जानिए कैसे करें तर्पण ओर क्या महत्व हैं तर्पण का??

भारतीय धर्मशास्त्रों के अनुसार जब सूर्य कन्या राशि में आते तब परलोक से पितृ अपने स्वजनों के पास आ जाते हैं। देवतुल्य स्थिति में तीन पीढ़ी के पूर्वज गिने जाते हैं। पिता को वसु के समान, रुद्र दादा के समान और परदादा आदित्य के समान माने गए हैं। इसके पीछे एक कारण यह भी है कि मनुष्य की स्मरण शक्ति केवल तीन पीढ़ियों तक ही सीमित रहती है।

व्यक्ति का अपने पितरों के प्रति श्रद्धा के साथ अर्पित किया गया तर्पण अर्थात जलदान पिंडदान पिंड के रूप में पितरों को समर्पित किया गया भोजन यही श्राद्ध कहलाता है। देव, ऋषि और पितृ ऋण के निवारण के लिए श्राद्ध कर्म है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि अपने पूर्वजों का स्मरण करने और उनके मार्ग पर चलने और सुख-शांति की कामना ही वस्तुत: श्राद्ध कर्म है।

हमारे धार्मिक ग्रंथों के अनुसार तर्पण का जल सूर्योदय से आधे प्रहर तक अमृत, एक प्रहर तक शहद, डेढ़ प्रहर तक दूध और साढ़े तीन प्रहर तक जल रूप में हमारे पितरों को प्राप्त होता है। अत: हमें सुबह सवेरे ही तर्पण करना चाहिए । 

हिन्दु धर्म शास्त्रों में- वसु, आदित्य और रुद्र इन तीन देवताओं को क्रमशः पितृ, पितामह और  है। हमारे विवाह में भी गात्रोच्चारण में पितृ, पितामह, प्रपितामह इन तीनों का ही उल्लेख होता है। 

“येन पितुः पितरो ये पितामहास्तेभ्यः पितृभ्योनमसा विधेम।”

अर्थात्‌ पितृ, पितामह, प्रपितामाहों को हम श्राद्ध से तृप्त करते हैं।

“त्रयाणामुदकं कार्य त्रिषु पिंडः प्रवर्तते। 

चतुर्थः सम्प्रदातैषां पंचमो नापि विद्यते॥”

अर्थात्‌ पिता, पितामह और प्रपितामह इन तीनों का श्राद्ध , तर्पण , पिंडदान होता है। 

चौथा श्राद्धकर्ता स्वयं यजमान होता है, और यहाँ पर पाँचवें की कोई सम्भावना ही नहीं है।

तिल और पानी की जलांजली के माध्यम से हम अपने पित्रों को संतुष्ट करते हुए उनको और ऊंचे स्तर पर पहुंचा सकते हैं। 

जल और तिल से ही तर्पण क्यों ??

श्राद्ध पक्ष में जल और तिल (देवान्न) द्वारा तर्पण किया जाता है। जो जन्म से लय(मोक्ष) तक साथ दे, वही जल है। तिलों को देवान्न कहा गया है। ऐसा माना जाता है कि इससे ही पितरों को तृप्ति होती है।

तर्पण में हम उन्हें मंत्रों के साथ पानी और तिल की पेशकश करते हैं तर्पण जो उन्हें बहुत पसंद है और वह शीघ्रता से प्रसन्न हो जाते है । 

महाभारत,आदि पर्व, 74.39 मे लिखा है

“पुन्नाम्नॊ नरकादयस्मात्पितरम् त्रायते सुत:

तस्मात्पुत्र इति प्रॊक्त: स्वयमॆव स्वयम्भुवा”

बेटा पिता को पुत नाम का नरक से बचाता है,इसलिए उसे स्वयंभु भगवान ने पुत्र नाम रखा था। 

हमारे पूर्वजों की मौत के बाद हमें उनकी आगे की यात्रा के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है, वे कहाँ, किस रूप में है, उन्होंने जन्म लिया है या नहीं, जन्म लिए है तो कहाँ किसी को कुछ भी पता नहीं होता है, लेकिन यह हमारा कर्तव्य है की हम उन्हें जीवित भी खुश रखें और उनकी मृत्यु के बाद भी। 

पितृ तर्पण  एक अद्भुत मौका है जिसमें देवताओं, वसु, रुद्र और आदित्य,चाहे हमारे पितृ कहीं भी किसी भी रूप में हो, उनको सूक्ष्म माध्यम से हमारे जल और तिल को पित्रों के पास उत्तम रूप मे पहुंचा देते हैं।

 पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि हमारे पितृ अत्यंत दयालु तथा कृपालु होते हैं, वह अपने पुत्र-पौत्रों से पिण्डदान तथा तर्पण की आकांक्षा रखते हैं। श्राद्ध तर्पण आदि द्वारा पितृ को बहुत प्रसन्नता एवं संतुष्टि मिलती है। पितृगण प्रसन्न होकर दीर्घ आयु, संतान सुख, धन-धान्य, विद्या, राजसुख, यश-कीर्ति, पुष्टि, शक्ति, स्वर्ग एवं मोक्ष तक प्रदान करते हैं।

महर्षि पुलस्त्य के अनुसार जिस कर्मविशेष में दूध, घृत और मधु से युक्त अच्छी प्रकार से पके हुए पकवान श्रद्धापूर्वक पितृ के उद्देश्य से गौ, ब्राह्मण आदि को दिए जाते हैं वही श्राद्ध है। अतः जो लोग विधिपूर्वक शांत मन होकर श्राद्ध करते हैं वह सभी पापों से रहित होकर मोक्ष को प्राप्त होते हैं। उनका संसार में चक्र छूट जाता है।

इसीलिए चाहिए कि पितृगणों की संतुष्टि तथा अपने कल्याण के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। कहा है कि श्राद्ध करने वाले की आयु बढ़ती है पितृ उसे श्रेष्ठ संतान देते हैं, घर में धन-धान्य बढ़ने लगता है, शरीर में बल, पौरुष बढ़ने लगता है एवं संसार में यश और सुख की प्राप्ति होती है।

श्राद्ध कर्म में गया तीर्थ का स्मरण करते हुए ‘ॐ गयायै नमः’ तथा गदाधर स्मरण करते हुए ‘ॐ गदाधराय नमः’ कहकर सफेद पुष्प चढ़ाने चाहिए। साथ ही तीन बार ‘ॐ श्राद्धभूम्यै नमः’ कहकर भूमि पर जौ एवं पुष्प छोड़ने चाहिए।

“ओम आगच्छन्तु मे पितर एवं ग्रहन्तु जलान्जलिम” 

हे पितरों! पधारिये पितरों तथा जलांजलि ग्रहण कीजिए। पितृपक्ष में पितर स्वर्ग से उतरकर धरती पर वाश करेंगे। इस बार सोलह के स्थान पर चौदह दिन के ही श्राद्ध हैं। श्राद्धपक्ष अपने कुल, अपनी परंपरा, पूर्वजों के श्रेष्ठ कार्यों का स्मरण करने और उनके पदचिह्नों पर चलने का संकल्प लेने के दिन है।

चूँकि पितरों को भी पोषण की जरूरत है। इसलिए जब हम उनको तर्पण देते हैं,वे संतुष्ट हो जाते हैं और हमें सुख, दौलत और सत संतति की आशीर्वाद देते हैं। और जब वे अच्छाई करते हैं,तब उसके हिसाब से उनको भी ऊंचाई मिल जाती है। 

जानिए कौन कर सकता है तर्पण ??

पुत्र, पौत्र, भतीजा, भांजा कोई भी श्राद्ध कर सकता है। जिनके घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं है लेकिन पुत्री के कुल में हैं तो धेवता और दामाद भी श्राद्ध कर सकते हैं। पंडित द्वारा भी श्राद्ध कराया जा सकता है। 

क्या करें पितृ अमावस्या को ??

जिनकी मृत्यु तिथि याद नहीं रहती या किन्ही कारण से हम श्राद्ध नहीं कर पाते, एसे ज्ञात-अज्ञात सभी लोगों का श्राद्ध पितृ अमावस्या को किया जा सकता है। इस दिन श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिए। इसके बाद ही पितृ हमसे विदा लेते हैं।

ध्यान रखें, पितृ तर्पण  करने से पहले कुछ भी नहीं खाना चाहिए। उस दिन के रात में, किसी भी उपवास खाना खाना चाहिए|

वैसे ही तिथि के पहले दिन की रात मे भी उपवास का खाना लेना है।

प्रतिदिन तर्पण के दिन की सुबह में गीले किए हुये और सूखे धोती / कपड़ा पहनना चाहिए। यदि संभव हो तो पिछली रात मे धोती को धो के एक स्थान पर लटकाए जिधर कोई नहीं छुए।

तर्पण करने से व्यक्ति के जन्म के आरंभ से तर्पण के दिन तक जाने अनजाने किए गए पाप उसी समय नष्ट हो जाते हैं। 

“समयानुसार तर्पण ओर श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।”

पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि पितृपक्ष  में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। 

ऐसे करें तर्पण–

तर्पण  करते समय एक पीतल के बर्तन में जल में गंगाजल, कच्चा दूध, तिल, जौ, तुलसी के पत्ते, दूब, शहद और सफेद फूल आदि डाल कर फिर एक लोटे से पहले देवताओं, ऋषियों, और सबसे बाद में पितरों का तर्पण करना चाहिए। 

कुश तथा काला तिल भगवान विष्णु के शरीर से उत्पन्न हुए हैं तथा चांदी भगवान शिव के नेत्रों से प्रकट हुई हैं। गाय का दूध और गंगाजल का प्रयोग श्राद्ध के कर्मफल को कई गुना तक बढ़ा देता है। तुलसी बहुत ही पवित्र मानी जाती है अत: इसके प्रयोग से पितृ अत्यंत प्रसन्न होते हैं। 

तर्पण  में कुशा (पवित्री) का प्रयोग अनिवार्य है। दो कुशा से बनाई हुई पवित्री (अंगूठी) दा‍हिने हाथ की अनामिका अंगुली तथा तीन कुशाओं से मिलाकर बनाई गई पवित्री बाईं अनामिका में धारण करें, यह आप खुद भी बना सकते या बाज़ार में किसी भी पूजा की दुकान में मिल जाता है।

पितरों के तर्पण में सोना-चांदी, कांसा या तांबे के पात्र का ही उपयोग करना चाहिए। लेकिन लौह के पात्र अशुद्ध माने गए हैं। अत: यथासंभव लोहे के बर्तनो का प्रयोग नहीं ही करना चाहिए । 

तर्पण , श्राद्ध  में तिल और कुशा सहित जल हाथ में लेकर देवताओं का तर्पण करते समय पूर्व दिशा की तरफ मुँह करके देवताओं का नाम लेकर एक एक बार तपरान्तयामि बोलते हुए उन्हें मध्यमा ऊँगली से जल गिराते हुए जलांजलि दें । 

दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाएं। अब एक कुशा लेकर उसे दोहरा करें और तिरछा रखते हुए दाहिने हाथ में अंगूठे से पकड़ें (पितृतीर्थ मुद्रा)। अब अपने गोत्र का नाम लेते हुए पितरों का आह्वाह्न करते हुए कहें कि “हे पितर! कृपा कर मेरी ये जलंजलि स्वीकार करें!”

अगर अपने पिता के लिए तर्पण कर रहे हों, तो पिता काम लेते हुए कहें – “ मैं अपने पिता।। (नाम) की तृप्ति के लिए यह तिल सहित जल अर्पण करता हूं/ करती हूं। तस्मै स्वधा नम:!” और दूसरे पात्र में जल छोड़ें।

इसी विधि का पालन करते हुए माता, दादा, दादी आदि के लिए भी करें। मंत्र में हर पुरुष पितर के लिए “तस्मै स्वधा नम:!” और हर महिला पितर के लिए “तस्यै स्वधा नम:!” कहें। जैसे पिता के लिए “तस्मै”, तो मात के लिए “तस्यै”।

ध्यान रखें कि माह की जिस भी तिथि को पितरों की मृत्यु हुई हो, उसी तिथि को उनका श्राद्ध या तर्पण करें। 

अगर तिथि का ज्ञान ना ह हो, तो श्राद्ध के आखिरी दिन (अमावस्या) उनके नाम पर दान या तर्पण करें। सभी ज्ञात पितरों के लिए जलांजलि (तर्पण) अर्पित करने के पश्चात् अपने अन्य सभी अज्ञात पितरों के लिए इस प्रकार तर्पण करें:—

“जो नरक आदि में यातना भुगत रहे हैं और हमसे जल पाना चाहते हैं, उन सभी की तृप्ति के लिए मैं जलांजलि अर्पण करता/करती हूं। जो मेरे बंधु-बांधव हैं और जो मेरे बंधु-बंधव नहीं हैं, जो पिछले किसी जन्म के बंधु-बांधव हैं, उनकी तृप्ति के लिए भी मैं ये जलांजलि अर्पण करता/ करती हूं….

देव, ऋषि, पितृ, मानव सहित ब्रह्म पर्यंत सभी की तृप्ति के लिए मैं ये जलांजलि अर्पण करता/करती हूं। माता और नाना के कुल के और करोडों कुलों के सातों द्वीपों और समस्त लोकों में रहने वाले प्राणियों की तृप्ति के लिए भी मैं ये जलांजलि अर्पण करता/करती हूं। जो मेरे बंधु-बांधव हैं या जो मेरे बंधु-बंधव नहीं हैं…

जो पिछले किसी जन्म के बंधु-बांधव हैं, वे सभी मेरे द्वारा अर्पण किए इस तर्पण से पूरी तरह तृप्त हों।” इस तर्पण के पश्चात् संभव तो सबसे पहले ब्राह्मण या किसी जरूरतमंद को भोजन कराएं, फिर किसी गाय को रोटी खिलाएं, इसके बाद ही परिवार के सभी सदस्य भोजन करें। यम स्त्रोत्र और पितृ स्त्रोत्र का पाठ कर सकें तो और भी अच्छा है।

ध्यान रखें,ऋषियों का तर्पण करते समय उत्तर दिशा की तरफ मुँह करके दो बार तपरान्तयामि, तपरान्तयामि बोलते हुए उन्हें मध्यमा ऊँगली के दोनों तरफ से जल गिराते हुए जलांजलि दें । 

इसके पश्चात दक्षिण दिशा की तरफ मुँह करके सबसे पहले भगवान यमराज फिर चित्रगुप्त का नाम लेते हुए और उसके बाद अपने सभी पितरों का नाम लेते हुए सबके नाम के बाद तीन बार तपरान्तयामि, तपरान्तयामि, तपरान्तयामि कहकर पितृ तीर्थ यानी अँगूठे के बगल की उँगली और अंगूठे के बीच से जलांजलि देते हुए जल को धरती में किसी बर्तन में छोड़ने से पितरों को तृप्ति मिलती है। 

तर्पण करते समय पहले अपने ननिहाल के सभी पितरों उसके बाद अपने ननिहाल के सभी पितरों का नाम लेते हुए उनका तर्पण करें, फिर अपने वंश के भूले हुए, पितृ जिन तक आपका तर्पण पहुँचना चाहिए उन सभी पितरों को एक साथ जलांजलि देते हुए उनका तर्पण करें । 

अंत में पूर्व की ओर मुंह करके शुद्ध जल से सूर्य को अर्घ्य प्रदान करें।

ध्यान रहे तर्पण का जल तर्पण के बाद किसी वृक्ष की जड़ में चढा देना चाहिए ।अथवा किसी पवित्र नदी -सरोवर में विसर्जित किया जा सकता हैं।

ध्यान रखें, वह जल इधर उधर बहाना नहीं चाहिए । 

पितरों का श्राद्ध और पिंडदान करने तथा ब्राह्मणों को भोजन कराने से पितरों की आत्माएं तृप्त होती हैं। इसके परिणाम स्वरूप कुल और वंश का विकास होता है। परिवार के सदस्यों को लगे रोग और कष्टों दूर होते हैं।अपने पितरों का जो भी व्यक्ति अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक तर्पण एवम श्राद्ध करता है, उसे सभी दोषों से मुक्ति मिलती है और घर-परिवार, व्यवसाय और आजीविका में हमेशा उन्नति होती है।

1 thought on “जानिए कैसे करें तर्पण ओर क्या महत्व हैं तर्पण का??

  1. Ghar mein pitaji ki mritu hui hai tou kya es saal baki pitro ka shraad hoga aur kya sabhi ko jal arpan karna chahiye ya teesre saal pitaji ki pooja k baad krna hai sab.

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