गोवत्स एकादशी को मनाये जाने के कारण एवम कथा को

कार्तिक कृष्ण द्वादशी को गोवत्स द्वादशी के नाम से जाना जाता है. इसे बछ बारस का पर्व भी कहते हैं. गुजरात में इसे वाघ बरस भी कहते हैं. यह एकादशी के बाद आता है. गोवत्स द्वादशी के दिन गाय माता और बछड़े की पूजा की जाती है. यह पूजा गोधुली बेला में की जाती है, जब सूर्य देवता पूरी तरह ना निकले हों.
इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं. खासतौर से पुत्र को संतान के रूप में प्राप्त करने वाली महिलाओं के लिए ये व्रत करना शुभकारी होता है।इस दिन गाय तथा बछड़ों की पूजा की जाती है और व्रत रखा जाता है।घर के आस-पास यदि गाय और बछडा़ न मिले, तो गीली मिट्टी से उनकी आकृति बनाकर पूजा करने का विधान है। इस व्रत में गाय के दूध से बनी चीजें नहीं खाई जातीं।
गोवत्स द्वादशी का महत्व—गोवत्स द्वादशी से संबंधित कई पौराणिक कथाएं हैं। एक कथा के अनुसार राजा उत्तानपाद और उनकी पत्नी सुनीति ने सबसे पहले ये व्रत किया था। इस व्रत के प्रभाव से ही उन्हें भक्त ध्रुव जैसे पुत्र की प्राप्ति हुई। इसलिए निसंतान पति-पत्नी को उत्तम संतान के लिए ये व्रत करना चाहिए। इस दिन गाय की पूजा करने से भगवान विष्णु भी प्रसन्न होते हैं।वैदिक पंचांगनुसार कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की द्वादशी (12वें दिन) को गोवत्स द्वादशी का त्योहार मनाया जाता है। यह त्योहार गाय माता को समर्पित है। अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार यह पर्व इस बार शुक्रवार (25 अक्टूबर) को मनेगी।
वैदिक पंचांग के अनुसार इस बार गोवत्स द्वादशी गुरुवार (24 अक्टूबर) रात 10 बजकर 19 मिनट से शुरू होकर अगले दिन यानी 25 अक्टूबर को शाम 7 बजकर 8 मिनट तक रहेगी।
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि यह त्योहार धनतेरस से एक दिन पहले मनाया जाता है। गोवत्स द्वादशी के दिन गाय-बछड़ों की पूजा की जाती है। पूजा के बाद गाय-बछड़ों को खाने के लिए गेंहू और उड़द से बनी चीजें दी जाती हैं।
गोवत्स द्वादशी को विधि पूर्वक मनाने वाले व्रतधारी इस दिन गेंहू और दूध से बनी चीजों के सेवन से परहेज करते हैं।
गोवत्स द्वादशी को नंदिनी व्रत भी कहते हैं। हिंदुओं में नदिनी एक पवित्र गाय का नाम है। महाराष्ट्र में गोवत्स द्वादशी को वासु बरस के नाम से भी जाना जाता है। गोवत्स द्वादशी को दिवाली शुरू होने का पहले दिन माना जाता है। 
यह रहेगा गोवत्स द्वादशी शुभ मुहूर्त–गोवत्स द्वादशी का शुभ मुहूर्त शुक्रवार (25 अक्टूबर) को शाम 05:42 बजे से 08:15 बजे तक है। प्रदोष काल का समय दो घंटे तैतीस मिनट है।
इस विधि से करें व्रत—सबसे पहले व्रती (व्रत करने वाला) को सुबह स्नान आदि करने के बाद दूध देने वाली गाय को उसके बछडे़ सहित स्नान कराना चाहिए। फूलों की माला पहनाएं। माथे पर चंदन का तिलक लगाएं। तांबे के बर्तन में पानी, चावल, तिल और फूल मिलाकर नीचे लिखा मंत्र बोलते हुए गाए के पैरों पर डालें।
क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते। सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नम:॥
इस मंत्र का अर्थ है- समुद्र मंथन के समय क्षीर सागर से उत्पन्न सुर तथा असुरों द्वारा नमस्कार की गई देवस्वरूपिणी माता, आपको बार-बार नमस्कार है। मेरे द्वारा दिए गए इस अर्घ्य को आप स्वीकार करें। इसके बाद गाय को विभिन्न पकवान खिलाएं और नीचे लिखा हुआ मंत्र बोलें-
सुरभि त्वं जगन्मातर्देवी विष्णुपदे स्थिता। सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस॥ तत: सर्वमये देवि सर्वदेवैरलड्कृते। मातर्ममाभिलाषितं सफलं कुरु नन्दिनी॥
इस तरह गाय और बछड़ों की पूजा करने के बाद गोवत्स व्रत की कथा सुनें। पूरा दिन व्रत रखकर रात में अपने इष्टदेव और गौमाता की आरती करें। इसके बाद भी भोजन करें।

🏻यह हैं महत्व गोवत्स एकादशी का –
यह पर्व पुत्र की मंगल-कामना के लिए किया जाता है. इस पर्व पर गीली मिट्टी की गाय, बछड़ा, बाघ तथा बाघिन की मूर्तियां बनाकर पाट पर रखी जाती हैं तब उनकी विधिवत पूजा की जाती है.
भारतीय धार्मिक पुराणों में गौमाता में समस्त तीर्थ होने की बात कहीं गई है. पूज्यनीय गौमाता हमारी ऐसी मां है, जिसकी बराबरी न कोई देवी-देवता कर सकता है और न कोई तीर्थ. गौमाता के दर्शन मात्र से ऐसा पुण्य प्राप्त होता है, जो बड़े-बड़े यज्ञ, दान आदि कर्मों से भी नहीं प्राप्त हो सकता.
ऐसी मान्यता है कि सभी देवी-देवताओं एवं पितरों को एक साथ खुश करना है तो गौभक्ति-गौसेवा से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है. गौ माता को बस एक ग्रास खिला दो, तो वह सभी देवी-देवताओं तक अपने आप ही पहुंच जाता है.
भविष्य पुराण के अनुसार गौमाता कि पृष्ठदेश में ब्रह्म का वास है, गले में विष्णु का, मुख में रुद्र का, मध्य में समस्त देवताओं और रोमकूपों में महर्षिगण, पूंछ में अनंत नाग, खूरों में समस्त पर्वत, गौमूत्र में गंगादि नदियां, गौमय में लक्ष्मी और नेत्रों में सूर्य-चन्द्र विराजित हैं.
इसीलिए बछ बारस या गोवत्स द्वादशी के दिन महिलाएं अपने बेटे की सलामती, लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली के लिए यह पर्व मनाती है. इस दिन घरों में विशेष कर बाजरे की रोटी जिसे सोगरा भी कहा जाता है और अंकुरित अनाज की सब्जी बनाई जाती है. इस दिन गाय की दूध की जगह भैंस या बकरी के दूध का उपयोग किया जाता है. 

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यह हैं व्रत विधि–
यह निराहार व्रत है. इसमें महिलाएं घर आंगन लीप कर चौक पूरती हैं और उसी चौक में गाय खड़ी करके चंदन अक्षत, धूप, दीप नैवैद्य आदि से विधिवत पूजा की जाती हैं.
पूजा में धान या चावल का इस्तेमाल गलती से भी ना करें. पूजन के एिल आप काकून के चावल का इस्तेमाल कर सकते हैं.
आज खाने में चने की दाल जरूर बनती है. व्रत करने वाली महिलाएं गोवत्स द्वादशी के दिन गेहूं, चावल आदि जैसे अनाज नहीं खा सकतीं. साथ में उनका दूध या दूध से बनी चीजें खाना भी वर्जित होता है.
यह व्रत कार्तिक, माघ व वैशाख और श्रावण महीनों की कृष्ण द्वादशी को होता है. कार्तिक में वत्स वंश की पूजा का विधान है. इस दिन के लिए मूंग, मोठ तथा बाजरा अंकुरित करके मध्यान्ह के समय बछड़े को सजाने का विशेष विधान है. व्रत करने वाले व्यक्ति को भी इस दिन उक्त अन्न ही खाने पड़ते हैं. 

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यह है गोवत्स द्वादशी कथा–
प्राचीन समय में भारत में सुवर्णपुर नामक एक नगर था। वहां देवदानी नाम का राजा था। देवदानी के पास एक गाय और एक भैंस थी। उनकी दो रानियां थीं, एक का नाम सीता और दूसरी का नाम गीता था। सीता को भैंस से बड़ा ही लगाव था।
वह उससे बहुत नम्र व्यवहार करती थी और उसे अपनी सखी के समान प्यार करती थी। राजा की दूसरी रानी गीता गाय से सहेलियों के समान और बछडे से पुत्र समान प्यार और व्यवहार करती थी। यह देख भैंस ने एक दिन रानी सीता से कहा- गाय होने पर गीता रानी मुझसे ईर्ष्या करती है। सीता ने कहा- ऐसी बात है, तो मैं सब ठीक कर लूंगी।
सीता ने उसी दिन गाय के बछडे को काट कर गेहूं की बोरी में दबा दिया। इस घटना के विषय में किसी को कुछ भी पता नहीं चलता। उसके अगले दिन जब राजा भोजन करने बैठा तभी मांस और रक्त की बारिश होने लगी। महल में चारों ओर रक्त और मांस दिखाई देने लगा। राजा के भोजन की थाली में भी मल-मूत्र आदि की बास आने लगी। यह सब देखकर राजा को बहुत चिंता हुई।
तभी आकाशवाणी हुई – ‘हे राजा! तेरी रानी सीता ने गाय के बछडे को काटकर गेहूं की बोरी में दबा दिया है। इसी कारण आपके घर में रक्त और मास की बारिश हो रही है। तभी राजा ने हाथ जोड कर आग्रह किया कि कृप्या मुझे इसके पश्चाताप का उपाय बताएं। तभी आकाशवाणी ने उपाय बताया कि कल गोवत्स द्वादशी है। गाय और बछडे की पूजा कीजिए।
गोवत्स द्वादशी के दिन आप गाय का दूध तथा कटे फलों का भोजन में त्याग करें। इससे आपकी रानी द्वारा किया गया पाप नष्ट हो जाएगा। गाय और बछडा़ भी जिंदा हो जाऐंगे। तभी से गोवत्स द्वादशी के दिन गाय-बछड़े की पूजा करने का महत्व बहुत अधिक माना जाता है। इस दिन गौशाला आदि जगह जाकर गाय माता की सेवा करनी चाहिए। इस दिन को गोवत्स द्वादशी के साथ ही बछ बारस भी कहा जाता है।

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