लेखक परिचय

अभिषेक रंजन

अभिषेक रंजन

लेखक कैम्पस लॉ सेन्‍टर, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में एल.एलबी. (द्वितीय वर्ष) के छात्र हैं।

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बेचैनी और बौखलाहट शब्द के अर्थ अगर आप समझना चाहते है तो दिल्ली विश्वविद्यालय में देश के लोकप्रिय व विकास पुरुष जननेता नरेन्द्र मोदी के प्रसिद्ध भाषण के बाद हताश वामपंथियों के चेहरो को पढ़िए। बेचैनी, इस बात की कि भारत के भावी कर्णधार के प्रति बढ़ते जनसमर्थन से वामपंथियों की अपनी दुकान बंद होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। बौखलाहट की वजह, तमाम विरोध प्रदर्शनों के बावजूद कार्यक्रम की रौनकता को अंशभर भी प्रभावित करने में हुई विफलता है। कार्यक्रम का व्यापक प्रसारण और अगले दिन देशभर के अख़बारों में छपे समाचार से सबकी छाती पर सांप लोट गई है। मोदी विरोधी 1 अख़बार को छोड़कर, सबने प्रचार पाने की आड़ में विरोध के नाटक करने के इनके नापाक मंसूबे पर पानी फेर दिया।

एसआरसीसी कॉलेज में 6 जनवरी को हुए कार्यक्रम में मोदी का डीयू के उस्ताद कॉमरेड अकेले विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, इसलिए विरोध दर्ज करने के लिए जेएनयू, जामिया सहित दिल्ली के अन्य इलाकों से मोदी विरोधियों, जेहादियो, भाड़े के प्रदर्शनकारी और कुछ बहला फुसलाकर विद्यार्थी लाए गए। सब जुटे। जमकर भड़ास निकाली। कार्यक्रम के दौरान जब इनकी दाल गलती नहीं दिखी तो लगे सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देने। पानी की बौछारे और जबरदस्त लाठियां पड़ी। अंत में, जब लगभग एक घंटे के प्रभावशाली भाषण सुनकर निकले विद्यार्थियों के मुहं से चारो तरफ मोदी की प्रसंशा होते सुनाई दी तो सारे वामपंथी खीजते हुए, अपने घर लौट गए। लेकिन किस्सा यही समाप्त नहीं हुआ बल्कि बुरी तरह अपनी भद पीटने के बाद भी ये नहीं माने और आजकल जेएनयू की स्टाइल में लगातार पर्चे के रूप में मोदी को फासीवादी करार देने, उन्हें हत्यारा बताने, हिन्दू राज्यव्यवस्था को फासीवादी राज्यव्यवस्था की संज्ञा देने और सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए मारपीट का झूठा आरोप लगाकर ABVP जैसे संगठनों को बदनाम करने पर तुले हुए है। सुनने में आया है कि गांजा-भांग का नियमित रूप से सेवन करनेवाले दिग्भ्रमित वामपंथियों का यह गिरोह दिल्ली विश्वविद्यालय में मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से घबरा कर आनेवाले दिनों में तरह-तरह के बहाने बनाकर विरोध का नाटक जारी रखने वाले है।

दरअसल, वामपंथी गिरोह की यह बेचैनी सब जानते है, समझते है कि आखिर मोदी का इतना जबरदस्त विरोध वामपंथी क्यों करते है? क्या वजह है कि रात-रातभर जागकर न केवल मोदी विरोधी पर्चे लिखे जाते है, बल्कि अख़बारों के माध्यम से दुष्प्रचार फ़ैलाने के लिए लेख भी लिखे जाते है। हर टीवी डिबेट में में मोदी के विरोधी क्यों भाषाई मर्यादा तक भूल जाते है? इस सवाल का जबाब जानने से पहले, यह जरुरी है कि नरेन्द्र मोदी को जाने व उनके विरोध करने के पीछे छुपे मंसूबों को समझे।

नरेन्द्र मोदी गुजरात ही नहीं पूरे विश्व में, विकास की राजनीति को राष्ट्रनीति से जोड़कर, धर्म-जाति-क्षेत्र से परे जनता के हित में काम करने वाले जननेता के तौर पर जाने, पहचाने जाते है। एक दशक से भी अधिक के अपने स्वर्णिम शासनकाल में नरेन्द्र मोदी ने विकास की ऐसी परिभाषा गढ़ डाली है कि पूरा विश्व अनायास उस विकास मॉडल को स्वीकार्य मॉडल मानने लगा है, जिसमे किसान से लेकर नौजवान तक, खेत से लेकर आसमान तक, नदी से लेकर संस्कृति तक समाहित है। आज दुनिया इस बात को मानती है कि ”सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः” के मूलमंत्र गुजरात के गली-कूचियों में प्रत्यक्ष दीखता है। स्पष्ट सोच, दृढ इच्छाशक्ति और देश से जुड़े हर मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखने व उसे करने का माद्दा रखने वाले भविष्यद्रष्टा नरेन्द्र मोदी भ्रष्टाचार की तपिश में झुलस रहे देश में गिनेचुने नेताओं में शामिल है, जिनके पास भ्रष्ट होने का तगमा नहीं है। समाज की सेवा में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले नरेन्द्र मोदी का व्यक्तित्व इतना व्यापक हो गया है कि देश के हर कोने के लोग, न केवल उनकी तारीफ करते है, व्यक्तिगत जीवन में प्रेरणा पाते है, बल्कि उन्हें भावी प्रधानमंत्री के तौर पर भी देखते है। सड़को पर रिक्शा चलाने वाले हो, कॉलेजों में पढनेवाले विद्यार्थी हो या टाटा-बिरला जैसी कंपनियों में काम करने वाले, सब यह विश्वास भी मोदी से रखते है कि उनके नेतृत्व में भारत भ्रष्टाचार, आतंकवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद से मुक्त होकर, सच्चे अर्थ में सुपरपावर बनेगा। बेरोजगारी की मार झेल रहे देश के नौजवानों का यह भरोसा है कि मोदी जनसँख्या को बोझ नहीं मानेगा, बल्कि उसे मानव संसाधन के रूप में विकसित करके भारत को समृद्धि के शिखर पर पहुचायेगा। वोट की लालच में तुष्टिकरण की नीति अपनाने से आहत देशभक्त जनता को यह विश्वास है कि मोदी देश के दुश्मनों की नापाक हरकतों को बार-बार माफ़ नहीं करेगा, बल्कि उन्हें सबक सिखाएगा। मोदी के हाथों में जब सत्ता होगी तो वह रीढविहीन, अवसरवादी, संकीर्ण सत्ता नहीं होगी बल्कि वह हर फैसला देशहित में करनेवाली एक हिम्मती और दूरदर्शी सरकार होगी। अर्थनीति स्वार्थनीति नही, जननीति पर आधारित होंगे। राजनीति में चापलूसी संस्कृति, भ्रष्ट व स्वार्थी गठजोड़ समाप्त होंगे।

मोदी की यही वो खूबियाँ है जो लोगो को भांति है और युवाओ को सफल भविष्य की आस दिलाती है। लेकिन मोदी की उपरोक्त खूबियों को न तो मोदी के राजनितिक विरोधी बर्दास्त नही कर पा रहे है और न ही देश की मिटटी में पले-बढ़े, इसी धरती के अन्न खाकर बड़े हुए राष्ट्रविरोधी ताकते पचा पा रही है। राजनीतिक तौर पर विरोध करने वालो के मंसूबे तो साफ समझ में आती है और उससे मोदी अकेले लड़ने में सक्षम है लेकिन देश के लोकतंत्र में यकीन नही रखनेवाले संगठनो का आंख मूंदकर विरोध करना थोड़ा हैरान करने वाला है। वास्तविकता तो यह है कि इन्हें मोदी से काफी डर लगता है। उसे लगता है कि मोदी और अधिक शक्तिशाली हो गया, उसे सत्ता की बागडोर मिल गई तो वह देश के दुश्मनों को बिरयानी खिलाकर नहीं पलेगा। वह भारत विरोधियों को सम्मानित नहीं करेगा। और न ही वह राज्य की सत्ता का सुख भोगते हुए देशविरोधी कार्य करने की किसी को अनुमति देगा।

आज इसी डर से भयभीत नक्सली-माओवादियों के समर्थक छात्र-संगठन परिसरों में सक्रिय होना चाहते है ताकि देश के भोले-भाले युवकों को मोदी विरोधी विचारधारा का विष पिलाकर गुमराह किया जाए। मोदी के नकारात्मक चित्रण करके, हत्यारा बताकर, एक डर पैदा किया जाए। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसी गतिविधियाँ वामपंथी संगठन अकेले नही कर रहे है बल्कि इन्हें उन सभी जेहादी संगठनो से भी अप्रत्यक्ष समर्थन मिल रहा है जो मोदी विरोध के नाम पर अपनी दुकान खोलकर बैठे है।

2002 के दंगे निश्चित तौर पर इतिहास के एक काले अध्याय के सामान है। दंगे में हिन्दू मरे, या मुसलमान, मरती है इंसानियत। जो जख्म मिले है, उसे शब्दों के दिलासे देकर नहीं भरे जा सकते। लेकिन उन जख्मो को कुरेदकर, किसी व्यक्ति विशेष को बदनाम करना, किसी भी सूरत में सही नहीं मानी जा सकती। सब जानते है कि जिस गुजरात के दंगो को लेकर आरोपों की गठरी पिछले 10 वर्षों से मोदी के सर पर लादने की कोशिश की जा रही है, उसपर SIT द्वारा सुप्रीम कोर्ट को दी गई रिपोर्ट से यह स्थिति साफ हो गई है कि मोदी की भूमिका दंगो में नहीं थी।

खुद मोदी ने 26 जुलाई, 2012 को उर्दू पत्रकार शहीद सिद्दीकी को दिए इंटरव्यू में यह कहकर अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है कि अगर मेरी संलिप्तता है तो यह साबित की जाए, फिर मुझे फांसी पर लटका दिया जाए। अगर नही तो तुरंत दुष्प्रचार तुरंत बंद होना चाहिए। यहाँ तक की मोदी ने गोधरा दंगो में दोषियों को सजा दिलाने का काम किया। जबकि देश में हुए सैंकड़ो दंगो के दोषी आज भी सड़को पर खुलेआम घूमते दिखाई देते है, लेकिन उन दंगो की कोई चर्चा भी नही होती। इसके बाबजूद मोदी का विरोध क्यों हो रहा है, इसे देश को समझने की जरुरत है।

समय की मांग है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर मोदी के अंधविरोध का सिलसिला अब बंद होनी चाहिए। सरकार की गलतियों को लेकर विरोध उचित है। सरकार व नेता की स्वस्थ आलोचना एक हद तक सही है लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने सरकार के मुखिया के संबंध में दुष्प्रचार बंद होना चाहिए, जिसकी लोकप्रियता अपने राज्य की सीमा में कैद न होकर पूरे विश्व में फैली हुई है।

 

5 Responses to “मोदी का वामपंथी अंधविरोध”

  1. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    यह एक नई खोज है कि वामपंथ को ही ‘नरेन्द्र मोदी ‘ के प्रधानमंत्री बनने पर आपत्ति है..! याने वाकी तो पूरा देश ही उन्हें प्रधानमंत्री बन्नाने जा रहा है. यदि यह सही है तो अग्रिम बधाई…! लेकिन इस सिद्धांत के मुताबिक स्वर्गीय बाल ठाकरे जी,आदरणीय आडवानी जी ,आदरणीय केशुभाई जी,आदरणीय गडकरी जी,आदरणीय सुष्माजी,आदरणीय उद्धव जी और आदरणीय नितीश जी सब “वामपंथी” हो गए..! वामपंथ ने तो कभी अटलजी का भी अनुमोदन नहीं किया जबकि अटलजी ने अपने छात्र जीवन में ‘वामपंथी ‘ छात्र संघ ऐ आई एस ऍफ़ में काम किया था. कांग्रेस के कुशाशन से जनता तंग आकर उसे ही जिताती है जो जीतने के योग्य हो और बेहतर सुशासन दे सके. निसंदेह मोदी में ये गुण हो सकते हैं किन्तु देश कि जनता ये भी तो जानना चाहेगी कि मोदी कि सामजिक-आर्थिक-वैदिशिक नीति क्या है? यदि देश के दो-चार पूंजीपति उनका गुणगान करने लगें तो ये जरुरी नहीं कि ६० करोड़ निर्धन जनता भी मोदी को पसंद करेगी. यदि आडवानी जी कि रथयात्रा और ‘अयोद्ध्या विध्वंश के वावजूद भी १८६ सीट से ज्यादा नहीं ला पाए तो अब भाजपा और ऐंसा क्या करेगी कि २७२ सीटे आ जाएँ और मोदी जी लाल किले कि प्राचीर से देश को संबोधित करें?
    ये हकीकत है कि गठ्वंधन के दौर में मद्द्यम्मार्गी और धर्मनिरपेक्ष किस्म का नेता ही प्रधानमंत्री बनेगा अब यदि मोदी जी भी आडवानी जी कि तरह वेटिंग में रहते हैं तो इसमें ‘वामपंथ’ को कोसने से क्या फायदा?

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  2. Anil Gupta

    अभी आठ दिन पहले मैं द्वारिकाधीश के दर्शन करके भेंट द्वारिका जा रहा था. मोटर बोट पर आठ नवयुवक भी थे जो हंसी मजाक कर रहे थे.मैंने समझा की वो संभवतः छात्र होंगे. पूंछने पर उन्होंने बताया की वो सभी कंप्यूटर इंजिनियर हैं और हाल ही में टाटा कंसल्टेंसी में सेवा प्रारंभ की है. उन्होंने कहा की वो किसी राजनितिक दल से सम्बद्ध नहीं हैं लेकिन मानते हैं की इस समय देश को केवल नरेन्द्र मोदी जी ही बचा सकते हैं.मैंने कहा की आप उनके लिए क्या कर सकते हो? मैंने उन्हें बताया की हाल में अमेरिका के चुनावों में वहां के एक भारतीय मूल के नवयुवक पराग खंडेलवाल ने एक वेब साईट “रोबोरोमनी.कोम” नाम से बनायीं जिसमे विभिन्न वर्गों के बीच रोमनी द्वारा विभिन्न विषयों पर दिए परस्पर विरोधी वक्तव्यों को एक साथ संकलित काके दिखाया गया था. एक सप्ताह में ही उसके पांच लाख से ज्यादा अनुयायी बन गए. अगर मोदी विरोधियों की करतूतों को इसी प्रकार से प्रस्तुत किया जाये तो अच्छा रहेगा. खास तौर पर १९६९ में हितेंद्र देसाई की सर्कार के दौरान गुजरात में हुए भयंकर दंगो की २००२ के दंगों से तुलना करने पर पता चल जायेगा की २००२ तो १९६९ की तुलना में कुछ भी नहीं थे. इसी तरह १९८४ के सिख विरोधी दंगे और १९८७ में मेरठ के हाशिमपुरा और मल्याना कांड को प्रस्तुत किया जा सकता है. उन लड़कों ने तुरंत “मोदिएजपीएम्.कोम’ नाम से वेब साईट लांच करने की घोषणा कर दी.ये केवल एक उदहारण है की इस समय युवा भारत मोदी जी को पी एम् के रूप में देखने को कितना उत्सुक है.

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