लेखक परिचय

राकेश उपाध्याय

राकेश उपाध्याय

लेखक युवा पत्रकार हैं. विगत ८ वर्षों से पत्रकारिता जगत से जुड़े हुए हैं.

Posted On by &filed under राजनीति.


भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्‍त कराने में प्रख्‍यात स्वतंत्रता सेनानी एवं समाज सुधारक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का योगदान अविस्‍मरणीय है। कांग्रेस गरम दल के नेता के नाते उन्‍होंने स्‍वतंत्रता आंदोलन को नयी दिशा दी। ‘गीतारहस्य’ नामक पुस्‍तक के रचयिता तिलक के लेखों ने लाखों भारतीयों को अपने देश के लिए सर्वस्‍व न्‍योछावर करने की प्रेरणा दी। महाराष्‍ट्र में उन्‍होंने गणेश पूजा का प्रारंभ कर लोगों में धार्मिक और सांस्‍कृतिक चेतना का प्रवाह किया। उत्‍कट देशभक्ति के प्रेरणास्रोत व “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा” का उद्घोष करनेवाले तिलक का जन्‍म 23 जुलाई, 1856 को एवं 1 अगस्‍त, 1920 को देहावसान हुआ। यानी आगामी 1 अगस्‍त को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की 89वीं पुण्यतिथि पड़ रही है। ‘प्रवक्‍ता डॉट कॉम’ के विशेष आग्रह पर युवा पत्रकार राकेश उपाध्याय ने समकालीन राजनीति और तिलक की प्रासंगिकता विषय पर तीन कड़ियों में आलेख लिखा है। ये आलेख आज की परिस्थिति के अनुकूल विचारोत्तेजक है और लोकमान्य तिलक के प्रति एक भावभीनी श्रद्धांजलि भी। लोकमान्य के जीवन का विहंगावलोकन करती ये श्रृंखला हमारे युवा पाठकों का आज की राजनीतिक परिस्थिति में अत्यंत महत्वपूर्णा मार्गदर्शन करेगी, इसका हमें विश्‍वास है-संपादक

tilak1 अगस्त, 2009 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को गुजरे लगभग 90 साल पूरे हो जाएंगे। हम अब ये दावा नहीं कर सकते कि देश में कोई ऐसा होगा जिसने लोकमान्य को अपनी आंखों से कभी देखा होगा, हां इतना जरूर कहा जा सकता है कि लोकमान्य की आंखों के सपने अभी भी कुछ भारतीयों की आंखों में तिरते होंगे। संभवत: मुट्ठीभर ऐसे भी अवश्‍य होंगे जो आज भी सही मायनों में ‘स्वराज’ आने का इंतजार कर रहे हैं।

बहुतों को अजीब लगेगा कि ये स्वराज की बात अब क्यों? क्या पराधीनता 1947 में खत्म नहीं हो गई? आखिर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जीवित होते तो आज क्या कर रहे होते? क्या आज भी वे स्वराज, स्वराज का मंत्रजाप कर रहे होते? आज कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी सहित देश के तमाम राजनीतिक दलों के अंदर उपजी विचारहीनता को देखकर इस प्रश्‍न का उत्तर खोजना ज्यादा मुश्किल नहीं है। मुझे लगता है कि तिलक आज जिंदा होते तो शायद पहले से भी कहीं अधिक वेग से हिंदुस्तान में स्वराज की स्थापना के संघर्ष का बिगुल बजा रहे होते। आज के भारत का कड़वा सच यही है कि भारतीय राजनीतिक पटल पर एक भयानक तमस और कुहासा चारों ओर छाया दिख रहा है। तिलक का कालखण्ड बीतने को शताब्दी आ गई लेकिन उस समय जो गाढ़ा अंधकार भारत के राजनीतिक क्षितिज पर छाया हुआ था, जिससे निजात दिलाने के लिए तिलक भारतभूमि पर पैदा हुए, वह तो आज कहीं ज्यादा विकराल हो उठा है। लोकप्रियता को ही मानक मान लें तो आज देश में किस राजनीतिक दल का कौन नेता दावा कर सकता है कि उसकी एक दहाड़ पर हिंदुस्तान ठप्प हो सकता है? शायद ही कोई राजनेता ऐसा हो जिसके पास अखिल भारतीय दृष्टि हो, जिसके लिए भारतवर्ष के प्रत्येक प्रांत की जनता में बेइंतहा प्यार हो, जो अपने जीवन में किसी विचारधारा की लीक पर चलता हो, जिसका कोई सिद्धांत हो और वह सिद्धांत उसके आचरण से स्पष्‍ट झलकता भी हो।

आज हिंदुस्तान की 77 प्रतिशत आबादी जब 10 से 20 रूपए प्रतिदिन में गुजर-बसर कर रही है, सारा देश सांस्कृतिक संक्रमण, बेरोजगारी, आंतरिक आतंकवाद और वैदेशिक आतंकवाद, घोर गरीबी, गांवों की खस्ताहाल हालत, बजबजाते शहरों और कस्बों से लहूलुहान हो उठा है, विदेशी कारपोरेट कल्चर हिंदुस्तान और उसकी नियति के निर्धारकों राजनीतिक नेताओं और अफसरों को पूरी तरह से जब अपनी गिरफ्त में ले चुका है तब हमें तिलक की याद आती है। तिलक की ही याद क्यों? क्योंकि यही वह अकेला शख्स था जिसने 100 साल पहले भारत की राजनीति को अपने मन और बुद्धि से सोचना सिखाया। हां ये तिलक ही थे जिन्होंने पहले पहल ये करके दिखाया था। उनकी सिंहगर्जना से ब्रिटिश हुकूमत हिलती थी और कांग्रेस का नरमपंथी धड़ा भी। आखिर यूं ही उन्हें तमाम ब्रिटिश दस्तावेजों ने ‘फादर ऑफ इंडियन अनरेस्ट’ अर्थात भारत में अशांति का जन्मदाता होने के खिताब से नवाजा नहीं था। ये उनकी लोकप्रियता का ही भय था कि ब्रिटिश हुकूमत को उन्हें गुपचुप कालेपानी जैसी कैद के लिए बर्मा स्थित माण्डले जेल रवाना करने पर मजबूर होना पड़ा।

तिलक के समय हिंदुस्तान की राजनीतिक परिस्थिति क्या थी, उस पर भी एक निगाह दौड़ाना वाजिब होगा। कैसे नेता थे हमारे उस समय! ऐसे जो सवेरे कहीं किसी क्लब में गोष्‍ठी करके ब्रिटिश हुकूमत को शासन संबंधी सुझाव और सलाह देने से अधिक कुछ करने में विश्‍वास नहीं रखते थे और शाम को ब्रिटिश हुक्मरानों के खैरमकदम और जीहुजूरी में जो पलक पांवड़े बिछाकर खड़े रहने में ही अपना जीवन धन्य मानते थे कि कहीं साहब बहादूर उन्हें भी कहीं पर रायबहादुरी या सर का कोई खिताब अदा फरमाएंगे। कांग्रेस को उन्होंने क्लबनुमा थिएटर मंडली बना रखा था जिसकी हालत आज देश में चल रहे तमाम चैरिटी क्लबों के समान थी जो सरकार और समाज के साथ अपना पीआर जमाए रखने के लिए गाहे बगाहे मिलते-जुलते और अधिवेशन आदि करते रहते थे। हमारी कांग्रेस उस समय औपनिवेशिक स्वराज को ही अपनी राजनीति का अखण्ड लक्ष्य मानकर चलती थी, और कर भी क्या सकती थी क्योंकि उस कालखण्ड की विकट परिस्थिति में कांग्रेस के सामने ब्रिटिश हुक्मरानों के सामने गिड़गिड़ाने के सिवाय अपना अस्तित्व बचाए रखने का कोई और उपाय भी शेष नहीं दिखता था। एक राजनीतिक दल होने के मायने क्या हैं, भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस होने का मतलब क्या है, इसके बारे में भी लोकमान्य तिलक ने ही राजनीतिक कार्यकर्ताओं को पहले पहल सीख दी। लोकमान्य जनता के नेता थे, किसी को ‘मैनेज’ करके तीन तिकड़म से या किसी की कृपा से उन्होंने लोकमान्य की पदवी हासिल नहीं की थी। लोकमान्य के समय राजनीतिक क्षेत्र में काम कर रहे अधिकांश राजनेता अंग्रेज सरकार के कृपापात्र बने रहने के लिए लालायित रहते थे और समूची राष्‍ट्रीय राजनीति ही अंग्रेजपरस्ती का शिकार बन चुकी थी। लोकमान्य ने अपने पराक्रम से अंग्रेजपरस्त राजनीति को भारतपरस्त बनाने का ऐतिहासिक कार्य सम्पन्न किया।

1857 का प्रथम स्वातंत्र्य समर का दीपक करोड़ों हिंदुस्तानियों में आजादी की आस जगाकर बुझ चला था। जो दिया मंगल पाण्डे प्रभृति वीरों ने अपना जीवन दीप जलाकर रोशन किया था उस दीपक को कांग्रेस विलायती घी से जला कर रखने की कोशिश कर रही थी। विदेशी पराधीनता का विकट घना अंधेरा जब हमारे लाखों ग्रामों से होता हुआ दूर लाहौर, कोलकाता, मुंबई, मद्रास और दिल्ली तक पसरा पड़ा था, जब कोई राह सुझाने वाला नहीं था, अंग्रेजी राज मानो ईश्‍वर ने सदा के लिए हमारी नियति में लिख-पढ़ दिया था तब लोकमान्य का पदार्पण हिंदुस्तान की राजनीति में हुआ। उस महनीय व्यक्तित्व की याद आज के संदर्भ में तो और भी प्रासंगिक हो उठती है क्योंकि उसी ने उन्नीसवीं सदी के उगते सूर्य को साक्षी मानकर पहले पहल कहा था कि अंग्रेजों तुम हमारे भाग्यविधाता नहीं हो, हमारी आजादी हमें सौंपकर तुम हम पर कोई अहसान नहीं करोगे, ये हमारा स्वराज है, सदियों से ये स्वराज हमारी आत्मा को परमात्मा से जोड़ने का साधन रहा है, तुम हमारी आत्मा पर राज नहीं कर सकते, तुम्हें हिंदुस्तान से जाना होगा, जाना ही होगा क्योंकि स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे।

स्वराज!!! छोटा सा शब्द, किंतु मानव ही क्या मानवेत्तर अन्य योनियों, पशु-पक्षियों के जीवन के लिए भी सर्वाधिक गहन और महत्वपूर्ण इस शब्द के अर्थ को देश को समझाने के लिए तिलक महात्मा ने कैसा भीशण संघर्ष और संताप अपने जीवन में झेला इसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ब्रिटिश हुकूमत और भारत के कुछ कथित राजनीतिक रहनुमाओं की षडयंत्री राजनीति ने सन् 1908 में उन्हें 6 साल के लिए बर्मा स्थित माण्डले जेल पहुंचा दिया, जेल में रहने के दौरान ही उन्होंने अपनी धर्मपत्नी को खो दिया। इसके पूर्व अपने नरमपंथी साथियों के खिलाफ दिसंबर, 1907 के कांग्रेस के सूरत महाधिवेशन में ताल ठोंककर वे खड़े हो गए। कहां कहां उन्होंने संघर्ष नहीं किया। ब्रिटिश परीधीनता की चक्की में पिस रहे स्वदेशी शिल्पकारों, मजदूरों, किसानों, मजलूमों की वे सशक्त आवाज बने। उनकी लोकप्रियता कैसी थी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब उन्हें केसरी में ब्रिटिश शासन विरोधी संपादकीय लिखने और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हिंसक आतंकवाद और बगावत भड़काने के आरोप में सन् 1908 में कैद की सजा सुनाई गई, समूची मुंबई उस दिन ठप्प पड़ गई। और मुंबई ही क्यों समूचे देश में अंग्रेजी शासन ने अलर्ट की घोषणा कर दी। बैरकों में सिपाहियों को किसी संभावित विद्रोह को कुचलने के लिए तैयार रहने को सावधान कर दिया गया।

लोकमान्य को याद करने का मतलब आज क्या हो सकता है? इसे जानने के लिए हमें लोकमान्य के जीवन में झांकना होगा। वह जीवन जिसने आत्माभिमान शून्य, दिमागी तौर पर अलसाये, मुरझाए और गुलामी के बोझ से कांपते, कातर हिंदुस्तान को सही मायनो में सोचना और बोलना सिखाया। तिलक की याद करना सिर्फ अतीत के बीते पन्नों को पलटना मात्र नहीं है, उनकी याद आज की तरंगित, उमंगों से भरी युवा पीढ़ी को, संसद में कलफदार धोती कुर्ता, पाजामा और पैंट-शर्ट पहने नेताओं को अपना जीवनोद्देश्‍य फिर से तलाशने की राह पर ले जाने का प्रयास भी है। ये उस विरासत को संभालने और संजोए रखने का प्रयत्न है जिसकी रक्षा के लिए महात्मा तिलक ने अपना जीवन अर्पित किया।

पर लोकमान्य को याद करने का मतलब आज क्या हो सकता है? इसे जानने के लिए हमें लोकमान्य के जीवन में झांकना होगा। वह जीवन जिसने आत्माभिमान शून्य, दिमागी तौर पर अलसाये, मुरझाए और गुलामी के बोझ से कांपते, कातर हिंदुस्तान को सही मायनो में सोचना और बोलना सिखाया। तिलक की याद करना सिर्फ अतीत के बीते पन्नों को पलटना मात्र नहीं है, उनकी याद आज की तरंगित, उमंगों से भरी युवा पीढ़ी को, संसद में कलफदार धोती कुर्ता, पाजामा और पैंट-शर्ट पहने नेताओं को अपना जीवनोद्देश्‍य फिर से तलाशने की राह पर ले जाने का प्रयास भी है। ये उस विरासत को संभालने और संजोए रखने का प्रयत्न है जिसकी रक्षा के लिए महात्मा तिलक ने अपना जीवन अर्पित किया।

राजनीतिक दलों में पद को लेकर आज जो मारामारी हम देखते हैं ये मारामारी तिलक के समय विचारों के स्तर पर प्रबल थी। कांग्रेस पर उन तत्वों ने कब्जा जमा लिया था जो हिंदुस्तान को अंग्रेजी राज के खिलाफ किसी निर्णायक जंग के खिलाफ खड़ा करने में बुद्धिमानी नहीं समझते थे। ऐसे तत्व 1857 की क्रांति की असफलता के बाद मुकम्मल आजादी यानी पूर्ण स्वराज की मांग को उतना ही गैर जरूरी मानते थे जितना जरूरी वे भारत के कल्याण के लिए अंग्रेजों की उपस्थिति को मानते थे। इसी सिद्धांत में से औपनिवेशिक स्वराज का सिद्धांत जन्मा जिसके अनुसार ब्रिटिश हुकूमत तो हमारे हित में ही है, वह बनी रहे, देश का विकास करे, डाक-तार-स्कूल-विश्‍वविद्यालय, सड़कें, रेल, प्रशासन और सेना, साफ-सफाई की व्यवस्था करे, नगरीकरण करती रहे और कुछ टुकड़े यह हुकूमत हम सभ्य नागरिकों की ओर भी कृपा कर फेंकती रहे तो क्या हर्ज है। कुछ साल पहले हमारे देश के एक वरिष्‍ठ केंद्रीय मंत्री ने अंग्रेजों द्वारा सौंपी गई इस महान विरासत के लिए लंदन में कैसा धन्यवाद ज्ञापित किया था, उसे यहां दुहराने की जरूरत नहीं है, हां ये सच जरूर स्वीकार कर लेने की जरूरत है कि तिलक का कालखण्ड बीतने के 90 साल बाद भी वह कौम हिंदुस्तान में खत्म नहीं हुई है जिसके खिलाफ तिलक जीवन भर संघर्ष करते रहे किंवा वह कौम तो और मजबूती और कहीं ज्यादा प्रभावी ढंग से आज हम हिंदुस्तानियों को उपदेश करती फिर रही है। ये वो कौम है जो ये कहने में कोई संकोच नहीं करती कि हे हमारे विधाता अंग्रेज भाइयों! तुमने 17वीं सदी में हिंदुस्तान आकर हमारे उपर कितनी कृपा की, ये तुम्हारे 200 साल के कठोर शासन का ही प्रतिफल है कि हम हिंदुस्तानी कुछ पढ़ लिख गए हैं अन्यथा अगर तुम ना आए होतो तो जरा सोचो हमारा क्या हाल होता? तब ना ये संसद होती और ना ये बिजली बत्ती, दुनिया जरूर 21वीं सदी में पहुंच गई हम तो वैसे ही आदम के जमाने में रह गए होते। तुमने यहां आकर जो कृपा की उसका क्या अहसान हम चुकाएं! हम तो बस यही कह सकते हैं कि तुम एक बार फिर आओ, पिछली बार 200 साल के लिए आए पर इस बार आओ तो ऐसे आओ कि जाने की जरूरत ही न पड़े। क्योंकि हम हिंदुस्तानी तभी शांति से रह सकते हैं जब तुम हमारा मार्गदर्शन करने के लिए हमारे सिर पर डण्डा लिए बैठे रहो। इस बार आओगे तो ज्यादा मुश्किल ना आएगी क्योंकि तुम्हारी मदद के लिए हिंदुस्तान भर में हमने अंग्रेजी पढ़ी लिखी, तुम्हारी सभ्यता में पली बढ़ी और तुम्हारे जैसी आधुनिक सोच रखने वाली पूरी की पूरी जमात खड़ी कर रखी है। और अगर ना आना हो तो कोई बात नहीं, हमारा मार्गदर्शन करते रहो, आपकी अनुपस्थिति में आपकी खड़ाउं रखकर हम आपके राज को उसके सच्चे स्वरूप में हिंदुस्तान में बनाए रखेंगे।

ये उस सोच का ही नमूना है जो 19वीं सदी के प्रारंभ में समग्र हिंदुस्तान के कथित प्रगतिशील राजनीतिक नेतृत्व में देखी जा सकती थी और आज जब हम इस कथित 21वीं सदी में आ गए हैं तो यह औपनिवेशिक सोच और ज्यादा प्रभावी ढंग से नए रूप धरकर हमारे सामने खड़ी है। तिलक कदम कदम पर कांग्रेस में इसी गुलाम मानसिकता का सामना कर रहे थे। उन्होंने कांग्रेस की नरम दलीय कोटरी के मकड़जाल के विरूद्ध समान विचार वाले राष्‍ट्रीय नेताओं से संपर्क किया और फिर क्या था देश में अंग्रेजी राज के खिलाफ बगावत का बिगुल बज उठा।

जारी……..

9 Responses to “लोकमान्य! हम शर्मिन्दा हैं…..स्वराज को हम भूल गए”

  1. सागर नाहर

    कपिलजी की टिप्पणी से एकदम सहमत, उसे ही कॉपी पेस्ट मान लिया जाये।
    अगली कड़ी का इन्तजार है।

    Reply
  2. kapildev singh

    आप देश में गणमान्य, गण्यमान्य, धनमान्य, धन्यमान्य, संमान्य से लेकर अमान्य कुछ भी पा सकते हैं लेकिन अब देश में कहीं कोई लोकमान्य नहीं दिखता। लोकमान्य दिलों पर राज करता है वह आत्मा से राज करता है वह ताकत के बल पर, डण्डे के बल पर राज नहीं करता। सच कहें तो आज कहने के लिए लोकतंत्र है बाकी राज तो सामंती है, डण्डे का राज चल रहा है, भारत भ्रष्ट नेताओं और अफसरों और धनखोर बनियों के चंगुल में फंस गया है। गरीब और गरीब हो रहा है, अमीर और अमीर, गांव बदहाल हैं, शहर और शहरी एनसीआर, एनआरआई की बल्ले बल्ले है, अब कहां से लाएंगे लोकमान्य। कहां से आएंगे लोकमान्य। पैसा ही लोकमान्यता की गारंटी है,, पैसा नहीं तो कुछ नहीं,,और पैसा कमाने का रास्ता अब सीधा नहीं रह गया है,,पैसा कमाने के लिए पैसा पानी की तरह बहाना पडता है, बहाने के लिए जमकर कमाना पडता है,,जमकर कमाने के लिए जमकर उगाना पडता है, उगाने के लिए उगाहना पडता है, उगाहना के लिए उगाही देनी भी पडती है, अब आप तय करिए कि जिस देश में सिर से पैर तक यही फण्डा काम कर रहा है, वहां अब किस बात की गुंजाइश बचती है,,जाहिर है जो सक्षम हैं वो कमजोरों का पैसा भी हडप कर जाएंगे, अब रास्ता क्या है सिवाय लूटमार और धोखाधडी के,,,, भारत भयानक भूलभुलैया में फंस चुका है, जानते ये बात सभी हैं लेकिन कोई तिलक और कोई लोकमान्य बनने को तैयार नहीं है। क्योंकि लोकमान्य का रास्ता आज भी जेल से होकर ही निकलता है। कोई जेल अब क्यों जाना चाहेगा…

    Reply
  3. anil

    इसमें दो राय नहीं कि लोकमान्य तिलक हमारी आजादी के नायक थे, ऐसे नायक जिन्होंने अंग्रेजों के बहिष्कार को एक आंदोलन बना दिया। ऐसे आलेख समय की मांग हैं ताकि नई पीढी अपने नायकों के सपनों से अनजान ना रहे। राकेशजी को बधाई…आधुनिक राजनीति से तिलक के समय और उनके संघर्ष को जोडकर आपने परिस्थिति का अच्छा विश्लेषण किया है…

    Reply
  4. mahesh ranjan

    I have read all articles on tilak written by rakesh upadhyay. basically in which mode and style it has been written is like an article cum research paper. if he would have given the actual source of references then it become better.well….what was tilk? according my view he was a original thinker having a fighter attitude. by their true sense he was a real marahata. a vigourous personality he was.. he was really the actual embodiment of a pride india’s aspirations and ideals of our freedom struggle.

    once tilak wrote a marvolous peace in marahata, it shows his view about our country-‘ I regard India as my motherland..and my goddess, the people in india my kith and kin, ..and loyal and steadfast work fortheir political and social emancipation is my highest religion and duty..

    let us remember what were the word of Ram to laxman when matter coms to take rein of lanka in their own hand. what ram says to laxman….अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते..जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी…
    our motherland is more worthwhile than heaven.
    that was the emotions and inspirations of tilak about their motherland, taking their inspirations from their great traditions? where is the leaders in this country like tilak? we are unable to see in this political arena….thank you rakesh for writing such article.

    Reply
  5. समन्‍वय नंद

    samanwaya nanda

    भाई साहेब बहुत बढिया लेख है । यह बिलकुल सही टिप्पणी है । आपने वर्तमान संदर्भों में इसकी बहुत अच्छा विश्लेषण किया है ।
    इसके लिए हार्दिक अभिनंदन ।

    समन्वय नंद
    शिमला

    Reply
  6. जयराम "विप्लव"

    आज की राजनीति स्वराज नहीं बल्कि सुराज यानि “सुरा +राज ” के फार्मूले पर चाल रही है . दोष केवल उनका नहीं हम सभी भागीदार हैं . और राकेश जी आप भी कौन सी दकियानुशी बात को लेकर बैठ गए ! अरे , आपको पता नहीं स्वराज आदि की बात भूमंडलीकरण के युग में करना पिछडापन मन जाता है ! जमाना कहाँ से कहाँ जा रहा है ? लड़के -लड़के , लड़की-लड़की आपस में शादी कर प्रगतिशीलता को साबित कर रहे हैं एक आप हैं कि ……………………

    Reply
  7. vivek Jaiswal

    Lokmanya Tilak is never been a person he was a legend in his life time and after that also… to write in breif he was an epitome of courage and truth .. It is always been difficult to set a new wave and Shri Tilak did by setting a new dimension of cutural bravery and integral society.. yes we are shame ful and we shud be as we have drifted so much from our core values that now our fight has taken its direction from higher consiousness to lower subtle of material system, we have forgotten so much and lost our courage to so many times that it looks like revival has lost all his hope……
    But reading this article written by my elder brother, I once again feel fire is still present …. it is just we need a new revolution of burning the self and coming out of our den and comfort zone and face the sunlight… I dont say we once again need Mr. Tilak as time is now not so much difficult as it was in his days we just need a INDIAN to be reborned in every person with courage to say yes I am Indian and will live as an Indian, at any cost and will keep the names and spirits of our historical persons alive ….

    Reply
  8. shyam

    Rakesh ji,
    Aapne article shayad accha likha ho, itna interesting topic hote huye bhi mein isse zyada nahi pad paaya, I want to suggest you to read post of Mr. suresh chiplunkar. Try to observe their writing style.

    If article does not create interest then its difficult to read complete article. I do not want insult or teach you, just my observation.

    Thanks
    Shyam

    Reply
  9. abhisek

    great rakeshji great, ise likhna jari rakhie, lambe samay baad aisa article padhne ko mila hai, isme mudde ki baat hai….rajnetaon ko ise jaruur padhna chahie.

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *