विदेशी आतंक से मुक्त होती घाटी

संदर्भः- विदेशी आतंकी अबु दुजाना का सुरक्शाबलों के हाथों मारा जाना

प्रमोद भार्गव

सेना ने दुर्दांत आतंकियों की सूची में शामिल खुंखार आतंकी अबु दुजाना को मार गिराया है। यह लश्कर-ए-तैयबा का कमांडर था। पुलवामा के हाकरीपोरा क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में अबु तो मारा गया। साथ ही   इसका साथी लालिहारी भी मार गिराया गया। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान का रहने वाला दुजाना 7 साल से कश्मीर में आतंकी वारदातों को अंजाम दे रहा था। इसने सुरक्शाबलों पर भी कई हमले किए थे। पांच मर्तबा सेना को चकमा देकर भाग जाने वाले इस आतंकी पर 15 लाख का ईनाम घोशित था। यह उधमपुर और पंपोर समेत कई हमलों में शामिल था। 2013 में अबु कासिम के मारे जाने के बाद लश्कर ने इसे कमांडर बना दिया था। यह तभी से घाटी में खून-खराबा कर रहा था। पिछले साल जुलाई में बुरहान बानी के मारे जाने के बाद सेना के निशाने पर दुजाना आ गया था।  बीते एक वर्ष में कश्मीर में तीन दर्जन से भी ज्यादा आतंकवादी मारे गए हैं। इनमें वह सब्जार अहमद भट भी शामिल था, जिसने हिजबुल मुजाहिदीन बुरहान बानी की जगह ले ली थी। लेकिन कुछ माह पहले उसकी अय्याशी की खबरें मिलने के बाद उसके संगठन के अकाओं ने उसकी हैसियत घटा दी थी। इस कारण वह असमंजस में था और अलकायदा की ओर रुख कर रहा था। साथ ही इस्लामी इस्टेट की विचारधारा को मानने वाले जाकिर मूसा के भी संपर्क में था। मूसा कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने या अजादी दिलाने की बजाए इस्लामी इस्टेट का हिस्सा बनाना चाहता है। मूसा ने शरीयत का कानून नहीं मानने वाले हुर्रियत के अलगाववादियों को भी धमकाया था। इससे यह पता चलता है कि कश्मीर में सक्रिय आतंकी गुटों में भी गुटबाजी उभर रही है। इसी वजह से हाल ही में जो अमरनाथ यात्रियों पर हमला हुआ था। उसके पीछे अबु दुजाना और अबु इस्माइल की वजूद कायम बनाए रखने की भी जिद् शामिल थी। दुजाना ने हाकरीपोरा गांव के खुर्शीद  की बेटी रुकैया की बेटी से विवाह किया था। यह गांव लश्कर-ए-तैयबा के गढ़ नेवा की सीमा से सटा है। दुजाना अय्याशी के लिए अपनी प्रेमिका शाजिया के घर भी  आता जाता था। दुजाना अपने साथ आरिफ के साथ रुकैया से मिलने हाकरीपोरा पहुंचा था। सेना, सीआरपीएफ और जम्मू-कश्मीर पुलिस को इसके आने की सटीक जानकारी मिल गई। इसके बाद मुठभेड़ हुई और दोनों आतंकी मारा गिराए गए। पिछले दो सालों में विदेशी आतंकियों की घुसपैठ कश्मीर में बढ़ी है। 2015 में 88 विदेशी आतंकी और 2016 में 91 आतंकी मारे गए हैं। विदेशी आतंकियों के मामले में हैरानी की बात यह है कि स्थानीय लोगों को भी इन्हें समर्थन प्राप्त हो जाता है। हालांकि हुर्रियत के नेताओं की गिरफ्तारी के बाद यह नेटवर्क टूट रहा है। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि राष्ट्रीय जांच एंजेंसी (एनआईए) ने कश्मीर घाटी में पत्थरबाजी तथा आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले अलगावादियों पर शिकंजा कस दिया है।

पिछले दिनों पाकिस्तान से धन लेकर कश्मीर में आग लगाने वाले सात अलगावदियों को एनआईए ने हिरासत में लिया है। केंद्र सरकार ने इन्हें गिरफ्तार करके उस संकल्प शक्ति का परिचय दिया है, जिसे दिखाने की बहुत पहले जरूरत थी। जम्मू-कश्मीर के अलगावादी जम्मू-कश्मीर को अस्थिर बनाए रखने के साथ पाकिस्तान के शह पर  इसे देश से अलग करने की मुहिम भी चलाए हुए हैं। इस नाते गिरफ्तार किए गए अलगावादी देशद्रोह का काम कर रहे थे। इसलिए इन पर देश की अखंडता व संप्रभुता को चुनौती देने के परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रद्रोह का मामला बनता है। आतंक और देश की संपत्ति को नष्ट करने के लिए लिया गया विदेशी धन राष्ट्रद्रोह से जुड़ी गतिविधियां ही हैं। क्योंकि चंद लोगों के राष्ट्रविरोधी रूख के कारण देश का भविष्य दांव पर लगा हुआ है।  देश के विरूद्ध षड़यंत्र करने वाले ये कथित नेता अब तक पूर्व की केंद्र सरकारों के ढुलमुल रवैये एंव शिथिल नीतियों के कारण बचे हुए थे। लिहाजा इनके हौसले बुलंद थे और बेखौफ विदेशी धन लेकर कश्मीरी युवाओं को भड़काने में लगे थे। एक समाचार चैनल पर दिखाए गए स्टिंग आॅपरेशन में हुर्रियल नेता नईम खान कथित तौर पर यह स्वीकार कर रहा था कि उसे हवाला के जरिए पाकिस्तानी आतंकी संगठनों से फंडिग मिल रही है। इसी खुलासे के बाद एनआईए ने मामले की जांच शुरू की थी। एनआईए को यह जानकारी भी मिली थी कि कश्मीर में ‘अशांति फैलाने के बड़े षड़यंत्र के तहत‘ घाटी में स्कूलों और सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने की साजिष की जा रही है। स्टिंग आॅपरेशन में भी नईम खान ने कथित रूप से दावा किया था कि पाकिस्तान द्वारा रचे गए षड़यंत्र के तहत शिक्षण संस्थानों को निशाना बनाया जा रहा है। ये बात बार-बार जाहिर हुई है कि जम्मू-कश्मीर के आम लोग शांतिपूर्वक अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं। वे राष्ट्रीय मुख्यधारा में रहकर जीना चाहते हैं।

लेकिन अलगाववादियों के षड़यंत्र के कारण वे कई बार गुमराह हो जाते हैं। अलगाववादियों पर ढिलाई का ही परिणाम था कि कश्मीर में अराजकता निरंतर फैल रही थी। नतीजतन जम्मू-कश्मीर के पूंछ सेक्टर में भारत की जमीन में आकर पाकिस्तानी सेना और आतंकी कायराना हमले करने में लगे हुए हैं। रोजाना जवान शहीद हो रहे हैं। यहां तक कि शहीदों के शवों को भी अंग-भंग किया जा रहा है। श्रीनगर के नौहट्टा इलाके में जामिया मस्जिद के पास हुई घटना में एक बेकाबू भीड़ ने डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित को ड्यूटी पर तैनात रहते हुए मार डाला था। पंडित पर पत्थरों और लाठियों से बेरहमी से हमला बोलकर उनकी हत्या कर दी गई थी। इस घटना के अंजाम से अर्थ निकलता है कि श्रीनगर पुलिस अधिकारियों के लिए भी असुरक्शित हो चुका है। अन्य की तो बिसात ही क्या है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विश्व-फलक पर आतंकवाद के पोशक के रूप में पाकिस्तान के खिलाफ जो मुहिम चलाई हुई है, उसका अब प्रभाव दिखाई देने लगा है। अमेरिका ने पाकिस्तान की आर्थिक मदद रोक दी है। हालांकि मोदी की कूटनीतिक आक्रामकता के बावजूद चीन न केवल पाक का खुला मददगार बना हुआ है, बल्कि डोकलाम को लेकर चीन और भारत के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है।  पिछले महीने बुरहान बानी के परिजनों और सेना पर पत्थर बरसाने वाले लोगों को जम्मू-कश्मीर सरकार ने मुआवजे दिए और यहां के मानवाधिकार आयोग ने कई पत्थरबाजों के लिए सरकार से मुआवजे की मांग की। ऐसे में सवाल उठता है कि जो मानवाधिकारों के वाकई में असली उल्लंघनकर्ता हैं, उन्हें मुआवजा और संरक्षण किए लिए ? भारतीय दंड संहिता के मुताबिक तो ये देशद्रोह के आरोप में सजा के हकदार है। आतंकवाद और अलगाववाद जब नागरिकों के शांति से जीने के अधिकार में दखल देते है, तब राज्य को उनसे निपटने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत पड़ती है, ऐसे में यदि बाईदवे सुरक्शाबलों से ज्यादती भी हो जाए तो उसे नजरअंदाज करना पड़ता है। लेकिन भारत में मानवाधिकार संगठन सुरक्शाबलों की बजाय आतंकियों की पैरवी करते दिखाई दे रहे हैं। डार को मुआवजे की सिफारिश और बुरहान बानी के परिजनों को राज्य सरकार द्वारा मुआवजा दिया जाना इसी श्रृंखला की विस्मित कर देने वाली कड़ियां हैं। जबकि कश्मीर में आतंकवाद मानवाधिकारों और लोकतंत्र पर खतरे के रूप में उभरा है।

पंजाब में भी इसी तरह का आतंकवाद उभरा था। लेकिन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की दृढ़ इच्छा शक्ति ने उसे नेस्तनाबूद कर दिया था। कश्मीर का भी दुश्चक्र तोड़ा जा सकता है, यदि वहां की सरकार मजबूत इरादे वाली होती। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती दुधारी तलवार पर सवार हैं। एक तरफ तो उनकी सरकार भाजपा से गठबंधन के चलते केंद्र सरकार को साधती दिखती है, तो दूसरी तरफ हुर्रियत की हरकतों को नजरअंदाज करती है। इसी कारण वह हुर्रियत नेताओं के पाकिस्तान से जुड़े सबूत मिल जाने के बावजूद कोई कठोर कार्यवाही नहीं कर पा रही थीं। नतीजतन राज्य के हालात नियंत्रण से बाहर हुए। महबूबा न तो राज्य की जनता का भरोसा जीतने में सफल रही हैं और न ही कानून व्यवस्था को इतना मजबूत कर पाई हैं कि अलगाववादी व आतंकी खौफ खाने लग जाएं। साफ है, महबूबा में असरकारी पहल करने की इच्छाशक्ति नदारद है।  लेकिन अब देशविरोधी ताकतों पर जिस तरह से शिकंजा कसा है, उससे लगता है कि अब सरकार ने सही दिशा में कदम उठा दिए हैं।

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