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    काशी विश्वनाथ गलियाराः अतीत की विवशता से भविष्य के सुनहरे अध्याय का दस्तावेज

    श्रीनिवास आर्य

    कल काशी विश्वनाथ कॉरिडोर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी राष्ट्र को समर्पित कर देश के धार्मिक, सांस्कृतिक व अध्यात्मिक इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया। । यह राष्ट्र की अध्यात्मिक चेतना का काॅरिडोर हैं । इसी के साथ यह काॅरिडोर आक्रांताओं द्वारा विकृत किए गए इतिहास को विस्मृत कर स्वर्णिम अतीत, राष्ट्रीय चरित्र, पुरा पुरुष को जागृत करने का संकल्प है।
    ‘काशी’ भगवान शिव की नगरी हैं , जो सनातन धर्म ग्रंथों के अनुसार इस समस्त जगत के आदि कारक माने जाते हैं। उन्हीं से ब्रह्मा, विष्णु सहित समस्त सृष्टि का उद्भव होता हैं। जगत के प्रारंभिक ग्रंथों में से एक ‘वेद’ में इनका नाम रुद्र है। वे व्यक्ति की चेतना के अर्न्तयामी हैं । हमारे यहाँ शिव का अर्थ कल्याणकारी माना गया है।
    उसी शिव की नगरी कल परिष्कृत रुप में होगी। दुर्भाग्य हैं हमारी विकृत इतिहास परंपरा का जो अपने चारित्रिक नायकों से सीख न लेकर उन्हें ग्रंथों में या परंपराओं में सिमटा रही हैं । कल का आयोजन सदियों की आध्यात्मिक विरासत को जमीन पर उतारने का संकल्प दिवस माना जा सकता हैं । काशी कॉरिडोर के बहाने इतिहास ने नई करवट ली है। भगवान शंकर की यह नगरी, जो धर्म,संस्कृति और संस्कार का गढ़ मानी जाती है, सदियों की गुलामी के कारण ध्वंस और अतिक्रमण की पीड़ा से त्रस्त थीं, इस कॉरिडोर ने इससे मुक्ति जरूर दिलायी है।
    काशी मृत्यु में भी उत्सव का सीख देता हैं । काशी काॅरिडोर तमाम बाधाओं के बीच अपने स्वर्णिम अतीत से जुड़ने का संकल्प देता है। भगवान शिव से जुड़ी एक कथा हैं-
    ‘एक बार माँ काली क्रुद्ध अवस्था में थीं। देव, दानव और मानव सभी उन्हें रोकने में असमर्थ थे। तब सभी ने माँ काली को रोकने हेतु भगवान शिव का सामूहिक स्मरण किया। शिवजी ने भी यह अनुभव किया कि माता काली को रोकने का एकमात्र मार्ग है -प्रेम और वे माँ काली के मार्ग में लेट गए। माँ काली ने ध्यान नहीं दिया और उन्होंने उनकी छाती पर पैर रख दिया। अभी तक महाशक्ति ने जहाँ-जहाँ कदम रखा था, वह जगह नष्ट हो गया था। पर यहां अपवाद हुआ । माँ काली ने जब देखा उनका पैर भगवान शिव की छाती पर हैं, वे पश्चाताप करने लगीं। इस कथा का सार यहीं हैं कि हर कठिन कार्य का सामना आत्म बल के साथ किया जा सकता हैं।
    काशी ने अपने ध्वंस को बार-बार देखा हैं । दुनिया की इस प्राचीन नगरी ने सब कुछ देखा है। पर बार-बार उठ खड़ी हुई है – काशी। काशी ने भारतवर्ष को संस्कृति, भाषा में राह दिखाया हैं । कभी देवी अहिल्या बाई और महाराजा रणजीत सिंह ने काशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कर सनातन संस्कृति के प्रतीक द्वार को जीवंत किया था, बाद में महामना मदन मोहन मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के रुप में और अब प्रधानमंत्री मोदी ने इस महान नगरी को पूरे धैर्य और सम्मान के साथ जीवंतता दी हैं । आप बधाई के पात्र हैं माननीय प्रधानमंत्री । आपने इस काॅरिडोर के द्वारा पूरी दुनिया में सनातन संस्कृति के इस महान स्थल को नया स्वर दिया है।
    कहा जाता है काशी में भगवान शिव राजराजेश्वर के रुप में विराजमान हैं । बाबा विश्वनाथ के दरबार में चार प्रमुख द्वार हैं। शांति द्वार, कला द्वार, प्रतिष्ठा द्वार और निवृत्ति द्वार। पूरी दुनिया में यही एक ऐसा स्थान है, जहां शिव-शक्ति एक साथ विराजमान हैं और तंत्र द्वार भी है। कामना हैं शिव की इस धरा से भारत भूमि पर शांति, कला, प्रतिष्ठा का द्वार प्रशस्त हो ।
    काशी विश्वनाथ काॅरिडोर का जाग्रत स्वर हमारी सनातन संस्कृति की जड़ों की ओर भी हमें ले जाता है। इस देश की सांस्कृतिक अस्मिता और परंपरा के लिए अभी बहुत कार्य शेष हैं । फिर भी यह कहा जा सकता हैं, जो सभी सांस्कृतिक योद्धाओं को समर्पित ।
    “झुकी-दमित, दबी आंखें अब आशावान हो रही है,
    जिन सुरखी-चुने की मजबूत दीवारों पर आपने अविश्वास और झूठ की नोनी लगाई थी वो अब भरभरा रही है,
    एक दिन सब धूल-धक्कड में उड़ जाएंगे।
    धीरे-धीरे सैकड़ो साल पुराने झूठ, भ्रांतियों के अवशेष।

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