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    Homeसाहित्‍यलेखमात पिता के अपमान पर भी मैत्री रखना कायर सन्तान की पहचान है

    मात पिता के अपमान पर भी मैत्री रखना कायर सन्तान की पहचान है

    -दिव्य अग्रवाल

    एक ऐसी सन्तान जिसके माता पिता को उसके तथाकथित मित्रो ने एक छोटे से कमरे में कैद कर दिया हो । उन्हें कैदी से भी बद्तर स्थिति, गंदगी व कीचड़ से भरे स्थान पर रखा हो । प्रतिदिन उनके ऊपर थूका हो , अपने पैरों से रौंदा हो । क्या ऐसे व्यक्तियों को अब भी अपना मित्र मानने वाले पुत्र या पुत्री को सन्तान कहलाने का अधिकार मिलना चाहिए । यदि नही तो कल्पना करनी चाहिए जिन महादेव को सम्पूर्ण हिन्दू समाज अपना परमपिता परमेश्वर मानता है उन महादेव को सैकड़ो वर्षों से इस स्थिति में रखने वाले वर्तमान मुस्लिम समाज को दोषी न मानकर केवल औरंगजेब आदि को दोष देकर  , वर्तमान मुस्लिम समाज से भाईचारे का कायरतापूर्ण संबंध रखना क्या किसी भी सनातनी को महादेव की सन्तान या भक्त होने का अधिकार दे सकता है । हिन्दू समाज किस अधिकार से महादेव पर आभिषेक कर पा रहा है जब उनके आराध्य का ही घोर अपमान किया जा रहा है ।  हिन्दू समाज यह कब समझ पायेगा की कट्टरपंथियो का लक्ष्य ही कुफ्र अर्थात काफ़िर को समाप्त कर गजवा ऐ हिन्द को पूरा करना है । जब अंग्रेज भारत आए थे तब हिन्दुओ की जनसंख्या बहूत कम बची थी । मुस्लिम आक्रांताओं ने हिन्दुओ की शक्ति , सम्मान व स्वाभिमान पूर्ण रूप से क्षीण कर दिया था । जब अंग्रेजो से आजादी की बात आयी तो मुस्लिम समाज इस पूरे राष्ट्र पर राज करना चाहता था यही कारण था कि भारत का मुसलमान बंटवारे के पक्ष में नहीं था । क्योंकि यदि आज सब मुसलमान एक होते तो जनसंख्या के दम पर अब तक यह देश मुस्लिम देश बन चुका होता । अतः यह हिन्दुओ को समझना है कि उनकी बुद्धिमता व रक्त उत्तेजना क्या मृत शैया पर विश्राम कर रही है जिसके कारण अब भी हिन्दू समाज आपसी सद्भाव की दुहाई देता है। असंख्य प्राचीन शिवलिंग व धर्मस्थल ऐसे है जिन्हें मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा खंडित किया गया एवम मुस्लिम समाज उन स्थलों को इबादतगाह के रूप में काबिज किए हुए है। सत्यता के आधार पर सभी धार्मिक स्थलों को पुनर्जीवित करना हिन्दुओ का मौलिक अधिकार है क्योंकि यह मात्र धर्मिक स्थलों हेतु नही अपितु अपने परमेश्वर , धर्म , संस्कृति , स्वाभिमान एवम आत्मसमान की लड़ाई है । अब बात संविधान व कानून की जाए तो यह भी स्पष्ठ रूप से समझ लेना चाहिए कि जिस तरह मुगलकाल में हिन्दू समाज की कोई सुनवाई नही होती थी उसी प्रकार शरीयत लागू होने के पश्चात कोई कानून या किसी संविधान का अस्तित्व इस देश मे बच पाना लगभग असंभव ही है ।

    दिव्य अग्रवाल
    दिव्य अग्रवाल
    विचारक व लेखक Mob-9953763293

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