कहीं आफत ना बने करतारपुर कॉरिडोर

प्रभात कुमार रॉय

गुरुनानक देव के 550 वें प्रकाश पर्व के शानदार अवसर उपस्थित हुआ है और 9नवंबर को करतारपुर कॉरिडोर तीर्थ यात्रियों को समर्पित कर दिया गया. करतारपुर कॉरिडोर भारत के तीर्थ यात्रियों को भारत की सरहद पार पाकिस्तान के करतारपुर नगर में स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब के दर्शन कराने ले जाएगा. वर्ष 1998 में वाजपेयी सरकार और नवाज़ शरीफ हुकूमत के मध्य संपन्न हुई वार्ता में करतारपुर कॉरिडोर को निर्मित करने पर बाकायदा विचार-विमर्श किया गया था. किंतु तकरीबन 21 वर्ष के दीर्घ अंतराल के पश्चात नरेंद्र मोदी सरकार और इमरान खान हुकूमत के दौर में 9 नवंबर, 2019 को करतारपुर कॉरिडोर एक वैचारिक प्रस्ताव से हकीक़त बन गया है. एक तरफ बड़ी प्रसन्नता का विषय है कि गुरुनानक देव के भक्तों को करतारपुर कॉरिडोर का बड़ा मनचाहा तोहफा मिल गया है, वहीं दूसरी तरफ प्रबल आशंका है कि करतारपुर कॉरिडोर द्वारा पाकिस्तान पधारे तीर्थ यात्रियों के मध्य पाक़ में डेरा डाले हुए खालिस्तान समर्थक आतंकवादियों को अपने पृथकतावादी विषाक्त विचारों का प्रचार प्रसार करने का मौका निरंतर उपलब्ध हो जाएगा. उल्लेखनीय है कि वर्ष 1978 से पाकिस्तान हुकूमत द्वारा पृथकतावादी खालिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय और सैन्य प्रशिक्षण प्रदान किया जाता रहा.

तकरीबन 14 वर्ष तक खालिस्तानी आतंकवाद द्वारा पाकिस्तान के प्रबल और सक्रिय समर्थन से पंजाब की धरती पर बड़ा खून खराबा अंजाम दिया गया. पंजाब प्रांत में खालिस्तानी आतंकवाद द्वारा तकरीबन पचास हजार बेगुनाह इंसानों को कत्ल किया गया. भारतीय सुरक्षा बलों द्वारा बड़े बलिदान देकर ही खालिस्तानी आतंकवाद का भौतिक खात्मा वर्ष 1993 में मुमकिन हो सका. दुर्भाग्यपूर्ण तौर पर खालिस्तान निर्माण करने की परिकल्पना आज भी खालिस्तानी सरगनाओं के दिल ओ दिमाग में बाकायदा जीवंत बनी हुई है. अनेक खालिस्तानी आतंकवादी सरगनाओं को आज भी पाक़ हुकूमत बाकायदा पनाह प्रदान किए हुए है. इन आतंकवादी सरगनाओं में एक कुख्यात सरगना गोपाल सिंह चावला को तो पाकिस्तान गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (पीजीपीसी) में पाक़ हुकूमत द्वारा प्रमुख स्थान प्रदान किया गया था और उसके साथ ही एक अन्य कुख्यात सरगना बिशन सिंह को भी पीजीपीसी में शामिल किया गया था.

उल्लेखनीय है कि खालिस्तानी सरगना गोपाल सिंह चावला का घनिष्ठ संबंध पाक़ आईएसआई और हाफिज सईद सरीखे ज़ेहादी आतंकवादियों के साथ रहा है. भारत सरकार के अत्यंत कड़े एतराज के तत्पश्चात ही गोपाल सिंह चावला और बिशन सिंह को पाकिस्तान गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (पीजीपीसी) से हटा दिया गया. किंतु सरगना बिशन सिंह के स्थान पर उसके सगे भाई और आतंकवादी सरगना अमीर सिंह को पीजीपीसी में स्थान प्रदान किया गया. इमरान खान हुकूमत के इसी एक ही कारनामे से ही बखूबी समझा जा सकता है कि करतारपुर गलियारे की आड़ में पाक़ आईएसआई पंजाब प्रांत में क्या साजिश अंजाम देना चाहती है. कश्मीर विवाद में प्रत्येक मक़ाम पर शिकस्त खा चुकी इमरान हुकूमत, अब वस्तुतः भारत के प्रांत पंजाब में मृत प्रायः खालिस्तानी आतंकवाद को फिर से सक्रिय करने का निर्णय कर चुकी है. इसका सबसे अहम और ताजा प्रमाण है कि पाक़ हुकूमत द्वारा कम से कम दस दफ़ा ड्रोन विमानों का इस्तेमाल करके पंजाब में विभिन्न स्थानों हथियार गिराए गए. पंजाब पुलिस की जबरदस्त निगरानी और सतर्कता के कारण ही ड्रोन विमानों द्वारा गिराए गए तकरीबन सभी हथियारों को बरामद कर लिया गया और साथ ही बड़े पैमाने पर खालिस्तानी आतंकवादियों को गिरफ्तार कर लिया गया. पंजाब पुलिस की इस बड़ी कामयाबी से यह ना समझ लिया जाए कि पंजाब प्रांत से खालिस्तान आतंकवाद के पुनर्जीवित हो जाने का खतरा खत्म हो गया है. वास्तविक वस्तुस्थिति तो यह है कि नारकोटिक ड्रग्स की दुर्भाग्यपूर्ण चपेट में आ चुके पंजाब पर खालिस्तानी आतंकवाद का खतरा फिर से मंडराने लगा है.

पाकिस्तान के फौजी जनरल मिर्जा असलम बेग द्वारा तो यह खुले आम यह दावा किया जा रहा है कि करतारपुर कॉरिडोर पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद को पुनर्जीवित करने के लिए अत्यंत कारगर स्थान सिद्ध हो सकता है. पंजाब के मुख्यमंत्री कप्तान अमरेंद्र सिंह भी करतारपुर कॉरिडोर का खालिस्तानी आतंकवादियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने की प्रबल आशंका प्रकट कर चुके है. हाल ही में दिल्ली में गिरफ्तार की गई खालिस्तान आतंकवाद से संबद्ध महिला कुलबीर कौर द्वारा जो खुलासे किए गए हैं वो भी बहुत चौंकाने वाले है. कुलबीर कौर ने पुलिस को बताया कि पंजाब के नौजवानों को खालिस्तानी आतंकवाद की तरफ आकृष्ट करने के लिए अमेरिका, कनाडा और अन्य देशों से हवाला के माध्यम से बड़ी दौलत भेजी जा रही है.

इस खुलासे से प्रमाणित होता है कनाडा, अमेरिका तथा कुछ अन्य देशों के खालिस्तान समर्थक संगठन फिर से सक्रिय हो उठे है. भारत को अत्यंत सजग और मुस्तैद बने रहना होगा अन्यथा पंजाब में खालिस्तानी आतंकवाद फिर से खून-खराबा अंजाम दे सकता है. पाकिस्तान की हुकूमत और फौज़ आज तक वर्ष 1971 के युद्ध में भारत द्वारा दी गई शिकस्त को कदापि विस्मृत नहीं कर सकी है. पाकिस्तान को विभाजित करके बंग्लादेश के निर्माण को अंजाम देने के लिए पाकिस्तान के हुक्मरॉन खुद को दोषी करार नहीं देकर, वस्तुतः भारत को पाक़ के विभाजन का जिम्मेदार मानते रहे है. अतः किसी भी कीमत पर भी भारत को विखंडित करने का दिवा-स्वप्न देखा करते हैं. पहले पंजाब में और फिर कश्मीर घाटी में बर्बर आतंकवादियों को प्रश्रय, परिपोषण और सैन्य प्रशिक्षण प्रदान करके पाक़ हुक्मरॉन भारत को विभाजित करने की नाक़ाम कोशिश करते रहे हैं.

पाक़ हुक्मरॉनों की फितरत को बदल सकना नामुमकिन रहा है, क्योंकि अनेक दशकों तक पाकिस्तान का आका रहे अमेरिका ने भी अब तो पाकिस्तान से तौबा कर ली है. पाकिस्तान की वास्तविक शासक डीप-स्टेट करार दिए जाने वाली पाक़ फौज रही है जिसके एक वरिष्ठ जरनल मिर्जा असलम बेग के लिए तो करतारपुर कॉरिडोर पाक़ के लिए पंजाब को फिर से खालिस्तानी आतंकवाद में झोंक देने का मार्ग प्रशस्त कर देगा.

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