सरदूल सिंह
इन दिनों धान मंडियों में फसल की आवक अपने चरम पर है। रबी की फसल—जिसे पंजाबी में ‘हाड़ी’ कहा जाता है—के अप्रैल से शुरू होकर जून तक चलने वाले इस दौर में खरीद-फरोख्त, परिवहन और रखरखाव का व्यापक काम होता है लेकिन किसान के लिए यह प्रक्रिया तब ‘कोढ़ में खाज’ बन जाती है, जब वह खेतों में मौसम की मार, नकली खाद-बीज, पानी की कमी और छोटी जोतों की अनुत्पादकता से जूझता हुआ अपनी फसल लेकर मंडी पहुंचता है। वहां उसे नए सिरे से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी), समय पर भुगतान न होने, धान में नमी (गीलापन) और दाम में कटौती जैसी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन तमाम दुश्वारियों को झेलने के बाद भी किसान पुनः इसी चक्र में जुट जाता है।
वर्तमान में फसलों की बिक्री का संकट कोई छोटा नहीं है। इसे गेहूं की खरीद में आ रही मौजूदा समस्याओं के व्यावहारिक उदाहरण से समझा जा सकता है। राजस्थान सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अतिरिक्त बोनस देना तय किया है, जिससे बाजार में इसकी कीमत ₹2765 प्रति क्विंटल निर्धारित की गई है। जैसा कि हम जानते हैं, खुली नीलामी में फसल अक्सर न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर बिकती है। यही कारण है कि खुले बाजार में गेहूं एमएसपी से कम दाम पर बिक रहा है और किसान को प्रति क्विंटल करीब ₹400 का सीधा नुकसान झेलना पड़ रहा है। यह स्थिति केवल गेहूं तक सीमित नहीं है; पिछली बार मूंग भी एमएसपी से ₹2000 कम पर बिका और मूंगफली का भी यही हाल रहा। व्यवस्था की खामियों को समझने के लिए गेहूं का यह उदाहरण बेहद सटीक है।
राजस्थान में श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिलों में गेहूं का सर्वाधिक उत्पादन होता है। आंकड़ों पर नजर डालें तो इस बार हनुमानगढ़ जिले में अनुमानित उत्पादन 8.62 लाख टन है जबकि खरीद का लक्ष्य 7.27 लाख टन रखा गया है—यानी उत्पादन से 15% कम। इसी प्रकार, श्रीगंगानगर का अनुमानित उत्पादन 8.39 लाख टन है और खरीद का लक्ष्य मात्र 5.6 लाख टन है, जो उत्पादन से 37% कम है। हद तो यह है कि फसल खरीदने के लिए बारदाने (थैलों) की उपलब्धता लक्ष्य की तुलना में मात्र एक-चौथाई ही है। इस वजह से खरीद की गति बेहद धीमी है। किसान के पास भंडारण की क्षमता नहीं है, वहीं दूसरी ओर बैंकों का कर्ज चुकाने की मजबूरी और अन्य पारिवारिक जरूरतों का भारी दबाव है। यही कारण है कि मंडियों में आए दिन विवाद और झगड़े हो रहे हैं।
व्यापारियों ने भी हड़ताल कर सरकार को इस गंभीर समस्या से अवगत करा दिया है।
प्रश्न यह उठता है कि आज के इस उच्च तकनीकी और एआई के दौर में बारदाने की आपूर्ति या फसलों के उठान जैसी समस्याओं का समाधान क्या वाकई इतना मुश्किल है? यदि बोरियां भर दी जाती हैं, तो उन्हें मंडियों से उठाने के लिए परिवहन संसाधनों की कोई कमी नहीं है। देश में ट्रकों और श्रम शक्ति (मजदूरों) की पर्याप्त उपलब्धता है। यदि भंडारण और रसद (लॉजिस्टिक्स) का नियोजन पहले से कर लिया जाए, तो इस संकट से आसानी से बचा जा सकता है। असल कमी नीति और नीयत की है।
अब किसानों की वास्तविक स्थिति को भी आंकड़ों के आईने में समझ लेना चाहिए। हमारे कृषि क्षेत्र में बड़े किसान लगभग 5%, मध्यम किसान 15% और छोटे या सीमांत किसान करीब 83% हैं। मंडियों में एमएसपी पर गेहूं बेचने की यह जद्दोजहद केवल मध्यम और बड़े किसानों तक सीमित है। छोटा किसान तो घर की तात्कालिक जरूरतों और कर्ज के लेन-देन के चक्कर में फसल कटते ही उसे पहले ही औने-पौने दामों में बेच चुका होता है। विडंबना यह भी है कि सरकार के नुमाइंदे और जनप्रतिनिधि स्वयं सरकार से गेहूं खरीद की मांग करते नजर आते हैं, जो अपने आप में हास्यास्पद है। यह केवल मध्यम और बड़े किसानों के बीच अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने की कवायद मात्र है।
अर्थशास्त्र के नियमों के अनुसार यदि इस समस्या के मूल कारण और समाधान पर बात की जाए, तो बाजार हमेशा अपनी औसत लागत और वैश्विक रुख से संचालित होता है। अब बाजार वैश्विक हो चुका है। दुनिया के बड़े पूंजीवादी देशों के पास विशाल कृषि फार्म हैं, जहां आधुनिक मशीनों और बेहद कम श्रम लागत से बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार उनके लिए खुला है। कूटनीतिक नीतियों का दबाव और वैश्वीकरण की नीतियां भारतीय मंडियों को सीधे प्रभावित करती हैं। बड़े पूंजीवादी देशों के एकाधिकारवादी माल को भारतीय बाजारों में खपाने के लिए बनाई जाने वाली आयात-निर्यात नीतियां अंततः हमारे किसानों पर भारी पड़ती हैं। यही कारण है कि हर सीजन में मंडियों में किसानों की दुर्दशा होती है, जिसका मुख्य कारण पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली का अंतर्विरोध है।
ऐसी स्थिति में, छोटे किसानों के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचता कि वे अपनी छोटी-छोटी जोतों को मिलाकर सहकारी नहीं ‘साझा या सहयोगी खेती’ (Allied Farming,not cooperative farming) अपनाएं। आधुनिक तकनीकों और मशीनों का सामूहिक उपयोग करके ही वे अपनी उत्पादन लागत को कम कर सकते हैं और अपनी श्रम शक्ति का सही मूल्य वसूल सकते हैं। अन्यथा, पूंजीवादी दौर में मंडियों पर बड़े कॉरपोरेट्स के कब्जे के कारण छोटा और महंगी लागत पर खेती करने वाला उत्पादक हमेशा नुकसान में रहेगा और धीरे-धीरे इस व्यवस्था से बाहर हो जाएगा। सरकार के बयान चाहे जो भी हों, जमीनी हकीकत अव्यवस्थाओं की ही गवाही देती है।
इस संकट का प्राथमिक समाधान ‘साझा सहयोगी खेती’ के माध्यम से लागत कम करना और दीर्घकालिक रूप से संपूर्ण कर्जमुक्ति है। बड़ा किसान तो बाजार के इन झटकों को झेल जाता है और अपने राजनीतिक दबाव से सरकार से कुछ न कुछ राहत भी पा लेता है, लेकिन 83% छोटा किसान पूंजीवादी व्यापार चक्र के उतार-चढ़ाव और महंगाई की मार से हमेशा के लिए तबाह हो जाता है। इसके अभाव में किसान संगठन भी हर सीजन में केवल अपनी फसल बेचने के संघर्ष, धरने, प्रदर्शन और घेराव के एक अंतहीन चक्रव्यूह में फंसे रह जाएंगे।
मंडी व्यवस्था में पूंजीवादी उतार-चढ़ाव का एकमात्र स्थायी समाधान एक ऐसी सुदृढ़ व्यवस्था के अंतर्गत ही संभव है, जिसमें उत्पादन, वितरण, विनिमय, उपभोग और पुनरुत्पादन की संपूर्ण प्रक्रिया को पूरी तरह योजनाबद्ध (Planned Economy) किया जाए। इसके बिना किसानों की बुनियादी स्थिति को नहीं बदला जा सकता; तात्कालिक तिकड़मों या अंतरिम राहतों से कुछ किसानों को थोड़ी बहुत राहत भले मिल जाए पर संकट जस का तस रहेगा।