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    Homeसाहित्‍यकविताजिंदगी बेहाल है, बहुत बुरा हाल है

    जिंदगी बेहाल है, बहुत बुरा हाल है

    यह कोरोना काल है, दुनिया में भूचाल है,
    घर से बाहर ना निकलें, जी का जंजाल है।
    पर किसने किसकी मानी है, घर में रहने की ठानी है,
    जब फैल गया कोरोना तो, हर बस्ती में वीरानी है।
    चारों ओर हाहाकार है, मरीजों की चीत्कार है,
    दवा नहीं बनेगी, तब तक डॉक्टर भी लाचार हैं।
    सूना सूना बाज़ार है, ऑनलाइन व्यापार है,
    काम-धंधा कब करें, चिंतित हर परिवार है।
    टूट रहे अरमान हैं, बिदक रहे मेहमान हैं,
    लग जाये यदि रोग तो, मर कर भी अपमान है।
    मंदिर में बंद भगवान हैं, भटक रहे जजमान हैं,
    त्योहारों के मौसम में, ना राशन ना पकवान है।
    फ़ेस मास्क जरूरी है, रखना दो गज की दूरी है,
    कितने भी हों काम पड़े, घर पर रहना मजबूरी है।
    जिंदगी बेहाल है, बहुत बुरा हाल है,
    कोरोना से बच गए तो जीवन निहाल है।
    ऊपर वाले से गुहार है, सुखी रहे संसार है,
    हाथ जोड़ विनती करे, बजाज बारम्बार है।

    • अशोक बजाज
    अशोक बजाज
    अशोक बजाज
    श्री अशोक बजाज उम्र 54 वर्ष , रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर से एम.ए. (अर्थशास्त्र) की डिग्री। 1 अप्रेल 2005 से मार्च 2010 तक जिला पंचायत रायपुर के अध्यक्ष पद का निर्वहन। सहकारी संस्थाओं एंव संगठनात्मक कार्यो का लम्बा अनुभव। फोटोग्राफी, पत्रकारिता एंव लेखन के कार्यो में रूचि। पहला लेख सन् 1981 में “धान का समर्थन मूल्य और उत्पादन लागत” शीर्षक से दैनिक युगधर्म रायपुर से प्रकाशित । वर्तमान पता-सिविल लाईन रायपुर ( छ. ग.)। ई-मेल - ashokbajaj5969@yahoo.com, ashokbajaj99.blogspot.com

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