(एड्स दिवस 1 दिसम्बर के मौके पर)

प्रमोद भार्गवएड्स के सिलसिले में जहां रोगियों के घटने की खबरें आ रही हैं, वहीं कुछ समय पहले आई खबर आश्चर्यजनक खुशी देने वाली है। एचआईवी पीड़ित 49 महिलाओं ने स्वस्थ शिशुओं को जन्म दिया है। हरियाणा के हिसार स्थित सिविल अस्पताल में इन बच्चों का जन्म एक साल के भीतर हुआ है। अस्पताल की एड्स नियंत्रण प्रकोष्ठ की सलाहकार ममता का कहना है कि एचआईवी ग्रस्त गर्भवती के शिशु में वायरस का असर न हो, इसके लिए पीजीआई रोहतक के एआरटी केंद्र से इन महिलाओं को दवा दी जाती थी। इस दवा के असर से शरीर में पनपे सीडी-4 वायरस का असर कम हो गया। नतीजतन महिलाओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ गई। जिससे स्वस्थ बच्चे पैदा हुए। एड्स यानी ह्यूमन इम्यूनोडेफीशिएंसी वायरस (एचआईवी) के असर से लोगों में प्रतिरोधात्मक क्षमता क्षीण होती चली जाती है। भारत में एचआईवी पीड़ित पहला मरीज 1986 में चैन्नई में मिला था। हरियाणा में रोहतक जिले के गांव बोहर में एड्स का पहला मरीज 1989 में मिला था। अभी भी हरियाणा में 28000 एड्स रोगी पंजीबद्ध हैं। ताजा खबर से इस परिप्रेक्ष्य में दो बातें स्पष्ट हुई हैं, एक तो एड्स लाइलाज बीमारी नहीं रही, दूसरे एड्स पीड़ित महिलाएं इलाज के बाद स्वस्थ बच्चों को जन्म दे सकती हैं। अंधेरी जिंदगी में यह उम्मीद की किरण एड्स पीड़ितों में नई जिजीविषा जगाने का काम करेगी।बीती शताब्दी में एड्स को कुछ इस तरह प्रचारित किया गया कि यह महामारी का रूप लेकर दुनिया को खत्म कर देगा। इसे भय का बड़ा पर्याय मानकर दिखाया जा रहा था। एड्स से जुड़े संगठनों की मानें तो पिछले दशक में हर साल 22 लाख लोग एड्स की चपेट में आकर दम तोड़ रहे थे, किंतु अब यह संख्या घटकर 18 लाख रह गई है। मसलन 1997 की तुलना में एड्स के नये मरीजों की संख्या में 21 फीसदी की कमी आई है। कहा जा रहा है कि यदि इस गति से एड्स नियंत्रण पर काम चलता रहा तो दुनिया जल्दी ही एड्स मुक्त हो जाएगी। यहां हैरजअंगेज पहलू यह है कि एड्स के जब सभी मरीजों को उपचार मिल नहीं पा रहा है तो यह बीमारी एकाएक घटने क्यों लगी? दरअसल एड्स को लेकर एक अवधारणा तो पहले से ही चली आ रही थी कि एड्स कोई ऐसी बीमारी नहीं है, जो लाइलाज होने के साथ केवल यौन संक्रमण से फैलती हो? इस कारण इसे सुरक्षित यौन उपायों और दवाओं के कारोबार का आधार भी माना जा रहा था। दुनिया में आई आर्थिक मंदी ने भी एड्स की भयावहता को कम करने का सकारात्मक काम किया है। दरअसल, अबतक एड्स पर प्रतिवर्ष 22 सौ करोड़ डाॅलर खर्च किए जा रहे थे, लेकिन अब बमुश्किल 1400 करोड़ डाॅलर ही मिल पा रहे हैं। इस कारण स्वयंसेवी संगठनों को जागरूकता के लिए धनराशि मिलना कम हुई तो एड्स रोगियों की भी संख्या घटना शुरू हो गई?दुनिया में कथित रूप से फैली एड्स एक ऐसी महामारी है जिसकी अस्मिता को लेकर अवधारणाएं बदलने के साथ-साथ दुनिया के तमाम देशों के बीच परस्पर जबरदस्त विरोधाभास भी सामने आते रहे हैं। हाल ही में एड्स से बचाव के लिए जो नई अवधारणा सामने आई है, उसके अनुसार एड्स से बचाव के लिए टीबी (क्षय रोग) पर नियंत्रण जरूरी है। यह बात कनाडा के टोरंटो शहर में सम्पन्न हुए सोलहवें एड्स नियंत्रण सम्मेलन में प्रमुखता से उभरी। सम्मेलन में यह तथ्य उभरकर सामने आया कि दुनिया भर में जितने एचआईवी संक्रमित लोग हैं, उनमें से एक तिहाई से भी ज्यादा टीबी से पीड़ित हैं। अब सच्चाई यह है कि एड्स को लेकर दुनिया के वैज्ञानिक खुले तौर पर दो धड़ों में बंट गए हैं। आर्थिक मंदी के चलते अब उन लोगों का पक्ष प्रबल होता जाएगा जो एड्स को महामारी नहीं मानते। क्योंकि 1990 के दशक में एड्स का हौवा फैलाने वाले लोगों का दावा था कि 15-20 सालों के भीतर अफ्रीकी देशों की आबादी पूरी तरह बरबाद हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मध्य और दक्षिणी अफ्रीकी देशों की आबादी लगातार बढ़ रही है। उनके नवजात शिशुओं में एड्स के कोई लक्षण देखने में नहीं आ रहे हैं।ब्राजील में कंसाॅर्शियम टु रिस्पाॅण्ड इफेक्टवली टु दी एड्स-टी.बी. एपिडेमिक (क्रिएट) द्वारा ग्यारह हजार लोगों पर एक अध्ययन किया गया। इनमें से कुछ लोगों को सिर्फ एंटीरिट्रोवायरल (एच.आई.वी.रोधक) दवा दी गई। कुछ लोगों को सिर्फ टी.बी. की दवा आइसोनिएजिड दी गई जबकि तीसरे समूह को दोनों तरह की दवाएं दी गईं। नतीजतन एंटीरिट्रोवायरल औषधि से टीबी संक्रमण से 51 प्रतिशत बचाव हुआ। सिर्फ आइसोनिएजिड से 32 प्रतिशत बचाव हुआ। जबकि मिलीजुली दवाएं देने से टीबी संक्रमण का खतरा 67 फीसदी तक कम हो गया। इस निष्कर्ष को महत्व देते हुए अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी एचआईवी संक्रमित रोगियों के लिए मिलीजुली दवा देने की अनुशंसा की है। यह अलग बात है कि इस सिफारिश का पालन भारत में नहीं किया जा रहा है। क्योंकि भारत सहित दक्षिण अफ्रीका में टीबी की रोकथाम के लिए आइसोनिएजिड के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। यह रोक इस डर से लगाई गई थी कि कहीं आएसोनिएजिड के अत्यधिक इस्तेमाल से टीबी का बैक्टीरिया इसका प्रतिरोधी न बन जाए? मगर वैज्ञानिकों को अब यह आभास हो रहा है कि सिर्फ एंटीरिट्रोवायरल दवा देने से पूरा फायदा नहीं मिल पाता और मरीज टीबी का शिकार हो जाता है। अब विश्व स्वास्थ्य संगठन का स्पष्ट मत है कि टीबी पर नियंत्रण एड्स से संघर्ष में सबसे प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए।इसके पूर्व एड्स के सिलसिले में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जो रिपोर्ट जारी की गई थी तब यह दर्शाया गया था कि अफ्रीकी देशों में 38 लाख एड्स रोगी हैं। 22 रोगियों की एड्स के कारण मौतें भी हुईं। तब अफ्रीकी राष्ट्रपति और वहां के वैज्ञानिकों ने इस रिपोर्ट को नकारते हुए एड्स के अस्तित्व को ही अस्वीकार कर दिया था। इस रिपोर्ट पर सख्त असहमति जताते हुए अफ्रीकी सरकार ने न तो इस जानलेवा रोग से निजात के लिए दवाएं उपलब्ध कराईं और न ही एड्स के विरूद्ध वातावरण बनाने के लिए जन-जागृति की मुहिम चलाई। बल्कि इसके उलट अफ्रीका के तत्कालीन राष्ट्रपति थावो मुबेकी ने अंतराष्ट्रीय स्तर पर 33 विशेषज्ञों का पैनल बनाया। इस पैनल की खास बात यह थी कि इसमें सेंटर फाॅर मालीक्यूलर एंड सेलुलर बायोलाॅजी, पेरिस के निदेशक प्रो. लुकमुरनिर भी शामिल थे। प्रो. लुकमुरनिर वही वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने अमेरिकी वैज्ञानिक डा. गैली के साथ मिलकर 1984 में एड्स के वायरस एचआईवी का पता लगाया था। इसके साथ ही इस पैनल में अमेरिका, ब्रिटेन, भारत और अटलांटा के सी.डी.सी. के वैज्ञानिक डाॅ. ऑन ह्यूमर भी शामिल थे।इस पैनल ने अप्रैल 2001 में अपनी अति महत्वपूर्ण रिपोर्ट अफ्रीकी राष्ट्रपति को सौंपते हुए एड्स के वायरस एचआईवी के अस्तित्व पर तीन सवाल उठाते हुए नये सिरे से इसपर अनुसंधान की सलाह दी थी। रिपोर्ट का पहला सवाल था कि संभावित एड्स पीड़ित रोगी में रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता कम होने की वास्तविकता क्या है, जिससे मौत होती है? दूसरा, एड्स से होने वाली मौत के लिए किस कारण को जिम्मेदार माना जाए? तीसरे, अफ्रीकी देशों में विपरीत सेक्स से एड्स फैलता है, जबकि पाश्चात्य देशों में समलैंगिकता से, यह विरोधाभास क्यों? इस रपट में एड्स रोधी दवाओं की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए गए हैं। दरअसल इस परिप्रेक्ष्य में दबी जुबान से वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि एड्स रोधी दवाओं के दुष्प्रभाव से भी रोगी के शरीर में प्रतिरोधात्मक क्षमता कम होती जाती है और नतीजतन रोगी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।भारत के बुद्धिजीवी भी इस महामारी के संदर्भ में नए सिरे से सोचने लगे है। उनका कहना है कि एड्स दुनिया की बीमारियों में एकमात्र ऐसी बीमारी है जो दीन-हीन, लाचार, कमजोर और गरीब लोगों को ही गिरफ्त में लेती है, ऐसा क्यों? एड्स से पीड़ित अभीतक जितने भी मरीज सामने आये हैं, उनमें न कोई उद्योगपति है, न राजनेता, न आला अधिकारी, न डॉक्टर-इंजीनियर, न लेखक-पत्रकार और न ही जन सामान्य में अलग पहचान बनाये रखने वाला कोई व्यक्ति? जबकि अन्य बीमारियों के साथ ऐसा नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि एड्स के मूल में क्या है और उसका उपचार कैसे संभव है? अभी साफ नहीं है। इसपर अभी खुले दिमाग से नये अनुसंधान की और जरूरत है? इन सबके बावजूद यह एक अच्छी बात है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ऐसे आंकड़े देने लगा है जो एड्स रोगियों की तादाद कम दर्शाते हैं। बहरहाल एड्स के परिप्रेक्ष्य में निराशाजनक खबरों के आने का दौर खत्म होता लग रहा है।

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