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    उम्मीदों की लौ जलती रहनी चाहिए

    तेरह दिन तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष के बाद अंततः गैंगरेप से पीड़ित लड़की दामिनी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। दुनिया को उसने अलविदा तो कह दिया, लेकिन जाते-जाते वह कुछ ऐसे सवाल छोड़ गयी है जिसकी गुत्थी सुलझाने में आज पूरा समाज, पूरी व्यवस्था एवं सरकार उलझी पड़ी है। लड़की की मौत ने देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को रुला दिया है। कठोर से कठोर दिल वालों को भी झकझोर कर रख दिया है। उसकी मौत पर पत्थर इंसान दिल भी रो पड़े हैं। कोई आरोपी बड़े से बड़ा अपराध कर दे, किंतु उसके परिजन आरोपी को निर्दोष ही बताते हैं, किंतु इस बार के मामले में नजारा कुछ अलग ही दिख रहा है। किसी भी आरोपी के परिजन बचाव में नहीं आ रहे हैं, बल्कि सभी यही कह रहे हैं कि आरोपियों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। भारतीय समाज के लिए अपने आप में यह एक शुभ संकेत है। लोगों की अंतरात्मा यदि स्वतः जाग उठे और अच्छे-बुरे की पहचान हो जाये तो यह अपने आप में कम बड़ी बात नहीं है।
    गैंगरेप के आरोपी तिहाड़ जेल में भी भय के साये में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। कई समाचार पत्रों के मुताबिक आरोपियों की पिटाई तिहाड़ जेल के कैदी भी कर चुके हैं। बताया जा रहा है कि इन आरोपियों के प्रति तिहाड़ के कैदियों में इतना आक्रोश है कि मौका मिलने पर वे कुछ भी कर सकते हैं। तिहाड़ के कैदियों में यदि इस प्रकार की भावना आ रही है तो इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि समाज की सोई हुई आत्मा जाग रही है। सरकार और नेताओं को पहले यही लगता था कि वे चाहे कुछ भी करते रहें किंतु उनकी सेहत पर कुछ भी असर पड़ने वाला नहीं है।
    इंडिया गेट पर प्रदर्शनकारियों के बीच जब दिल्ली की मुख्यमंत्राी शीला दीक्षित के पुत्रा एवं पूर्वी दिल्ली के सांसद संदीप दीक्षित पहुंचे तो प्रदर्शनकारियों ने उन्हें भी घेर लिया, बहुत मुश्किल से वे बच-बचाकर निकल पाये। इसी प्रकार मुख्यमंत्राी शीला दीक्षित जब जंतर-मंतर पर दामिनी को श्रद्धांजली देने पहुंची तो उन्हें भी प्रदर्शनकारियों ने घेर लिया। श्रीमती शीला दीक्षित को बिना श्रद्धांजली दिये वापस आना पड़ा। इंडिया गेट पर नेता एवं समाजसेवी गये, किंतु प्रदर्शनकारियों पर उनके समझाने का कोई भी असर नहीं हुआ।
    आज देश की आम जनता का स्पष्ट रूप से कहना है कि अब बहुत हो चुका, वादों और आश्वासनों से काम चलने वाला नहीं है। जनता ने अब बता दिया है कि नेताओं का वह पुराना फार्मूला ‘हम देख रहे हैं, आगे भी देखेंगे और पहले भी देख रहे थे’ अब चलने वाला नहीं है। अब तो लोग इतने जागरूक हो चुके हैं कि सरकार जो कुछ करना चाहती है, जनता के दिमाग में वह बात पहले ही आ जाती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जनता को अब बरगलाना बहुत मुश्किल है। भारत के राजनीतिक दलों को यदि लगता है कि इतने के बावजूद जनता उन्हें वोट दे रही है तो इससे यह साबित नहीं हो जाता कि जनता उनसे बहुत प्रसन्न है। चुनाव तो कई दल विकल्पहीनता की स्थिति में जीत रहे हैं। जिस दिन बेहतर विकल्प जनता को मिल जायेंगे, उस दिन इन दलों को कोई वोट नहीं देगा। राजनीतिक दल यदि स्वयं नहीं सुधरे तो जनता ही उन्हें सुधार देगी। राजनीति में सब कुछ चलता है का फार्मूला अब चलने वाला नहीं है।
    भारतीय समाज एवं जनमानस के बारे में सरकार चाहे जो कुछ भी सोचे किंतु अपने समाज की एक विशेषता है कि जब तक वह सहता है तब तक सहता रहता है किंतु जब वह जाग जाता है तो जाग ही जाता है। उदाहरण के तौर पर आपातकाल के बाद जब जनता जागी तो उसने श्रीमती इंदिरा गांधी जैसी प्रभावशाली नेत्राी को भी सत्ता से बेदखल कर दिया इसलिए सरकार जनता को जरा भी कम करके न आंके। जनता यदि नेताओं की इज्जत करती है तो आवश्यकता पड़ने पर सबक भी सिखाना जानती है इसलिए आज दामिनी प्रकरण पूरी राजनैतिक बिरादरी के लिए एक सबक एवं चुनौती दोनों है। अब यह राजनैतिक बिरादरी पर निर्भर है कि इस प्रकरण के माध्यम से जनता का विश्वास जीतने में वह कितना कामयाब होती है?
    दिल वालों का शहर दिल्ली के बारे में कहा जाता था कि यह तमाशबीनों का शहर बन गया है। सड़क पर कोई पिटता रहे, किसी अबला की इज्जत लुटती रहे, कोई घायल सड़क पर कराहता रहे, किंतु तमाम लोग चुपचाप देखते हुए निकल लेते थे। इतनी भी जरूरत नहीं समझते थे कि 100 नंबर पर कॉल कर पुलिस को सूचना दे दें किंतु दामिनी प्रकरण से दिल्लीवासियों में जो जज्बा देखने को मिला है, उससे अब यह साबित हो गया है कि दिल्ली शहर अब तमाशबीनों का शहर नहीं है, बल्कि अपनी दिलेरी के लिए मशहूर इस शहर ने दिखा दिया है कि उसमें आज भी वही हिम्मत, इंसानियत एवं मानवता का जज्बा विद्यमान है जो पहले था।
    समाज यदि सोच ले कि किसी भी बलात्कारी का वह हर स्तर से बहिष्कार करेगा, उसकी उपेक्षा करेगा, वकील बलात्कारियों का मुकदमा नहीं लड़ेंगे, डा. बलात्कारियों का इलाज नहीं करेंगे एवं अन्य तमाम मामलों में जब बलात्कारियों को जिल्लत का सामना करना पड़ेगा तो इससे अन्य लोगों को सबक मिलेगा। बलात्कारी यदि जनसेवक, सरकारी कर्मचारी एवं समाज के प्रतिष्ठित लोग हों तो उनके मामले में और अधिक कठोरता बरती जाने की आवश्यकता है। बलात्कारियों को सजा देने के लिए कैसा कानून बनाया जाये? आज उस पर गंभीर चिंतन-मनन चल रहा है। सजा कैसी हो, कितनी हो, यह एक अलग बात है। इसके साथ ही एक बात पर समानता अवश्य दिखाई दे रही है कि बलात्कारियों को नपुंसक बना दिया जाये। उनके अंग भंग कर दिये जायंे।
    प्रमुख समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन के पहले यही लगता था कि अब देश में कुछ होने वाला नहीं है। भ्रष्टाचार एवं अपराधों को आम समाज ने अपने में अंगीकार कर लिया है लेकिन अन्ना हजारे ने दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में मजबूत जन-लोकपाल एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन किया तो देश की जनता ने दिखा दिया कि वह किसी भी कीमत पर भ्रष्टाचार से समझौता करने वाली नहीं है। उसकी आत्मा इतनी नहीं मरी है कि वह सहज रूप से भ्रष्टाचार एवं अपराधों को सहन कर ले। आज शुकून की बात तो यह है कि भ्रष्टाचार देश में बहस का विषय बन चुका है। भ्रष्टाचार एवं काले धन के मामले में लोग जानने लगे हैं। सभी समस्याओं की जड़ लोग अब भ्रष्टाचार एवं एवं लूट-खसोट को मानने लगे हैं। आज प्रधानमंत्राी डॉ. मनमोहन सिंह जब कोई बात कहते हैं या राष्ट्र के नाम संबोधन करते हैं तो उनकी बातों पर कोई यकीन नहीं करता क्योंकि जनता उनके आश्वासनों से आजिज आ चुकी है। जनता अब उनसे और अधिक आश्वासनों की इच्छा नहीं रखती। जनता तो अब हर मामले में कार्रवाई चाहती है।
    समाज में बढ़ते अपराधों एवं बलात्कार की घटनाओं के बारे में कहा जाता है कि उसका एक बहुत कड़ा कारण नशा है। नशे का अर्थ सिर्फ शराब, भांग, गांजा, अफीम या चरस से नहीं है बल्कि नशा तो किसी भी प्रकार का भी हो सकता है। किसी को पैसे का नशा है तो किसी को समाज में अपने रुतबे का नशा है तो किसी को अपने पावर का नशा है। अधिकांश गलत काम नशे की हालत में होते हैं। समाज का हर व्यक्ति बलात्कार एवं अपराध में शामिल नहीं होता किंतु सामान्य से सामान्य व्यक्ति जब नशे में चूर हो जाता है तो जघन्य से जघन्य अपराधों को अंजाम दे देता है इसलिए आज आवश्यकता इस बात ही है कि समाज को पूर्ण नशामुक्त करने के लिए अभी से हर संभव उपाय किये जायें, क्योंकि समाज को अब सही रास्ते पर लाने के लिए पूर्ण नशामुक्त समाज ही एक मात्रा विकल्प है।
    आज समाज में एक परंपरा-सी चल पड़ी है कि कोई भी जब रेप की घटना होती है तो सबसे पहले महिला को ही दोषी ठहराने की कोशिश होती है। कोई कहता है कि लड़कियां, महिलाएं ही पुरुषों को उकसाती हैं तो कोई कहता है कि लड़कियों के कपड़े बढ़ते बलात्कार के लिए जिम्मेदार हैं तो कोई कहता है कि लड़कियां देर रात क्यों घूमती हैं? लड़कों के साथ क्यों घूमती हैं? तमाम तरह की बातें समाज में होती रहती हैं किंतु सवाल तो यह उठता है कि बलात्कार तो दो वर्ष की की बच्ची के साथ भी हो रहा है और 80 साल की वृद्धा के साथ भी।
    आखिर 2 साल की बच्ची और 80 साल की वृद्धा ने कौन-सा भड़काऊ एवं उकसाने वाला कपड़ा पहन रखा था जिससे उसका बलात्कार हो गया। कपड़ों से ज्यादा अब संस्कारों की चर्चा होनी चाहिए। समाज का प्रत्येक व्यक्ति यदि महिला को माँ, बेटी या बहन के रूप में देखने लगे तो व्यक्ति के मन में विकृति या वासना के भाव पैदा नहीं होंगे। अगर कपड़ों की बात की जाये तो क्या कोई भी व्यक्ति अपनी नग्न या अर्धनग्न बेटी या बहन के साथ दुष्कर्म करने की सोच सकता है। भाई-बहन, बाप-बेटी एवं अन्य तमाम रिश्तों में दुष्कर्म की खबरें सुनने को मिलती हैं। आखिर यहां कौन सा कपड़े का मामला आता है। घरों में जो रेप हो रहे हैं, उसके लिए कौन-सा कारण जिम्मेदार है?
    कुल मिलाकर कहने का आशय है यह है कि लोगों को अपनी सोच बदलने की आवश्यकता है। लोग महिलाओं का सम्मान करना सीखें। हर महिला में लोग बहन, बेटी एवं माँ की छवि देखने लगेंगे तो समाज में बदलाव अपने आप आ जायेगा? संस्कारों की चर्चा होना समाज में बहुत जरूरी है, किंतु कानून क्या कर रहा है, इस पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है। यदि कानून सख्त होंगे एवं लोगों में कानून के प्रति भय होगा तो अपराध करने से पहले अपराधी सौ बार सोचेगा? लोग मर्डर करने से क्यों घबराते हैं? क्योंकि लोगों को लगता है कि हत्या के आरोप में आजीवन कारावास हो सकता है। इस प्रकार यदि हर छोटे-बड़े अपराध के लिए सख्त सजा नहीं होगी तो कानून के प्रति लोगों में भय पैदा नहीं होगा इसलिए कानून का सख्त होना बहुत जरूरी है।
    बात सिर्फ दामिनी के हत्यारों को ही सजा देने की नहीं है, बल्कि इन दरिंदों को ऐसी सजा मिले, जिससे भविष्य में कोई भी किसी लड़की या महिला की तरफ नजर उठाकर देखने की हिम्मत न कर सके। अभी तो सब कुछ सरकार के हाथ में है किंतु जब देर हो जायेगी तो जनता दोषियों को स्वयं सजा देने लगेगी। यह स्थिति सरकार एवं समाज दोनों के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकती है इसलिए आज आवश्यकता इस बात की है कि उबलते हुए एवं आक्रोशित समाज को संतुष्ट करने के लिए हर क्षेत्रा में सख्ती बरती जाये। कानून, सरकार, समाज, मीडिया, न्यायपालिका एवं अन्य संस्थाएं अपना काम निष्ठा एवं ईमानदारी से करें। जब तक हर क्षेत्रा अपना काम ठीक से नहीं करेगा तब तक समाज में महिलाओं को उचित सम्मान एवं अधिकार नहीं मिल सकेगा।
    कठोर कानूनों एवं संस्कारों के अलावा घर में लड़के एवं लड़की के बीच कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए और लड़कियों में इस बात की भावना नहीं भरनी चाहिए कि वे लड़कों से किसी भी रूप में कम हैं। लड़कियां, लड़कों की तरह साहसी बनें, अपने खिलाफ अत्याचार एवं अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सकें, लड़कियों को इस काबिल बनाना चाहिए। लुच्चे-लफंगों एवं मनचलों को जिस दिन लड़कियां मुंहतोड़ जवाब देना शुरू कर देगीं, उनके खिलाफ अपराध स्वतः कम हो जायेगा। इन सबके बावजूद सरकार, समाज एवं पूरी व्यवस्था को देश में इस प्रकार का वातावरण बनाना होगा जिससे कोई भी लड़की एवं महिला निडर होकर कहीं भी आ-जा सके। उसके अंदर असुरक्षा का जरा भी बोध न हो। जिस दिन हम सब इस प्रकार का समाज बनाने में कामयाब हो गये वह समय भारतीय समाज के लिए बहुत ही गौरवशाली एवं स्वर्णिम समय होगा।

    अरूण कुमार जैन
    अरूण कुमार जैन
    इंजीनियर लेखक राम-जन्मभूमि न्यास के ट्रस्टी हैं

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