लेखक परिचय

पंडित दयानंद शास्त्री

पंडित दयानंद शास्त्री

ज्योतिष-वास्तु सलाहकार, राष्ट्रीय महासचिव-भगवान परशुराम राष्ट्रीय पंडित परिषद्, मोब. 09669290067 मध्य प्रदेश

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हिंदू धर्मग्रन्थों के अनुसार, श्रावण मास की शुक्ल पंचमी को नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। यह नागों और सर्पों की पूजा का पर्व है। मनुष्य और नागों का संबंध पौराणिक कथाओं से झलकता रहा है। हिंदू धर्मग्रन्थों में नाग को देवता माना गया है और इनका विभिन्न जगहों पर उल्लेख भी किया गया है। हिन्दू धर्म में कालिया, शेषनाग, कद्रू (साँपों की माता) पिलीवा आदि बहुत प्रसिद्ध हैं। कथाओं के अनुसार दक्ष प्रजापति की पुत्री तथा कश्यप ऋषि (जिनके नाम से कश्यप गोत्र चला) की पत्नी ‘कद्रू’ नाग माता के रूप में आदरणीय रही हैं। कद्रू को सुरसा के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों के अनुसार, सूर्य के रथ में बारह सर्प (नाग) हैं, जो क्त्रमश: प्रत्येक माह में उनके रथ के वाहक बनते हैं। भगवान विष्णु क्षीर-सागर में शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं। शेषनाग ही रामावतार में लक्ष्मण और कृष्णावतार में बलराम के रूप में अवतरित हुए थे।

हिन्दू संस्कृति ने पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति सबके साथ आत्मीय संबंध जोड़ने का प्रयत्न किया है। हमारे देश में गाय की पूजा होती है। कोकिला-व्रत होता है, जिसमें कोयल के दर्शन होने पर या उसकी आवाज कानों में पड़ने पर व्रत को खोला जाता है और भोजन किया जाता है। हिन्दू संस्कृति में वृषभोत्सव के दिन बैल का पूजन किया जाता है। वट-सावित्री व्रत के दिन बरगद की पूजा कि जाती है। उसी प्रकार से नागपंचमी के दिन नाग की पूजा की जाती है।

इस वर्ष नाग पंचमी 27 जुलाई 2017 को है| 
पूजा का मुहूर्त सुबह 7 बजे से 8:25 तक है, मतलब इस 1 घंटे 24 मिनट की अवधि में ही पूजा करना उत्तम माना गया है| पंचमी तिथि की शुरुआत 27 जुलाई की सुबह 7 बजे से हो रही है और पंचमी का अंत 28 जुलाई को सुबह 6:38 पर होगा| शिव पुराण में कहा गया है कि काल सर्प दोषयुक्त कुंडली वाला व्यक्ति यदि नागपंचमी पर नाग की पूजा करें और शिवजी पर सहस्राभिषेक करें तो सर्वमनोकामना सिद्धि प्राप्त होती है।
नाग पंचमी पर आमतौर पर पांच पौराणिक नागों की पूजा की जाती है जो क्रमश: अनंत, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक व पिंगल हैं। अनंत (शेष) नाग की शय्या पर भगवान विष्णु विश्राम करते हैं। वासुकि नाग को मंदराचल से लपेटकर समुद्र-मंथन हुआ था। पुराणों के अनुसार तक्षक नाग के डसने से राजा परीक्षित की मृत्यु हुई थी। नागवंशी कर्कोटक के छल से रुष्ट होकर नारदजी ने उसे शाप दिया था। तब राजा नल ने उसके प्राणों की रक्षा की थी। हिंदू व बौद्ध साहित्य में पिंगल नाग को कलिंग में छिपे खजाने का संरक्षक माना गया है। मान्यता है कि श्रद्धालुओं को उज्जैन के सिद्धवट तीर्थ पर  या अन्य ज्योतिर्लिंगों में जाकर विधि-विधान से पूजा पाठ करवाने से कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। इस दिन नाग दर्शन का विशेष महत्व होता है। इस दिन सर्पहत्या की मनाही है। पूरे श्रावण माह विशेष कर नागपंचमी के दिन धरती खोदना निषिद्ध है।

नागपंचमी की पूजा सुबह-सुबह की जाती है और पूजा से पहले यह जरूरी है कि व्यक्ति नित्यकर्म निपटा कर, अच्छी तरह स्नान करके स्वच्छ कपड़े धारण कर ले| पूजा के लिए ताजा-ताजा सेवई या चावल की खीर बनाई जाती है| दीवाल पर गेरू पोतकर पूजा के लिए जगह बनायीं जाती है| कच्चे दूध में कोयला घिसकर उस कोयले से सर्पों की आकृति बनायीं जाती है| अगर किसी सपेरे के पास या आसपास कहीं भी सांप हों तो सबसे पहले साँपों की बांबी में एक कटोरा दूध नागों को अर्पित किया जाता है| इसके बाद दीवाल पर बनाये हुए नागों को दही, दूर्वा, गंध, अक्षत, कुशा, फूल, जल, रोली, चावल इत्यादि अर्पित करके और पूजन करके सेवई/खीर और अन्य मिष्ठान का भोग लगाया जाता है| इसके बाद कथा और आरती संपन्न करते हैं| इस दिन कई लोग व्रत भी रखते हैं| कई क्षेत्रों में नागपंचमी के दिन पिछले दिन का बनाया हुआ बासी भोजन ग्रहण करने की भी प्रथा है|

नाग-पंचमी का पर्व धार्मिक आस्था एवं विश्वास के सहारे हमारी बेहतरी की कामना का प्रतीक है। यह जीव-जंतुओं के प्रति समभाव, हिंसक प्राणियों के प्रति भी दयाभाव और अहिंसा के अभयदान की प्रेरणा देता है। यह पर्व हमें पर्यावरण से जोड़ता है। सांप खेतों में रहकर कृषि-संपदा (अनाज) को नुकसान पहुंचाने वाले चूहों को खा जाते हैं, इसलिए उन्हें किसानों का मित्र अथवा क्षेत्रपाल भी कहा जाता है। अनेक जीवन-रक्षक औषधियों के निर्माण हेतु नागों से प्राप्त जहर की जरूरत होती है। अत: नाग हमारा जीवन-रक्षक भी है। इसी कारण आधुनिकता के वर्तमान युग में भी नाग-पंचमी का त्योहार प्रासंगिक है। हमारी संस्कृति ने उन सभी जीवों, वनस्पतियों तथा वस्तुओं को सम्मान दिया है, जो हमारे अस्तित्व को बचाने में सहायक हैं। इसी कारण, पर्यावरण-संतुलन में मदद करने वाला सांप देवाधिदेव शिवजी के कंठ का हार बनता है, तो नाग-पंचमी पर वह पूजा जाता है।

नाग-पंचमी पर मुख्यत: पांच पौराणिक नागों की पूजा होती है – अनंत, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक व पिंगल। असंख्य फन वाले अनंत (शेष) नाग की शय्या पर भगवान विष्णु विश्राम करते हैं। वासुकि नाग को मंदराचल से लपेटकर समुद्र-मंथन हुआ था। तक्षक के डसने से राजा परीक्षित की मृत्यु हो गई। नागवंशी कर्कोटक के छल से रुष्ट होकर नारदजी ने उसे शाप दिया था। तब राजा नल ने उसके प्राणों की रक्षा की थी। हिंदू व बौद्ध साहित्य में पिंगल को कलिंग में छिपे खजाने का संरक्षक माना गया है।

 

पौराणिक महत्ता:- शेषनाग के फन पर पृथ्वी टिकी है। भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर सोते हैं। शिवजी के गले में सर्पों का हार है। कृष्ण जन्म पर नाग की सहायता से ही वासुदेवजी ने यमुना पार की थी। यहां तक कि समुद्र-मंथन के समय देवताओं की मदद भी वासुकी नाग ने ही की थी। लिहाजा नाग देवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है- नागपंचमी। श्रावन मास की शुक्‍ल पंचमी को नागपंचमी कहते है। यह हिन्दुओं का एक महत्वपूर्ण त्यौहार भी है। नागपंचमी के दिन नागदेव या सर्प की पूजा की जाती है।

 

मान्यता है कि नाग-पंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कालिय-मर्दन लीला हुई थी। भविष्य पुराण में कथानक है कि देवासुर-संग्राम में हुए समुद्र-मंथन से उच्चैश्रवा नामक अश्व (घोड़ा) निकला था। उसे देखकर नागमाता कद्रू ने अपनी सौत विनता से कहा, इस घोड़े का सफेद रंग है, परंतु बाल काले दिखलाई पड़ते हैं। विनता द्वारा यह बात स्वीकार न किए जाने पर दोनों में वाद-विवाद छिड़ गया। कद्रू ने नागों से अश्व के बाल के समान सूक्ष्म होकर उच्चैश्रवा के शरीर पर लिपट जाने को कहा, ताकि वह काले रंग का दिखाई देने लगे। पुत्र नागों द्वारा विरोध करने पर कद्रू ने क्त्रोधित होकर उन्हें राजा जनमेजय द्वारा किए जाने वाले सर्प-यज्ञ के दौरान भस्म हो जाने का शाप दे दिया। तब ब्रह्माजी के वरदान से आस्तीक मुनि ने सर्प-यज्ञ को रोककर नागों की प्राणरक्षा की। मान्यता है कि ब्रह्माजी द्वारा पंचमी के दिन वरदान दिए जाने और पंचमी के दिन ही आस्तीक मुनि द्वारा नागों की रक्षा किए जाने के कारण पंचमी-तिथि नागों को समर्पित है।

नागपंचमी के दिन कई गांव व कस्बों में कुश्ती का आयोजन किया जाता है। भारतवर्ष की पृष्ठभूमि पर मनाया जाने वाला नागपंचमी का पर्व अत्यंत प्राचीन पर्व है। पुराणों में यक्ष, किन्नर एवं गंधर्वो की भांति नागों का भी वर्णन है। उसमें सांप शक्ति एवं सूर्य के अवतार माने गए हैं, इसलिए नाग को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, नाग महर्षि कश्यप और उनकी पत्‍‌नी कद्रू की संतान हैं lवाराह पुराण में आई कथा के अनुसार श्रावणमास शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ब्रह्माजी ने शेषनाग को पृथ्वी धारण करने का आशीर्वाद प्रदान किया था। नागपंचमी की कई कथाऐ भी प्र‍चलित है, जिसका नागपंचमी के दिन पाठन किया जाता है।

 

प्रथम कथा

एक समय की बात है, यमुना नदी में कालिया नाग का निवास था, जिसके कारण पूरी यमुना नदी का पानी काले रंग का हो गया भयानक विषधर कालिया नाग के विष के कारण यमुना नदी विषाक्त हो चली थी। जब कालिया नाग के इस कृत्य की जानकारी भगवान श्री कृष्ण तक पहुंची। तब भगवान श्री कृष्ण ने कालिया नाग के साथ युद्ध कर उसे हरा दिया और यमुना नदी को छोड़ने पर विवश कर दिया और पाताल लोक भेज दिया। जिस दिन भगवान श्री कृष्ण ने कालिया नाग को हराया था वह दिन श्रावण मास की पंचमी तिथि थी, इस कारण नाग देवता की पूजा कर उसे नागपंचमी का नाम दिया।

 

द्वितीय कथा

एक सेठ के चार पुत्र थे। सभी का विवाह हो चूका था। तीन पुत्र की पत्नियों का मायका बहुत सम्पन्न था उसे धन-धान की कोई कमी ना थी, लेकिन चौथी के परिवार में कोई नहीं था उसका विवाह किसी रिश्तेदार ने किया था। अन्य तीन बहुए अपने घरो से कई उपहार लाती थी और छोटी बहु को ताने मारती थी। लेकिन छोटी बहुत स्वाभाव से बहुत अच्छी थी उस पर इन बातों का प्रभाव नहीं पड़ता था।
एक दिन बड़ी बहु से सभी बहुओं को साथ चल कर कुछ पौधे लगाने को कहा। बड़ी बहु ने खुरपी से गड्डा करने के लिए जैसे ही खुरपी को उठाया। उसी समय वहां एक सर्प आ गया उसने उसे मारने की सोची लेकिन छोटी बहु ने उसे रोक दिया कहा,” दीदी यह बेजुबान जानवर हैं इसे ना मारे।” तब सर्प की जान बच गई। कुछ वक्त बाद सर्प छोटी बहु के स्वपन में आया और उसने उससे कहा तुमने मेरी जान बचाई इसलिए तुम जो चाहों मांग लो। छोटी बहु ने सर्प को उसका भाई बनने का कहा। सर्प ने छोटी बहु को अपनी बहन स्वीकार किया। कुछ दिनों बाद सारी बहुयें अपने-अपने मायके गई और वापस आकर छोटी बहु को ताना मारने लगी। तब ही छोटी बहु को उस स्वपन का ख्याल आया और उसने मन ही सर्प को याद किया।

 

एक दिन वह सर्प मानव रूप धर के छोटी बहु के घर आया और उसने सभी को यकीन दिलाया कि वो छोटी बहु का दूर का भाई हैं। और उसे अपने साथ मायके ले जाने आया है। परिवार वालो ने उसे जाने दिया। रास्ते में सर्प ने छोटी बहु को अपना वास्तविक परिचय दिया। और उसे शान से घर लेकर गया। जहाँ बहुत धन-धान्य था। सर्प ने अपनी बहन को बहुत सा धन, जेवर देकर मायके भेजा। जिसे देख बड़ी बहु जल गई और उसने छोटी बहु के पति को भड़काया और कहा कि छोटी बहु चरित्रहीन हैं। इस पर पति ने छोटी बहु को घर से निकालने का निर्णय लिया। तब छोटी बहु ने अपने भाई सर्प को याद किया। सर्प उसी वक्त उसके घर आया और उसने सभी को कहा कि अगर किसी ने मेरी बहन पर आरोप लगाया तो वो सभी को डस लेगा। इससे वास्तविकता सामने आई और इस प्रकार भाई ने अपना फर्ज निभाया। तब ही से सर्प की पूजा सावन की शुक्ल पंचमी के दिन की जाती हैं। लडकियाँ सर्प को अपना भाई मानकर पूजा करती हैं। धन्य धान की पूर्ति हेतु भी सर्प की पूजा की जाती हैं।

 

नागों की वि‍षेशता 

भारत एक कृषिप्रधान देश है और सांप खेतों की रक्षा करते है, इसलिए सांपों को क्षेत्रपाल भी कहा जाता है। फसल को नुकसान पहुंचाने वाले जीवों को सांप खा जाता है, जिससे फसलों को नुकसान नही होता है और खेत हरा-भरा रहता है। हमारे जीवन में सांपों का बहुत महत्‍व है।सांप वैसे तो विषैला जीव है लेकिन अकारण किसी को डसता नहीं है| भारत में नागों को पूजने के पीछे तर्क संगत कारण ये है कि सांप ऐसे जीव-जंतु, कीड़े-मकोड़े, और चूहों को नष्ट कर देते हैं जो फसल को नुकसान पहुंचाते हैं| सांप खेतों की रक्षा करते हैं और भारत में हमेशा से कृषि जीविका का मुख्य साधन रही है| कृषिप्रधान देश होने के कारण खेतों की रक्षा करनेवाले सांप पूज्य माने गए हैं| इसके अलावा कई प्राचीन काल से जुड़ी कथाएं भी हैं जो नागों और नागपंचमी के महत्त्व को बताती हैं| ऐसी मान्यता भी है कि नागपंचमी के दिन नागों की पूजा करने पर आध्यात्मिक शक्ति और धन की प्राप्ति होती है| लेकिन यह बेहद जरूरी होता है कि नागपंचमी के दिन पूजा सही तरीके से ही की जाए|

 

यह रखें सावधानी—

सर्पादि के काटने से जिनकी अधोगति हो जाती है, उनके निमित यदि एक वर्ष तक यह उत्तम व्रत भक्ति पूर्वक किया जाए तो वे जीव उस यातना से मुक्त होकर शुभ गति को प्राप्त होते है| श्रावण शुक्ला पंचमी में नागों का महान् उत्सव होता है| उस दिन वासुकि, तक्षक, कालिक, मणिभद्रक, धृतराष्ट्र, रैवत, कर्कोटक और धनंजय- ये सभी नाग प्राणियों को अभय (दान) देते है| जो मनुष्य नागपंचमी के दिन नागों को दूध से स्नान कराते है, दूध पिलाते है| उनके कुल में प्राणियों को ये सदा अभयदान देते रहते है| जब नाग माता कद्रू ने नागों को शाप दे दिया, तब वे रात-दिन संतप्त हो रहे थे| जब उन्हें गाय के दूध से तृप्त किया गया तब से वे प्रसन्न होकर सुखी हो गए|

भाद्रपदशुक्ला पंचमी को काले रंगों से नागों का चित्र बनाकर गंध-पुष्प-घी-गूगल-खीर आदि से भक्ति पूर्वक पूजा करता है, उस पर तक्षक आदि नाग प्रसन्न होते है| उसके सात कुल (पीढ़ी) तक नागों से भय नही रहता| इसी प्रकार आश्विनमास की शुक्ला पंचमी को कुश के नाग बनाकर इंद्राणी के साथ उनकी पूजा करे| घी-दूध और जल से स्नान कराकर दूध में पके गेहूँ तथा अन्य भोज्य पदार्थ उन्हें श्रद्धा-भक्तिपूर्वक समर्पित करे तो शेष आदि नाग उस पर प्रसन्न होते है, उसे सुख-शांति प्राप्त होती है| मृत्यु के बाद वह प्राणी उत्तम लोक को प्राप्त करता है, जहाँ चिरकाल तक आनंद भोगता है| यह पंचमी व्रत का विधान है|

सर्पों का सर्वेदोष-निवारक मंत्र यह है- ‘ॐ कुरुकुल्ले हुं फट् स्वाहा|’ इस मंत्र से भक्तिपूर्वक सौ पंचमियों को जो सर्पों की पूजा पुष्पों से करते है, उनके घर में साँपों का कभी भय नही होता|

One Response to “जानिए नाग पंचमी का महत्त्व”

  1. ravindra pal

    श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है। पंचमी तिथि के स्वामी नाग देवता हैं। नाग पंचमी नागों / साँपो की पूजा के लिए मनाया जाता है।http://www.memorymuseum.net/hindi/nag-panchami.php

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