किसान आन्दोलन में कृषक पक्ष

हैरानी इस बात पर भी है कि बैंकों के कुल ऋण में उद्योगपतियों की हिस्सेदारी 41.71 फीसदी है, जबकि किसानों की महज 13.49 प्रतिशत ही है। जाहिर है, उद्योगपतियों का ही बैंकों का ज्यादा कर्ज फंसा हुआ है। यही वजह है कि पिछले 17 महीनों में बैंकों का एनपीए बढ़कर दोगुने से ज्यादा हो गया है। कारोबारियों के इन डूबे कर्जों को न्यायसंगत ठहराते हुए रिर्जव बैंक की दलील है कि आर्थिक बद्हाली के कारण कारोबारी कर्ज नहीं चुका पा रहे हैं।

हाल ही में सरकारी स्तर पर सामने आई जानकारी से पता चला है कि सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर 6.1 फीसदी रह गई है। जबकि लंबे समय से संकटग्रस्त रहे कृषिकृषि क्षेत्र में बढ़त दर्ज की गई है। तय है, इसके लिए अच्छे मानसून के साथ-साथ किसानों की मेहनत भी रंग लाई है। इसके बावजूद देश के किसान और किसानी से जुड़े मजदूर किस हाल में हैं, इसकी तस्वीर महाराष्ट्र, तमिलनाडू, मध्यप्रदेश, राजस्थान और गुजरात में चले किसान आंदोलनों से सामने आई है। किसान ऋृणमाफी के सिलसिले में केंद्र और प्रदेश की सरकारों का विरोधाभासी पहलू यह है कि औद्योगिक घरानों के कर्ज तो लगातार बट्टे खाते में डाले जा रहे हैं, जबकि किसान कर्जमाफी की मांग पर सरकार और कथित अर्थशास्त्री अर्थव्यवस्था बद्हाल हो जाने का रोना रोने लगते हैं।
ऐसे में उत्तर प्रदेश की आदित्यनाथ योगी सरकार ने किसान कर्जमाफी का निर्णय लेकर एक मिसाल पेश की है। मुख्यमंत्री योगी ने किए चुनावी वादे को अमल में लाते हुए महज दो माह के भीतर ही प्रदेश के 2 करोड़ 51 लाख छोटे और सीमांत किसानों में से 2 करोड़ 15 लाख किसानों के 1 लाख रूपए तक के कर्ज माफ करने का ऐतिहासिक निर्णय ले लिया। इस माफी पर करीब 36 हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे, जो राज्य के कुल राजस्व का लगभग 8 प्रतिशत है। योगी यह कर्जमाफी सरकारी खर्चों में कटौती करके करेंगे। इस दिशा में अहम् पहल करते हुए योगी ने उन सभी उच्चाधिकारियों की विदेश यात्राओं को खारिज कर दिया, जो विभिन्न प्रशिक्षणों के बहाने गर्मियों में परिवार सहित विदेशों में मौज-मस्ती के लिए यात्राएं करते थे। ऐसी संवेदनाविहीन यात्राओं पर सभी प्रदेश सरकारों को रोक लगाने की जरूरत है।
देश में कर्ज में डूबे छोटी जोत के किसान सबसे ज्यादा आत्महत्या करते है। हालांकि कर्जमाफी का लाभ उन्हीं किसानों को मिलता है, जिन्होंने सरकारी और सहकारी बैंकों से कर्ज लिया होता है। निजी ऋणदाताओं से कर्ज लेने वाले किसान इस लाभ से वंचित रह जाते है। नतीजतन हर साल विभिन्न कारणों से 8 से लेकर 10 हजार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह बैंक और साहूकारों से लिया कर्ज है। इस परिप्रेक्ष्य में कुछ समय पहले गुजरात में किसानों पर मंडरा रहे संकट और उनकी आत्महत्यओं को लेकर स्वयं सेवी संगठन ‘सिटीजन्स रिसोर्स एंड एक्षन एंड इनीशिएटिव‘ ने सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल की थी। इस पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि ‘यह बेहद गंभीर मसला है। लिहाजा किसानों की आत्महत्याओं के परिप्रेक्ष्य में राज्यों द्वारा उठाए जाने वाले प्रस्तावित प्रावधानों की जानकारी से अदालत को अवगत कराएं।‘ इसे अदालत का संवेदनषील रुख कहा जा सकता है, क्योंकि अदालत ने एक प्रदेश की समस्या को समूचे देश के किसानों की त्रासदी के रूप में देखा और विचारणीय पहलू बना दिया।
हैरानी इस बात पर भी है कि बैंकों के कुल ऋण में उद्योगपतियों की हिस्सेदारी 41.71 फीसदी है, जबकि किसानों की महज 13.49 प्रतिशत ही है। जाहिर है, उद्योगपतियों का ही बैंकों का ज्यादा कर्ज फंसा हुआ है। यही वजह है कि पिछले 17 महीनों में बैंकों का एनपीए बढ़कर दोगुने से ज्यादा हो गया है। कारोबारियों के इन डूबे कर्जों को न्यायसंगत ठहराते हुए रिर्जव बैंक की दलील है कि आर्थिक बद्हाली के कारण कारोबारी कर्ज नहीं चुका पा रहे हैं। कालांतर में आर्थिक विकासदर में सुधार होगा तो एनपीए में कमी आएगी औा वसूली बढ़ जाएगी। लेकिन यही लाभ किसानों को देने के संदर्भ में न तो बैंक सोचते हैं और न ही सरकारें। बावजूद उद्योगपतियों के नाम और ऋण की राशि छिपाई जाती है, जबकि किसान को कुर्की का सामना करना पड़ता है। यही वजह है कि बीते दो साल में कर्ज में डूबे 2 लाख किसान आत्महत्या कर चुके है।
यदि वाकई किसानों की ऋणमाफी अर्थवयव्स्था की बद्हाली का कारण है तो फिर किस बूते पर बैंकों ने पिछले तीन सालों में पूंजीपतियों के 1.14 लाख करोड़ रुपए के कर्जाों को बट्टे खाते में डाल दिया ? पिछले 15 साल के भीतर के आंकड़े बताते है कि पूंजीपतियों के तीन लाख करोड़ रुपए के ऋण बट्टे खाते में डाले गए है। बैंक की तकनीकी भाषा में ये वे कर्ज हैं, जिनकी वसूली की उम्मीद षून्य हो गई है।
नबंवर 2016 में वित्त राज्यमंत्री पुरुषोत्तम रूपला ने राज्यसभा में कृषि कर्ज से जुड़े आंकड़े पेष करते हुए कहा था कि 30 सितंबर 2016 तक देश के 9 करोड़ किसानों पर 12 लाख 60 हजार करोड़ का कर्ज हैं। राज्यसभा में ही केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री संतोश कुमार गंगवार ने स्पष्ट किया कि 30 जून 2016 तक 50 करोड़ रूपए से अधिक का ऋण लेने वाले उद्योगपतियों के 2071 एनपीए खातों में कुल 3 लाख 88 हजार 919 करोड़ रुपए की राशि है, जो डूबंत खाते में चली गई है। इनमें भी 10 ऐसे औद्योगिक समूह हैं, जिन पर 5 लाख 73 हजार 682 करोड़ रुपए का कर्ज है। विजय माल्या जैसे 9000 करोड़ के कर्जदार के भाग जाने के बावजूद सरकार इन उद्योगपतियों से कर्ज वसूली की कोई अहम् पहल नहीं कर रही है।
हालांकि राजग सरकार ने किसान हित में फसल बीमा योजना में 13 हजार 240 करोड़ रुपए, दूध प्रसंस्करण निधी में 8 हजार करोड़ और सिंचाई एवं मृदा प्रयोगशालाओं के लिए 5000 करोड़ रुपए दिए हैं। साथ ही जिन किसानों ने सहकारी बैंकों से कर्ज लिया है, उन्हें 60 दिनों की बैंक ब्याज में छूट भी दी गई है। लेकिन ये उपाय किसानों के आसूं पोंछने जैसे है। क्योंकि ये सभी उपाय अप्रत्यक्ष लाभ से जुड़े है। अच्छा है केंद्र और राज्य सरकारें योगी आदित्यनाथ से प्रेरणा लेते हुए उन सभी 95 प्रतिशत सीमांत, लघु और छोटे किसानों की पूर्ण कर्जमाफी की पहल करें, जिनके पास 1 से लेकर 5 हेक्टेयर तक कृषि भूमि है। देश की कुल कृषि योग्य भूमि का यह 68.7 प्रतिशत हिस्सा है। यदि सरकारें ऐसा करती है तो उनकी किसान व मजदूर के प्रति संवेदना तो सामने आएगी ही, किसान देश की अर्थव्यवस्था में भी उमंग व उत्साह से भागीदारी करेंगे ?

प्रमोद भार्गव

Leave a Reply

%d bloggers like this: