जीवन है एक रंगमंच

 पंडित विनय कुमार
जीवन है सचमुच
एक रंगमंच की तरह
जिसका कोई आरंभ और अंत नहीं होता
जो बार-बार मंचित होता है हमारी रगों में
जो दौड़ता है खून की तरह लगातार…
बिना वक्‍त गँवाये और
अंत में जीवन की साँस के साथ
समाप्त हो जाती है !
जीवन जो है एक रंगमंच
हमारी विभिन्‍न जीवनगत परिस्थितियाँ हैं
उसके कथानक
समय का पहिया घुमता रहता है
रंगमंच के चारों ओर
जहाँ सुख भी है और दुख भी
जहाँ आनंद भी है और अवसाद भी
जहाँ थकान भी है और स्‍फूर्ति व ताजगी भी-
जो जीवन का सच भी है
और जीवन का अंत भी-
और यही है सच!
जीवन के केन्‍द्र में
जन्‍म के साथ-साथ ही सजते हैं रंगमंच की अट्टालिकाएँ
जहाँ हर वक्‍त चित्रपट की भाँति चलती रहती हैं विशेष प्राकर की रंगीन गतिविधियाँ
जहाँ शोषण दिखलाई पड़ रहा है
और जहाँ शोषक वर्ग मुस्‍कराते नजर आ रहे हैं
जो हमारे आस-पास बहुरुपिये के रूप में मौजूद हैं
जिसे हम कभी नंगी आँखों से
देख नहीं सकते; नहीं-नहीं
वह दिखता नहीं
वह नजरें चुरा ली गई हैं
वे नजरें हतप्रभ हैं
वे नजरें जो घूर रही हैं
चारों दिशाओं में
सर्वत्र ही फैली हैं
दसों दिशाओं में
जहाँ रंगमंच का बिल्‍कुल अभी-अभी मंचन होने वाला है!
कौन है वह ?
जिसने शोषण का शिकार बनाया नौनिहालों
को जो बाल मजदूर हैं
जो हमारे घर की बहू- बेटियाँ हैं
जो हमारे आस-पास का गरीब, निर्धन और लाचार व्‍यक्ति है
जो पुरुष-स्‍त्री, बालक-वृद्ध-सब-कुछ की श्रेणियों में कफट बैठ जाती हैं
जिनका जीवन कुन्‍द (खत्म) हो चला है
शायद कभी धरा पर अवतरित होने की उनकी दिली ख्‍वाहिश नहीं रह गई है…..
जीवन का सपना
सचमुच सपना ही अनकर सज गया है
सरकारी फाइलों में
दबा दी गई हैं उनकी व्‍यथाएँ
और वे कभी नहीं खुलेगी आलमारियाँ
जहाँ उनकी करुण दस्‍तान दफ़न हो चुकी हैं कभी नहीं खुलने के लिए…..
और किसी का भी ध्‍यान
नहीं है इन लोगों पर
क्‍या हो गई है हमारी संस्‍कृतियों, परंपराओं और विविध धर्मों को;
जो सिखलाया करती थी- ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई’
और- ‘परोपकराराय पुण्‍याय पापाय परजीडनम्’
जीवन का कितना बड़ा सच है यहाँ
जहाँ शोषक वर्ग सिर उठाए निर्भीक खड़ा है
हमें पलभर में लील जाने के लिए ओर यह क्रम लगातार जारी है….!
कौन हैं हमारे रक्षक?
कोई तो नहीं दिखता हमारे आस-पास नंगी आँखों से
जो हमारी रक्षा कर सके
इन परिस्थितियों से
जहाँ सब के होते हुए
अकेलापन काटने दौड़ता है
जहाँ सुख-शांति नहीं है
जहाँ केवल अशांति, तनाव ओर दुख की काली रंखाएँ फैली हैं
मेरे भीतर का सत्य क्‍यों इतना कमजोर पड़ गया है?
मेरे भीतर का ‘रामत्‍व’
अब रावण से पराजित होने के करीब है
मेरे भीतर की ‘शक्ति’
अब जवाब देने लगी है…

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