लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

देश जब रेडियो- टीवी पर पांच राज्यों में हुए चुनाव परिणामों से रूबरू हो रहा था, तब देश के जवानों पर छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सली घात लगाकर खूनी होली खेल रहे थे। सुकमा जिले के इंजरम और भेज्जी के बीच कोत्ताचेरू के जंगल में शनिवार 11 मार्च को सीआरपीएफ की रोड ओपनिंग पार्टी पर नक्सलियों ने ऊंची पहाड़ी से बंदूकों व विस्फोटकों से हमला बोलकर 12 जवानों को हताहत कर दिया। ये जवान सीआरपीएफ की 219वीं बटालियन के थे। देश के जवान कश्मीर की सीमा पर हो या छत्तीसगढ़ के जंगलों में, खून से होली खेलना उनके लिए कोई नई बात नहीं है। लेकिन जब देश नक्सली समस्या पर नियंत्रण से आश्वस्त था, तब 12 सैनिकों की शहादत दहलाने वाली हैं। माओवादी नक्सली इतने बेखौफ थे, कि वे सैनिकों के हथियार तक छीन ले गए। इसके पहले तोंगपाल थाना क्षेत्र के टाहकवाड़ा में भी 11 मार्च 201 इसके पहले तोंगपाल थाना क्षेत्र के टाहकवाड़ा में भी 11 मार्च 2014 को नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 11 और जिला पुलीस बल के 4 जवान शहीद हुए थे। इसमें एक नागरिक भी मारा गया था। आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में विकास के बहाने इस समस्या से मुक्ति के उपाय तलाशे जा रहे हैं, किंतु नक्सली अपने गढ़ में और मजबूत होते दिख रहे हैं।

सुरक्षा बलों के अधिकारियों ने इस हमले के बाद कहा है कि नक्सली मार्च से जून माह के बीच में अकसर बदले की कार्रवाही तेज कर देते हैं। क्योंकि इस दौरान घात लगाकर हमला करना आसान होता है। जब यह सूचना अधिकारियों के पास थी, तो उन्हें और सतर्कता बरतने की जरूरत थी ? दरअसल  ऐसे तर्क अधिकारी अपनी खामियों पर पर्दा डालने के नजरिय से देते हैं, जबकि हकीकत में नक्सली हमला बोलकर भाग निकलने में सफल हो जाते हैं। इस हमले से तो यह सच्चाई सामने आई है कि नक्सलियों का तंत्र और विकसीत हुआ है, साथ ही उनके पास सूचनाएं हासिल करने का मुखबिर तंत्र भी हैं। हमला करके बच निकलने की रणनीति बनाने में भी वे सक्षम हैं। इसीलिए वे अपनी कामयाबी का झण्डा फहराए हुए हैं। बस्तर के इस जंगली क्षेत्र में नक्सली नेता हिडमा का बोलबाला है। वह सरकार और सुरक्षाबलों को लगातार चुनौती दे रहा हैं और राज्य एवं केंद्र सरकार के पास रणनीति की कमी है।

नक्सली समस्या से निपटने के लिए राज्य व केंद्र सरकार दावा कर रही हैं कि विकास इस समस्या का निदान है। यदि छत्तीसगढ़ सरकार के विकास संबंधी विज्ञापनों में दिए जा रहे आकड़ों पर भरोसा करे तो छत्तीसगढ़ की तस्वीर विकास के मानदण्डों को छूती दिख रही हैं, लेकिन इस अनुपात में यह दावा बेमानी है कि समस्या पर अंकुश लग रहा है ? सुकमा की खबर इन आंकड़ों पर पानी फेरती दिखाई दे रही है। समस्या को केवल सुरक्षाबलों के भरोसे छोड़कर चैन की नींद सो जाना, आत्मघाती कदम है। इस नाते अच्छा है कि इस समस्या से निपटने की नीति की नए सिरे से समीक्षा की जाएं। फिलहाल हमलों के बाद मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शहीद जवानों के परिजनों के साथ सहानभूति जताकर और अतिरिक्त आर्थिक मदद करके समस्या की गहराई में जाने से अकसर बच निकलते है, यही वजह है कि नक्सली समस्या अपने गढ़ में दिन प्रतिदिन न केवल मजबूत हुई है, बल्कि समस्याग्रस्त राज्यों में कहीं भी उसके सिमट जाने के संकेत नहीं मिल रहे हैं।

विषमता और शोषण से जुड़ी भूमण्डलीय आर्थिक उदारवादी नीतियों को जबरन अमल में लाने की प्रक्रिया ने देश में एक बड़े लाल गलियारे का निर्माण कर दिया है, जो पषुपति ;नेपाल से तिरुपति ;आंध्रप्रदेश तक जाता है। इस पूरे क्षेत्र में माओवादी वाम चरमपंथ पसरा हुआ है। इसने नेपाल झारखण्ड, बिहार, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलांगाना और आंध्रप्रदेश के एक ऐसे बड़े हिस्से को अपनी गिरफ्त में ले लिया है, जो बेशकीमती जंगलों और खनिजों से भरे धरे हैं। छत्तीसगढ़ के बैलाडीला में लौह अयस्क के उत्खनन से हुई यह शुरुआत ओड़ीसा की नियमगिरी पहाड़ियों में मौजूद बाॅक्साइट के खनन तक पहुंच गई है। यहां आदिवासियों की जमीनें वेदांता समूह ने अवैध हथकंडे अपनाकर जिस तरीके से छीनी थीं, उसे गैरकानूनी खुद देश की सबसे बड़ी अदालत ने माना है। शोषण और बेदखली के ये उपाय लाल गलियारे को प्रशस्त करने वाले हैं। यदि सर्वोच्च न्यायालय भी इन आदिवासियों के साथ न्याय नहीं करती तो इनमें से कई उग्र चरमपंथ का रुख कर सकते थे ? सर्वोच्च न्यायालय का यह एक ऐसा फैसला है, जिसे मिसाल मानकर केंद्र और राज्य सरकारें ऐसे उपाय कर सकती हैं, जो चरमपंथ को आगे बढ़ने से रोकने वाले हों ? लेकिन तात्कालिन हित साधने की राजनीति के चलते ऐसा हो नहीं रहा है। राज्य सरकारें केवल इतना चाहती हैं कि उनका राज्य नक्सली हमले से बचा रहे। छत्तीसगढ़ इस नजरिए से और भी ज्यादा दलगत हित साधने वाला राज्य है। क्योंकि भाजपा के इन्हीं नक्सली क्षेत्रों से ज्यादा विधायक जीतकर आते है। मुख्यमंत्री रमन सिंह के नरम रुख का ही कारण है कि भाजपा के किसी विधायक या बड़े राजनेता पर नक्सली हमला नहीं होता। जबकि दूसरी तरफ नक्सलियों ने कांग्रेस पर 2013 में बड़ा हमला बोलकर लगभग उसका सफाया कर दिया था। यह ठीक है कि कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा ने नक्सलियों के विरुद्ध सलवा जुडूम को 2005 में खड़ा किया था। सबसे पहले बीजापुर जिले के कुर्तु विकासखण्ड के आदिवासी ग्राम अंबेली के लोग नक्सलियों के खिलाफ खड़े हुए थे। नतीजतन नक्सलियों की महेन्द्र कर्मा से नाराजी एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी। लेकिन कांग्रेस के हरिप्रसाद समेत अन्य नेता इस समस्या का हल सैन्य शक्ति के बजाय बातचीत से ही खोजने की वकालात कर रहे थे। मारे गए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और विद्याचरण शुक्ल इसी पक्ष के हिमायती थे।

सुनियोजित दरभा हत्याकांड के बाद जो जानकारियां सामने आई थीं, उनसे खुलासा हुआ था कि नक्सलियों के पास आधुनिक तकनीक से समृद्ध खतरनाक हथियार हैं। इनमें राॅकेट लांचर, इंसास, हेंडग्रेनेड, ऐके-56, एसएलआर और एके-47 जैसे घातक हथियार शामिल हैं। साथ ही आरडीएक्स जैसे विस्फोटक हैं। लैपटाॅप, वाॅकी-टाॅकी, आईपाॅड जैसे संचार के संसाधन है। साथ ही वे भलीभांति अंग्रेजी भी जानते हैं। तय है, ये हथियार न तो नक्सली बनाते हैं और न ही नक्सली क्षेत्रों में इनके कारखाने हैं। जाहिर है, ये सभी हथियार नगरीय क्षेत्रों से पहुंचाए जाते हैं ? हालांकि खबरें तो यहां तक हैं कि पाकिस्तान और चीन माओवाद को बढ़ावा देने की द्रृष्टि से हथियार पंहुचाने की पूरी एक श्रृंखला बनाए हुए हैं। चीन ने नेपाल को माओवाद का गढ़ ऐसे ही सुनियोजित षड्यंत्र रचकर वहां के हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को ध्वस्त किया। नेपाल के पषुपति से तिरुपति तक इसी तर्ज के माओवाद को आगे बढ़ाया जा रहा है। हमारी खुफिया एजेंसियां नगरों से चलने वाले हथियारों की सप्लाई चैन का भी पर्दाफाश करने में कमोबेश नाकाम रही हैं। यदि ये एजेंसियां इस चैन की ही नाकेबंदी करने में कामयाब हो जाती हैं तो एक हद तक नक्सली बनाम माओवाद पर लगाम लग सकती है।

जब किसी भी किस्म का चरमपंथ राष्ट्र-राज्य की परिकल्पना को चुनौती बन जाए तो जरुरी हो जाता है, कि उसे नेस्तानाबूद करने के लिए जो भी कारगर उपाय उचित हों, उनका उपयोग किया जाए ? इस सिलसिले में खासतौर से केंद्र सरकार को सबक लेने की जरुरत इंदिरा गांधी और पीवी नरसिम्हा राव से है, जिन्होंने पंजाब और जम्मू-कश्मीर के उग्रवाद को खत्म करने के लिए सेना का साथ लिया, उसी तर्ज पर माओवाद से निपटने के लिए अब सेना की जरुरत अनुभव होने लगी है। क्योंकि माओवादियों के सशस्त्र एक-एक हजार के जत्थों से राज्य पुलिस व अर्ध सैनिक बल मुकाबला नहीं कर सकते ? धोखे से किए जाने वाले हमलों के बरक्ष  एकाएक मोर्चा संभालना और भी मुश्किल है ? माओवाद प्रभावित राज्य सरकारों को संकीर्ण मानसकिता से ऊपर उठकर खुद सेना तैनाती की मांग केंद्र से करने की जरुरत है। देश में सशस्त्र 10 हजार तांडवी माओवादियों से सेना ही निपट सकती है। अन्यथा हमारे जवान इसी तरह खून की होली खेलते हुए शहीद होते रहेंगे।

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