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    Homeसाहित्‍यव्यंग्यकहीं बड़े पर भारी न पड़ जाए छोटे की चतुराई !

    कहीं बड़े पर भारी न पड़ जाए छोटे की चतुराई !

    सामयिक व्यंग्य: टू टेक राइट डिसीजन

    एक पुरानी कहानी है। आप भी सुनें और मजे लें। वर्तमान सन्दर्भ में कहीं इसका जोड़ बनता हो तो वो भी महसूस कर लीजिए। मुझे इसमें जरा भी एतराज नहीं होगा। और हो भी, तो हो। मैं आपका कुछ बिगाड़ थोड़े ही सकता हूं। आप आजाद भारत के नागरिक हैं। आपको पूर्णतः आजादी है। आप हर उस चीज का विरोध कर सकते हैं जो आपको सही न लगती हो। बस उसकी प्रमाणिकता होनी चाहिए। खैर छोड़िए इन बातों को। आप तो कहानी सुनें।

    दो भाईयों में बंटवारे  की स्थिति बन आई। सब सामान आधा-आधा बांटने पर सहमति भी हो गई। बड़ा भाई कुछ ज्यादा समझदार था। उसने सामान का इस तरह बंटवारा किया कि छोटे को उस पर निर्भर रहना ही रहना था। जो सामान दो की मात्रा में था वो तो एक-एक में बंट गया। एक भैंस बच गई। फैसला हुआ कि इनका अगला हिस्सा छोटे का तो पिछला हिस्सा बड़े को मिलेगा। छोटे ने इस पर हामी भर ली। सुबह चारा डालने के समय भैंस ने आदतन रंभाना शुरू कर दिया। बड़े ने छोटे को कहा- जा भैंस को चारा डालकर आ। अगला हिस्सा तेरा है। इस पर छोटे ने उसे चारा डाल दिया। बाद में बड़े ने उसका दूध निकाल लिया। छोटे ने मांगा तो उसे कहा कि भैंस का पिछला हिस्सा मेरा है। इसलिये दूध पर सिर्फ मेरा हक है।

    छोटे के पास इसका कोई जवाब न था। वह चुपचाप बड़े को दूध पीते देखता रहा। अब उसके साथ रोज ऐसा ही होने लगा। भैंस को चारा वो खिलाता, दूध बड़ा निकाल ले जाता। एक दिन उसने भी इसका उपाय सोच लिया। जैसे ही बड़े ने दूध निकालना शुरू किया उसने भैंस की गर्दन पर गुदगुदी करनी शुरू कर दी। भैंस को इसमें मजा आने लगा और वो अपने पूरे शरीर को हिलाने लगी। इसी दौरान बाल्टी को भैंस की लात लगने पर सारा दूध जमीन पर बिखर गया। बड़े ने गुस्सा होकर कहा-ये क्या मूर्खता है। तुम्हें दिखता नहीं। मैं दूध निकाल रहा हूं। छोटे ने बड़ी ही विनम्रता से जवाब दिया। भाई,आपने ही कहा था।अगला हिस्सा मेरा, पिछला आपका। मैं तो भैंस के अपने हिस्से पर ही गुदगुदी कर रहा हूं। पिछला हिस्सा आपका है। आप भैंस को उसे हिलाने से मना कर दो। आपकी समस्या हल हो जाएगी। बड़े से इसका कोई जवाब नहीं बना। वह चुपचाप बिना दूध निकाले ही चला गया। अब यही कहानी छोटे द्वारा जब रोज दोहराई जाने लगी तब बड़े को अपनी गलती का अहसास हुआ।उसने छोटे से कहा कि हम भैंस को चारा साथ-साथ खिलाएंगे और दूध भी बराबर लेंगे। इस पर दोनों भाईयों में आपसी प्रेम पूर्वत हो गया।

    आप भी सोच रहे होंगे कि इस कहानी की आज के समय में प्रांसगिकता क्या है। तो जानिए। केंद्र सरकार ने कृषि विधेयक बना दिए। देशभर में किसान संगठन विरोध में है। सरकार किसी भी हालत में इसे वापस लौटाने के मूड में नहीं है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस शासित प्रदेश के मुखिया अब इस कानून को अपने यहां नया कानून बनाकर ही रोकने का काम करेंगे। आलाकमान द्वारा उन्हें निर्देश भी जारी किए जा चुके हैं।

    यदि ऐसा हो गया तो केंद्र के इस कानून का उन प्रदेशों में कोई महत्व ही नहीं रह जाएगा। जिस कार्ययोजना या लक्ष्य के तहत केंद्र इन विधेयकों को लागू करने के प्रयास कर रहा है। वो तो फिर धरे के धरे रह जाएंगे। सुधार समय की जरूरत है पर सुधार को लागू करने के लिए उचित माहौल की उससे भी ज्यादा जरूरत है। जिस तरह से देश में इन विधेयकों के विरोध पर माहौल और बिगड़ता जा रहा है। वो उचित नहीं है। ऐसे में केंद्र को चाहिए कि वो इस पर गंभीरता से विचार करें। आमजन से ही इनमें सुधार के सुझाव लें। विपक्ष से भी राय ले। मिलबैठ कर संशोधन करने में कोई नाक नीची नहीं होगी। दबाव में आकर यदि इसे बदलना पड़ा तो बड़े पर छोटे की चतुराई भारी पड़ जाएगी।

    (नोट:लेख मात्र मनोरंजन के लिए है।जिसे उचित लगे वो ग्रहण करें। जिसे उचित न लगे वो बेवजह अपने सिर में दर्द न करें।)

    सुशील कुमार नवीन
    सुशील कुमार नवीन
    लेखक दैनिक भास्कर के पूर्व मुख्य उप सम्पादक हैं। पत्रकारिता में 20वर्ष का अनुभव है। वर्तमान में स्वतन्त्र लेखन और शिक्षण कार्य में जुटे हुए हैं।

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