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    Homeसाहित्‍यकविताबड़े घरों में पड़ा ताला

    बड़े घरों में पड़ा ताला

    -मिलन सिन्हा-  poem

    खस्ता हाल

    साल दर साल

    क्या करे मजदूर -किसान

    हैं सब बहुत परेशान

    या तो बाढ़

    या फिर सूखा

    आधी उम्र

    गरीब रहता है भूखा

    हर गांव में महाजन

    देते ऊंचे ब्याज पर रकम

    पर कैसे चुकाए उधार

    कहां मिले रोजगार

    बेचना पड़े घर – द्वार

    शहर भी कहां खुशहाल

    गरीब यहां भी बदहाल

    सड़क के साथ चलता

    उफनता बदबूदार नाला

    फूटपाथ पर रहते लोग

    बड़े घरों में पड़ा ताला

    स्वछन्द विचरते

    गाय, सूअर, कुत्ते

    जहां-तहां, इधर -उधर

    हर वक्त, बेरोकटोक

    न जाने और कितने साल

    रहने को अभिशप्त हैं ये लोग !

    मिलन सिन्हा
    मिलन सिन्हाhttps://editor@pravakta
    स्वतंत्र लेखन अब तक धर्मयुग, दिनमान, कादम्बिनी, नवनीत, कहानीकार, समग्रता, जीवन साहित्य, अवकाश, हिंदी एक्सप्रेस, राष्ट्रधर्म, सरिता, मुक्त, स्वतंत्र भारत सुमन, अक्षर पर्व, योजना, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, जागरण, आज, प्रदीप, राष्ट्रदूत, नंदन सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएँ प्रकाशित ।

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