कविवर टैगोर : कुछ विवाद – कुछ प्रवाद

 

रवीन्द्र नाथ टैगोर (7 मई 1861–7 अगस्त 1941), जिन्हें आधुनिक भारत में “ गुरुदेव “ का सम्मान मिला, ऐसे महाकवि, जिन्हें साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला, विश्व के एकमात्र ऐसे कवि जिनके लिखे गीतों को दो भिन्न देशों में “राष्ट्रगान “ का सम्मान मिला, बहु-आयामी व्यक्तित्व के ऐसे धनी जो हर आयाम में शिखर पर विद्यमान हैं, पर जिनके साथ कुछ विवाद और कुछ प्रवाद भी जुड़े हुए हैं । आइए, उन्हें समझने का प्रयास करें ।

 

1. गुरुदेव का परिवार :

गुरुदेव का परिवार भौतिक दृष्टि से संपन्न, सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध और बौद्धिक दृष्टि से जागरूक प्रतिष्ठित परिवार था । बंगाल में समाजसुधार की तत्कालीन प्रमुख संस्था ब्रह्मसमाज की स्थापना करने में और बाद में उसका प्रचार करने में इस परिवार का विशेष हाथ रहा । जो लोग “ जन्मना जाति “ को महत्वपूर्ण मानते हैं, उनके लिए यह जानकारी भी आवश्यक होगी कि वे ब्राह्मण थे ; पर शायद इतना ही बताना काफी नहीं क्योंकि हर जाति के हमारे यहाँ अनेक उप-वर्ग हैं । इस आधार पर अनेक लोग इस परिवार को “पिराली ब्राह्मण” कहते हैं । इस शब्द का प्रयोग प्रायः सुनने में नहीं आता । यह शब्द कैसे और क्यों बना, इसकी एक कहानी सुनाई जाती है । बात उस समय की है जब बंगाल में मुसलमानों का शासन था । कहते हैं जेस्सोर के मुसलमान सूबेदार के यहाँ ब्राह्मण परिवार का एक व्यक्ति वजीर था जिसने कुछ ही समय बाद इस्लाम कबूल कर लिया । उसका नाम रखा गया मो. ताहिर पीर अली । बाद में, इसके कामों और रुतबे से प्रभावित होकर दो और ब्राह्मण भी मुसलमान बन गए । यह देखकर कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने इस परिवार के शेष लोगों को पिराली ब्राह्मण कहना शुरू कर दिया । गुरुदेव का संबंध इसी परिवार से बताया जाता है । टैगोर / ठाकुर उपनाम इस परिवार ने बाद में अपनाया, यों पहले मूल उपनाम बंद्योपाध्याय था ।

 

 

2. राष्ट्रगान :

गुरुदेव विश्व के एकमात्र ऐसे कवि हैं जिनके लिखे दो गीत दो भिन्न देशों के राष्ट्रगीत बने – भारत में “जन गण मन ” और बांग्ला देश में “आमार सोनार बांग्ला देश ” ; पर इस दृष्टि से भी वे विश्व के एकमात्र ऐसे कवि हैं जिनके (भारत वाले) राष्ट्रगान पर यही विवाद है कि उसमें राष्ट्र की वन्दना की गई है या राष्ट्र को पद-दलित करने वाले ब्रिटिश शासकों का प्रशस्ति गान किया गया है ?

इस विवाद को पुष्ट करने वाले कई तथ्य मुंह चिढ़ाते रहते हैं । सबसे पहला तो है गीत लिखने का अवसर । देश पर ब्रिटेन की हुकूमत थी । महारानी विक्टोरिया का 22 जनवरी 1901 को देहांत हो चुका था और अब गद्दी पर विराजमान थे जार्ज पंचम ।  वे अपनी पत्नी महारानी मैरी सहित 1911 में भारत आने और दो महत्वपूर्ण घोषणाएं करने वाले थे – (1) देश की राजधानी कलकत्ता के बजाय दिल्ली बनाना, और (2)  बंगाल के उस विभाजन को समाप्त करना जो लार्ड कर्ज़न ने अक्टूबर 1905 में  किया था । कर्जन के समय का बंगाल वर्तमान बंगाल से एकदम भिन्न था । उसमें बिहार, उड़ीसा, और असम भी शामिल थे । कर्जन ने इसे दो भागों में बांटा – एक का नाम रखा बंगाल जिसमें पश्चिमी बंगाल और उसके साथ उड़ीसा एवं बिहार था (यह हिंदू बहुल था) ; दूसरे को पूर्वी बंगाल कहा जिसमें बंगाल के कुछ भाग के साथ असम भी था (यह मुस्लिम बहुल था) । यह विभाजन धार्मिक आधार पर किया गया था, अतः इसका ज़बरदस्त विरोध हुआ जो बंग-भंग आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध है ।

 

गुरुदेव यों तो अंग्रेज़ सरकार के समर्थक थे, पर वे बंगाल के विभाजन के पक्ष में नहीं थे । अतः जब सरकार ने कर्जन के विभाजन को समाप्त करके (भाषा के आधार पर बांग्लाभाषी) बंगाल प्रान्त बनाने का, तथा शेष भाग में बिहार, उड़ीसा एवं असम के पृथक प्रान्त बनाने का निश्चय किया तो वे भी इससे प्रसन्न हुए । इसे बंग-भंग आंदोलन की सफलता माना गया । अतः पूरे बंगाल में खुशी का माहौल था और जार्ज पंचम के आगमन का लोग स्वागत कर रहे थे । तत्कालीन कांग्रेस ने भी सम्राट का सम्मान करने और उसके प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने का निश्चय किया ( उस समय की कांग्रेस महात्मा गाँधी वाली कांग्रेस से एकदम अलग थी । तब कांग्रेसी सूट, बूट पहने, टाई और हैट लगाए कुर्सियों पर बैठे, अंग्रेजी में बात करते थे । )  इसी अवसर के लिए एक “ सरकारी अधिकारी “ ने जो गुरुदेव का मित्र था, सम्राट की प्रशस्ति में एक गीत लिखने का उनसे अनुरोध किया ।

 

गुरुदेव अपने सिद्धांतों के प्रति अत्यंत निष्ठावान थे । बंग-भंग आंदोलन के समय जब सामाजिक एकता पुष्ट करने की दृष्टि से कुछ लोगों ने बंगाल में दुर्गा के रूप के साथ भारतमाता के रूप को मिलाकर एक नए रूप में दुर्गापूजा सार्वजनिक रूप से मनाने का निश्चय किया और इसके लिए गुरुदेव से दुर्गा की भक्ति एवं आराधना का गीत लिखने का अनुरोध किया, तो  बंग-भंग आंदोलन के प्रबल समर्थक होने के बावजूद उन्होंने ऐसा गीत लिखने से साफ़ इनकार कर दिया । उन्होंने कहा कि दुर्गा में मेरी कोई आस्था नहीं है, यह भक्ति मेरे अंतःकरण से नहीं हो सकेगी, ऐसा गीत लिखना तो मेरे लिए अपराध जैसा होगा । ( देखें, प्रभात कुमार मुखर्जी, रवीन्द्र जीवनी, खंड – 2, पृष्ठ 339 ; पुलिन बिहारी सेन को 10 नवंबर 1937 को लिखा पत्र) ।

जिस दृढता से गुरुदेव ने दुर्गा पर गीत लिखने के प्रस्ताव को ठुकराया, उसी दृढ़ता से वे जार्ज पंचम के प्रशस्ति गान के लिए इनकार नहीं कर सके और उन्होंने जो गीत लिखा वह था, “जन गण मन …..” ।

संयोग यह भी है कि इस गीत में वन्दे मातरम्  की तरह भारत माता की प्रशस्ति नहीं, देश के केवल उस भू-भाग (पंजाब सिंध गुजरात मराठा…) का उल्लेख किया गया है जो अंग्रेज़ सरकार के अधीन था । कश्मीर, राजस्थान, मैसूर जैसी महत्वपूर्ण देसी रियासतों का इस गीत में कोई उल्लेख नहीं हुआ है । इस तथ्य के कारण विवाद और बढ़ गया ।

कोढ़ में खाज वाली एक बात इसमें और जुड़ गई । इस गीत का प्रथम गायन कांग्रेस के एक  अधिवेशन में स्वयं गुरुदेव ने किया, और वह अधिवेशन सम्राट को धन्यवाद देने के लिए ही आयोजित किया गया था । इसीलिए तत्कालीन अनेक समाचारपत्रों ने अपनी रिपोर्ट में यही लिखा कि सम्राट के सम्मान में टैगोर ने गीत गाया ।  “ The Bengali poet Babu Rabindranath Tagore sang a song composed by him specially to welcome the Emperor.“ (Statesman, Dec. 28, 1911). “When the proceedings of the Indian National Congress began on Wednesday 27th December 1911, a Bengali song in welcome of the Emperor was sung. A resolution welcoming the Emperor and Empress was also adopted unanimously.“ (Indian, Dec. 29, 1911).

गुरुदेव ने उस समय इस रिपोर्टिंग पर तो कोई टिप्पणी नहीं की ; पर विवाद बढ़ते चले जाने पर, लगभग 26 वर्ष बाद (10 नवंबर 1937 को एक पत्र में) कहा कि हमें जो सफलता मिली है, वह भगवान की कृपा से मिली है, वही हमारा भाग्य विधाता है । अतः मैंने उसकी स्तुति में गीत लिखा । गुरुदेव ने अपने मन की बात तो कही, पर बात कहने में बहुत देर लगा दी ।

 

3. नोबल पुरस्कार :

 

गुरुदेव की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित होने लगी थीं ।  वे बोलपुर के निकट “ शान्ति निकेतन ” में ” ब्रह्मचर्य आश्रम ” नाम से एक विद्यालय की 22 दिसंबर 1901 को स्थापना कर चुके थे। इस सबके बावजूद अभी उनकी ख्याति बंगाल के बाहर अधिक नहीं थी । सन 1913 में जब उन्हें गीतांजलि पर नोबल पुरस्कार मिला तब उनकी प्रसिद्धि पूरे विश्व में फैल गई ; पर यह पुरस्कार कैसे मिला – इस बारे में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं ।

 

“जन गण मन ….” वाली घटना घट ही चुकी थी और इस गीत की चर्चा सम्राट की प्रशस्ति के रूप में हुई थी । कुछ लोगों का कहना है कि साहित्य का नोबल पुरस्कार देने की जो प्रक्रिया है, उसमें पुरस्कार योग्य समझी जाने वाली पुस्तकों की पहले एक लंबी सूची, फिर उसके आधार पर एक छोटी सूची बनाई जाती है, और तब अंतिम निर्णय किया जाता है ; पर गीतांजलि का नाम पहली सूची में ही नहीं था । तो पुरस्कार कैसे मिला ? कुछ लोग इसके पीछे सम्राट के प्रशस्ति गान की भूमिका देखते हैं, तो कुछ लोग इसे ब्रह्म समाज की ईसाइयत के प्रति नरम नीति का पुरस्कार बताते हैं । ब्रह्म समाज ने जो समाज सुधार का कार्य किया, उसकी प्रेरणा उसे ईसाई पंथ से ही मिली । बाद में उस पर ईसाइयत का प्रभाव बढ़ता गया और केशवचंद्र सेन के समय में तो ब्रह्म समाज ईसाइयत में पूरी तरह रंग चुका था । ब्रह्मसमाजी होने का अर्थ हो गया था अंग्रेज सरकार और ईसाइयत का समर्थक।  (रामधारीसिंह ‘दिनकर’, संस्कृति के चार अध्याय, उदयाचल, पटना,1993 पृ.. 542-545) नोबल पुरस्कार के पीछे ईसाइयत के समर्थन वाले अनुमान को इस तथ्य से और बल मिला कि गुरुदेव को पुरस्कार “ भारतीय “ या “ बंगाली “ के रूप में नहीं, “ एंग्लो इंडियन “ के रूप में दिया गया । यह भी ध्यान देने की बात है पुरस्कार समारोह में जो भाषण दिया जाता है, वह गुरुदेव ने दिया ही नहीं । वे पुरस्कार लेने वहां गए ही नहीं। उन्होंने यहीं से एक तार भेज दिया जिसे वहां स्टाकहोम में पढ़कर सुना दिया गया ।

 

4. गांधी जी को महात्मा की उपाधि :
कुछ लोग कहने लगे हैं कि गांधी जी को सबसे पहले “ महात्मा “ की उपाधि गुरुदेव ने ही दी, पर तथ्यों से यह प्रमाणित नहीं होता । गांधी जी ने जब दक्षिण अफ्रीका से भारत आने का निश्चय किया तो सबसे पहले अपने फोनिक्स आश्रम के विद्यार्थियों को भारत भेजने का निश्चय किया । गांधी जी चाहते थे कि भारत में इन विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था ऐसी जगह होनी चाहिए जहाँ ये सब एक साथ रह सकें और इनका अध्ययन भी जारी रह सके । ऐसा स्थान खोजने के लिए उन्होंने अपने सहयोगी सी एफ एंड्रयूज़ से कहा । एंड्रयूज़ ने दो स्थान चुने – गुरुकुल कांगड़ी  (हरिद्वार) और शांतिनिकेतन । गांधी जी का पत्र द्वारा परिचय गुरुकुल कांगड़ी के संस्थापक स्वामी श्रद्धानंद से तो था (जिनका नाम उस समय महात्मा मुंशीराम था, और जिन्होंने गांधी जी के दक्षिण अफ्रीका में चलाए सत्याग्रह आंदोलन में अपने गुरुकुल की ओर से आर्थिक सहयोग भी दिया था), पर टैगोर से गांधी जी का कोई सम्पर्क नहीं था  । भारत आकर ये विद्यार्थी पहले (1914 में) गुरुकुल कांगड़ी में लगभग एक वर्ष रहे और फिर शांतिनिकेतन गए ।
जब गांधी जी 1915 में भारत आए तब ये विद्यार्थी शांतिनिकेतन में थे । गांधी जी पूर्व सूचना देकर 17 फरवरी 1915  को वहां गए, पर गुरुदेव ने उनसे मिलना भी उचित नहीं समझा, और किसी को कुछ बताए बिना चुपचाप वहां से कलकत्ता चले गए। ( “One wonders why RT was not  present when Gandhi arrived. There was no compelling reason to stay in Calcutta at this time……….. Probably for his own complex reasons, RT  deliberately avoided welcoming Gandhi to Shantiniketan on first arrival  ( Dutta & Robinson : Rabindranath Tagore;  University of Cambridge;  P. 196-197)

इसके बाद गुरुदेव ने श्री एंड्रयूज को (गांधी जी को नहीं) एक पत्र लिखा, उसमें अपनी अनुपस्थिति के लिए न तो खेद व्यक्त किया, न कोई कारण बताया, और गांधी जी को  “ मिस्टर ” ही लिखा ।   “  I hope Mr and Mrs Gandhi have arrived in Bolpur and  Shantiniketan has accorded them welcome as befits her and them . I shall convey my love to them personally when we meet  “  ( Krishna Dutta, Andrew Robinson :  Selected Letters of Rabindranath Tagore ; The Crest of Wave ; University of Cambridge;  P. 158) .

अगले ही महीने 6 मार्च 1915 को गांधी जी पुनः शांतिनिकेतन गए । इस बार उनकी गुरुदेव से भेंट हुई जिसका विवरण काका कालेलकर ने लिखा है, पर उसमें “ महात्मा “ कहने का कोई उल्लेख नहीं है । उन्होंने गांधी जी को वह सम्मान भी नहीं दिया जिसकी अपेक्षा की जाती है । गांधी जी पूर्व सूचना देकर शांतिनिकेतन गए थे, पर परिसर में उनके आ जाने की सूचना मिल जाने के बाद भी गुरुदेव अपने कक्ष में ही सोफे पर बैठे रहे । जब गांधी जी ने उनके कक्ष में प्रवेश किया तब वे सोफे से उठे, और गांधी जी को सोफे पर बैठने का संकेत किया, पर गांधी जी नीचे बिछे कालीन पर बैठ गए । फिर गुरुदेव भी कालीन पर ही बैठ गए ।

इसके बाद गांधी जी गुरुकुल कांगड़ी गए । गांधी जी ने पत्र लिखकर महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद) जी को यह सूचना तो दे दी थी कि शांतिनिकेतन से वापस आने पर मैं गुरुकुल में आऊंगा, पर निश्चित तारीख नहीं लिखी थी । गांधी जी वहां 8 अप्रैल 1915 को एकाएक पंहुचे । जैसे ही यह सूचना स्वामी श्रद्धानंद जी को मिली, वे तुरंत उनके स्वागत के लिए आए और गाँधी जी ने अपनी श्रद्धावश उनके चरण छूकर नमस्कार किया। यही वह पावन क्षण था जब मुंशीराम जी ने गाँधी जी को गले से लगा लिया और ” महात्मा जी ” कहकर संबोधित किया । एक महापुरुष ने जब दूसरे महापुरुष की साधना का सम्मान करते हुए उन्हें ” महात्मा ” की पदवी दी तो मानों सारा वातावरण धन्य हो उठा ।  बाद में यही सम्मानसूचक शब्द देश में ही नहीं, पूरे विश्व में गांधी जी की पहचान बन गया। मौखिक रूप से कहे गए इस संबोधन को गुरुकुल के शिक्षकों / विद्यार्थियों ने अपने उस अभिनन्दन पत्र में स्थायी रूप प्रदान कर दिया जो इस अवसर पर उन्होंने तैयार किया और गाँधी जी को सादर भेंट किया। इसमें उन्होंने गाँधी जी को ” महात्मा जी ” कहकर ही संबोधित किया । इस प्रकार गांधी जी को ‘ महात्मा ‘ का सम्मान सबसे पहले देने वाले थे महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद) । बाद में जब यह संबोधन गांधी जी के लिए प्रचलित होने लगा, तब गुरुदेव भी उन्हें महात्मा जी कहने लगे ।
5. स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागिता :

देश में चल रहे राजनीतिक आंदोलनों से गुरुदेव ने एक दूरी बनाए रखी थी । अंग्रेज सरकार से उन्हें इस दूरी का पुरस्कार भी मिला – सरकार ने उन्हें 1915  में नाइटहुड ( सर ) की उपाधि प्रदान की । वर्ष 1915 के प्रारंभ में ही गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से वापस आए और शीघ्र ही भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता बन गए । इसी वर्ष गुरुदेव से उनकी भेंट भी हुई और स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई । यह वार्ता मुख्यरूप से दो मुद्दों पर आधारित थी – मूर्तिपूजा और राष्ट्रवाद । दोनों मुद्दों पर दोनों के विचार भिन्न थे । गांधी जी की सोच थी कि जब तक भारतीय समाज सोच के स्तर पर परिपक्व नहीं हो जाता तब तक मूर्तिपूजा यथावत चलती रहनी चाहिए ; गुरुदेव का मानना था कि इस समाज को शाश्वत रूप से अबोध और अपरिपक्व मान लेना गलत है । यह समाज ज्ञान का पुजारी रहा है इसीलिए तार्किक बात समझाने पर स्वीकार कर लेता है । मूर्तिपूजा के दुष्परिणाम समाज को बताने चाहिए तभी यह कुप्रथा खत्म होगी । गुरुदेव राष्ट्रवाद के नहीं, विश्ववाद के समर्थक थे, इसीलिए वे तत्कालीन जर्मनी में पनप रहे राष्ट्रवाद का विरोध कर रहे थे । गांधी जी विश्ववाद के लिए राष्ट्रवाद को प्रथम सोपान मानते थे, और राष्ट्रवाद को आध्यात्मिक उत्थान की सीढ़ी का पर्याय मानते थे जिसकी परिणति वसुधैव कुटुम्बकम् में होती है । गुरुदेव गांधी जी के विचारों से सहमत नहीं हो सके और इसीलिए वे स्वतंत्रता आंदोलन से नहीं जुड़ सके ।

कुछ समय बाद ही अमृतसर के  जलियांवाला बाग में 13 अप्रैल 1919  को जो हत्याकांड हुआ, उससे गुरुदेव को मर्मान्तक पीड़ा हुई । इस हत्याकांड के बाद उन्होंने अपना विरोध व्यक्त करते हुए सी एफ एंड्रयूज को 23 से 26 अप्रैल के बीच एक के बाद एक पांच पत्र लिखे । जलियांवाला बाग कांड का प्रतिकार जिस तरह गुरुदेव करना चाहते थे उससे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू सहित कांग्रेस के तमाम नेता सहमत नहीं हुए । इससे गुरुदेव बहुत आहत हुए और आहत मन से उन्होंने एक ओर तो वायसरॉय को पत्र लिखकर नाइटहुड की उपाधि वापस कर दी, और दूसरी ओर एक प्रेरक गीत लिखा, “ जोदी तोर डाक सुने केउ न आशे तोबे ऐकला चलो रे “। इस प्रकार बाद में वे अपने ढंग से स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ गए ।

 

 

6. अद्वितीय गुरुदेव :

विवाद और प्रवाद तो अपनी जगह हैं, पर इसमें कोई संदेह नहीं कि गुरुदेव अद्वितीय व्यक्ति थे । वे एक ओर कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार, अभिनेता, निर्देशक आदि थे तो दूसरी ओर समालोचक, शिक्षाशास्त्री, विचारक, समाजसेवी, यायावर, चित्रकार आदि भी थे, और हर क्षेत्र में अद्वितीय थे। इतने गुण एक ही व्यक्ति में देखकर हैरानी होती है। कबीर हिंदी के कवि हैं, पर उनके महत्व को हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने वाले विद्वान आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने नहीं पहचाना, इसे सर्वप्रथम गुरुदेव ने ही पहचाना । उन्होंने कबीर को भारत की धार्मिक एकता का प्रतीक बताया और इसीलिए उन्होंने कबीर की रचनाओं का बांग्ला और अंग्रेजी में अनुवाद किया । रामायण में लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला की विरह वेदना की ओर भी उन्होंने साहित्यकारों का ध्यान आकृष्ट किया । जो बंगाली बंगाल को ही अपना सर्वस्व समझते थे, उन्हें बंगाल से बाहर के भारत से परिचित  कराने के लिए उन्होंने राणाप्रताप, शिवाजी, बंदा बैरागी, गुरू गोविंद सिंह आदि पर मार्मिक कविताएं लिखी ।
 

गुरुदेव उच्चकोटि के गीतकार और गायक ही नहीं उच्च कोटि के संगीतकार भी थे । उन्होंने संगीत की जिस विधा का विकास किया, उसे अब ”रवीन्द्र संगीत” कहा जाता है । वह इतनी मधुर है कि जिन्हें संगीत की बारीकियों का ज्ञान नहीं, वे भी इसका भरपूर आनंद उठाते हैं । बंकिम बाबू के लिखे राष्ट्रगीत  ”वन्दे मातरम् ”  की धुन गुरूदेव ने ही बनाई थी तथा 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार स्वयं इसे गाया भी ।

 

ऐसे बहु-आयामी व्यक्तित्व का धनी मुझे तो अद्वितीय लगता है । यदि इतिहास का ज्ञाता कोई विद्वान कोई दूसरा ऐसा व्यक्ति ढूँढ सके तो उसका स्वागत है ।

 

 

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