क्या हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व की विचारधारा भारत को बाँट रही है ?


डॉ. विनोद बब्बर, 

हाल ही में अमेरिका में पी.एच.डी. कर रहे एक तमिल छात्र अब्राहम सैमुअल को हिन्दी न बोल पाने के कारण मुंबई एयरपोर्ट पर रोक दिया गया था। उसने प्रधान मंत्री, मंत्रियों और राजनेताओं को ट्वीट किया, जिनमें शशि थरूर भी थे। इसी की प्रतिक्रिया में कांग्रेसी नेता शशि थरूर ने यह विवादास्पद ट्वीट कर दिया कि हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व की विचारधारा देश को बाँट रही है, हमें एकता की ज़रूरत है न कि समानता की। शशि थरूर ने इस छोटी से घटना पर हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व पर भारी आक्रमण कर दिया, हालांकि यह भी स्पष्ट नहीं है कि हिन्दी को ले कर यह घटना हुई कैसे? वस्तुत: यह कांग्रेसी नेता पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति में पला हुआ है और अँग्रेज़ी का प्रबल समर्थक है। ऐसे लोगों के विवादस्पद वक्तव्य बहुत ही असहज और क्षोभकारी होते हैं। लगता है शशि थरूर जी या तो भारतीय संस्कृति, परंपरा, जीवन-शैली और भाषाओं से परिचित नहीं हैं या जानबूझ कर सनसनी पैदा करने के लिए ऐसी बातें करते रहते हैं। 

उन्होंने हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व के बारे में ऐसी बेहूदा वक्तव्य दे कर भारत, भारतीय संस्कृति और भारतीय आस्था-विश्वास का अपमान किया है। उन्हें यह तो मालूम होगा कि हिन्दू, हिन्दी और हिन्दुत्व का विकास ‘’सिंधु’’ सभ्यता में हुआ है। सिंधु नदी के पार भारत में रहने वाले लोगों के लिए ईरान और उसके आस-पास हिन्दू शब्द प्रयुक्त होता था। वास्तव में यह शब्द भौगोलिक और सांस्कृतिक संदर्भ में प्रयुक्त होता था। बाद में हिन्दू उसे कहा जाने लगा जो भारत या हिंदुस्तान को अपनी मातृभूमि (या पितृभूमि) और अपनी पुण्य भूमि दोनों मानता था। बाद के कुछ स्वार्थी और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों और राजनीतिज्ञों ने इसकी पहचान धर्म से कर दी और हिन्दुत्व को एक विशिष्ट धार्मिक विचारधारा से जोड़ दिया। इसी लिए हिन्दुत्व को हिन्दू धर्म या सनातन धर्म या वैदिक धर्म भी कहा जाने लगा।  भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सही अर्थ में हिन्दुत्व की परिभाषा करते हुए हिन्दुत्व को एक जीवन शैली माना है न कि कोई उपासना पद्धति। हिन्दुत्व तो मानव जाति के प्रति उदार और व्यावहारिक दृष्टि  रखता है। इसकी स्थापना इस्लाम और ईसाई धर्मों की भाँति नहीं हुई है जिसे किसी पैगंबर या ईश्वरीय दूत ने की हो। हिन्दुत्व ईश्वर के निराकार या निर्गुण रूप परब्रहम स्वरूप ॐ की जहां आराधना करता है, वहाँ उसके साकार या सगुण रूप शिव, विष्णु, ब्रह्मा, दुर्गा, राम, कृष्ण, हनुमान आदि देवी-देवताओं की भी पूजा करता है। हिन्दू  नास्तिक भी हो सकता है और आस्तिक भी। यह भी बता दें कि हिन्दुत्व ‘वसुधेव कुटुंबकम’’ और ‘’विश्व बंधुत्व’’में विश्वास रखते हुए सर्वधर्म सद्भाव का समर्थक है। 

विभिन्न तथाकथित धर्मों या संप्रदायों ने भारत पर अपना अधिकार जमाने के लिए हमारे देश पर कई बार आक्रमण किया लेकिन हिन्दू-बहुल देश भारत ने किसी देश की भूमि पर न तो आक्रमण किया और न ही कब्जा किया, ऐसा इतिहास बताता है। भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत है और सभी हिंदुस्तानियों या भारतीयों की यही भाषा रही है। संस्कृत भाषा समूचे विश्व में सर्वाधिक समृद्ध और वैज्ञानिक भाषा है। भाषायी विकास के अंतर्गत हिन्दी भाषा का उद्भव हुआ। यह भाषा भी भारत के लोगों को उसी तरह जोड़ती जिस तरह हिन्दू और हिन्दुत्व लोगों को जोड़ते हैं। यह भाषा  समाज को जोड़ती है, देश को जोड़ती है, तोड़ती नहीं है। यह केवल हिंदुओं की भाषा नहीं है, यह मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिख आदि अनेक धर्मों, मजहबों, पंथों और मतों की भी भाषा है और रही है। यह भाषा भारत की सभी भाषाओं का साथ लेती है और उनको भी साथ देती है।

महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के लिए पुरजोर प्रयास किया था और उन्हीं की विचारधारा का डंका बजाने वाली कांग्रेस के ये नेता हिन्दी के विरुद्ध इस प्रकार की बातें कर रहे हैं। आश्चर्य की बात है कि कांग्रेस ने इस वक्तव्य का खंडन अभी तक नहीं किया है। वस्तुत: यह राजनीतिक विद्रूपता है और ये तथाकथित सेक्युलर लोग अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा में ऐसे अनर्गल वक्तव्य देते हैं जो बाद में उनके लिए भारी भी पड़ सकते हैं। संभवत: शशि थरूर जैसे अँग्रेज़ीदाँ लोगों का यह मानसिक दिवालियापन है कि उन्हें अपने देश की भाषाओं और संस्कृति से प्रेम नहीं है।   

तुच्छ राजनीतिक लाभ के लिए पूरी दुनिया में जहां भी लोकतंत्र है, सत्ता की चाह रखने वालों के बीच प्रतिद्वंद्वता, आपसी खींचतान, आरोप- प्रत्यारोप सामान्य बात है। लेकिन यह शोध का विषय है कि क्या भारत के अतिरिक्त भी कोई ऐसा देश है जहां पक्ष- विपक्ष की कटुता इतनी जहरीली हो कि अपने राजनीतिक विरोधियों की आलोचना करते हुए अपने ही देश की अस्मिता, भाषा और संस्कृति तक को अपमानित करने वाले मौजूद हैं। सर्वविदित हे कि पूर्व राजनयिक, मंत्री और वर्तमान सांसद शशि थरूर ने पिछले दिनों ट्विट किया, ‘हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व की विचारधारा देश (भारत) को बाँट रही है।’ थरूर विदेशों में पढ़़े हुए बुद्धिजीवी हैं। विचारणीय है कि ऐसा आखिर क्या हुआ कि वह ‘हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व’ को कोसने में सुख महसूस कर रहे हैं? क्या विदेश में पढ़ने या रहने से उनकी बुद्धि इतनी मलीन हो गई कि उन्हें स्मरण नहीं रहा कि हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व ने  कभी किसी व्यक्ति, समाज, अथवा देश पर स्वयं को नहीं थोपा है। न किसी को अपना उपनिवेश बनाया और न ही किसी का शोषण किया। वास्तविकता तो यह है कि दुनिया भर में जब भी किसी को सताया गया तो भारत ने उसे शरण दी। उसकी भाषा और संस्कृति को अक्षुण रखने में मदद की। उसके धार्मिक विश्वास का सम्मान करते हुए उन्हें हर संभव सहायता दी। यदि हिन्दुस्तान में ऐसी सहिष्णुता न होती तो अभारतीय  विश्वासों के मानने वाले कभी इतने सशक्त और सक्षम हो ही नहीं सकते थे कि ‘अलग कौम’ के नाम पर ‘बंटवारे’ की सोच भी सकते। क्या थरूर जैसे लोग नहीं जानते या नहीं जानना चाहते कि भारत की प्रथम मस्जिद एक हिन्दू राजा ने बनवायी थी। दुनिया में यदि वास्तविक अर्थों में सहिष्णुता है तो वह भारत में ही है जहां अल्पसंख्यक कहे जाने वाले भी करोडो ंमें है।  यहां जबरन धर्मान्तरण बहुसंख्यकों ने नहीं किया। भिन्न विश्वास को मानने वालों पर जजिया किसी हिन्दु राजा ने नहीं लगाया। मुट्ठी भर विदेशी आक्रांताओं के वंशजों की संख्या करोड़ों होना अगर अहिष्णुता है तो सहिष्णुता आखिर क्या है? थरूर जैसे लोग जानबूझ कर अपने ही देश की संस्कृति को बदनाम करते है जबकि वे बखूबी जानते है कि हिन्दुत्व आज से नहीं, सदियों से ‘वसुधैव कुटुंबकम’’ और ‘सर्वधर्म सद्भाव’ का पर्याय रहा है। हालांकि निष्पक्ष इतिहासकारों ने ‘अति उदार’ व्यवहार के कारण उसकी सीमाएं लगातार सिकुडने की बात भी कही है। सबको जोड़ने वाली विचारधारा पर थरूरी आक्षेप और कुछ नहीं बल्कि स्वयं और स्वयं के दल के अप्रसंगिक हो जाने की बौखलाहट है। यह किसी विवेकशील देशभक्त की भाषा नहीं। हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुत्व’ का सम्मान करने वाले समझते है कि ‘ थरूरों के पैरो तले की  जमीन खिसक रही है वे स्वयं को चर्चा में लाने अथवा अपना महत्व प्रदर्शित करने के लिए देश की कोटिशः जनता का मनोबल तोड़ने का उपक्रम कर रहेे है।’  थरूर और उनके आका जिन्हंें बेफकूफ समझ रहे हैं या बेफकूफ  बनाने का प्रयास कर रहे हैं, पूरी दुनिया उनके उस कौशल को देखा है जब उसने क्रूरों थरूरों को भूलुंठित किया है। ऐसा नहीं कि कांग्रेसी नेता शशि  थरूर भारतीय जीवन शैली और भाषाओं से परिचित न हो। वास्तव में वे जानबूझ कर भारत, भारतीयता और भारतीय विश्वास को कमजोर करना चाहते है। ऐसा करने के लिए ‘फूट डालों और राज करों’ के अपने आकाओं के पुराने दांव आजमा रहे हैं। वे जानबूढ कर भ्रम पैदा कर रहे है जबकि ‘हिंदी बांटने वाली नहीं, जोड़ने वाली’ भाषा है। इस देश का सामान्यजन अपनी मातृभाषा और हिंदी दोनो का सम्मान करता है। उसके लिए ये दोनो उसकी दो आंखों के समान है। दोनो की जरूरी। परंतु इन दोनो आंखों को लड़ा कर तीसरी आंख को सशक्त करने वालों की बेचैनी जगजाहिर है। यदि थरूर उसी अभियान को आगे बढ़ा रहे हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।जानते हुए भी वह यह मानने को तैयार नहीं कि विश्व में प्राचीनतम एवं सर्वाधिक समृद्ध और वैज्ञानिक भाषा संस्कृत कभी हर हिंदुस्तानी की भाषा रही है। भाषायी विकास की प्रक्रिया में हिंदी सहित लगभग सभी भारतीय भाषाओं का उद्भव हुआ। इस तरह सभी भारतीय भाषाएं सहोदर है। हिंदी केवल हिंदुओं की भाषा नहीं है, यह मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिख सहित सभी भारतीयों की भाषा है। सभी भाषा भाषियों ने इसे समृद्ध करने में अपना योगदान दिया है। स्वतंत्रता-संग्राम हो या अन्य कोई आंदोलन हिंदी की भूमिका सबको जोड़कर सफलता के द्वार पर दस्तक देने की रही है। गांधी जी ने हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने के लिए अनेक प्रयास किये। क्या थरूर इतने अल्पज्ञ है कि उन्हें  गांधी जी द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की जानकारी न हो। संभवत सेक्युलर रोग उन्हें बौद्धिक रूप से दिवालिया बना रहा है। यह भी कम कष्ट की बात नहीं कि ‘स्वयं को हिन्दुत्व पेरोकार साबित करने के लिए बेचैन थरूर के दल कांग्रेस के अध्यक्ष ने हिन्दी और हिन्दुत्व के विरुद्ध विषवमन करने वाले अपने इस नेता से असंबंद्धता की जानकारी अब तक इस देश को नहीं दी। उन्हें तत्काल सामने आकर इस विभाजक अँग्रेज़ीदाँ को अपने दल से निकाल बाहर करने की घोषणा करनी चाहिए। क्योंकि मगरूर थरूर उनके भी बोझ के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।डॉ. साकेत सहायइस विषय पर तथाकथित प्रबुद्ध माननीय शशि  थरूर से जी मेरा प्रश्न है –1. आप  तथ्यों के आधार पर अपने ब्यान को स्पष्ट करें। ” हिंदी, हिंदू और हिन्दुत्व भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। इस तथ्य को सदियों से प्रतिपादित किया गया है। फिर आपने किस तथ्य के आधार पर यह कहा ? इसे स्पष्ट करें। 1. यह ऐतिहासिक तथ्य है कि हमारी भाषा एवं संस्कृति स्वयमेव समरसता के आधार पर स्थापित हुई है। फिर यह ब्यान अतार्किक है।  2. हिंदी आत्मीयता की भाषा हैं- #जब भी मुझे किसी सेमिनार, संगोष्ठी या अन्य किसी कार्य से देश के विभिन्न क्षेत्रों में जाने का अवसर प्राप्त होता है तो भाषा के एक छात्र होने के नाते मेरा पहला ध्यान लोगों द्वारा सामान्य या आपसी बातचीत में उनके द्वारा बोली जाने वाली लोकभाषाओं पर रहता हैं ।  जिसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके द्वारा प्रयुक्त अधिकांश शब्द सभी भारतीयों को आसानी से समझ आ जाते हैं।  यह तथ्य भारतीय लोकजन द्वारा बोली जाने वाली सभी भाषाओं यथा तमिल, तेलुगु, पंजाबी, मलयालम, गुजराती, मराठी, कन्नड़, बांग्ला तथा हिंदी की सभी 22 बोलियों (उर्दू को मैं हिंदी एवं हिदुस्तानी का मिश्रित रूप मानता हूँ। संविधान निर्माताओं के मन में यह प्रमुख तथ्य रहा होगा हिंदी को देश की राजभाषा बनाने की पृष्ठभूमि में। संविधान में भी उसी हिंदी या हिंदुस्तानी को मान्यता दी गई है जिसमें मूलतः संस्कृत यानी हमारी परंपरा, व्यवहार एवं व्यवस्था की शास्त्रीय भाषा तथा गौणत: अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल करने की बात कही गई है। परंतु हमने केवल खड़ी बोलीं को हिंदी का रूप मानकर  एक हद तक हजारो वर्षों से भारतीय लोकजनमानस की भाषा हिंदी को कमजोर किया। 
दरअसल सभी भारतीय भाषाओं में लिपि को यदि छोड़ दें तो अद्भुत शाब्दिक समानता है। इस दिशा में हम सभी को सोचने की आवश्यकता है। एक उदाहरण-‘ घाम’ शब्द को लें यह शब्द बांग्ला, मराठी, हिंदी के देशी रूप भोजपुरी, पंजाबी, तेलुगु आदि भाषाओं में धूप या गर्मी के अर्थ में समान रूप से प्रयुक्त किए जाते है। ऐसे असंख्य शब्द है।  फिर भी नकारात्मकता के साथ यह धारणा फैलाई गई कि भारत विभिन्न भाषा-भाषियों का देश है। मैं इस तथ्य का पूर्ण समर्थन करता हूँ । परंतु तथ्य यह भी है भारत के लोगों की बोलियों में विभिन्नता के बावजूद अद्भुत शाब्दिक समानता है और इस समानता की धूरी सदियों से अलग-अलग रूपों में मौजूद रही है। कभी पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, हिंदुस्तानी या हिंदी के रूप में । वर्ना क्या कारण है कबीरदास की वाणी संचार के कम साधनों के बावजूद बंगाल के बाउल लोककलाकारों के गीतों में मौजूद रहे। हिंदी की इस ताकत को उसकी समरसता को भारत के सभी शासकों ने समझा। पर अफसोस  आज़ादी के बाद हमारे शासक उस ढंग से समझ नहीं पाए । पर इसे समझना देश के लिए नितांत आवश्यक है । हां आम जनता जरूर समझती है ।अतः आपका यह ब्यान अतार्किक है कि आपने हिंदी को विभाजन की भाषा बताया ।
जोगा सिंह विर्क आदरणीय,, अंग्रेजी के मामले में तो शशि थरूर और भारत के दूसरे सत्तासीन नेता (दायें-बाएं सब) एक ही ‘भारतीय भाषा विरोधी महागठबंधन’ के जीवनकाली और विश्वसनीय सदस्य हैं| कांग्रेस को तो कोसना बनता ही है पर अब तो योगी जी भी उत्तर प्रदेश में हिंदी माध्यम विद्यालयों को अंग्रेजी माध्यम करने में लगे हैं| भारतीय जन-साधारण से ही आशा है, सो इन्हें भारतीय भाषाओं की अनदेखी से भारत को हो रहे विकासपरक नुकसानों के बारे में जागृत करें|
ब्र. विजयलक्ष्मी,  इंदौर  शशि थरूर भारतीय सभ्यता से सर्वथा अनभिज्ञ व्यक्तित्व है किंतु यदि किसी भारतीय को हिंदी भाषा न जानने के कारण रोका गया है तो यह मेरे लिए अति हर्षित होकर नृत्य करने का विषय है। सब लोग इस घटना पर तालियां बजाईए, नृत्य कीजिए, हो सके तो शशि थरूर के बंगले के समक्ष। हा..हा..हा…..डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ मुंबई
अगर कोई यह कहता है कि हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व की विचारधारा देश को बांट रही है, तो यह तो ठीक वैसा है जैसे कोई नेत्रहीन गलती से दिन को रात कह दे या ओँखों वाला आंखें बंद करके जानबूझ कर ऐसा कहे। मेरा निष्कर्ष तो इसके ठीक विपरीत है। मैं तो यह पाता हूं कि हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व ही ये वे तीन तत्व हैं जो कि देश को जोड़े रखने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आ रहे हैं। पहले हिंदी शब्द को ही ले लिया जाए। महात्मा गांधी ने राष्ट्र की एकता के लिए हिंदी भाषा को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना और न केवल  गांधीजी या गांधीवादी बल्कि तमाम स्वतंत्रता सेनानी हिंदी को राष्ट्रीय एकता के लिए महत्वपूर्ण माध्यम मानते रहे हैं।  शहीदे आजम भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, विनोबा भावे, राज ऋषि पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ गोविंद दास, डॉ भीमराव अंबेडकर आदि। संविधान निर्माताओं ने हिंदी को संघ की राजभाषा बनाया। स्वतंत्रता संग्राम में हिंदी की महत्वपूर्ण भूमिका रही और इसी के माध्यम से हिंदी ने राष्ट्रीय स्वरूप भी प्राप्त किया। राष्ट्रीय एकता के लिए हिंदी को नकारने का अर्थ देश के स्वतंत्रता सेनानियों के विचारों को, देश के संविधान को और देश के उन तमाम  लोगों की भावनाओं को नकारना है जो हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा और राष्ट्रीय एकता की महत्वपूर्ण कड़ी मानते हैं।अब हिंदू की बात  लेते हैं। भारत एक हिंदू बहुल देश है, एकमात्र बड़ा हिंदू बहुल देश है। तो इस देश के हिंदू अपने ही देश को क्यों तोड़ेंगे ? सच तो यह है कि इस देश के बहुसंख्यक हिंदू पूरी शक्ति से, पूरी देशभक्ति से, देश विरोधी ताकतों के विरुद्ध खड़े होते हुए, बविदान देते हुए  देश की एकता के लिए काम करते हैं। उन पर देश तोड़ने का आरोप लगाना हास्यास्पद या दुर्भावनापूर्ण है।हिंदुत्व शब्द भी राष्ट्रीयता के प्रयाय जैसा ही है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने ही हिंदुत्व को भारत के लोगों की जीवन-शैली के रूप में परिभाषित किया है। अर्थात जो तत्व देश की एकता अखंडता के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं, उन्हें ही देश तोड़नेवाला बताना न तो सत्य है और न ही राष्ट्रहित में।डॉ पुष्पेन्द्र दुबे, प्रोफ़ेसर, महाराजा रणजीतसिंह कॉलेज, इंदौर,डॉ. मोतीलाल गुप्ता ने उचित समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है. नागरी लिपि देश को जोड़ने का काम करेगी. इसे बढाने के लिए हर र पर प्रयास करने की जरूरत है.  

3 thoughts on “क्या हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व की विचारधारा भारत को बाँट रही है ?

  1. दूर विदेश में बैठा “क्या हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व की विचारधारा भारत को बाँट रही है?” को पढ़ने अथवा स्वयं प्रश्न के उत्तर पर एक क्षण भी व्यर्थ न करते मैं बूढ़ा पंजाबी कहूँगा कि भारत में हिंदी, हिन्दू, और हिंदुत्व की विचारधारा भारतीयों में विशेषकर अंग्रेजी भाषा को न जानने व ठीक से समझ अथवा प्रयोग में न ला पाने वाले उन बहुसंख्यक भारतीयों के सामाजिक व आर्थिक संपन्नता के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण व आवश्यक रही है जितनी कि जीवन के लिए श्वास लेना| भारत व भारतवासियों की दयनीय स्थिति के अन्य बीसियों कारणों व परिस्थितियों के बीच केवल हिंदी, हिन्दू, और हिंदुत्व की विचारधारा की आरम्भ से ही अवहेलना करते उनके सभी राजनैतिक व शासकीय उपक्रमों के लिए मैं सदैव कांग्रेस को दोषी मानता आया हूँ|

    तथाकथित स्वतंत्रता व देश के रक्त पूर्ण विभाजन की प्रसव-वेदना के पश्चात नेहरु-कांग्रेस को शासक बन जन्म लेते देखा है| स्वयं उनके लिए लाभप्रद उनकी कुशल शासकीय-व्यवस्था फिरंगियों के प्रस्थान के पश्चात स्वदेश के प्रशासन में मध्यमता व अयोग्यता के चलते मानों उनके कार्यवाहक प्रतिनिधि नेहरु-कांग्रेस देर तक नहीं संभाल पाए और परिणाम स्वरूप सर्वव्यापी भ्रष्टाचार व अराजकता की शासन-प्रणाली बन उन्हें दशकों सत्ता में बिठाए रख पाई थी| कांग्रेस-मुक्त भारत को मैं केवल एक नारा नहीं बल्कि देश के लिए सम्पूर्ण व सच्ची स्वतंत्रता मानता हूँ| और, इसी लय में, भारत के पुनर्निर्माण में कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि युगपुरुष मोदी ही कांग्रेस-मुक्त भारत में सार्वजनिक कल्याण हेतु हिंदी, हिंदू और हिंदुत्व की विचारधारा को प्रोत्साहन दे इंडिया को फिर से स्वच्छ सुन्दर सशक्त व समृद्ध भारत बना सकते हैं|

  2. पहली बात,तमिल विद्यार्थी का रोका जाना गलत था। दूसरी बात,शशि थरूर का इस छोटी सी घटना पर इस तरह की बयान बाजी उनके मष्तिष्क की विद्रूपता दिखाता है।
    अब आते है मूल मुद्दे पर, कोई समझे या न समझे , माने या न माने हिंदी आज भी देश के हर कोने में बोली और समझी जाने वाली भाषा है। इसमें इसका मुकाबला कोई अन्य भाषा नहीं कर सकती। यह भारत का दुर्भाग्य है कि स्वतन्त्रता के इतने वर्षों के बाद भी इस राष्ट्र की कोई राष्ट्र भाषा नहीं है। हिन्दू और हिंदुत्व के मामले में इतना हीं कहना चाहता हूँ कि अगर इसे उसी अर्थ में आज भी ग्रहण किया जाता जिसमें इसका उद्भव हुआ था, तो इस राष्ट्र का अधिक कल्याण होता।
    रही बात दूसरे देशों पर आक्रमण की, तो मेरे विचार से उसके ऐतिहासिक कारण हैं।उसको विचार धारा से कुछ लेना देना नहीं हैं।

  3. हिन्दी हिन्दु और हिन्दुत्व इसमें किसी एक घटक से जुडनेवाले भी भारत को गत शतकों से जीवित रखे हुए हैं. कुम्भ यात्रा, मानस यात्रा, योग, संस्कृत, संस्कृति, रामायण, महाभारत, पंचतंत्र, इत्यादि सारी धरोहर आज विश्व में सम्मान पा रही है. भारत को सनातनता दे रही है. दुनिया आज भारत को हिन्दुत्व की पहचान के कारण आदर से देखती है.
    ॐ ==> विनाश की कगार पर खडे संसार के लिए ==> चिन्तक , अर्नॉल्ल्ड टोयन्बी भारत को तारण हार मानते हैं.
    ॐ ==> थरुर किस बभुल का काँटा है? या निम का पौधा? चाटुकारों को जान बूझकर झूठ बोलना आता है.

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