विश्व को धार्मिक कट्टरता से और राजनीति से रखना होगा दूर।

राजनैतिक अस्थिरता और धार्मिक कट्टरता कर सकती है विश्व को लेबनान की तरह तबाह-


भगवत कौशिक।

आज पूरे विश्व की निंगाहे मध्यपूर्व के देश लेबनान की राजधानी बैरूत मे हुए विस्फोटों एंव उसके बाद वहां सरकार के प्रति फैलै जनता के गतिरोध पर टिकी हुई है।वर्तमान समय में विश्व की मौजूदा हालातो को देखते हुए इस बात की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं कि धर्म को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिए। यह इस लिए प्रबल समस्या बन गई है कि राजनीति के काम में सब जगह धर्मों के अनुयायी अपने-अपने धर्म को राजनीति से जोड़ने की कोशिश करते हैं। ऐसा करने से उनके धर्म को बल मिलता है. और शक्ति से लोगों को विवश किया जाता है कि उनके धर्मों में अधिक से अधिक लोग आएं ताकि उस धर्म के अनुयायी अपनी इच्छा के अनुसार सरकार बना लें।जिसका परिणाम विश्व के देशो मे आपसी गतिरोध और देश के अंदर  धार्मिक कट्टरपंथी सोच विकसित हो रही है जो पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है।आज धार्मिक कट्टरता और अयोग्य राजनैतिक सोच का परिणाम लेबनान देश भुगत रहा है।लेबनान की राजधानी बेरुत पूरी तरह से नष्ट होने के कगार पर खडी है।आज पूरे विश्व और खासकर भारत जैसे देश को इस विषय मे सोचने की जरूरत है कि प्रत्येक धर्म और समुदाय की राजनीति मे अनिवार्यता कही देश मे राजनैतिक अस्थिरता पैदा ना कर दे।आज इस आलेख मे हम मध्य पूर्व के देश लेबनान व उसकी बर्बादी के बारे मे विस्तार से बता रहे है–

लेबनान की सबसे बडी कमजोरी उसकी राजनैतिक अस्थिरता मानी जा रही है।मध्यपूर्व का ये देश सबसे जटिल देशों में से आता है।साल 1943 में आजादी से पहले फ्रांस के अधीन रहा ये देश शिया, सुन्नी और ईसाई तबकों का मिश्रण है। बाद में सीरिया से होते हुए यहां भारी संख्या में फलस्तीनी आए। इनके आने के बाद यहां राजनैतिक अस्थिरता और बढ़ी। सत्तर की शुरुआत से ही यहां पर अलग-अलग मजहबों के लोग लड़ने लगे। यहां तक कि ईरान और इजरायल जैसे देशों के लिए लेबनान लड़ाई का मैदान बनकर रह गया।यहां के लोग वहां के राजनीतिक वर्ग को अयोग्य और भ्रष्ट मानते हैं।लेबनान में ये धमाका ऐसे समय में हुआ है, जब वहाँ स्थितियाँ काफ़ी संवेदनशील हैं। देश में कोरोना संक्रमण के मामले बढ़ रहे हैं और अस्पताल इससे पहले से ही जूझ रहे है।अब उन पर धमाके में घायलों का इलाज करने का अतिरिक्त बोझ आ गया है।1975 से 1990 तक चले गृह युद्ध के बाद से पहली बार लेबनान एक बड़े आर्थिक संकट से भी जूझ रहा है। सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन से देश में स्थिति पहले से ही तनावपूर्ण है। लोगों को बिजली की समस्या से जूझना पड़ रहा है, साफ़ पीने के पानी की समस्या है और स्वास्थ्य सुविधाएँ भी बहुत सीमित हैं।

◆अस्थिरता के पीछे धर्म है बड़ी वजह –
यहां साल 1975 से 1989 तक यहां गृहयुद्ध चलता रहा. इसकी बड़ी वजह यहां अलग -अलग धर्मों के वर्चस्व की लड़ाई है।यहां तक कि संसद में भी ये लड़ाई चलती रहती है, जहां धर्म के आधार पर लोगों को सीटें मिली हुई हैं। माना जाता रहा है कि धर्म में इतनी डायवर्सिटी के कारण बाहरी ताकतें इस देश को निशाना बनाती आई हैं।भ्रष्टाचार भी यहां काफी ऊपर है। साल 2019 में ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक करप्शन में 180 देशों में ये देश 137वें स्थान पर है। बता दें कि ये आंकड़ा रैंक के साथ बढ़ते क्रम में है। संस्था के मुताबिक करप्शन इस देश में राजनैतिक पार्टियों तक ही सीमित नहीं, बल्कि हर स्तर पर है।ये भी इसकी खस्ताहालत की एक वजह है।
◆खुबसूरत और आर्थिक ताकत के रूप मे मशहूर रहा है बेरूत–
एक जमाने में दुनिया के खूबसूरत और दुनिया की आर्थिक ताकत के रूप में बेरुत शहर मशहूर था।बॉलीवुड के तमाम फिल्मों की शूटिंग के रूप में होती थी जिसमें धर्मेंद्र और माला सिन्हा की “आँखें” भी शामिल थी …इतना ही नहीं हॉलीवुड का भी पसंदीदा शूटिंग स्थल बेरुत हुआ करता था और दुनिया के कुल सोने के गहनों का 50% कारोबार अकेले बेरुत से होता था और बेरुत को दुनिया की सबसे बड़ी सोने की मंडी कहा जाता था ।लेबनान  की आर्थिक ताकत इतनी ज्यादा थी एक जमाने में लेबनान की मुद्रा पाउंड और डॉलर  और से भी ज्यादा तगड़ी हुआ करती थी। (वर्तमान में एक यूएस डॉलर 1500 लेबनानी पाउंड के बराबर है)लेबनान बेहद खूबसूरत देश हुआ करता था।  मेडिटरेनियन सी का बहुत बड़ा किनारा लेबनान के पास है मेडिटरेनियन के समुद्र तट कोरल रीफ से बने हैं इस वजह से साफ-सुथरी सफेद रेती जो कोरल रीफ के इरोजन  से बनती है और मेडिटरेनियन का खूबसूरत नीला समुंदर साथ ही साथ ओलिव यानी जैतून के हजारों हेक्टेयर के विशाल फार्म खजूर के फॉर्म लेबनान को बेहद खूबसूरत बनाते थे ।ऐसा देश है जहां का कुछ हिस्सा इतना ठंडा है कि वहां काफी बर्फ गिरती है और मध्य पूर्व के देशों में यानी अरब देशों में लेबनान एकमात्र ऐसा देश है जहां के काफी बड़े हिस्से में बर्फबारी भी होती है।1972 तक लेबनान और इसकी राजधानी बेरुत घूमना लोगों का एक सपना हुआ करता था
◆राजनीति मे धार्मिक हस्तक्षेप ने पैदा गतिरोध–
 देश मे फैले धार्मिक कट्टरपंथी गतिरोध को खत्म करने के लिए व देश के सभी समुदाय के लोगों को संतुष्ट रखने के लिए नया राजनीतिक सिस्टम लाया गया था।  इसके तहत यह तय हुआ था कि देश का राष्ट्रपति ईसाई, प्रधानमंत्री सुन्नी मुस्लिम और संसद का अध्यक्ष एक शिया मुसलमान होगा। संसद की सीटों को दो बराबर भागों में मुस्लिमों और ईसाईयों में बांटा गया, नौकरशाही में भी यही नियम लागू किया गया। लेबनान में 27 फीसदी शिया मुस्लिम, 27 फीसदी सुन्नी मुस्लिम, करीब 40 फीसदी ईसाई और छह फीसदी द्रूज आबादी है।  लेकिन, कुछ समय बाद ही इस सिस्टम की कमियां सामने आने लगीं। दरअसल, शिया, सुन्नी और ईसाई तीनों ही राजनीतिक गुट अपने-अपने पक्ष को मजबूत रखने के लिए अलग-अलग बाहरी ताकतों के करीब हो गए। यहां की सुन्नी मुसलमानों की पार्टियों पर सऊदी अरब का प्रभाव रहता है। हिज़्बुल्लाह और अमल जैसी शिया मुसलमानों की पार्टियां ईरान के करीब हैं। इसी तरह देश की ईसाई पार्टियों पर फ्रांस का प्रभाव माना जाता है।
◆अतंर्राष्ट्रीय कर्ज के नीचे दबा है देश–
लेबनान की राजधानी बेरूत जहाँ भीषण विस्फोट हुआ है,वहां की आबादी मात्र 70 लाख है और उस पर 92 अरब डॉलर का अंतरराष्ट्रीय कर्ज है। पिछले सालों में लेबनान सरकार ने खर्चे चलाने के लिए हर व्हाट्सअप चलाने वाले से 6 डॉलर(₹450) टैक्स लगा दिया था। लेकिन वहां के युवा सड़कों पर उतर आए और यह टैक्स वापिस ले लिया गया।
◆भुखमरी के कगार पर पहुंचा देश–
तथाकथित अमोनियम नाइट्रेट के धमाकों के बाद वहां का अन्न भंडार भी नष्ट हो चुका है और लेबनान भुखमरी के कगार पर  पहुंच चुका है।लेबनान ने जितनी खाद्य सामग्रियाँ आयात की थी, वो बेरूत पोर्ट के पास ही गोदामों में रखी गई थी धमाके के कारण वो भी बर्बाद हो गई हैं।आशंका है कि देश में खाद्यन्न सामग्रियों की भी कमी हो सकती है।
अब गहरे सोचने की बात यह है कि मात्र 70 लाख की आबादी में सरकार किस कदर धार्मिक आधार ईसाई, शिया, सुन्नी आदि में बंटी हुई है। धर्म आधारित सरकार – देश – जनता ने आखिर पाया क्या? यह एक गंभीर और सोचनीय विषय है।

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