लेखक परिचय

वीरेंदर परिहार

वीरेंदर परिहार

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वीरेन्द्र सिंह परिहार

                        भाजपा ने पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी को भाजपा में शामिल कर उन्हें दिल्ली के मुख्यमंत्री का प्रत्याशी क्या बनाया ? कि इसको लेकर तरह-तरह की बातें उठ खड़ी हुई हैं। इस फैसले को लेकर किरण बेदी पर ही नहीं भाजपा पर भी तरह-तरह के तीर चलाए जा रहे हैं। आप पार्टी द्वारा भाजपा पर सबसे बड़ा आरोप यह लगाया जा रहा है कि दिल्ली विधानसभा चुनावों को लेकर भाजपा के पास अरविन्द केजरीवाल के टक्कर का कोई नेता नहीं था, इसलिए भाजपा द्वारा किरण बेदी केा आयात किया गया है। अब यदि किरण बेदी किसी दूसरे राजनीतिक दल में कार्यरत होती तो इस बात में दम भी हो सकता था। लेकिन यह सभी को पता है कि किरण बेदी अन्ना के जन लोकपाल आंदोलन में एक प्रमुख भूमिका निभा चुकी हैं और वह अपने जमाने में एक कड़क और ईमानदार पुलिस अधिकारी मानी जाती थीं। वर्तमान में उनका कार्य मुख्यतः समाज सेवा का था। ऐसी स्थिति में भाजपा ने यदि पेशेवर राजनीतिज्ञों की तुलना में किरण बेदी को अपने में शामिल कर उन्हें भाजपा का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बना दिया तो यह एक स्वागत-योग्य ही नहीं वरन एक स्तुत्य कदम है। इसका संदेश स्पष्ट है कि यदि कोई व्यक्ति भाजपा में सक्रिय नहीं है फिर भी यदि वह ईमानदारी से समाज सेवा का कार्य कर रहा है और उसके प्रति लोगों में एक सकारात्मक धारणा है तो उसका भाजपा में स्वागत है। सिर्फ स्वागत ही नहीं है, बल्कि उसे नेतृत्व की पाँत में खड़ा करने में भी कोई झिझक नहीं है। और इस तरह से ऐसे लोगों की क्षमता का उपयोग देश सेवा और राष्ट्र निर्माण में बेहतर तरीके से करना एक जिम्मेदार राजनीतिक दल का सिर्फ कर्तव्य ही नहीं, उसका राष्ट्रधर्म भी है। अब कुछ लोगों का कहना है कि किरण बेदी ने कभी चंदे की पारदर्शिता को लेकर भाजपा की आलोचना की थी, फिर वह भाजपा में कैसे शामिल हो गई ? पर इसका मतलब यह तो नहीं कि किसी मुद्दे पर कोई किसी राजनीतिक दल की आलोचना करता है, तो वह उसके माध्यम से महती जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए जन-सेवा नहीं कर सकता। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि किरण बेदी ने 2002 के दंगों को लेकर कभी नरेन्द्र मोदी की आलोचना की थी, इसलिए वह मोदी के नेतृत्व वाली पार्टी में कैसे गई ? जहां तक 2002 के दंगों का सवाल है, उसे लेकर कुछ ऐसा प्रचार-तंत्र चलाया गया जैसे मोदी बहुत बड़े खलनायक और मुस्लिमों के हत्यारे हों। जिसे लेकर बहुत से लोगों में भ्रान्त धारणा बन गई थी, जो समय के साथ सच्चाई के सामने आने से निर्मूल साबित हुई। स्वाभाविक है उस समय किरण भी उस प्रचार-तंत्र के चलते मोदी के बारे में गलत धारणा की शिकार हो गई हों, तो यह कौन सी बड़ी बात है ?

                        अब कुमार विश्वास जैसे लोग कहते हैं कि अन्ना आंदोलन के दौरान किरण बेदी भाजपा के एजेंट बतौर काम कर रही थीं। अब कुमार विश्वास जैसे लोग क्या यह बताएंगे कि क्या इस दौरान वह भाजपा से कोई लाभ प्राप्त कर रहीं थीं ? स्पष्ट है कि ऐसा कुछ नहीं था। इस संबंध में कुमार विश्वास का कहना कि कोयला खदानों के आवण्टन को लेकर वह तात्कालिक भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी के विरुद्ध धरने को तैयार नहीं थीं। यदि ऐसा था तो किरण बेदी अपनी जगह पर पूरी तरह सही थी, क्योंकि आज की तारीख तक एक भी ऐसा सबूत सामने नहीं आया है कि इस विषय में गडकरी की कोई गलत भूमिका थी। साबित होना तो दूर की बात है। यह भी एक बड़ी सच्चाई है कि वर्ष 2012 में गडकरी के विरुद्ध आप पार्टी ने भारी प्रोपोगंडा किया, उनकी कम्पनियों को लेकर तरह-तरह के आरोप लगाए। लेकिन जांच के बाद ऐसा भी कुछ नहीं निकला, जिसे खोदा पहाड़ निकली चुहिया भी कहा जा सके। हकीकत यह थी कि अन्ना आंदोलन के दौर से ही अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगी अपनी पूरी ताकत यह साबित करने में लगाए हुए थे कि भाजपा-कांग्रेस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, और भाजपा वैसी ही भ्रष्ट है, जैसे कांग्रेस ! इसके लिए भाजपा और उनके नेताओं पर तरह-तरह के अनर्गल आरोप लगाए गए। और यह सब इसलिए जानबूझकर किया गया, क्योंकि अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जैसे लोगों का अन्ना आंदोलन के माध्यम से पहले से सत्ता-राजनीति में घुसपैठ करने का इरादा था। इस उद्देश्य के तहत वह कांग्रेस की तरह भाजपा को भी योजनाबद्ध ढंग से बदनाम करने के प्रयास में थे, ताकि सत्ता की राजनीति में उनका रास्ता निर्बाध हो सके। बड़ी सच्चाई यह है कि किरण बेदी ऐसी सभी बातों से परिचित थीं, इसलिए वह ऐसी किसी भाजपा-विरोधी योजना का अंग नहीं बनीं। किरण बेदी को यह भी पता था कि वर्तमान दौर में भाजपा ही देश की एकमात्र विकल्प है, और उसे कमजोर करने का प्रयास करना और उसके खिलाफ अभियान छेड़ना कतई देशहित में नहीं होगा। इसके अलावा किरण बेदी की यह धारणा भी स्पष्ट थी, कि इस दौर में नरेन्द्र मोदी ही देश के खेवनहार हो सकते हैं, इसलिए भाजपा में न होते हुए और सक्रिय राजनीति से दूर रहते हुए भी बराबर वह नरेन्द्र मोदी के पक्ष में बोलती रहीं। जबकि इसके उलट अरविंद केजरीवाल नरेन्द्र मोदी को अडानी और अम्बानी का एजेंट बताते रहे। जिसका नतीजा लोकसभा चुनावों के पश्चात यह हुआ कि आप पार्टी का जनाधार कुछ ऐसा खिसका कि कई राज्यों में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में वह उम्मीदवार उतारने तक की हिम्मत नहीं जुटा पाई। यहां तक कि हरियाणा जैसे राज्य में भी जिसे आप पाटी का उर्वर प्रान्त माना जाता था। अब किसी तरह से दिल्ली के मैदान में कूदे तो किरण बेदी के चलते आप पार्टी का अपना सारा खेल बिगड़ता दिख रहा है, फलतः वह साय-पटाय बयानबाजी करने पर उतारू हो गई है।

                        क्या अरविंद केजरीवाल भूल गए कि सक्रिय राजनीति में आने के पूर्व इसमें न आने की उन्होंने कसमें खाई थीं, और अपने को मात्र भ्रष्टाचार-विरोधी योद्धा के बतौर प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। तो इस तरह से यदि वह सक्रिय राजनीति में हैं तो किरण बेदी के लिए यह क्षेत्र निशिद्ध क्यों है ? आप पार्टी का आरोप है कि किरण बेदी अन्ना आंदोलन की पूँजी खा रही हैं। क्या आप पार्टी यह बताएगी कि अन्ना आंदोलन की असल पूँजी उसी ने खाई है, वरना अरविंद केजरीवाल समेत उसके नेताओं को कितने लोग जानते थे ? रहा सवाल किरण बेदी का तो कई दशकों से वह एक ऐसी पुलिस अधिकारी रही हैं जो देशवासियों के लिए एक रोल-माॅडल कही जा सकती हैं। आखिर में प्रधानमंत्री रहते इंदिरा गांधी की गाड़ी का चालान काटना और उसे क्रेन से उठवाना क्या अपेक्षा से ज्यादा साहस और अदम्य कर्तव्य निष्ठा का कृत्य नहीं था ? अभी तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं है कि किरण बेदी ने कहीं भी सिद्धान्तों से समझौता किया हो, जबकि अरविंद केजरीवाल के विरुद्ध सिद्धान्तों से समझौतों के कई उदाहरण हैं। चाहे वह पिछले चुनाव में दंगों के आरोपी मौलवी तौकीर रज़ा से मिले हों, चाहे सरकार चलाने के लिए कांग्रेस से समर्थन लिया हो या वर्तमान में हो रहे दिल्ली विधानसभा चुनाव में चुनाव जीतने के नाम पर 17 ऐसे लोगों को उम्मीदवार बनाया हो, जिसके चलते आप पार्टी कहीं भी प्रचलित मापदण्डों से अलग नहीं दिखती।

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