ख़ामोशी का मंज़र

 
दिल में उठी अजीब सी हलचल है
क्या इस बेचैनी का कोई हल है
नादाँ इस दिल में तूफ़ान उठते हैं
पलकों के नीचे अब सपने सजते हैं।

सपनों और पलकों के बीच न जाने

कितना ज्यादा फासला है जो अब भी
सपने हमारी पलकों से दूर रहते हैं।
दिल में बातें बहुत हैं पर सुनने वाला
कोई भी नहीं, इसलिए अब हम अपनी
दास्तां खुद ही खुद से कहते हैं।
खुद ही खुद से करते हैं बातें और अब
खुद ही हम अपना दर्द बांट लेते हैं।
ख़ामोशी, ख़ामोशी और ख़ामोशी ही है
पर अब हम इन खामोशियों में भी

न जाने कैसे इतना शोर सुन लेते हैं।

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