खान की इस टोली में असरानी, रंजीत, जानकीदास और सीएस दुबे जैसे कुछ कम हास्य कलाकार शामिल थे, जबकि शक्ति कपूर, अमजद खान, प्रेम चोपड़ा, जगदीप और तेज सप्रू बारी-बारी से कॉमेडी और विलेन की भूमिका निभाते थे।

बीते दौर के इन कॉमेडियन में मोहन चोटी, पेंटल, जुगनू, केष्टो मुखर्जी, भगवान दादा, सतीश शाह, राकेश बेदी, सतीश कौशिक, टीकू तलसानिया, देवेन भोजानी, दिलीप जोशी जैसे कई और बेहतरीन कलाकारों के नाम शामिल हैं।

इनमें आज के कृष्णा अभिषेक और कपिल शर्मा के नाम भी शामिल हैं, जिन्होंने टेलीविजन पर अपने बेहतर काम से अपनी एक खास जगह बनाई।

लेकिन दुख की बात तो यह है कि अश्लील शब्दों का इस्तेमाल किए बगैर दर्शकों को हंसाने वाले इन शानदार कलाकारों की नस्ल धीरे-धीरे गायब होती रही। उनके इस कदर दूर होने की वजह क्या है? आज की कहानियों में उनके लिए कोई जगह नहीं है और न ही ऐसे लेखक हैं, जो अपनी कहानियों में उनके लिए भी किरदारों की रचना कर सकते हैं।

इन सबके साथ ही अब आखिर में जरा उन कलाकारों पर भी गौर फरमाया जाए, जिन्होंने फिल्मों में अपनी मुख्य भूमिका की कमान थामे हुए कॉमेडी भी की। इनमें अमिताभ बच्चन, गोविंदा, अनिल कपूर, अजय देवगन, सलमान खान, अक्षय कुमार, रणवीर सिंह और रणबीर कपूर इत्यादि शामिल हैं।

इन्होंने कॉमेडियन के लिए कोई खास श्रेणी या जगह नहीं छोड़ी है।

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