लेखक परिचय

विश्‍वमोहन तिवारी

विश्‍वमोहन तिवारी

१९३५ जबलपुर, मध्यप्रदेश में जन्म। १९५६ में टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि के बाद भारतीय वायुसेना में प्रवेश और १९६८ में कैनफील्ड इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी यू.के. से एवियेशन इलेक्ट्रॉनिक्स में स्नातकोत्तर अध्ययन। संप्रतिः १९९१ में एअर वाइस मार्शल के पद से सेवा निवृत्त के बाद लिखने का शौक। युद्ध तथा युद्ध विज्ञान, वैदिक गणित, किरणों, पंछी, उपग्रह, स्वीडी साहित्य, यात्रा वृत्त आदि विविध विषयों पर ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित जिसमें एक कविता संग्रह भी। १६ देशों का भ्रमण। मानव संसाधन मंत्रालय में १९९६ से १९९८ तक सीनियर फैलो। रूसी और फ्रांसीसी भाषाओं की जानकारी। दर्शन और स्क्वाश में गहरी रुचि।

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जब एक भाषा मरती है तब उसकी संस्कृति भी उसके साथ मर जाती है

’लिविंग टंग्ज़ इंस्टिट्यूट फ़ार एन्डेन्जर्ड लैन्गवेजैज़’ इन सैलम, ओरेगान के भाषा वैज्ञानिक डेविड हैरिसन तथा ग्रैग एन्डरसन कहते हैं कि जब लोग अपने समाज की‌ भाषा में बात करना बन्द कर देते हैं, तब हमें मस्तिष्क के विभिन्न विधियों में कार्य कर सकने की अद्वितीय अंतर्दृष्टियों को भी‌ खोना पड़ता है। आगे एन्डरसन कहते हैं कि लोगों को अपनी भाषा में बात करते हुए उऩ्हें वास्तव में अपने इतिहास से पुन: सम्पर्क करते देखने में जो संतोष होता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यह निश्चित ही हमारे मस्तिष्क की कार्य विधि तथा मातृभाषा के बीच गहरे संबन्ध को तथा उसका हमारे जीवन पर पड़ रहे प्रभाव को दर्शाता है।

पिछले वर्षों हुऎ अनुसंधानों से यह ज्ञात हुआ है कि जब हम अपनी मातृभाषा सीखते हैं तब एक सोचने की विधि भी सीखते हैं जो हमारे अनुभवों को ढ़ालती है।

मैन्चैस्टर विश्व विद्यालय के भाषा, भाषा विज्ञान तथा संस्कृति स्कूल के अवैतनिक अनुसंधान फ़ैलो गाई डायश्चैर ने एक पुस्तक लिखी है – “भाषा- चश्में से देखते हुए : अन्य भाषाओं में विश्व अलग क्यों दिखता है?” वे प्रश्न करते हैं, क्या भाषा, सर्वप्रथम तथा सर्वोपरि, एक सांस्कृतिक निर्मिति है ?” या कि यह मुख्यत: मानव के जैव विज्ञान द्वारा निर्धारित की जाती है?” गाई डायश्चैर ने अपनी पहली पुस्तक” द अनफ़ओल्डिंग आफ़ लैन्ग्वैजैक्ष” में दावा किया था कि भाषा एक सांस्कृतिक निर्मिति है। अपनी नई पुस्तक में वे जैव विज्ञान पर अधारित भाषा के सिद्धांतों पर और भी अविश्वास पैदा करते हैं।

प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक रोमन जैकब्सन ने भाषाओं में अन्तर समझाने के लिये एक जगमगाते हुए तथ्य की ओर इंगित किया है : “ भाषाओं में अनिवार्य अंतर इससे स्पष्ट होता है कि उऩ्हें अवश्य ही क्या अभिव्यक्त करना चाहिये न कि वे क्या अभिव्यक्त करती हैं।” यह कथन मातृभाषा की‌ सही शक्ति दर्शाता है।यदि हमें भिन्न भाषाएं भिन्न विधियों से प्रभावित करती हैं, तब यह इसलिये नहीं है कि वह भाषा हमें क्या सोचने की अनुमति या सुविधा देती‌ है, वरन यह कि वह हमें अधिकतर क्या सोचने के लिये बाध्य करती है।”

’यदि हमें कोई यह बतलाए कि वह आज शाम अपनी ’कज़िन’ के साथ शाम बिता रहा है; तब भारतीय (फ़्रैन्च, जर्मन आदि भी) सोच सकता है कि यह कज़िन पुरुष है या महिला, और वह चचेरी है या ममेरी या बुआ की तरफ़ से है। यदि आप उस अंग्रेज़ से पूछेंगे, तब वह यह उत्तर दे सकता है इससे आपको कोई मतलब नहीं। इंग्लैण्ड में कोई भी ऐसे प्रश्न नहीं करेगा। वहां वे इसे निजी व्यवहार मानेंगे, या अन्य के व्यवहार में अनावश्यक खलंदाजी। हम सांस्कृतिक प्रभाव के कारण बहुत से व्यवहार सीख जाते हैं जो हमें स्वाभाविक लगते हैं। और यह सब भाषा में दिखता है, उसके द्वारा आता है।’ भाषा तथा संस्कृति में अटूट तथा गहरा संबन्ध है।

’दूसरी तरफ़, अंग्रेज़ी‌ भाषा वह बतलाने के बाध्य करती‌ है जो शायद अन्य भाषाएं न करें।यदि अपने पड़ोसी के साथ मैं (अंग्रेज़) ’डिनर’ की‌ बात बतलाना चाहता हूं, तब मैं अपने पडोसी का लिंग चाहे न बतलाऊं, किन्तु मुझे उसके समय के विषय में अवश्य ही कुछ बतलाना होगा। मुझे बतलाना होगा कि – we dined, have been dining, are dining, will be dinning इत्यादि। जब कि चीनी भाषा में उस कार्य के समय को बतलाने की‌ कोई भी बाध्यता भाषा की त� ��फ़ से नहीं होती, क्योंकि वही क्रिया का रूप सभी‌ कालों के लिये होता है। वह स्वतंत्र है चाहे तो समय की जानकारी‌ भी दे सकता है, किन्तु अंग्रेज़ी‌ में‌ बतलाना ही होगा।’

मैं एक घटना का इसी प्रसंग में वर्णन करना चाहता हूं। बात उन्नीस सौ साठ के प्रारंभिक वर्षों की है। अमैरिकी उस समय भारत से मेंढकों के निर्यात का प्रयत्न कर रहे थे और उऩ्हें सभी प्रदेशों से नाहीं ही मिल रही थी। तब उऩ्होंने (अपने शत्रु ) केरल के मुख्य मंत्री नम्बूदरी पाद से बात की। वे समझ गए थे कि हिन्दू मुख्य मंत्री‌ धार्मिक भावनाओं के कारन ऐसी अनुमति नहीं देंगे । और केरल के मुख्य मंरी‌ ने वह अनुमति दे दी। मुख्य मंत्री को मिलियन्स डालरों की आमदनी हुई, किन्तु उस चावल के कटोरे में फ़सल बरबाद हो गई। तब उऩ्हें शायद कुछ समझ में आया। हमारी‌ संस्कृति में पारिस्थितिकी ( एकोलोजी) , पर्यावरन , प्रकृति संरक्षण, सर्वमंगल की‌ भावना सदा ही निहित रहती है। देवताओं के वाहन चाहे वह लक्ष्मी का उल्लू हो, या सरस्वती का हंस, या या गंगा जी का घड़ियल या उनके अलंकरण हों – चाहे शंकर जी  सांप हो या कृष्ण जी का मकराकृति कुण्डल, सभी‌में प्रकृति संरक्षण का वैज्ञानिक संदेश है। एक और उदाहरण हिन्दी भाषा में निर्जीव वस्तुओं के लिंग का है जो निर्जीव वस्तुओं के साथ संवेदनशीलता सहित व्यवहार करनॆ का संदेश देता है। वैसे तो पृथ्वी हमारी माता है।

जब भाषा किसी को जानकारियों को एक विशिष्ट रूप में‌ही देने के लिये बाध्य करती है, तब वह उसे उन कुछ विवरणों के प्रति तथा कुछ अनुभवों के विशेषरूप से अवलोकन करने के लिये बाध्य करती‌ है, जिन के लिये अन्य भाषा में वह विशेष अवलोकन आवश्यक न हो । और यह भाषा की बाध्यता बचपन से ही कार्य करती‌ है, ऐसा अवलोकन या भाषा उसका स्वभाव बन जाता है जो उसके अनुभवों, दृष्टिकोणों, भावनाओं, सहचारिताओं, स्मृ� �ियों और यहां तक कि उसकी‌ जीवन दृष्टि को प्रभावित करता है।

किन्तु क्या इस अवधारणा के लिये कोई प्रमाण हैं? ताजे प्रयोगों ने दर्शाया है कि व्याकरणीय लिंग के उपयोग करने वालों की वस्तुओं के प्रति अनुभूतियों और सहचारिताओं पर ऐसे उपयोग का प्रभाव पड़ता है। क्या दैनंदिन जीवन में वस्तुओं के प्रति लिंग की भाषा का उपयोग उनके संवेदनात्मक व्यवहारों को तुलनात्मक रूप से और ऊँचे धरातल पर ले जाता है ? क्या वे पसंद, फ़ैशन, आदतों और वरीयताओं पर प्रभाव डाल ता है ? इस समय इसका निर्धारण मनोवैज्ञानिक की प्रयोगशालाओं में‌नहीं किया जा सकता। किन्तु यदि ऐसा नहीं सिद्ध हुआ तो आश्चर्य तो होगा।

ताजे तथा मेधावी प्रयोगों की शृंखला ने यह दर्शाया है कि हम रंगों तक को अपनी मातृभाषा के लैंस के द्वारा देखते हैं। उदाहरन के लिये हरे और नीले रंगों के लिये हिन्दी‌ में ( कुछ अन्य में भी) नितांत अलग शब्द हैं, किन्तु कुछ भाषाओं में उऩ्हें एक ही रंग की भिन्न छवियां ही माना जाता है। और यह समझ में आया कि अपनी‌ भाषा जिन रंगों को निश्चित ही अलग नाम देकर अलग रंग मानने के लिये बाध्य करती है, वह हमारी रंगों के प्रति संवेदनशीलता को सचमुच परिष्कृत करती है, और हमारे मस्तिष्क भिन्न छवियों की‌ दूरियों को अत्यंत स्पष्टरूप से देख सकते हैं।

लगता है आने वाले समय में अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिक प्रत्यक्ष ज्ञान के सूक्ष्म क्षेत्रों पर भाषा के प्रभाव पर प्रकाश डाल सकेंगे । उदाहरण के लिये, कुछ भाषाएं, जैसी पेरु की मैत्सीज़ भाषा, अपने उपयोग करने वालों को जो तथ्य वे बतला रहे हैं, वे उऩ्हें कैसे प्राप्त हुए भी‌ परिशुद्ध बतलाने के लिये बाध्य करें। आप मात्र यह नहीं कह सकते, ”एक गाय यहां से गई”। आपको, एक विशेष क्रियापद का � �पयोग करते हुए, यह भी‌ बतलाना पड़ेगा कि क्या आपने उसे जाते हुए देखा था, या आपने उसके पदचिऩ्ह देखकर निष्कर्ष निकाला या केवल अनुमान किया कि वह तो अक्सर यहां से जाती है, या किसी से सुना था। यदि कोई कथन दिया गया जिसका प्रमाण गलत निकला तब उसे झूठ कहकर निंदित किया जाता है। उदाहरण के लिये यदि आप मैत्सीज़ पुरुष से पूछेंगे कि उसकी कितनी पत्नियां हैं; तब जब तक कि वे पत्नियां उसे आँख के सामने नहं दिख रही हैं, वह कुछ ऐसा उत्तर देगा, “ जब मैने पिछली बार देखा था तब दो थीं।” चूंकि उसकी पत्नियां उस समय वहां नहीं‌ हैं, वह उनके विषय में बिलकुल निश्चित तो नहीं हो सकता, अतएव वह इस तथ्य को वर्तमान काल में नहीं कह सकता। क्या हमेशा सत्य के विषय में सोचने की आवश्यकता उसकी जीवन दृष्टि में सत्य तथा कार्य – कारण संबन्ध का महत्व दर्शाती है ? ऐसे प्रश्नों के अनुभवसिद्ध उत्तर प्राप्त करने लिये हमें प्रयोग करने के लिये सूक्ष्मतर उपकरणों की आवश्यकता है।

यह सोचना तो गलत ही है कि भिन्न संस्कृतियों के व्यक्ति मूलरूप से एक ही तरह से सोचते हैं। हम दैनंदिन जीवन में सारे निर्णय क्या निगमनात्मक (डिडक्टिव) तर्कों द्वारा लेते हैं ? या आंतरिक भावनाओं, अंतर्दृष्टियों, संवेदनाओं, मनोवेगों या व्यावहारिक कौशलों के द्वारा लेते हैं? हमारे मन का व्यवहार, जैसा कि उसे हमारी संस्कृति ने बचपन से ढाला है, हमारी‌ जीवन – दृष्टि का, और वस्तुओं तथा परि्थितियों के प्रति हमारी संवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं का निर्माण करता है; उनका हमारे जीवन मूल्यों, विश्वासों तथा आदर्शों पर भी मह्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। अभी हम ऐसे प्रभावों को सीधी तरह नहीं नाप सकते या उनके द्वारा उत्पन्न सांस्कृतिक या राजनैतिक भ्रमों का आकलन भी नहीं कर सकते हैं। किन्तु भाषाओं की विविधता के रहते हुए, हम बेहतर आपसी समझ के लिये कम से कम इस विश्वास पर कि हम सभी क ही तरह से सोचते हैं, एक गंभीर प्रश्न तो कर ही सकते हैं।

’साइंटिफ़िक अमैरिकन – माइंड’ में भाषा वैज्ञानिक डा. कौरे बिन्स लिखते हैं कि इस विश्व में ७००० भाषाएं हैं, और प्रत्येक माह दो भाषाएं मर रही है, और उनके साथ अनेकानेक संततियों से प्राप्त सांस्कृतिक ज्ञान, तथा मानव मस्तिष्क का रह्स्यमय शब्द प्रेम भी सदा के लिये लुप्त हो रहा है।

हम यह तो देख ही रहे हैं कि भाषा और संस्कृति गहन रूप से, जैविक रूप से, संबन्धित हैं।आज की हमारे देश की शिक्षा पद्धति में अंग्रेज़ी माध्यम को प्राथमिक शालाओं से लादने की प्रवृत्ति को देखते हुए यह दिख रहा है कि भारतीय भाषाएं और उनके साथ भारतीय संस्कृति भी मृतप्राय होने वाली हैं। क्या हम अपनी संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं ? यदि हां तो अपनी‌ भाषाओं की रक्षा करें। हो सकता है कि कोई पश्न ही करे कि पश्चिम की सफ़ल और उत्तम संस्कृति के रहते, भारतीय संस्कृति की रक्षा क्यों करना है?‌ इस पर आगे विचार करेंगे ।

15 Responses to “भाषा और संस्कृति”

  1. डॉ. मधुसूदन

    dr. madhusudan

    प्रबुद्ध पाठक इस आलेख को पढ़कर विचारें| प्रसारित करें- नितांत सामयिक संकेतक (सिग्नल) है|

    लेख का अति विस्तृत सन्दर्भ एक सिद्धांत की क्षमता रखता है|
    सिद्धांत:
    “किसी राष्ट्र की संस्कृति समाप्त करने के लिए उस देश की भाषा को मार दो|”

    पौधे की जड़े यदि काटी गयी तो पौधा जापानी बोनसाई पौधे की भाँति नाटा-छोटा होगा, और यदि पूरी काटी गयी तो वह पौधा (हमारी संस्कृति) ख़तम होगी|
    प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है|
    भाषा प्रदूषण अबाधित चल रहा है| साथ साथ संस्कृति भी ख़तम होगी|
    जब बच्चों का व्यवहार ही बिगड़ रहा है, यह संस्कृति का धीरे धीरे विनाश ही बता रहा है|

    Reply
  2. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    डॉ. ठाकुर जी से नम्र अनुरोध:
    “हिंदी हितैषियों के चिंतानार्थ” —लेख पर आप खुलकर टिपण्णी करें|

    Reply
  3. Vishwa Mohan Tiwari

    डा. धनकर ठाकुर जी
    कृपया अपना ई मेल तथा फ़ोन नं. दें
    शुभ् कामनाएं।

    Reply
  4. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    संस्कृति और भाषा “वन टु वन कॉरेस्पोंडन्स” का समीकरण नहीं है।
    कॅल्क्युलस की परिभाषा में यह मल्टाय ह्वॅरिएबल फंक्शन है।जैसे y =f (x , t , w , s)

    पर भाषा इसकी प्रमुख वाहक है।
    स्थूल रूपसे –आप सोचें।

    (१ ) भारत-संस्कृत= आध्यात्मिक ज्ञान का अंत।

    (२ ) भारत-हिन्दी= राष्ट्रीयता का अंत।

    Reply
  5. dr dhanakar thakur

    माननीय तिवारीजी
    मैथिली का स्थान बंगला, असमी ओरिया के साथ तो माना जा सकता है पर भोजपुरी, अवधी, बुंदेलखण्डी, , ब्रज भाषा के साथ नहीं जो आज की हिन्दी भाषा की सहभाषाएं या बोलियां हैं। राजस्थानी भी स्वतंत्र भाषा मणी जाती है.
    हिन्दी के भाषाई साम्राज्यवादी क्षेत्र विस्तार के द्वारा इसे लोकस्वीकृत करने की हाथ हिन्दीप्रेमियों को छोड़ देनी चाहिए

    यह ठीक नहीं है आज की हिन्दी उर्दू, फ़ारसी,से प्रभावित है वल्कि यह उसी से बनी है , अरबी अंग्रेज़ी, पोर्तगीज़ के कुछ शब्द जरूर हैं कम हैं
    हिन्दी का इतिहास बहुत नया है वह विद्यापति को जबरदस्ती अपने को पुराना सिध्ह करने जोडती है
    सूर , तुलसी, जायसी भी हिन्दी के नहीं मने जा सकते
    जो खादी बोली हिन्दी हम अब जन रहे हैं उसका इतिहास १८५० के बाद का ही है और मन जाना चाहिए
    राष्ट्रीयता का नारा उसकी‌ जीवनी‌शक्ति है जिसे भातेंदु, रामचंद्र शुक्ल, किशोरीदास वाजपेयी, माखनलाल चतुर्वेदी, प्रेमचंद, अज्ञेय, दिनकर, जानकीबल्लभ आदि ने संवारा है
    कि उसने अपना अस्तित्व अभी तक बचाकर रखा है जो की सिनेमा के उर्दुई जगत में खोयी जा रही थी और अब एक विदेशी‌भाषा अंगेज़ी अब उसके अस्तित्व को, उसकी अस्मिता को नष्ट करने के लिये तैय्यार है, और जिस षड़यंत्र में‌ हमारे ब्राउन साहब लोग जीजान से लगे हैं।
    मैं सहमत हूँ कि” हिन्दी‌नहीं मरेगी, एक आशावादी दृष्टि तो दर्शाता है, किन्तु यथार्थ से बहुत दूर है।”
    जरूर आज के बच्चे अपने सम्बन्धियों के, सप्ताह के दिनों के, और महत्वपूर्न संवेदनशील शब्दों जैसे मृत्यु, जन्म, प्रेम, आत्मा, मोक्ष, आदि आदि को तेजी से भूल रहे हैं।
    अब यदि हम अंग्रेज़ी के प्रभाव को रोकने के लिये कुछ ठोस कदम नहीं उठाते हैं,तब अगले दस वर्षों में‌ही‌ युवाओं की‌भाषा ‘हिंग्लिश’ या दुर्बल अंग्रेज़ी होगी। मैं सहमत नहीं हूँ की ‘हिन्दी‌का जन्म मुगलों के आने के पहले हो चुका था।’
    सारे भक्तिकालीन कवियों की‌ भाषा स्वस्थ हिन्दी नहीं अवधी, बरजा आदि है।

    कैम्पबैल ने हिदी तो बन्द कराने की प्रतिज्ञा ली थी, किन्तु उसके स्थान पर उऩ्होंने स्थानीय भाषायों वर्नाकुलर भाषा के पढ़ाने कीबात की थी।
    सभी अंग्रेज मेकाले नहीं थे कम से कम आयरिश ग्रियर्सन ने अनेक भाषाओँ की मैथिली, मुंदरी, राजस्थानी आदि की संरक्षण के लिए कदम उठाये थे ?

    “वस्तुतः भाषा, सर्वप्रथम तथा सर्वोपरि, एक सांस्कृतिक निर्मिति है
    जो संभवतः मुख्यत: मानव के जैव विज्ञान द्वारा निर्धारित की जाती है.” और यहाँ हिन्दी का इतिहास ही धुंधला है जो मुस्लिम रंग में रंगा है जिसे उतरना कठिन है पर हमारी अस्मिता के लिए आवश्यक है – क्या यह मधुसूदनजी की हिन्दी रह पायेगी संस्कृतनिष्ठ ?
    संस्कृति भाषिक निर्मिति है; भाषिकTAA ही संस्कृतिनिर्मि है वास्तव में दोनों अलग नहीं हैं संस्कृति या वंश प्रथम है
    प्रताड़ित यहूदी समाज अनेक्बशी हो गया हिब्रू भूल गया पर यहूदी बना रहा, त्रिनिदाद की प्रधानमंत्री कमला विसेषर भाषा भूल गयी पर कमला विश्वेश्वर से बस बिसेसर रही – अंगरेजी बोल भी सिन्दूर लगती रही- अभी मौक़ा मिलने पर अपने पैत्रिक गाँव बिहार में आयी और अपनी भाभी से गले मिल रोई
    ओबामा रास्त्रपति हुआ
    यहूदी यह दोनों सामाजिक जीवन पर निर्भर करते हैं।

    मुझे तो इसमें‌तनिक भी संदेह नहीं है कि यदि हम भारतीय भाषाओं की पश्चिमी भोगवाद से तथा अंग्रेज़ी द्वारा लील जाने से रक्षा नहीं करते हैं तो भारतीय संस्कृति का भविष्य अंधकारमय है।
    कल आपसे बात कर काफी अछा लगा खासकर की आज भी आप इस उम्रमे सामाजिक कार्य में लगे हैं – क्या मैं भी २० वर्षों के बाद आपकी तरह सक्रीय रह PAUNGA ?

    Reply
  6. Vishwa Mohan Tiwari

    डा. ठाकुर् जी,
    आपकी लम्बी और गहरी विश्लेषणात्मक समीक्षा से हृदय को आनंद भया। धन्यवाद
    मुझे लगा कि डा. मधुसूदन जी सुझाव कितना सही था। मेरा इस लेख को प्रवक्ता में डालने की प्रेरणा देने के लिये डा. मधुसूदन जी‌का धन्यवाद्।
    मैं इस पर बहुत ही संक्षेप में अपनी प्रति
    क्रिर्या दे रहा हूं।

    सबसे पहले मैं यह विनम्रतापूर्वक कहना चाह्ता हूं कि मैथिली, अवधी, बुंदेलखण्डी, राजस्थानी, ब्रज भाषा आदि आदि हिन्दी भाषा की सहभाषाएं या बोलियां हैं। हम इससे असहमत हो सकते हैं और उस पर चर्चा फ़िर कभी। किन्तु हमारी आगे की चर्चा के लिये इससे कोई बाधा नहीं होना चाहिये ।

    यह ठीक है कि आज की हिन्दी उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, पोर्तगीज़, अरबी आदि से प्रभावित है, किन्तु यह उसकी‌जीवनी‌शक्ति ही है कि उसने अपना अस्तित्व अभी तक बचाकर रखा है। किन्तु एक विदेशी‌भाषा अंगेज़ी अब उसके अस्तित्व को, उसकी अस्मिता को नष्ट करने के लिये तैय्यार है, और जिस षड़यंत्र में‌हमारे ब्राउन साहब लोग जीजान से लगे हैं। यह सोचना कि हिन्दी‌नहीं मरेगी, एक आशावादी दृष्टि तो दर्शाता है, किन्तु यथार्थ से बहुत दूर है। आज के बच्चे अपने सम्बन्धियों के, सप्ताह के दिनों के, और महत्वपूर्न संवेदनशील शब्दों जैसे मृत्यु, जन्म, प्रेम, आत्मा, मोक्ष, आदि आदि को तेजी से भूल रहे हैं। अब यदि हम अंग्रेज़ी के प्रभाव को रोकने के लिये कुछ ठोस कदम नहीं उठाते हैं,तब अगले दस वर्षों में‌ही‌ युवाओं की‌भाषा ‘हिंग्लिश’ या दुर्बल अंग्रेज़ी होगी। साथ हि यह स्मरण रखना चाहिये कि हिन्दी‌का जन्म मुगलों के आने के पहले हो चुका था। अत: फ़ारसी, अरबी या पोर्तगीज़ आदि का प्रभाव तेरहवीं शती में प्रारंभ होता है। किन्तु लगभग सारे भक्तिकालीन कवियों की‌भाषा स्वस्थ हिन्दी‌ही है।
    कैम्पबैल ने हिदी तो बन्द कराने की प्रतिज्ञा ली थी, किन्तु उसके स्थान पर उऩ्होंने किस भाषा के पढ़ाने कीबात की थी। मुझे इस पर जानकारी धूढ़ने पर भी‌नहीं मिली, किन्तुमेरा अनुमान है वे अंग्रेज़ी पढ़ाने की‌बात कर रहे होंगे । उनकी‌बात को हम कितना मह्त्व दें ?

    “वस्तुतः भाषा, सर्वप्रथम तथा सर्वोपरि, एक सांस्कृतिक निर्मिति है
    जो संभवतः मुख्यत: मानव के जैव विज्ञान द्वारा निर्धारित की जाती है.”
    यह भी सही है कि संस्कृति भी एक भाषिक निर्मिति है; वास्तव में दोनों अन्योन्याश्रित हैं। यह दोनों सामाजिक जीवन पर निर्भर करते हैं।

    मुझे तो इसमें‌तनिक भी संदेह नहीं है कि यदि हम भारतीय भाषाओं की पश्चिमी भोगवाद से तथा अंग्रेज़ी द्वारा लील जाने से रक्षा नहीं करते हैं तो भारतीय संस्कृति का भविष्य अंधकारमय है।
    आपका इस विषय्य पर चिन्तन करने के लिये पुन: बहुत धन्यवाद।

    Reply
  7. डॉ. मधुसूदन

    dr. madhusudan

    आदरणीय विश्व मोहन जी –आप की टिपण्णी देखि नहीं थी. गंभीर पाठक कम ही होते हैं. मैं भी बहुत मित्रों को लेख भेजता रहता हूँ.
    आपके लेख विचारकों के लिए होते हैं.
    सोच कर कुछ परिणामकारी हल निकालना चाहिए| यहाँ हिंदी चाहक भी फॉण्ट ना होने से असमर्थ हैं| सारे पता नहीं सभी आहार निद्रा भय और मैथुन में व्यस्त है.
    सर्वे गुणा कांचनं आश्रयन्ते|
    कठिन है|
    फिर भी लिखकर कुछ कहा जा सकता है|
    आपकी व्यथा समझता हूँ|

    Reply
    • Vishwa Mohan Tiwari

      मधुसूदन जी
      आपके सुझाव पर मैने फ़िर प्रवक्ता में लेख डालना प्रारंभ कर दिया है। सुझाव के लिये धन्यवाद। संस्कृति लेख पर लेख पर डा. ठाकुर जी की विद्वत्तापूर्ण प्रतिक्रिया आ रहॆ है।
      ऐसी चर्चा हो तो आनन्द आता है।

      Reply
  8. Vishwa Mohan Tiwari

    डा. ठाकुर् जी,
    जी नहीं वह लेख मेरा नहीं था।
    मेरा ई मेल :
    1.vishwa.mohan@gmail.कॉम
    फ़ोन : ९९५८८६४४९९।
    शुभ् कामनाएं‌

    Reply
  9. dr dhanakar thakur

    “जब एक भाषा मरती है तब उसकी संस्कृति भी उसके साथ मर जाती है,” यह बात बहुत हद तक सही है पर भारत के सन्दर्भ में बहुत कुछ और भी बातें हैं
    मान लिया जय की हिन्दी के चलते मेरी मातृभाषा मैथिली मरनाशंन्न हो गयी थी पर हमने अथक प्रयास से इसे बचा तो लिया है पर जब तक प्रान्त मिथिला न बने बिहार में हिन्दी का आक्रमण चलता रहेगा
    हिन्दी यदि संस्कृत निष्ठ हो तो कुछ हद तक सस्कृति बच सकती है पर यह धारणा निर्मूल है की हिन्दी हमारी सस्कृति की वाहिका है वल्कि वह उर्दू के दालमे बनी खिचरी है
    यह बात भोजपुरी, मगही, व्रज, अवधी, छात्तिस्स्गढ़ी, बुन्देली, मारवाड़ी आदि बोली समूहों के ऊपर भी लागू है
    हिन्दी angrejon की suvidhaa के liye जब pahlee bar aayee
    G. Campwell ने अपने रिपोर्ट में लिखा था –
    “ I was astonished on lately visiting Bihar to find this bastard language(Hindi) not only flourishing in its fullest course in our official proceedings but that we are perpetuating it by teaching in our schools….I found that all in all our so called vernacular schools this monstrous language if it can be called a language ,is being taught by Maulvis instead of the vernacular.. I am determined to put a stop to the teaching of the language in our schools.”

    यानी हिन्दू, हिन्दी , हिन्दुस्तान का फार्मूला गलत है

    यह सही है की “जब लोग
    अपने समाज की‌ भाषा में बात करना बन्द कर देते हैं, तब हमें मस्तिष्क के
    विभिन्न विधियों में कार्य कर सकने की अद्वितीय अंतर्दृष्टियों को भी‌ खोना
    पड़ता है।”
    ‘ अपनी भाषा में बात करते हुए
    उऩ्हें वास्तव में अपने इतिहास से पुन: सम्पर्क करते देखने में जो संतोष
    होता है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।’
    ” मातृभाषा
    सीखते हैं तब एक सोचने की विधि भी सीखते हैं जो हमारे अनुभवों को ढ़ालती
    है।’

    वस्तुतः भाषा, सर्वप्रथम तथा सर्वोपरि, एक सांस्कृतिक निर्मिति है
    जो संभवतः मुख्यत: मानव के जैव विज्ञान द्वारा निर्धारित की जाती है.

    “ भाषाओं में अनिवार्य
    अंतर इससे स्पष्ट होता है कि उऩ्हें अवश्य ही क्या अभिव्यक्त करना चाहिये न
    कि वे क्या अभिव्यक्त करती हैं।” यह कथन मातृभाषा की‌ सही शक्ति दर्शाता
    है।यदि हमें भिन्न भाषाएं भिन्न विधियों से प्रभावित करती हैं, तब यह
    इसलिये नहीं है कि वह भाषा हमें क्या सोचने की अनुमति या सुविधा देती‌ है,
    वरन यह कि वह हमें अधिकतर क्या सोचने के लिये बाध्य करती है।”
    महिला, और वह चचेरी है या ममेरी या बुआ की तरफ़ से है की बात दक्षिण भारत( विन्ध्य के दक्क्षिण जिसमे गुर्जर, महारष्ट्र भी पहले सम्मिलित थे) में apnee in sambadhiyon के beech hone vale Vivah सम्बन्ध के karan ek samy upsthit kataa है jis mane में vindhy के uttar की sthiti alag है
    यह सत्य है ‘हम सांस्कृतिक प्रभाव के कारण बहुत
    से व्यवहार सीख जाते हैं जो हमें स्वाभाविक लगते हैं।’ भाषा तथा संस्कृति में अटूट तथा गहरा संबन्ध है।
    सत्य है की,’हमारी‌ संस्कृति में पारिस्थितिकी (
    एकोलोजी) , पर्यावरन , प्रकृति संरक्षण, सर्वमंगल की‌ भावना सदा ही निहित
    रहती है।’

    हिन्दी भाषा में निर्जीव वस्तुओं के लिंग के उदाहरन से मैं सहमत नहीं हूँ- यह संस्कृत से अलग दिखने की भावना से है संवेदनशीलता सहित व्यवहार करनॆ से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है

    जरूर, “जब भाषा किसी को जानकारियों को एक विशिष्ट रूप में‌ही देने के लिये
    बाध्य करती है, तब वह उसे उन कुछ विवरणों के प्रति तथा कुछ अनुभवों के
    विशेषरूप से अवलोकन करने के लिये बाध्य करती‌ है, जिन के लिये अन्य भाषा
    में वह विशेष अवलोकन आवश्यक न हो,..स्वभाव बन जाता है जो उसके अनुभवों,
    दृष्टिकोणों, भावनाओं, सहचारिताओं, स्मृ� �ियों और यहां तक कि उसकी‌ जीवन
    दृष्टि को प्रभावित करता है।”
    हम रंगों को जरूर
    अपनी मातृभाषा के लैंस के द्वारा देखते हैं जिनमे संकृति का पुट रहता है हरा नीला में शायद बहुत अंतर है भी नहीं – prathmik rang लाल,हरा aur नीला है इसमें भी laal का अपना उछ स्थान है और यह
    , और न केवल विविध रंगों से हमारे मस्तिष्क भिन्न छवियों की‌ दूरियों को अत्यंत स्पष्टरूप से देख सकते हैं लाल वा केशरिया अग्नि वा त्याग के संस्करण को बताता है
    ” भिन्न संस्कृतियों के व्यक्ति मूलरूप से एक ही
    तरह से सोचते हैं’ यह गलत है ।
    उनका हमारे जीवन मूल्यों, विश्वासों तथा
    आदर्शों पर भी मह्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। अभी हम ऐसे प्रभावों को सीधी
    तरह नहीं नाप सकते या उनके द्वारा उत्पन्न सांस्कृतिक या राजनैतिक भ्रमों
    का आकलन भी नहीं कर सकते हैं किन्तु अनुमान कर सकते हैं जिसमे भाषाओं की विविधता का भे इक स्थान है यद्यपि इसके अनेक पहलु हैं

    ” इस विश्व में ७००० भाषाएं हैं, और प्रत्येक माह दो भाषाएं मर रही
    है, और उनके साथ अनेकानेक संततियों से प्राप्त सांस्कृतिक ज्ञान, तथा मानव
    मस्तिष्क का रह्स्यमय शब्द प्रेम भी सदा के लिये लुप्त हो रहा है.” यह सत्य है और भारत के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी अंगरेजी से अधिक नहीं तो बरबा र्की साझेदारी इसमें रखती है – vastutah हिन्दी मुस्लिम संस्कृति के द्वारा आक्रमण बताती है तो अंगरेजी अब अंग्रेजो की नहीं वल्कि भौतिक वाद की केन्द्रस्थाली अमेरका का आक्रमण है

    भाषा और संस्कृति गहन रूप से, जैविक रूप से,
    संबन्धित हैं यह सत्य है
    आज की हमारे देश की शिक्षा पद्धति में अंग्रेज़ी माध्यम को प्राथमिक शालाओं से लादने की प्रवृत्ति को देखते हुए यह दिख रहा है कि
    भारतीय भाषाएं और उनके साथ भारतीय संस्कृति भी मृतप्राय होने वाली हैं पर यह होगा नहीं क्योंकि हिन्दू संस्कृति की जड़ें काफी गहरी हैं(इन्हें भारतीय का सेकुलर jaamaa पन्हानाने की आवश्यकता नहीं है ) आज का भारतीय हिन्दू का पर्याय नहीं है वल्कि हिन्दू+ यवन है और खिचडी से संस्कृति नहीं बंटी है संस्कृति मिश्रण नहीं यौइगिक है जो अबिभाज्य है
    यदि हम अपनी संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं तो अपनी‌ मातृभाषा की रक्षा करें। पश्चिम की सफ़ल और सुविधाजनक संस्कृति उत्तम
    है ऐसा कहना गलत है
    हिन्दू संस्कृति की रक्षा और अभिवर्धन की आवश्यकता आज के भौतिकवादी युग में और भी आवश्यक है
    विचार करेंगे ।

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  10. Dr. Dhanakar Thakur

    लेख उत्तम है जिस पर बाद में लिखूंगा
    पहले मुझे आपसे एक जानकारी चाहिए- १९८०-८३ के आसपास मैंने टाइमस ऑफ़ इंडिया में एक समाचार पढ़ा था वायु सेना के किसी एस्कुवाद्रण लीडर का की अंगरेजी भाषा का विकास तुलु से हुआ है? वह लेख क्या आप ही का था ? आपका ईमेल? फ़ोन नुम्बर?

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  11. Vishwa Mohan Tiwari

    मधुसूदन जी
    आप कहते हैं कि प्रवक्ता में लेखा डालना चाहिये, किन्तु कहां हैं गंभीर पाठक ! !

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  12. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    इतना मौलिक लेख, कैसे छूट गया ?
    स्मरण नहीं हो पा रहा है। पर आज ढूँढ कर पढा ।
    मैं प्रवक्ता के पाठकों से इस लेख को पढने का अनुरोध करता हूँ।
    चिन्तन प्रेरक लेख है।
    “भाषा और संस्कृति का आपसी सम्बंध एक फूल और उसकी सुंगध” समान है।
    कभी आपने सोचा, कि “अपना” के लिए अंग्रेज़ी में समानार्थी शब्द ही नहीं है। क्यों?
    यह सांस्कृतिक अंतर है।

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  13. डॉ. शिवपूजन लाल

    भाषा, समाज एवं संस्‍कृति पर ऐसा वैचारिक और ज्ञानवर्धक आलेख उपलब्‍ध कराने हेतु संपादक एवं पत्रि‍का को बहुत-बहुत बधाई.

    Reply

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